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December 26, 2010

मुक्ति-पथ'ः दलित-वाम एका पथ

'मुक्ति-पथ'
दलित-वाम एका पथ

अभय मोर्य का 'मुक्ति-पथ' उपन्यास समाज में विभिन्न शक्तियों के बीच बहुस्तरीय टकराहट अन्तविर्रोधों को अभिव्यक्त करते हुए समाज में सक्रिय विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक शक्तियों की पहचान कराता है। दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त करने आए चार नवयुवकों के माध्यम से शहरी उच्चवर्ग और ग्रामीण जीवन के बीच मौजूद भारी अन्तर दर्शाने के माध्यम से सांस्कृतिक अन्तर को भी रेखांकित करता है। दलित राजनीति की अवसरवादी और मुक्तिकामी धाराओं के बीच जारी टकराहट को तथा धर्म के नाम राजनीति करने वाले कथित 'शुद्धतावादियों' के छद्म को उद्घाटित किया है।
भारतीय समाज मुख्यत: दो वर्गों में बंटा है एक जो पूरी तरह भोग-विलास, ऐश्वर्य मौज-मस्ती में संलिप्त है, दूसरी ओर ऐसे लोगों की बहुतायत है जिनके पास पेट भरने के लिए पर्याप्त भोजन, पहनने के लिए आवश्यक कपड़े पीने के लिए स्वच्छ पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं भी नहीं हंै। जन्म लेते ही जिन्दा रहने का संघर्ष शुरू हो जाता है। विजय के बचपन के वर्णन से इसको काफी विस्तार दिया गया है। जिससे ग्रामीण जीवन की सच्ची तस्वीर उभरती है और गांव का रोमांचकारी मिथ भी टूटता है। दूसरी तरफ मधु का बचपन है जिसे कभी किसी चीज की कमी का अहसास ही नहीं होता, उसके लिए तमाम सुविधाएं हाजिर हंै।
मधु और विजय की जीवन-शैलियों में भारी अन्तर वास्तव में दो वर्गों के बीच दूरी ही दर्शाता है। इसीलिए मधु को विजय का बचपन अति रोमांचकारी साहसिक कथा के नायक की तरह लगता है, जबकि विजय जैसी पृष्ठभूमि के हरेक व्यक्ति का जीवन ऐसा ही बीतता है जैसे लेखक ने वर्णन किया है। मधु का विजय की कहानी सुनकर आश्चर्य व्यक्त करना असल में उसकी भारतीय जीवन की सच्चाइयों से अनभिज्ञता ही है। दोनों के बीच मौजूद असमानता की चैड़ी गहरी खाई दोनों को एक दूसरे के प्रति सहज नहीं होने देती। विजय में गांव का गरीब होने पर हीनता-बोध है तो मधु उसकी मण्डली के लिए वह 'दूसरे ग्रह का जानवरÓ, 'गंवारÓ, 'पहेलीÓ है। समाज के ये दोनों वर्ग एक दूसरे के सह-अस्तित्त्व में नहीं रह रहे, बल्कि एक की कीमत पर दूसरे का विकास हो रहा है। इसने समाज में ऐसा असंतुलन पैदा कर दिया है एक वर्ग तो अपने अभावों से ग्रस्त होकर विकास नहीं कर पाता और दूसरा बहुतायत के कारण विकृतियों का शिकार हो जाता है। पूंजीवादी-सामन्ती सामाजिक संरचना की निर्मिति वर्ग-व्यवस्था इसी तरह के असामान्य मानव पैदा कर रही है। मधु और विजय का बचपन स्पष्ट तौर पर दो श्रेणियों का प्रतिनिधित्व करता हंै। एक 'इंडियाÓ का निवासी है तो दूसरा 'भारतÓ का। 'इंडियाÓ के लोग 'भारतÓ के बारे में सोचते ही नहीं।विडम्बना यही है कि 'इंडियाÓ के लोगों के हाथ में ही 'भारतÓ के लोगों का भविष्य है। वही नीति-निर्माता हैं, इन्हीं के पास साधन हैं और इन्हीं के पास वास्तविक राजनीतिक शक्ति है। इस शक्ति को प्रयोग करके ये अपने वर्ग के लिए समस्त नियामतें सुरक्षित करते जाते हैं। इसीलिए यह वर्ग तो खूब फलफूल रहा है, अपने बैंक-बैलेंस गिन रहा है, शेयर खरीदनें की होड़ लगी है।इस वर्ग को सूझ नहीं रहा कि वह कहां कहां अपनी धन-सम्पति को निवेश करे, दूसरी ओर किसान हैं जो अभावों के कारण आत्महत्याएं कर रहे हैं। उच्च वर्ग उपभोक्तावाद की ग्लोबल ऐयाशी में मस्त है। विजय और मधु की बातचीत में इस वर्ग की सच्चाई सामने जाती हैै।
''मुझे लगता है कि तुमने हिन्दुस्तान में हो रही बहुत सारी बातों के बारे में कभी सोचा ही नहीं होगा?ÓÓ
''तुम यही कहना चाहते हो कि मैं असली भारत को जानती ही नहीं, पहचानती ही नहींÓÓ
''हां, यह सच नहीं है क्या? मेरा भारत और तुम्हारा इंडिया अलग-अलग देश नहीें है क्या?ÓÓ
''हो सकता है, पर इसमें मेरा क्या कसूर है? हमें वैसे ही पाला-पोषा जाता है, जैसे विदेशों में होता है, उसी तरह के तौर-तरीके सिखाए जाते है, वैसे ही संस्कार हमें दिये जाते है।ÓÓ
शायद तुम्हारे वर्ग ने तुम्हारे जैसे गिने-चुने लोगों को ही असली भारत मान लिया है। और यही भारत झलकता है तुम्हारे बड़बोले-से नारे में 'मेरा भारत महान।Ó सच्चाई में कितनी दूर है यह नारा! कितना खोखलापन है इसमें! कितना धोखा है इसमें ''(पृ. 40-41)
भट्ट, सुरजीत, मोना और मेहश की भोगलिप्सा ही उच्च वर्गीय जीवन का सार है। एकमात्र धन ही इनके जीवन को परिचालित करता है। इसके लिए मोना अपने पिता की उम्र के बूढे भट्ट से विवाह कर सकती है, देह को बेच सकती है। इसी धन के लिए विजय की हत्या का षडयन्त्र रचते है। जो इस वर्ग के तौर-तरीके नहीं अपनाता उसके लिए इसमें कोई जगह नहीं है। विजय के प्रति भट्ट की नफरत को कारण यही है कि उसने उसकी बेटी को नशे सैक्स के गलीजपने से बाहर निकाल दिया है ''मधु हमारी जमात का शत्रु बन गई है। और इसके लिए वह मिट्टी का माधो विजय जिम्मेदार है। उसका तो कोई परिवार है, उसके कोई तहजीब उच्च वर्ग के लोगों के तौर-तरीके। मधु पूरी तरह से भटक गई है, वह हमारे वर्ग की शत्रु बन गई है।ÓÓ (पृ.-263)
इस वर्ग के 'तौर-तरीकेÓ 'तहजीबÓ का मॉडल रूप मोना हैै। इस वर्ग के 'तौर-तरीकेÓ 'तहजीबÓ सुरजीत में है जो हमेशा दूसरों का चरित्र हनन करता है 'इस्तेमाल करो और फेंक दोÓ की संस्कृति में गहरा विश्वास रखता है। स्वाभाविक ही है कि विजय जैसा स्वस्थ संस्कृति का प्रगतिशील व्यक्ति इनमें नहीं खप सकता है।
'मुुुक्ति-पथÓ उपन्यास में दलित-राजनीति को बहुत ही दिलचस्प ढंग से उठाया गया है। उपन्यास के प्रमुख पात्रों में से दो दलित हैं- महेश और नफे सिंह - दोनों की राजनीतिक-सामाजिक मान्यताएं कार्य केवल भिन्न हैं बल्कि परस्पर विरोधी हैं। इनके माध्यम से दलित राजनीति के विभिन्न पक्षों को उद्घाटित किया है। महेश दलित राजनीति की अवसरवादिता, जातिवादिता और स्वार्थीपन का प्रतिनिधि है नफे सिंह जातिवाद को समाप्त करके जातिविहीन-शोषणमुक्त समाज के लिए संघर्ष करने वाला। महेश दलितों को जाति के आधार पर गोलबंद करके उनको बृहतर संघर्षों से काटने वाली राजनीति का चैंपीयन है तो नफे सिंह दलितों को समाज के अन्य उत्पीडि़त एवं संघर्षशील वर्गों से एकता स्थापित करने वाला। लेखक ने दलित राजनीति धाराओं को पहचानकर महत्वपूर्ण काम किया है। अक्सर दलित राजनीति या दलित सवाल पर बात करते हुए ऐसी श्रेणियां बनाने से चिंतक-विचारक बचते हैं। ऐसा मान लिया जाता है कि जैसे दलितों में कोई मतभेद नहीं हैं। एक ऐसे वर्ग के तौर पर उस की गिनती कर ली जाती है जैसे कि एक जैसा है (होमोजिनियस) और इस एक जैसा मान लेने के बहुत गम्भीर खतरे होते हंैं। इसमें जो वर्चस्वी धारा होती है उसी पर चर्चा होती है, उसी को प्रतिनिधि मान लिया जाता है और अन्य धाराएं उपेक्षित हो जाती हैं और इसका अर्थ है जिनको कि शासन सत्ताएं चर्चा में लाना चाहती हैं उनको तो चर्चा में ले आती हैं उनके विचारों और मंतव्यों को तो प्रचारित-प्रसारित करती हैं और जिस धारा को दबाना चाहती हैं उसको दबा देती हैं। अल्पसंख्यक विशेषकर मुसलमानों के साथ यही हुआ कि उसे एक ऐसा समुदाय मान लिया गया, जिसमें कोई मतभेद नहीं हैं, और वही छवि प्रसारित की गई जो कि शासन-सत्ताओं को रूचती थीं,यानी उनकी छवि दकियानूसी समुदाय के रूप में, धार्मिक-कट्टर समुदाय के रूप में और अशान्ति फैलाने वाले हिंसक-क्रूर समुदाय के रूप में प्रचारित किया गया। इसके भंयकर नुक्सान मुसलमानों में मौजूद धर्मनिरपेक्ष-प्रगतिशील वर्ग को हुआ, उनकी आवाज दबकर रह गई, उन्हें उनका वास्तविक प्रतिनिधि नहीं माना गया और मुसलमान भी अपने नेता के रूप में बहुप्रचारित कट्टर को ही मानने लगे। उनकी स्वार्थभरी संकीर्ण व्याख्याओं को ही इस्लाम का प्रामाणिक पाठ माना गया। दलित-वर्ग और उसकी राजनीति के साथ भी अभी तक यही हो रहा है कि उसे एकरस एकरूप माना जा रहा है, उसमें मौजूद विविधताओं को कभी रेखांकित नहीं किया जाता। जो सत्ता को रास आती है उसको दलित राजनीति कह दिया जाता है और उसके अनुकूल नहीं बैठती उसे किसी दूसरे खाते में डाल दिया जाता है। इस उपन्यास के लेखक ने नफेसिंह की राजनीति और महेश की राजनीति में स्पष्ट अन्तर करते हुए दलित राजनीति में मौजूद विभिन्नताओं को उद्घाटित करते हुए उसके वर्गीय चरित्र को उद्घाटित किया है।
उपन्यासकार ने महेश को सवर्ण-जमींदार रणजीत सिंह की अवैध संतान के तौर पर निर्मित किया है, जो जमींदार के धन पर ही गुलछर्रे उड़ाता है और आगे बढ़ता है। असल में तो महेश ही जमींदार का 'असलीÓ बेटा साबित होता है जो उसकी सामन्ती-पिछड़ी मान्यताओं का संवाहक बनता है। महेश की मात्र भौतिक उत्पत्ति ही जमींदार द्वारा नहीं बल्कि कहना चाहिए कि महेश की अवसरवादी-विचारधारा राजनीति भी जमींदारों-पंूजीपतियों की नाजायज संतान है, जो पैदा तो दलितों के यहां हुई है लेकिन जिसका स्रोत वर्चस्वी लोगों और पैसे वालों के यहां है। वही उसकी जातिवादी राजनीति के 'फाइनेंसरÓ हैं। दलित-मुक्ति का नकाब ओढ़कर महेश जैसे घोर स्वार्थी लोग असल में अपने लिए पद, पैसा और प्रतिष्ठा हासिल कर रहे हैं। दलित-मुक्ति का ढोंग रचाकर दलितों को जाति के आधार पर एकत्रित करके उनकी वोटों का सौदा कर रहे हैं और बदले में स्वयं को प्रतिष्ठापित कर रहे हैं। अपनी काली करतूतों, आपराधिक, अमानवीय अनैतिक कार्यों को बड़ी चालाकी से दलित-मुक्ति की संज्ञा देकर अपने स्वार्थ हल करते जाते हैं। महेश ''अक्सर नई-नई लड़कियों के साथ घूमता नजर आता। सभी लड़कियां रंग में एक से बढ़कर एक गोरी होतीं। वे अक्सर सवर्ण कन्याएं होती थी। एक बार जब महेश नफेसिंह को रास्ते में मिल गया, तो उसने महेश से पूछ लिया, ''तुम इतनी लड़कियों की जिंदगी के साथ क्यों खिलवाड़ कर रहे हो?ÓÓ
महेश ने तपाक से जवाब दिया, ''मैं तो सवर्ण-जातियों द्वारा दलितों पर सदियों से किए गए अत्याचार का बदला ले रहा हूं।ÓÓ
नफेसिंह दंग रह गया। महेश अपने बड़े से बड़े अपराध के औचित्य का भी आधार ढंूढ लेता था।ÓÓ (पृ.-207) उपन्यासकार ने सही ही उजागर किया है कि बदले की कार्रवाई को किसी भी तरह से दलित-मुक्ति का कार्य नहीं कहा जा सकता। सदियों तक जो सवर्णों ने दलितों पर किया, शक्ति हासिल करने पर दलित वही सवर्णों के साथ करेगें की मान्यता किसी भी तरह से तो उचित है और इसे दलित-मुक्ति की संज्ञा देना तो कतई उचित नहीं है। ऐसा कहने-करने वाले लोग असल में कुंठाग्रस्त मानसिक तौर पर बीमार हैं, जो अपने अनैतिक कार्यों को वैध ठहराने की कोशिश इस रूप में करते हैं। समझने की बात यह है कि दलित-मुक्ति एक सकारात्मक एजेंडा है, नकारात्मक नहीं। यह किसी प्रतिक्रिया स्वरूप नहीं उपजा, बल्कि इसका जो अपना मानवीय-दार्शनिक आधार है, उसी पर चलकर ही इसे हासिल किया जा सकता है। फिर यह भी देखने की बात है कि दलित-मुक्ति का प्रश्न अकेले दलितों से नहीं जुड़ा। केवल दलितों को ही मुक्त नहीं होना है, बल्कि ब्राह्मणवादी विचारधारा के अहं एवं श्रेष्ठता-बोध से ग्रसित सवर्ण को भी इस अमानवीय विचार से मुक्ति पानी है। ब्राह्मणवादी विचारधारा से जहां दलित को दोयम दर्जे का माना जाता है, वहीं सवर्ण को भी यह कभी सामान्य नहीं होने देतीं, इस संस्कार से ग्रस्त होकर वह मानव गरिमा का भी सम्मान नहीं कर पाता।
महेश की दलित-मुक्ति के एजेंडे की पोल उसी समय खुल जाती है जब वे 'मनु-स्मृतिÓ को संविधान के तौर पर अपनाने की वकालत करने वाले घोर मनुवादी-साम्प्रदायिक शक्तियों से गलबहियां करते हैं। आम्बेडकर का नाम लेकर राजनीति करने वाले महेश जैसे भ्रष्ट स्वार्थी दलित-नेताओं बुद्धिजीवियों ने ही आम्बेडकर के सिद्धान्तों दलित-मुक्ति की राजनीति का गला घोंटा है। हां, इस अवसरवाद के चलते दलित नेतृत्व में सरकारें भी रह चुकी हैं, जिसका दलितों को तो कोई लाभ शायद ही हुआ हो लेकिन घोर भ्रष्टाचार सामन्ती रुख के किस्से राजनीति में जरा भी रुचि रखने वाला हर व्यक्ति जानता है। समाज-परिवर्तन में रुचि रखकर सत्ता की राजनीति करने वाले दलित-नेतृत्व का यही तर्क फार्मूले को लेखक नफेसिंह महेश की बातचीत में स्पष्ट किया है, महेश कहता है कि ''हम बाबा साहेब आम्बेडकर द्वारा दशाये गए रास्ते पर चलेंगे। हम मनुवादी पार्टियों में से एक के साथ होने का दिखावा करेंगे और उसे दूसरी मुख्य मनुवादी पार्टी पर धावा बोलने के लिए उकसाएंगे। उनमें फूट डालेंगे और अपना राज कायम करेंगे। (पृ.-213) ध्यान देने की बात है कि डा. भीमराव आम्बेडकर ने मात्र सत्ता-प्राप्ति को कभी तो अपना मकसद बनाया और ही सत्ता की राजनीति के वे कायल थे। वे राजनीतिक सत्ता अपना राज कायम करने के लिए नहीं, समाज सुधार दलितों को शोषण से मुक्ति के लिए प्राप्त करना चाहते थे। बिना समाज परिवर्तन सुधार की राजनीति के आलोचक थे। उनकी लड़ाई का मकसद सत्ता प्राप्ति नहीं था, बल्कि समाज में आमूल चूल परिवर्तन था, इसलिए वे प्रतिक्रियावादी शक्तियों से कभी समझौता करने की सोच ही नहीं सकते थे। वे इस बात को बार बार रेखांकित करते थे कि जिन शक्तियों से सामाजिक तौर पर स्पष्ट संघर्ष है उनसे राजनीतिक मित्रता कैसे हो सकती है। सही भी है कि जिन लोगों की मदद से सत्ता हासिल की जायेगी, उनके विरूद्ध संघर्ष कैसे किया जा सकता है। असल में यह आम दलितों को अपने पीछे लगाए रखने के लिए गढा गया तर्क है और अपने स्वार्थ वर्ग-समझौते को छिपाए रखने का शब्दजाल, जिसका कोई तो दार्शनिक आधार है और ही किसी दलित चिंतक ने इस विचार को स्थापित किया है।
असल में यह भी भ्रम ही है कि मनुवादियों को आपस में लड़ाकर दलित सत्ता हासिल कर लेंगे, फिर यदि कोई दलित राजगद्दी पर बैठ भी जाता है और दलितों को सामाजिक-न्याय सम्मान नहीं मिलता, सामाजिक सम्पत्ति में हिस्सा नहीं मिलता तो उससे 'मनुवादियोंÓ को क्या फर्क पड़ता है। मनुवादियों की नीति और सत्ता तो नीतियों के माध्यम से ही कायम रहती है। विडम्बना ही है कि दलित नेतृत्व में सरकार घोर-मनुवादी राजनीतिक पार्टी की मदद से ही बनी है। दलित अवसरवाद को महेश के माध्यम से उपन्यासकार ने व्यक्त किया है।
दक्षिणपंथी शक्तियां महेश को दलितों का जाति के नाम पर संगठन खड़ा करने तथा उसको वामपंथियों के विरुद्ध करने के लिए खूब धन देते हैं। वे दलित और वामपंथियों में एकता नहीं होने देना चाहते क्योंकि वे अच्छी तरह पहचानते हैं कि दलितों का वामपंथियों से जुड़ाव मनुवादी-पंूजीवादी-सामंतवादी के वर्चस्व को चुनौती होगा इसलिए नफेसिंह और विजय के संघर्ष के बाद दक्षिणपंथियों की मंत्रणा इस पक्ष को सही ही उद्घाटित करती है।
''दलितों और वामपंथियों का एक होना हमारे लिए बहुत ही खतरनाक सिद्ध हो सकता है। हमें यह ठीक से समझ लेना चाहिए कि वामपंथियों का शोषितों का पक्षधर होना, उनके हित में आवाज उठाना कभी कभी दलितों को उनके करीब ला सकता है। यदि बहुत सारे अछूतों के मन में यह बात घर कर गई कि वामपंथी ही उनके असली हितैषी हैं, उनकी विचारधारा में ही दलितों का संपूर्ण उद्धार निहित है, उसी में उनके अंतिम उद्धार की मंजिल छिपी है, धर्म को राजनीति से अलग करने और उसके साथ-साथ जात-पात के चलन को सामाजिक जीवन पूर्णत: मिटाने से ही दलित लोग समाज में बराबरी का स्थान पा सकेंगे, तो दलितों को वामपंथियों के समीप आने से कोई नहीं रोक सकता। हमें यह भी समझ लेना चाहिए कि वामपंथी वास्तव में ऐसा ही चाहते हैं, उनकी विचारधारा में धार्मिक क्रिया-कलापों और जात-पात के लिए कोई स्थान नहीं। यदि दलितों को यह बात समझ में गई तो सारे देश में वामपंथियों का 12-14 प्रतिशत और 15-17 प्रतिशत दलित वोट मिलकर एक भयावह समीकरण को जन्म दे सकता है। इतनी बड़ी शक्ति के रूप में उभरकर शीघ्र ही 50 प्रतिशत से भी अधिक हो जाएंगे। तब हमारे खात्मे को कोई नहीं टाल सकता। ऐसा होने पर समाज में हमारा एकाधिपत्य, हमारा दबदबा हमेशा के लिए मिट जाएगा, हमारे प्रेरणास्रोत और धनाधार सदा के लिए सूख जायेंगें, हमारे दानवीर कुबेर, जो हमारे तमाम तामझाम के लिए हम पर धन वर्षा करते हैं, इस से मुंह फेर-लेंगे। जाहिर है कि हमारा भला इसी में है कि हम दलितों को वामपंथियों से दूर रखने की हर संभव कोशिश करें, साम, दाम, दंड, भेद, आदि सभी हथकंडों का प्रयोग करके दलितों को उलझाए रखें, उन्हें वोट बैंक की राजनीति की दलदल में धकेल दें, उनके कुछ चुनिंदा नेताओं की महत्वाकांक्षाओं को इतनी हवा दें कि वे वामपंथियों को अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वियों के रूप में देखते रहें, उन्हें अपना सबसे बड़ा शत्रु मानते रहें। यही नीति हमें काफी अर्से तक बचा सकती है।ÓÓ(पृ.-107-108) दक्षिणपंथी राजनीति की मंशा को बहुत ही सही ढंग से उजागर किया है। दलित राजनीति और घोर-दक्षिणपंथी राजनीति के गठजोड़ के अन्त: सूत्र भी इससे खुलते हैं। इस रहस्य से भी पर्दा उठ जाता है कि बड़े-बड़े धन्ना सेठ, पंूजीपति जमींदार जो आम दलित से घृणा करते हैं, दलित राजनीति से भी घृणा करते हैं वे दलित नेताओं को इतना धन क्यों देते हैं और जातिवादी राजनीति को बढ़ावा देने के लिए क्यों तत्पर रहते हैं। असल में जातिवादी राजनीतिक गोलबंदी चाहे वह दलितों की हो या सवर्णों की हमेशा समाज के उच्चवर्ग को ही लाभ पहुंचाती है। सामाजिक परिवर्तन की राजनीति करके मात्र सत्ता हासिल करने और उसे बनाए रखने की राजनीति तो असल में उच्चवर्गीय यथास्थितिवादी राजनीति का ही रूप है। यह बात भी इसी से समझ में जाती है कि दलितों के बड़े नेता ऐसा क्यों कहते रहे कि 'यदि एक कमरे में कम्युनिस्ट और सांप हों तो पहले कम्युनिस्ट को मारोÓ उनकी यह टिप्पणी पंूजीवाद के समर्थन में रहती है। यह बात भी अच्छी तरह इस उपन्यास का लेखक उद्घाटित करता है कि आंबेडकर और माक्र्स यानी दलितों वामपंथियों के प्रेरणा-स्रोत के बीच व्याप्त मतभेदों को एक दूसरे के विपरीत क्यों खड़ा कर दिया जाता है और उनमें मौजूद समानता का जिक्र भी नहीं किया जाता है। वर्ग बनाम वर्ण का विवाद खड़ा करके ऐसा बना दिया जाता है मानो कि दोनों एक-दूसरे विपरीत हों। जबकि जाति-व्यवस्था या वर्ण-व्यवस्था भारतीय समाज में असमानता शोषण को वैध-ठहराने का काम ही तो करती रही है। शोषणकारी व्यवस्थाओं और वर्गों ने अपने शोषण को जारी रखने के लिए समाज में तरह-तरह की संरचनाएं निर्मित की हैं। भारतीय समाज में वर्ण-व्यवस्था ऐसी व्यवस्था है जिसमें अधिकांश आबादी को ज्ञान, सत्ता शक्ति सम्पत्ति से वंचित करके उसका शोषण किया है। वर्ण-व्यवस्था या जाति-व्यवस्था की समाप्ति के बिना किसी वर्ग-विहीन समाज की कल्पना नहीं की जा सकती और बिना वर्ग-विहीन समाज के निर्माण का मकसद लिए वर्ण-व्यवस्था समाप्त नहीं की जा सकती। वर्ण-व्यवस्था को समाप्त करने और वर्ग-व्यवस्था को समाप्त करने का संघर्ष एक-दूसरे के विपरीत नहीं है बल्कि ऐसे दूसरे का पूरक है। इसमें पहले किसे समाप्त किया या पहले किससे संघर्ष किया जाए, यह प्रश्न बेमानी है, चंूकि दलित को तो दोनों ही तरह के शोषण से गुजरना पड़ता है।
'मुक्ति-पथÓ में दलित के आर्थिक-शोषण और सामाजिक शोषण को एक सिक्के के दो पहलुओं की तरह से रेखांकित किया है। आर्थिक स्थिति व्यक्ति के सामाजिक दर्जे को परिभाषित करती है, तो उसकी सामाजिक स्थिति उसके आर्थिक शोषण का आधार तैयार करती है। किसके प्रति संघर्ष हो या फिर पहले किससे हो यह सवाल तो असल में दलितों में भ्रम पैदा करने और उनके संघर्ष को कुंद करने का ही हथियार है। जमींदार रणजीत सिंह महेश के पिता बारु का आर्थिक शोषण करता है। भारी भरकम ब्याज घर के खर्चे के कारण बारु की हालत बंधुआ मजदूर की है। वह पूरी तरह जमींदार के नीचे दबा हुआ है। उसकी पत्नी धन्नो का जमींदार यौन-शोषण करता है और वह उसका विरोध नहीं कर पाती। जमींदार उस पर डोरे डालने की कोशिश करता है तो वह बचने के लिए छूत का वास्ता देती है। जमींदार सबको बराबर समझने की बात करता है तो ब्याज माफ करने की बात करती है लेकिन जमींदार रणजीत कहता है कि ''देख धन्नो, मैं जमींदार जरूर संू, लेकिन जे तौं ईसे तरां म्हारै तै बात करदी रैगी, तो सब ठीक-ठाक हो जैगा। (पृ.-21) धन्नो अपनी स्थिति समझती है और जमींदार भी उसकी स्थिति को बहुत अच्छी तरह समझता है इसलिए वह बेधड़क होकर उसका शारीरिक शोषण करता है। यह बात कोई चोरी छुपे नहीं थी बल्कि इस बात का धन्नों के पति बारु को भी अच्छी तरह पता था, वह भी इसका विरोध नहीं करता। इस शोषण की जड़ में उसका आर्थिक शोषण ही है जो उसको चुप रखता है वरन् भारतीय पुरुष प्रधान समाज में कोई भी पुरुष अपनी पत्नी से किसी अन्य व्यक्ति से संबंधों को किसी भी तरह से सहन नहीं कर सकता। यदि धन्नों और बारु आर्थिक रूप से जमींदार रणजीत सिंह पर निर्भर हों तो उनका सामाजिक शोषण संभव नहीं है। दलित-मुक्ति की प्रगतिशील राजनीति के संवाहक नफेसिंह की दृष्टि से सामाजिक शोषण की जड़ में बैठी आर्थिक स्थिति कभी ओझल नहीं होती। इसलिए वामपंथी राजनीति में भूमि-सुधार का मुद्दा इतने जोरदार ढंग से उठाया जाता है। गांव में जमीन का मालिकाना एक तरह से सामाजिक सम्मान की गारंटी है। दलित मुक्ति की लड़ाई में जरूरत है दलितों और वामपंथियों में एकता के आधार बिन्दुओं को पुख्ता करने की कि उनमें वैमनस्य पैदा करने वाले फूट डालने वाले बिन्दुओं को हवा देने की। इस उपन्यास के लेखक ने दलित-मुक्ति और वामपंथी राजनीति को परस्पर पूरक के रूप मे देखा है। नफेसिंह की राजनीतिक चेतना समझ इस बात को बार-बार रेखांकित करती है कि वामपंथी विचारधारा अपनाकर ही दलित-मुक्ति के उद्देश्य को हासिल किया जा सकता है। अपने विद्यार्थी जीवन के और अध्यापक बनने के बाद के संघर्षों में तथा गांव में जाति-पंचायत के उत्पीडऩ के दौरान वामपंथी राजनीति में उसका विश्वास पक्का हुआ है।
नफेसिंह दलितों के सामाजिक सम्मान मानवीय गरिमा की लड़ाई को आर्थिक स्वतन्त्रता की लड़ाई के साथ जोड़कर देख रहा है। उसकी तार्किक विश्लेषणात्मक समझ ने इस बात को पहचान लिया है कि दलितों मसीहाओं के नाम पर पार्क बनवाने, सड़कों के नाम रखने से, विश्वविद्यालय के नाम रखने से, चैक पर उनकी बड़ी-बड़ी प्रतिमाएं स्थापित करने से दलितों का उद्धार नहीं हो सकता। दलितों में से कुछ अफसर, मंत्री, बनने धन बटोरने से भी दलितों का उद्धार नहीं हो सकता, जातीय-उत्पीडऩ समाप्त नहीं हो सकता। क्योंकि जिन पार्कों-विश्वविद्यालयों का नाम दलित-मसीहाओं के नाम पर रखा जाता है उनमें घूमने पढऩे की फुरसत कूवत दलितों में नहीं है। दलित-मुक्ति के लिए उसका मानना है कि ''हमें भारतीय समाज से लोगों को दलित बनानेवाले कारणों को उखाड़ फंकना है, रोग को जड़ से खत्म करना है और यह तभी हो सकता है जब भारत में एक वर्ग रहित और धार्मिक जंजाल से मुक्त यानि जाति-पाति के जंजाल से मुक्त समाज कायम होगा, राजनीति का ढांचा बनेगा।ÓÓ ... ''हां, साम्यवादी, समाजवादी दलितों के स्वाभाविक साथी हैं। उनके साथ मिलकर तो चलना ही चाहिए। यहां किसी को एक दूसरे का आधार छीनने का या खोने का सवाल ही पैदा नहीं होता। बात तो सांझे लक्ष्य को प्राप्त करने की है, गरीबी, बेरोजगारी, जातीय उत्पीडऩ से मुक्ति पाने के लिए संघर्ष करने की बात है, संपूर्ण उद्धार की ओर बढऩे की बात है, दलितों की संपूर्ण मुक्ति का सवाल है। हमारी बीमारी एक समान है, हमारे दुखदर्द एक जैसे हैं, हमारा उत्पीडऩ एक जैसा है और यदि आप ध्यान से देखें तो हमारे उत्पीड़क, हम पर अत्याचार करने वाले एक ही वर्ग के लोग हैं, एक ही तरह की जमात हैं। और वह जमात है भारत के सरमायदारों की, जमींदारों की, उनके नाना प्रकार के एजेंटों की, जिनमें तुम भी शामिल हो रहे हो, महेश भैया। इसलिए मुझे अपने रास्ते से हटाने की बजाए तुम मेरे साथ चलना शुरू करो, तुम मेरे साथ आओ। हमारा लक्ष्य एक है, और दुश्मन भी एक ही है, यानि मनुवादी सरमायदार और जमींदारÓÓ, नफेसिंह ने महेश की ओर देखते हुए कहा।ÓÓ (पृ.-216) नफेसिंह के विचार संघर्ष की दिशा स्पष्ट है जो दलितों का सही मुक्ति पथ है जिसपर चलकर ही दलित-मुक्ति का उद्देश्य संभव है। विडम्बना यही है कि दलित आन्दोलन की प्रभावशाली धारा अभी महेश उस जेसे ही स्वार्थी, संकीर्ण जोड़-तोड़ करके अपनी नेतागिरी चमकाने वाले पंूजीपतियों-जमींदारों के नाजायज धन पर पलने-पनपने वालों के हाथ में है और नफेसिंह जैसे निस्वार्थ, संघर्षशील नवयुवक इनका कोपभाजन बन जाते हैं। वे इन ईमानदार लोगों को कोसते रहते हैं, गद्दार कहकर बदनाम करते हैं।
'मुक्ति-पथÓ उपन्यास के लेखक की शैली में खास बात यह है कि वह पर्दे के पीछे की सोच को एकदम सामने ले आते हैं। दक्षिणपंथी राजनीति अवसरवादी दलित राजनीति को उनके ही मुंह से उद्घाटित करते हैं जिससे साफ पता चलता है कि समाज में जो शक्तियां सक्रिय हैं वे अनजाने में नहीं चल रहीं बल्कि उसके पीछे वर्ग-स्वार्थ हैं, वर्गों की योजनाएं हैं। वामपंथ और दलित राजनीति पर महेश उसके साथी तथा नफेसिंह के बीच हुई बहस के दौरान का प्रसंग उद्धृत करना प्रासंगिक रहेगा। ''और फिर लाल झण्डे वालों से तुम्हें परहेज क्यों है वे तो शोषितों और दलितों के स्वाभाविक समर्थक हैं, साथी हैं। उन्हें क्यों आप अपना दुश्मन समझते हैं? नफेसिंह ने पूछा।
''नहीं! तुम बहुत बड़ी भूल कर रहे हो! स्वाभाविक साथी होने के कारण ही लाल झण्डेवाले हमारे लिए खतरनाक हैं। उनके नेता और कार्यकत्र्ता बड़े ही ईमानदार, समझदार, निष्ठावान और कर्मठ होते हैं। तुम्हारी तरह वे भी बहुत नेक और नि:स्वार्थी होते हैं, अपने लक्ष्य और विचारधारा के प्रति पूर्णतया समर्पित होते हैं। ऐसे लोगों के संपर्क में आकर हमारे कार्यकत्र्ता उनसे प्रभावित हो सकते हैं। तब हम अपने समर्थकों को आंख मंूदकर अपने पीछे चलनेवाले हथियार बनाकर उपयोग कर पायेंगे। लाल झण्डेवाले अवश्य हमारे लोगों को प्रभावित कर लेंगे। वे हमारे वोट-बैंक में सेंध लगा सकते हैं। हमारे काडर, कार्यकत्र्ता और हमारे समर्थक अगर उनके संपर्क में आए, तो वे उनकी तरफ जा सकते हैं, जैसा कि तुम्हारे साथ हो रहा है। इसलिए लाल झंडे वाले हमारे दुश्मन नंबर एक हैं।ÓÓ छुटभैये ने थूकते हुए कहा। (पृ.-212)
दलित आन्दोलन अभी अपनी प्राथमिक अवस्था में है जिसमें विचार-विमर्श लगातार जारी है। जिस तरह 'मुक्ति-पथÓ उपन्यास के लेखक ने दलित राजनीति के अवसरवादी तत्वों को पहचाना है, उनके मंतव्यों को स्पष्ट किया है उसी तरह दलित-चिन्तक दलित-कार्यकत्र्ता भी दलित राजनीति की दिशा को पहचान रहे हैं और इस अवसरवादी नेतृत्व को छोड़कर 'जेनुइनÓ नेतृत्व की ओर जा रहे हैं। वे इस बात को भी पहचान रहे हैं कि उनको वास्तविक नेतृत्व कौन दे रहा है उनके राजेमर्रा के दु: तकलीफों में कौन साथ हैं और उच्च वर्ग द्वारा प्रायोजित नेता कौन से हैं जो केवल अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए ही दलितों का नाम लेते हैं।
'मुक्ति-पथÓ लेखक ने वामपंथी राजनीति की ओर भी संकेत किया है कि उसका विस्तार प्रसार दलितों के जुड़ाव से ही संभव है। भारत के असली सर्वहारा तो दलित ही हैं वही इस पंूजीवादी-सामन्ती व्यवस्था के पीडि़त हैं। वर्तमान समाज में आर्थिक सामाजिक दृष्टि से दलित ही सबसे निचले पायदान पर हैं, इसलिए उन्हें ही व्यवस्था के आमूल-चूल परिवर्तन की सर्वाधिक जरूरत है और वही सबसे अधिक लडऩे की क्षमता भी रखते हैं। दलितों के आर्थिक शोषण के साथ उनके सामाजिक शोषण के सवालों को जोड़कर संघर्ष करने से ही वर्ण-वर्गविहीन शोषणमुक्त समाज की स्थापना संभव है।व्यवस्था परिवर्तन के इस महासंघर्ष में जाहिर है कि बहुत बड़ी जन-शक्ति की जरूरत होगी। कोई भी वर्ग अकेले अकेले मुक्ति के संघर्ष को नहीं चला सकता और प्रख्यात कवि मुक्तिबोध ने सच ही कहा था कि अकेले अकेले मुक्ति संभव नहीं है, मुक्ति होगी तो समस्त शोषित वर्ग की एक साथ ही होगी। इसलिए जो मुक्ति के संघर्ष में शामिल हैं उनको अपने दोस्तों और दुश्मनों की पहचान करनी निहायत जरूरी हो जाती है। नफेसिंह के माध्यम से लेखक ने सही ही कहा है कि ''यह बात अब और भी साफ नजर रही है कि दलित-मुक्ति के लिए संघर्ष को आसानी से फलता नहीं मिलेगी। कांटों से भरा है दलित-उेार का रास्ता। यह भी स्पष्ट है कि दलित-मक्ति के पथ पर चलते हुए हमें अपने दोस्तों और दुश्मनों की ठीक से पहचान करनी होगी। विधायक महोदय का दल और दूसरी मनुवादी शक्तियां इसलिए हम पर हावी पड़ती हैं, क्योंकि सवर्ण शासक वर्ग का सभी धर्मों के सरमाएदारों से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से गठजोड़ है। उनके हाथ में साधन भी हैं और साधक भी। जरूरत पडऩे पर उन्हें भाड़े के साधक भी पर्याप्त संख्या में मिल जाते हैं, नाना प्रकार की स्वार्थी ताकतें उनकी सेवा में रत हंै। इसीलिए यह बात तय है कि हम अकेले दलित-उेार की लड़ाई नहीं जीत सकते। हमें अधिक से अधिक मित्रों और सहयोगियों को साथ लेकर चलने की जरूरत है। जाहिर है समाज की सभी जातियों और धर्मों के शोषित और दलित लोग हमारे स्वाभाविक साथी हैं, हमराही हैं, सहभागी हैं। इसलिए हमें दलित अस्मिता को वर्ग चेतना से जोडऩा है। संघर्ष करते हुए हमें असली दोस्तों के साथ तालमेल बैठाकर आगे बढऩा है।ÓÓ (पृ.-294)
घोर-प्रतिक्रियावादी अवसरवादी-राजनीति की संस्कृति और वर्गीय चरित्र को इस राजनीति का प्रतिनिधित्व करने वाले राजनीतिक दल के विधायक के चरित्र के माध्यम से संकेत किया है। यह विधायक अपने दोस्त अपनी पार्टी के समर्थक की पत्नी से अवैध सम्बन्ध बनाता है। उसकी सम्पति हड़पने के लिए मुक्तसिंह (नफेसिंह का बेटा) को अगवा करने की कोशिश करता है और जद्दोजहद में अपने दोस्त लाला को गोली मारकर हत्या कर देता है। धर्म संस्कृति की राजनीति करने वाले और 'चाल, चरित्र चेहरेÓ से अलग होने का दावा करने वाली कथित शुद्ध राजनीति के दावा करने वाले दल की सच्चाई को लेखक ने लाला और एम. एल. . की बातचीत के माध्यम से उद्घाटित किया है। ''वो सब तो ठीक है। पर तुम्हारा हिंदू धर्म, जिसकी तुम इतनी डफली बजाते हो, क्या यही शिक्षा देता है कि दूसरों की बीवी के साथ दुष्कर्म करो? हिंदू नेता होकर क्या तुम्हें ऐसे काम करना शोभा देता है?ÓÓ लाला ने मरी आवाज में कहा।
''छोड़ो ये भाषणबाजी, राजनीति में सब कुछ चलता है। और तो और हमारे शीर्षस्थ नेता भी यही करते हैं। वे कुंवारे हैं, पर ब्रह्मचारी नहीं। दूसरों की बीवीयों को अपनी पत्नी बनाकर पति के जीते जी अपने घर में रखतें हैं। हमें क्या ताना देते हो तुम। अब इस तांत्रिक को जाने दो। यदि यह बात उजागर हो गई तो लोग सांचेंगें कि सभी 'बाबाÓ, सभी 'स्वामीÓ ऐसे ही लंपट और उचक्के होतें होंगे। तब हिंदू धर्म और संस्कृति पर भी आंच आयेगी। और हां, रेखा को को जिससे उसका मन आये शादी करने दो। रही तुम्हारी पत्नी? उसे भी मैं बुला दूंगा। पर मेरे तुम्हारे यहां आने जाने पर कोई रोक नहीं होनी चाहिए,ÓÓ नेता ने तेज तर्रार आवाज में कहा।(पृ.-240) धर्म, शुचिता और शुद्धता की राजनीति का ढोंग करने वालों की असलियत उजागर करते हुए लेखक ने इस शब्दावली के नीचे की असली राजनीति को सामने रखा है।
खाप पंचायतों के तुगलकी फतवों से हरियाणा का संवेदनशील विवेकशील नागरिक त्रस्त है। पिछले वर्षों में ये पंचायतें गोत्र के नाम पर कई शादियां तुड़वा चुकी हैं, कई पति-पत्नी के जोड़े को भाई-बहन बना चुकी हैं। गैर-जाति में शादी करने के कारण कई नवयुवक युवतियां मौत के घाट उतारे जा चुके हैं, कईयों को गांव से निकाला जा चुका है। तमाम प्रतिक्रियावादी, सामन्ती पंूजीवादी शक्तियां इनमें सक्रिय होकर मानव-अधिकारों नागरिक अधिकारों को कुचल रही हैं। इस उपन्यास के लेखक ने पंचायतों की इन कारगुजारियों की एक झलक प्रस्तुत की है। यद्यपि यहां रणवीर सिंह किसी गैर-जाति लड़की से विवाह नहीं करता, लेकिन जमींदार पिता संबंधियों को उसका अपनी इच्छा से अपना जीवन-साथी चुनना भी सामन्ती आचार-संहिता का उल्लंघन ही नजर आता है। गौर करने की बात है इस पंचायत की नजरों में महेश जैसा लम्पट तो सम्माननीय है जो लड़कियों से छेड़छाड़ करता है लेकिन विजय, नफेसिंह और रणबीर सिंह का अपमान एवं प्रताडऩा की जाती है। इन गैर कानूनी पंचायतों के लिए सही-गलत, उचित-अनुचित की कोई आधुनिक कसौटी नहीं है। केवल अनपढ़ समाज या पंचायतों की बात नहीं बल्कि अधिकांश शिक्षित हरियाणवियों में भी आधुनिक प्रगतिशील मूल्यों के लिए कोई आदर स्थान नहीं है। जब विजय और नफेसिंह रणबीर के होने वाले साले के पास विश्वविद्यालय में जाकर वस्तुस्थिति बताते हैं तो उनकी बात को समझने की बजाए वह अपने दोस्तों से उनकी पिटाई करवा देता है।
पंचायतों के मामले में प्रशासन भी कोई दिलचस्पी नहीं लेता। असंवेदनशील प्रशासनिक ढांचा इसे कानून व्यवस्था की समस्या ही नहीं मानता, बल्कि सामाजिक समस्या मानकर मूक-दर्शक बन जाता है और कानून तोडऩे वालों को अपनी मनमर्जी करने की छूट मिल जाती है। नफेसिंह, विजय मधु जब एफ.आई.आर. दर्ज करवाते हैं तो वहां के पुलिस इंचार्ज का रवैया यही उद्घाटित करता हैं यद्यपि मधु के उच्चवर्गीय रूप-रचना को देखकर रिपोर्ट तो लिख लेता है लेकिन यह एक तरह का चमत्कार ही था इससे पुलिस का यह चरित्र भी स्पष्ट होता है कि वह उच्चवर्ग के लोगों को देखकर केवल दबाव में जाती है बल्कि उनकी चापलूसी भी करने लगती है, जैसे कि वे उन्हीं के सेवक हों और निम्नवर्ग के लोगों पर डंडा-परेड़ करती है, गालियां देकर अपमान करती हैं जैसे कि उनको खदेडऩा-भगाना-पीटना ही उनका मुख्य काम हो।
उपन्यासकार की नजर समाज में परिवर्तनकारी अन्याय को सहने वाली शक्तियों भी है चाहे ये शक्तियां कमजोर हों लेकिन समाज में मौजूद हैं जो इन प्रतिक्रियावादी शक्तियों का विरोध करती हैं। नफेसिंह, विजय एवं मधु के साथ इस संघर्ष में वे कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हैं। यही शक्तियां ही भविष्य को निर्माणकारी शक्तियां हैं। लेखक ने इस सच्चाई की ओर भी संकेत किया है कि कथित पंचायती इतने ताकतवर नहीं हैं कि उनको हराया नहीं जा सकता बल्कि यदि कोई प्रतिरोध उनको नजर आए तो वे तुरन्त ही बचाव की मुद्रा भी अख्तियार कर लेती हैं।
जब पंचायतियों को पुलिस गिरपफ्तार करके हवालात में बंद कर देती है तो जमींदार रणजीत सिंह अपने बचाव के लिए रिरियाने-गिड़गिड़ाने लग जाता है और अपने बचाव के लिए अपने बेटे के पैर पकडऩे के लिए भी तैयार है जिसकी अपनी इच्छा से विवाह करना भी उसे स्वीकार नहीं था। लेखक ने बहुत ही साहसिकता दिखाई है कि रणबीर सिंह अपने पिता के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करवाता है। असल में इसी तरह के काम की आवश्यकता भी है जब समाज खूनी-रिश्तों के आधार पर नहीं बल्कि मानवीय आधार पर व्यवहार करना शुरू करेगा तभी कोई गुणात्मक बदलाव संभव है।
'मुक्ति-पथÓ उपन्यास की पृष्ठभूमि हरियाणा का एक गांव है, लेकिन लेखक का कोई मकसद नहीं है कि वह वहां के सांस्कृतिक अभिव्यक्ति करे। वह तो र्फि राजनीतिक-सामाजिक शक्तियों को व्यक्त करने में ही रूचि रखते हैं, परन्तु ग्रामीण जीवन की ठेठ शब्दावली हरियाणवी जीवन को चित्र अवश्य दे जाते हैं। उपन्यास को जीवन्त विश्वसनीय बनाने में हरियाणा के गांव में बोले जाने वाले शब्दों के प्रयोग की विशेष भूमिका है। मसलन बिशाला, बक्सूई, ढिंढरे, लेट, सूड़, बिलौनी, नौरे, आहरा, कढोणी, बाखड़ी, आले, गैरे, भरोटा आदि ऐसे शब्द हैं जिनमें एक चित्र अंकित है। गांव से लम्बे समय तक दूर रहने के बावजूद भी लेखक की चेतना से गांव की स्मृतियां गायब नहीं हुई हैं और जैसा कि अक्सर होता है कि स्मृतियों को व्यक्ति महिमामंडित करने लगता है। लेकिन इस उपन्यास के लेखक ने तो स्मृतियों को महिमामंडित किया है और ही ग्रामीण जीवन को रोमांचकारी, आदर्श के रूप में ही वर्णित किया है, बल्कि ग्रामीण यथार्थ के प्रति एक आलोचनात्मक दृष्टि रखते हुए उसकी अभिव्यक्ति की है।
'मुक्ति-पथÓ का विषयवस्तु इतना प्रासंगिक है कि उपन्यास की पाठकीयता हमेशा बनी रहती है। लेखक स्वयं ही कथा का वर्णन करता है जिससे उपन्यास के चरित्रों का स्वाभाविक विकास नहीं हो पाया और कोई पात्र यादगारी पात्र नहीं बन पाया। जब जो चीज लेखक ने अपने चरित्रों से करवानी चाही वो करवा ली, जो कहलवाना चाहा वो कहलवा लिया और जिस तरह से उसको मोडऩा चाहा उस तरह से मोड़ दिया। जहां-जहां उपन्यास के चरित्र लेखक से स्वतंत्र हुए हैं वहां-वहां वे बहुत ही पावरफुल बनकर भी उभरे हैं। कई चरित्र हैं जिनकी उपन्यास में उपस्थिति तो है, लेकिन वे उतना उनका विकास नहीं हुआ जितना कि संभव था और उपन्यास के लिए जरूरी था। विशेष तौर पर मधु की मां और सुरजीत की पत्नी में बहुत संभावनाएं छुपी हैं।
हिन्दी उपन्यास की परम्परा में 'मुक्ति-पथÓ को यशपाल की परम्परा में रखा जा सकता है। 'मुक्ति-पथÓ उपन्यास को समाज के गम्भीर सवालों पर एक मुकम्मल बहस है, जो एक पक्ष का निर्माण करती है। समाज में सक्रिय प्रगतिशील प्रतिगामी शक्तियों की पहचान करवाने में मदद करती है।

1 comment:

  1. बढ़िया पोस्ट

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    Tamasha-E-Zindagi
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