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December 28, 2010

लोकचित्त के कवि : हरभगवान चावला

लोकचित्त के कवि : हरभगवान चावला
सुभाष चन्द्र, एसोसिएट प्रोफसर, हिंदी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय , कुरुक्षेत्र

हरियाणा की पहचान किसानी जीवन से है। हरियाणा की संस्कृति, रीति-रिवाज व सोचने-अभिव्यक्त करने के ढंग में किसानी जीवन की गहरी छाप है। वर्तमान हरियाणा के अधिकांश कवियों का क्षेत्र शहर है। उनकी रचनाओं में शहरी जीवन तो खूब मिलता है, इस जीवन के सुख-दुख, पीड़ा-संघर्ष को रचनाकारों ने अपनी कविताओं में बखूबी व्यक्त भी किया है, लेकिन यह भी सही है कि समकालीन कविता में ग्रामीण जीवन की भीतरी सच्चाइयों व जीवन संघर्ष को अभिव्यक्ति नहीं मिली है। लोकचेतना की तहों से कविता का गहरा सम्पर्क नहीं हुआ। खुशी की बात यह है कि हरभगवान चावला की कविताएं इस कमी को पूरा करती हैं। हरभगवान चावला के कविता-संग्रह 'कोई अच्छी खबर लिखना' और 'कुंभ में छूटी औरतें' की कविताओं में लोक चेतना पूरी तरह रची बसी है। बड़े ही सादगीपूर्ण ढंग से ये कविताएं सामाजिक सच्चाई को हमारे सामने उद्घाटित कर जाती है।
हरभगवान चावला की कविताओं का अनुभव संसार मूलत: ग्रामीण किसान है। ग्रामीण किसान के जीवन की वास्तविक स्थिति के साथ-साथ उसके जीवन में मौजूद विसंगतियों व विडम्बनाओं को व उसके कारणों को स्पष्ट कर जाती हैं। 'सम्पन्न एवं समृद्ध' किसान की छवि के नीचे हरियाणा के किसान का जीवन संघर्ष आमतौर पर दबकर रह जाता है, जिसे हरभगवान चावला की कविताएं उजागर करती हैं। हरभगवान चावला हरियाणा के जिस क्षेत्र से ताल्लुक रखते हैं, उसमें बकौल डी.आर.चौधरी समृद्ध किसान की पहचान 'जीपड़ी, बन्दूकड़ी और बोतलड़ी' से है। किसानी जीवन को यह ब्रांड ही परिभाषित करता है, जबकि किसानी की बहुत बड़ी आबादी बिल्कुल विपरीत स्थितियों में जी रही है। किसानी जीवन में पितृसत्तात्मक व सामन्ती विचारधारा गहरी जड़ जमाए हुए है। इस जकडऩ से निकलकर ही किसान का पारिवारिक व सामाजिक जीवन सुखी हो सकता है। हरभगवान चावला की कविताएं किसानी जीवन की वास्तविक स्थिति, मूल्य व सोच को उद्घाटित करती हैं।
गांव के हर पिता की तरह
मेरे पिता के पास तीन चीजें हैं-
खेत, दारू और जूता
खेत में वह
अपने बच्चों के पेट की भट्टी में
झोंकने के लिए ईंधन उगाता है
दारू से वह अपना मन बहलाता है
और जूता मूर्ख मां को
पीटने के काम आता है।
हरभगवान चावला की कविता अपने समाज की और उसके आस पास की खबर चुपचाप बिना किसी शोर शराबे के दे जाती हैं। उनकी कविता की पंक्तियां पूरे परिदृश्य पर रोशनी डाल देती हैं। पाठक को उनकी कविताएं सचेत व जागृत कर जाती हैं और उसको सच्चाई से अवगत करवा जाती हैं। हमारा समाज किन समस्याओं से जूझ रहा है 'कोई अच्छी खबर लिखना' कविता पूरे समाज के विश्वसनीय ब्यौरे के साथ पूरा नक्शा पेश कर जाती है।
ओ पिता।
अपने पत्र में कभी कोई
जवान मौत न लिखना
न लिखना पानी के अभाव में
मर गए खेतों में पौधे
न लिखना कि आंधी में
उड़ गया पशुओं का छप्पर
न लिखना कि पंचायत चुनाव में
चल गई लाठी-गोली
न लिखना कि थाने में पिट गया
कोई बेकसूर लड़का
न लिखना कि गांव में आने लगी हैं
साधु-सन्तों की यात्राएं
ओ पिता।
कोई अच्छी खबर हो तो खत लिखना
हरभगवान चावला की कविताओं में ग्रामीण परिवेश व उसका जीवन एकदम सजीव हो उठता है। गांव के बूढों के चित्र उनके पूरे जीवन को उनकी तमाम मानसिकता व स्थिति के साथ प्रस्तुत कर देती हैं। बदली हुई भौतिक परिस्थितियों एवं उसके कारण हो रहे मानवीय मूल्यों के क्षरण ने बूढों को अप्रासंगिक घोषित कर दिया है। वे अपने को सबके बीच भी अकेला महसूस करते हैं। वे किसी को अपनी बात नहीं बता पाते, सच तो यह है कि उनकी कोई सुनता नही है। उनके पास वर्तमान में कुछ नहीं है, तो वे अपने बीते दिनों की याद में ही समय व्यतीत करते हैं, लेकिन विडम्बना यह है कि उनकी कोई नहीं सुनता।
बूढ़े इससे पहले कि मर जाएं
खोल देना चाहते हैं
अपनी जिन्दगी का हर पन्ना
पर उन्हें कोई सुनता नहीं
बहुत सारे लोगों के बीच भी
अक्सर अपने आप से बतियातें हैं बूढ़े।
मरने से पहले ही मरे जैसा मान लिया जाना बुढापे की सबसे बड़ी विडम्बना है। उनकी अभिव्यक्ति पर कई तरह की पाबन्दी लग जाती है। वे अपने जीवन में बीते दिनों को याद करके ही खुशी लौटा ले आना चाहते हैं, लेकिन अपने बच्चों की प्रतिष्ठा का ख्याल उनकी अभिव्यक्ति को रोक देता है। बंद समाज की सामाजिक सेंसर की कैंची मानवीय भावनाओं, इच्छाओं-आकांक्षाओं को कतर देती है। सामाजिक मूल्य, कथित 'मर्यादा' व 'इज्जत' की अवधारणाएं सहजता को प्रेरित नहीं करती। भावनाओं को दबाने का यह सामाजिक दबाव समाज में अलग किस्म की समस्या पैदा करता है।
'इससे पहले कि मर जाएं
बूढ़े बताना चाहते हैं
अपने प्रेम के बारे में...
वे बताकर लौटाना चाहते हैं
कुछ पलों के लिए
विह्ललता के वे दिन
पर बूढ़े खामोश रहते हैं
अपने बेटों की प्रतिष्ठा
के बारे में सोचते हुए।
बूढ़ों की मनस्थिति को बहुत ही सटीक तरीके से हरभगवान चावला व्यक्त करते हैं। वे समझते हैं कि बूढों में बेशक उतनी ताकत नहीं है कि वे अपनी बात को हैसियत दिलवा सकें, लेकिन उनके सपने अभी मरे नहीं हैं। बेशक उनको याद दिलाया जाता हो कि उनके पांव कब्र में लटके हैं, लेकिन उनमें जिजीविषा है, भविष्य के सुनहरे सपने उनके पास हैं।
बुढ़ापे में किसान व ग्रामीण बूढ़ों के हिस्से में भैंसों की देखभाल करने का काम आता है। जोहड़ पर भैंसों की निगरानी करने का जो विश्वसनीय चित्र हरभगवान की कविता में है वह अद्वितीय है। इसमें बूढों की लाचारी भी उद्घाटित होती है और उनकी कर्मठता व अपने अस्तित्व का अहसास कराने की जद्दोजहद भी नजर आती है। उनकी शक्तिहीनता भी है और अपनी शक्ति का अहसास कराने के लिए कसमकस भी है। स्थितियों के प्रति उनका रिस्पांस भी है। भैंसों के साथ जद्दोजहद करते बूढ़े असल में पूरे समाज की ही चित्र पेश कर जाते हैं।
भैंसों को घर में खूंटे से बांधकर
उन्हें लाठियों से खूब पीटते हैं
पस्त और तमतमाए बूढ़े
अस्पष्ट आवाज में उनकी जबान से निकलती हैं
गंदी गालियां और चेतावनी
कि फिर भागी तो कुछ भी कर सकते हैं बूढ़े
अर्राती रहती हैं भैंसें
और पिटती रहती हैं
थक जाते हैं तो बैठ जाते हैं बूढ़े
थोड़ी देर बाद वे उठते हैं
भैंस की पीठ पर लाठियों की
मार से बने निशानों को
सहलाते रहते हैं देर तक
और रोते रहते हैं।
बदलती अर्थव्यवस्था ने समाज का नक्शा ही बदल दिया है। अपने अस्तित्व के लिए व रोजगार की तलाश में लोग विस्थापित होने को विवश हैं। इस स्थिति ने मनुष्य के समक्ष चुनौती पैदा कर दी है। अपनी जड़ों से कटने का दर्द सहन करते बूढ़ों का ऐसा मार्मिक चित्र हरभगवान चावला ने खींचा है। उनको अपना जीवन भी याद आता है, जिसमें वे खुश महसूस करते हैं, वहां वे मेहमान बनकर रह गए हैं। शहर में बसे अपने बेटे के पास रहने वाले बूढ़ों को रह रहकर गांव याद आता है। जड़ों से कटने के दर्द को चावला ने गहराई से महसूस किया है चाहे वह दर्द विवशता में अपना घर छोडऩा हो या फिर बदलती स्थितियों में घर छोडऩे पर। बेशक दोनों स्थितियों के कारण अलग हैं, लेकिन विस्थापन की पीड़ा में कोई विशेष अन्तर नहीं होता। बूढ़ों की स्थिति पर हरभगवान चावला ने पूरा थीसिस ही तैयार किया है। बड़ी गहराई व सूक्ष्मता से बूढ़ों के जीवन को चावला ने जाना है व उनके जीवन को इस तरह से व्यक्त किया है कि बूढ़ों के प्रति संवेदित करने में कामयाब हो जाती हैं।
विकास के तमाम शोर के बावजूद हरभगवान चावला की कविता देश के कल यानी 'बच्चा' के ऐसे चित्र दर्शाते हैं, जो विकास को व बचपन बचाने की तमाम कोशिशों को और मानवाधिकारों के हनन को सामने खोलकर रख देते हैं। मंदिर में प्रसाद के लालच में बैठा बच्चे और शराबी के लिए पकौड़े लाते बच्चे में कोई अन्तर नहीं है। दोनों एक ही व्यवस्था की उपज हैं। बच्चे के लिए मंदिर व शराब की दुकान में कोई अन्तर नहीं है। पेट की भूख उसे ऐसा बना रही है, तो उसे व्यवस्था के ऐबों में भी वह धकेल रही है। जिससे वह अनाज भी चोरी करके बेचता है और नशा व भोंडी संस्कृति की चपेट में आ रहा है।
एक बीड़ी या चाय के कप के बदले
बच्चा ढाबे वाले के कोयले कूट देता है
नए खुले देसी शराब के ठेके पर बैठे
शराबियों को पकौड़े लाकर देता है बच्चा
और बदले में एक दो पकौड़े पाता है
रात में ठहरने वाली बस के कंडक्टर के
पांव दबा देता है बच्चा
बच्चे में सब को दिखाई देता है
अच्छा नौकर।
ग्रामीण जीवन में हाशिये पर पड़े लोगों के मार्मिक व सटीक चित्र चावला की कविता के प्रभाव को स्थायी बना देते हैं। इनके माध्यम से कविता सहज ही अपने पाठकों से रिश्ता कायम कर लेती है। चित्रों की जीवन्तता व विश्वसनीयता पाठक का कविता से तुरन्त जोड़ देती है। पाठक यहां सहज महसूस करता है। हरभगवान चावला की कविता में हाशिए पर पड़े मेहनतकश जनता के सजीव चित्र हैं। चाहे वह बकरियों को चराने वाला 'रामरखा' हो, या सारे गांव के बढ़ई के काम करता 'हीरा काका' हो, 'विधवाएं' हों, 'बच्चा' हो, 'बूढ़े' हों, सेवा करता बहादुर हो, या 'जननी'। समाज में मौजूद विषमता की गहरी खाई का तीखा अहसास चावला की कविताएं सहज ही करवा देती हैं। शोषित वर्ग के सबसे निचले पायदान पर खड़ी 'जननी' के पास जच्चगी के लिए भी आराम नहीं है, लेकिन उसका समाज के विकास में बहुत अधिक योगदान है, इसी तरह 'हीरा काका' का भी पूरे गांव के जीवन में महत्वपूर्ण योगदान है, लेकिन बदले में उनको कुछ विशेष नहीं मिलता है। पर बच्चों की 'गुल्ली' बनाने में ही जीवन में खुशी का संचार हो जाता है। जीवन चाहे कितना ही कष्टों से भरा क्यों न हो, लेकिन जीवन में खुशी के पल ही व्यक्ति में जिजीविषा पैदा करते हैं। कोई समाज चाहे कितना ही अभावों व अत्याचारों से ग्रस्त क्यों न हो, लेकिन वह अपने लिए कुछ न कुछ पल ऐसे जरूर ही निकाल लेता है कि वह खुश हो सके। चावला की दृष्टि से ये पल बिल्कुल भी ओझल नहीं होते, वे अपनी कविताओं में इन्हें प्रकट कर ही जाते हैं। 'विधवाओं' के जीवन में उनका मिलना ही खुशी के पल हैं, जिसे वे किसी भी कीमत पर गंवाना नहीं चाहतीं। दुखों भरे जीवन में सुख की एक झलक को पकड़ पाना उस जीवन की गहरी समझ को दर्शाता है।
हरभगवान चावला की कविताएं लोगों को जागरूक करती हैं। वे संसार में बढ़ रहे अन्याय, अत्याचार व शोषण को व्यक्त करने के लिए ईश्वर से सवाल करती हैं। संसार में ईश्वरीय शक्ति व लीला का लाभ उठाकर ही शोषण जारी रहा है। ईश्वर की अवधारणा हमेशा ताकतवर आदमी के काम आई है। हरभगवान चावला की कविताएं इस सच्चाई को प्रकट करती हैं कि एक ओर तो ईश्वर के नाम पर संयम के उपदेश दिए जाते हैं, दूसरी ओर इन उपदेश देने वाले कथित 'धार्मिकों' के ऐशो आराम में बढोतरी होती जाती है और उनकी संपति में बढोतरी होती जाती है। धार्मिक विचारधारा में अन्तर्विरोध-विरोधाभास प्रकट होते हैं, तो धार्मिक कहे जाने वाले लोगों के व्यवहार की कथनी-करनी के अन्तर को उजागर कर जाती है।
धर्माचार्य फरमाते हैं
मोह-माया से दूर रहो
और हर-रोज बढ़ती जाती है
धर्माचार्यों के मठों और डेरों की सम्पति
हरभगवान चावला की कविताएं साम्प्रदायिकता के शिकार जीवन की झलक दे जाती हैं। साम्प्रदायिकता के कारण एक पूरी पीढी ने उजडऩे की पीड़ा सहन की है। वह उनकी स्मृति का स्थायी भाव है, गाहे बगाहे वे अनुभव चावला की कविताओं में अनायास ही आ जाते हैं। इस पीढ़ी के खुशी व दर्द को व्यक्त करती चावला की कविताओं में यह अहसास किसी न किसी रूप में आ ही जाता है। चाहे वह 'मां' हो या फिर अपनी जवानी के मस्ती भरे दिनों को याद करते 'बूढ़े'। यह अनुभव उनको लगातार कचोटता है और चावला इसी कारण साम्प्रदायिकता को राजनीतिक स्तर पर नहीं, बल्कि मानवीय व सांस्कृतिक स्तर पर साम्प्रदायिकता के असर को व्यक्त कर रहे हैं। साम्प्रदायिकता की घृणा आधरित राजनीति साधरण नागरिकों का जीना दूभर कर रही है। निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतार रही है वह भी धर्म के नाम पर। धर्म रक्षा के नाम पर खूनी यात्रओं को पूरे हिन्दुस्तान ने अनुभव किया है। 'यात्रा' कितनी तबाही लेकर आती है। साम्प्रदायिकता की राजनीति ने व्यक्ति की पहचान अल्पसंख्यक में तब्दील कर दी है। अल्पसंख्यक न होने की 'प्रार्थना' इस पीड़ा को सही शब्दों में व्यक्त करती है।
अगर अमेरिका या यूरोप में जन्म दो
तो मुझे ईसाई बनाना
अरब देशों में बनाना मुसलमान
हिन्दुस्तान में हिन्दू बनाना
अल्पसंख्यक बनाकर मुझे
धरती पर मत उतारना ओ पिता!
पृथ्वी पर जब कहीं भी होती है अनहोनी
तो जानवरों के पैरों तले
नन्हें पौधों की तरह
रौंदे जाते हैं अल्पसंख्यक
हरभगवान चावला की विषयवस्तु चुनने की खूबसूरती इस बात में है कि वे ऐसे विषयों को उठाते हैं, जहां मतभेद की गुंजाइश कम है। जैसे बूढ़ों के प्रति सहानुभूति व चिन्ता लगभग हर संवेदनशील व्यक्ति करता है। इस विषय को उठाकर वे इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि जिस समाज में हम रह रहे हैं उसकी क्रूरता व संवेदनहीनता स्वत: ही प्रकट हो जाती है। पूंजीवादी समाज व्यवस्था में उत्पादन के लायक न रहने पर व्यक्ति का शोषण होता है, चावला बूढ़े और बच्चों के माघ्यम से यह बखूबी प्रस्तुत किया है। हरभगवान चावला की सीधी सी लगने वाली कविता में एक खास किस्म की वक्रता है। सच्चाई को इस तरह से प्रस्तुत करती हैं कि उसके अन्तर्विरोध स्पष्ट होने लगते हैं। उसकी विडम्बनाएं उजागर हो जाती हैं।
विभाजन की मार खाए लोगों के 'रिफ्यूजी' होने की पीड़ा को तो चावला की कविताएं समेटे हैं साथ ही उस त्रसद स्थिति में उन पर घोर संकट आए। अपने नजदीकी रिश्तेदारों से भी बिछुड़े। हर तरह का कष्ट सहन किया, लेकिन इनके जीवट को और स्वाभिमान को भी चावला की कविताएं व्यक्त करती हैं। उनका कहना है कि 'वे भिखारी नहीं बने'। विपरीत स्थितियों से जूझने की अपार क्षमता को बड़ी सहजता से व्यक्त करती कविता जरा भी लाऊड नहीं होती। यदि कविता यहां लाऊड हो जाती तो वह इस तरह का प्रभाव नहीं छोड़ पाती। पीड़ा की सघनता और उसके अहसास की गम्भीरता को एक साथ साधे रखना किसी समर्थ कवि के बूते की ही बात है।
हरभगवान चावला अपनी कविताओं में अपने अपने आस पास हो रही त्रसदियों को मानवीय संवदना के साथ व्यक्त करते हैं। चाहे डबवाली का आग-काण्ड हो, जिसमें सैकड़ों बच्चों झुलस गए थे और शहर को मातमी सन्नाटे में भर गए थे। चाहे 'सुनामी' जैसी प्राकृतिक आपदा हो या गुजरात में आया भूकम्प की तबाही से 'राहत शिविर' के नागरिक बने लोगों की पीड़ा हो। लोक चित के विविध आयामों को व्यक्त करने वाली हरभगवान चावला की कविता की विशेषता यह है कि लोक प्रचलित मुहावरों व लोकोक्तियों का सहारा नहीं लेती। वे अपने कथ्य को व्यक्त करने के लिए ऐसे शब्दों का चुनाव करते हैं कि स्वयं मुहावरे की व्यंजना ले लेते हैं।
सादगी हरभगवान चावला की कविताओं की विशेषता है। वे पाठक को न तो शब्दों की भूलभूलैया में खोने देते हैं और न ही प्रतीकों व बिम्बों की दुरूहता में फंसाते हैं। वे आम जीवन से ही बिम्ब उठाते हैं और सीधे शब्दों में व्यक्त कर देते हैं। बात का सीधापन उनकी बात कहने के सीधे ढंग की ओर ले आता है। हरभगवान की कविता के कथ्य और शिल्प की एकता बेजोड़ है और इससे ही उनकी प्रभावक्षमता की मार बढ़ जाती है। उनकी कविता में सामूहिक जीवन के बिम्ब एकदम सजीव हो उठते हैं। उनकी अधिकांश कविताएं सामूहिक जीवन के चित्रों को सामने रखती हैं। चाहे वे 'बूढे' हों, 'बच्चे' हों, 'स्त्रियां' हों। सामूहिक जीवन उनके कविता की जमीन है, जहां से वे अपनी खुराक भी लेती हैं और अपने को ऊर्जा प्रदान करती हैं। यदि उपन्यास की शब्दावली में कहा जाए तो उनकी कविताएं प्रातिनिधिक चरित्रों व चित्रों को समोये हुए हैं। उनकी 'मां' भी प्रतिनिधि हो उठती है और उसके साथ जुड़ा हुआ 'चरखा' भी। उनके 'ससुर' भी प्रतिनिधि हो उठते हैं। विशिष्टता और प्रातिनिधिकता का यह मेल अद्भुत है। हरभगवान चावला की कविता में उनकी वैयक्तिकता भी बनी रहती है और उसके साथ सामूहिकता भी बनी रहती है। अपने अनुभव को बृहद संदर्भों में रखकर उसको निरखना परखना और उसे उसका हिस्सा बनाकर प्रस्तुत करना कि वह सच्चाई से भी बड़ी सच्चाई बन जाए बड़ा रचनाकार ही कर सकता है।
हरभगवान चावला की कविता में समाज के यथार्थ के साथ ही उनकी मंशा भी रहती है। वे जो स्थापित करना चाहते हैं वह अलग से कहने की उनको आवश्यकता नहीं पड़ती। उनकी कविता की बनावट ही इस तरह की है कि वह स्वयं ही मुंह चढ़कर बोलने लगती है। हरभगवान चावला अपनी कविता में एक शब्द भी फालतू नहीं रखते। उनकी कविताएं इतनी सुगठित हैं जैसे रामचन्द्र शुक्ल के निबंध। नाटक के संवादों की तरह हर शब्द का महत्व है, न अवांछित विस्तार है और न ही व्याख्या। उनको अपने पाठक पर पूरा भरोसा है कि वे उनकी कविता को ग्रहण कर पायेंगे। पाठक के लिए वे कविता में ही कुछ संकेत छोड़ देते हैं, जिससे कविता अपनी सम्प्रेषणीयता में पाठक की कल्पना शक्ति का स्पर्श पाते ही खिल उठती है। उनकी कविता पाठक से अतिरिक्त दिमागी कसरत करवाकर थकाती भी नहीं और पाठक की चेतना का हिस्सा भी बन जाती है। उनकी कविता का एक एक शब्द व पंक्ति अपनी अर्थव्यजंना की एक दिशा में इस तरह अग्रसर होती हैं कि यदि उनमें से किसी एक को निकाल दिया जाए तो कविता अधूरी लगेगी। कविता को इतना कसने के लिए जिस रचनात्मक ऊर्जा व धैर्य की जरूरत है वह हरभगवान चावला पूरी करते हैं। वे कविता को पकाने के लिए खुद अपने को झोंकते हैं। उनकी कविता स्वत: नहीं बनती, बल्कि लुहार की तरह ठोक-पीटकर वो शक्ल उसे देते हैं, जो वे देना चाहते हैं।
कविता में विचारों की स्थिति को लेकर जो बहस रही है उसको चावला की कविता का शिल्प बड़े सन्तुलित ढंग से जबाब देती है। हरभगवान चावला की कविता वैचारिक परिप्रेक्ष्य तो लिए है, लेकिन कविता में विचार अलग से नहीं आते, वे संवेदना के साथ ही जुड़े होते हैं। जिस स्थिति को वे अभिव्यक्त करना चाहते हैं, उसके पक्ष में एक वकील की तरह से चुन चुनकर तथ्य रखते हैं, जिससे वह स्थिति ही तर्क का काम भी करने लगती है।
हरभगवान चावला ने अपनी कविता के लिए बहुत ही मौलिक मुहावरा विकसित किया है, जो काफी प्रभावी है, लेकिन इस मुहावरे में रचनाकार की सीमा बन सकने की गुंजाइश भी है। बहुत सुविचारित भाव के एक पक्ष को व्यक्त करने के लिए तो यह मुहावरा उचित है, लेकिन इसके अन्तर्विरोधों को उदघाटित करने में यह आड़े आता है। स्थिति के दूसरे पक्ष को व्यक्त करते यह मुहावरा जबाव दे जाता है।
कविता के इस शिल्प की ताकत यह है कि कवि अपनी कविता के माध्यम से पाठक को जहां ले जाना चाहता है, वहां ले जाने में कामयाब हो जाता है। पूरा परिप्रेक्ष्य पाठक के सामने खुल जाता है।

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