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December 28, 2010

विकट संकट विश्लेषक कवि : मनमोहन


विकट संकट विश्लेषक कवि : मनमोहन
सुभाष चन्द्र, एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र
साहित्य अकादमियों और अन्य सरकारी किस्म की संस्थाओं से भी कभी कभार कोई साहित्य के लिए सुखद खबर सुनने को मिल जाती है। कभी कभी नोबेल पुरस्कार भी वास्तव में जनता के पक्षधर रचनाकारों को भी मिल जाते हैं। आमतौर पर तो देखा गया है कि साहित्य के पुरस्कार भी 'सम्पर्कों व जुगाड़' का कारोबार ही हो गया है। सृजनात्मक साहित्यकारों के हक को कभी साहित्य के शिक्षक चाट जाते हैं, तो कभी साहित्य के नाम पर स्थापित गैर-साहित्यिक किस्म के लेखक। इस बार हरियाणा साहित्य अकादमी के संचालक बधाई के पात्र है, जिन्होंने पिछले तीन चार दशकों से अपनी कविता के जरिये व साहित्य-संस्कृति संबंधी विभिन्न सवालों पर लेखों, विचार-गोष्ठियों के जरिये रचनात्मक माहौल के निर्माण में जुटे हुए रचनाकार मनमोहन को 'सूर' पुरस्कार के लिए चुना। ऐसा करके उन्होंने वास्तव में ही सृजनात्मकता का सम्मान किया है। मनमोहन ऐसे रचनाकार हैं, जो पुरस्कारों के शोर-शराबे व लेखक के महिमामंडन व स्तुति-संस्कृति से दूर रहकर अपना लेखकीय दायित्व निभा रहे हैं। सामाजिक सवालों को संबोधित करने वाले सक्रिय साहित्य-संस्कृतिकर्मियों को उनके जीवन्त मार्गदर्शन के बहुत ही सकारात्मक परिणाम भी निकले हैं। हरियाणा प्रदेश के विभिन्न शहरों में नाटकों की दसियों मण्डलियां जातिगत भेदभाव, स्त्री-मुक्ति, मानवाधिकारों जैसे ज्वलंत सवालों पर मानवीय दृष्टिकोण से प्रस्तुतियां कर रही हैं। मनमोहन कहीं न कहीं इनके बीच अवश्य मौजूद रहते हैं। कभी नाटक की स्क्रिप्ट तैयार करने में तो कहीं नाटक के लिए गीत लिखने में। साहित्य अकादमी ने मनमोहन की प्रतिभा को व उनके काम को रेखांकित करके वास्तव में खुशहाल समाज के लिए काम करने वाली रचनाधर्मिता को पुरस्कृत किया है।
मनमोहन के मामले में उल्लेखनीय बात यह है कि वे बाबा नागार्जुन व शील की परम्परा के लेखक भी हैं और रघुवीर सहाय की परम्परा को भी साथ लिए हुए हैं। सामाजिक समस्याओं व सवालों को उनकी जटिलता में समझना व जनपक्षीय नजरिये के साथ प्रस्तुत करना दोनों के एक साथ ही उनकी रचनाओं में दर्शन होते हैं। मनमोहन के साहित्य संबंधी लेखों की रचनात्मक भाषा व वैचारिक स्पष्टता पाठक की साहित्य के प्रति समझ को दुरुस्त करती है। मनमोहन की रचनाधॢमता के सरोकारों की पहचान उनके सांस्कृतिक कर्म के साथ जोड़कर ही हो सकती है।
'जिल्लत की रोटी' मनमोहन का बेशक पहला कविता संग्रह हो लेकिन हिन्दी जगत के लिए उनकी कविता का तेवर भलीभांति जाना पहचाना है। अपने समय के बेहद जरूरी कवि मनमोहन की कविताएं अपने में पूरा युग समेटे हुए है, अपने समय के तमाम केन्द्रीय सवालों को उठाती है। शासक वर्ग की चालाकियों और षडयन्त्रों को, मध्यवर्ग की बेईमानी, कत्र्तव्यविमुखता, लिजलिजेपन व अवसरवादिता को उद्घाटित करती है। जब शासक वर्ग पोषित उत्तर-आधुनिक चिन्तन पूरे शोर-शराबे के साथ 'इतिहास के अन्त', 'विचारधारा के अन्त' करके सामाजिक यथार्थ की असंगतियों-विसंगतियों का धूमिल करने पर तुला हो तो शासित-शोषित वर्गों का पक्ष निर्माण करती ये कविताएं स्वत: ही आवश्यक हो उठती हैं। मनमोहन की कविता दार्शनिक-सांस्कृतिक-सामाजिक विमर्श की राजनीतिक कविता है जो किसी विचार अथवा स्थिति के सूक्ष्म से सूक्ष्म पक्षों को उद्घाटित करती है।
एकाधिकारी वैश्विक पूंजीवाद की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति उपभोक्तावाद में होती है, जो विविधताओं के होने का दिखावा करता है, लेकिन वास्तव में मौजूद विविधताओं को समाप्त करके एकरूपता को पोषित करके समस्त समाज की रूचियां बाजार के अनुकूल बनाता है। वास्तविकता और छद्म में अन्तर मिटाने के लिए साम्राज्यवादी शक्तियां तरह तरह के पाखण्ड रचती हैं। युद्धघोष करके कारपेट बम्बिंग भी करती है और शान्ति के कबूतर भी उड़ाती हैं और शान्ति पुरस्कार भी प्रदान करती हैं। लोकतंत्र के रक्षक का ढोल पीटते हुए तानाशाही को भी स्थापित करती है। मुक्तिदाता भी नजर आती है और दुनिया को गुलाम भी बना लेती है। सत्ता पक्ष स्वयं को विपक्ष के तौर प्रस्तुत करके वास्तविक विपक्ष का गला घोंट रहा है। मनमोहन के 'इन शब्दों में' 'शर्मनाक समय' की संस्कृति का उद्घाटन है जो अपने में सर्वस्व का 'समायोजन' कर लेना चाहती है।
ढाँचागत समायोजन के इन वर्षों में
वे सभी ढाँचे विवादास्पद हो गए हैं
जिनका समायोजन कठिन है

विवाद में विवाद तो कहने की बात ह
वो इसलिए कि जिससे सूचित हो जाए
कि विवाद खड़ा हो चुका है
करने की बात तो समाधान है

विवाद के समाधान पर
कोई विवाद नहीं

विवाद के हल के
निश्चित विकल्प हैं
जो एकदम स्पष्ट और निर्विवाद हैं:
ठीक-ठीक समायोजन
विसर्जन
या फिर विध्वंस

जो भी शासक वर्गों के हित में नहीं है, उस विचारधारा को इस समय में खारिज किया जा रहा है और उसकी खिल्ली उड़ाई जा रही है, खुशहाली लोगों के जीवन में नहीं है केवल चित्रों में है। खुशहाली के चित्र ही

मनमोहन की कविता किसी स्थिति विशेष की कविता नहीं है बल्कि उनकी कविता पूरी परिस्थिति के संदर्भ से निकली है। पीड़ादायक सामूहिक अनुभव मनमोहन की कविता का स्रोत है। मनमोहन की 'कला का पहला क्षण' यही 'दर्द' है। दर्द का सामूहिक अनुभव सीधे-सीधे कविता में नहीं आता बल्कि वैचारिकता के साथ गुंथकर आता है। इस विचार को अनुभव से अलग नहीं किया जा सकता। जन की चेतना को नियंत्रित करने की शासक वर्ग के षडय़न्त्रों, दुष्प्रचार को न केवल उद्घाटित करती है बल्कि उसकी गम्भीरता का अहसास भी करवाती हैं। 'हमारा जातीय गौरव', 'देववाणी', 'कार्तिक-स्नान', 'भारतीय संस्कृति', महत्त्वपूर्ण कविताएं हैं।
पहले पहल जब हमने सुना
चमड़े का वॉसर है
तो बरसों-बरस नल का पानी नहीं पिया

तब कुओं-बावडिय़ों पर हमारा कब्जा था
जो आखिर तक बना रहा

हमने कुएँ सुखा दिए
पर ऐरों-गैरों को फटकने न दिया

अब भी कायनात में पीने योग्य
जितना पानी बचा है
दलितों की बस्ती की ओर रूख करे इससे पहले
हमीं खींच लेते हैं

हमारे विकास ने जो जहर छोड़ा
जमीन की तहों में बस गया

कितना महान सांस्कृतिक दृश्य है कि
हत्याकाण्ड सम्पन्न करने के बाद हत्यारा भीड़ भरे
घाट पर आता है
और संस्कृत में धारावाहिक स्त्रोत बोलता हुआ
रूकी हुई यमुना के रासायनिक जहर में
सौ मन दूध गिराता है

अडिय़ल चट्टानों को ढहा दिया जाएगा
डाइनामाइट लगा दिया जाएगा
ढेलों पर पाटा चला दिया जाएगा

चौरस बनेगा
चौरस
हमारा आर्यावर्त

बिना कोनों वाला
बिना नोकों वाला

इसे टिकाऐंगे हम

हम आर्यपुत्र
हम अमृतपुत्र
इसे टिकायेंगे
तलवार की नोंक पर

मनमोहन की कविताओं के केन्द्र में मध्यवर्ग है, जो अपने ऐतिहासिक दायित्व से मुंह मोड़ रहा है। इसकी आलोचना से ही उनकी कविता अपनी सामग्री ग्रहण करती है। यह भी कहा जा सकता है कि इस वर्ग से शिकायतों की साहित्यिक अभिव्यक्ति ही कविता बन जाती है। कभी इस वर्ग की तुच्छता दर्शाने में कभी अपने व्यंग्य के कोड़े की मार से उसे जगाने में। तमाम शिकायतों के बावजूद भी उन्हें इस वर्ग से कोई आशा नहीं है।
खाये-पीये अघाये ऐतिहासिक कर्तव्य से विमुख लोगों के प्रति आक्रोश, क्षोभ व गुस्सा व्यंग्य के रूप में निकलता है। मनमोहन का व्यंग्य बहुत गम्भीर व अदृश्य ढंग से आता है, न तो आर्य समाजियों की तरह का है कि खिल्ली-रस में डुबा दे और न ही इतना सीधा और तीखा है कि कोई तिलमिला जाए। व्यंग्य बेशक कविता का केन्द्रीय तत्त्व न बनता हो लेकिन संदर्भ को खोलने और परिस्थिति की विडम्बना को समझने में यह एक परिप्रेक्ष्य प्रदान करता है और कवि की पक्षधरता इस से ही प्रकट हो जाती है।
स्त्री के प्रति भेदभाव पुरूष-प्रधान समाज में हर स्तर पर होता है, स्त्री के लिए पुरूषों ने ऐसी आचार-संहिता का निर्माण किया है जिसमें उसके व्यक्तित्व का विकास संभव नहीं है। 'उसकी थकान', 'सिर्फ अपने अपने शरीर ', 'तुम्हारा ', 'सुन्दरी-' 'सुन्दरी-' 'अच्छी स्त्री कविताओं में स्त्री के प्रति पितृसत्तात्मक सोच का अन्याय का तर्क उद्घाटित किया है। पितृसत्तात्मक पैमानों पर वही स्त्री '' कहलाएगी जिसे पितृसत्ता के
'सभी संवाद इसे याद हैं,
जिन्हें यथा समय यह ठीक-ठीक बोलती '
'तमाम पोशाकों को रखना,
और बदल बदल कर पहनना खूब आता '
'नमक की मिकदार तय करने में इससे ,
कभी चूक नहीं '
'अत्याचारों को इसने भुला दिया,
लेकिन त्वचा को नहीं,
दैनिक अत्याचारों और व्यस्तताओं में ,
कभी इतनी गाफिल नहीं '
किसी विचार, स्थिति, अनुभव की कमजोरियों और खूबियों को उद्घाटित करने के लिए मनमोहन परस्पर विपरीत व विरोधाभासी बिम्बों, प्रतीकों, शब्दों को चुनते हैं और इस तरह संयोजित करते हैं कि अन्तर्विरोध स्पष्ट तौर पर उद्घाटित हो जाते हैं। व्यवस्था के पैरोंकारों का घाघपन व चालाकी सामने आ जाती है। 'भारतीय ' में 'हत्याकाण्ड ' के बाद हत्यारे का 'पवित्र भाषा में स्त्रोत बोलना और रसायनिक पदार्थों से गंदी हुई गंगा में दूध बहाना '। 'आसानियां और ', 'ठंडी और गर्म ' 'भूखे मारना या खिला-खिलाकर ', 'अकेला या ', 'लाकर या फूलों ये ', 'जिन्दा रखकर या ', 'स्मृति या आगामी' इस तरह के अनेक प्रभावशाली प्रयोग हैं जो कविता की सम्प्रेषणीयता को सघन बना देते हैं।
मनमोहन की कविताओं की भाषा में शब्द पंडिताऊपन लिए है,लेकिन इनका लहजा देसी है। शब्द मनमोहन की कविता की ताकत हैं। एक शब्द का कई अर्थों में प्रयोग करने की क्षमता किसी समर्थ कवि की ही वश की बात है। मनमोहन ने शब्दों का बहुत मारक प्रयोग किया है। लेकिन जब शब्दों को लय या तुक के तौर पर प्रभाव पैदा करने के प्रयोग करते हैं तो कविता में चमत्कारिकता तो अवश्य पैदा हो जाती है लेकिन कविता की धार कुंद हो जाती है। शब्दों के चमत्कार के आगे कविता की अन्तर्वस्तु से पाठक का ध्यान हटता है और शब्द साम्यता की भूलभलैया में असली मंतव्य पीछे छूट जाता है। एक ही कविता में ऐसे बिन्दु देखे जा सकते हैं। 'विकट ' कविता से इसे समझा जा सकता है।
मनमोहन की कविता का कसाव ढीला हो जाता है जब वे कविता में मजे लेने लगते हैं। शब्दों से खेलने लगते हैं तो मूल से भी ध्यान हटता है। 'हम तुम्हें मार ' जैसी सशक्त कविता भी इस मजे का शिकार हाक जाती है
'एक दिन पड़ौसी के मर जाने से ईर्ष्या करोगे
और अपने बचे रहने पर शर्म करोगे
तुम कहोगे कि मैं जल्द से जल्द मरना चाहता हूं
और हम कहेंगें कि जल्दी क्या है।
मुहावरों का प्रयोग मनमोहन ने बहुत सचेत तौर पर किया है। वे मुहावरों को कभी उसी रूप में प्रयोग नहीं करते जिस रूप में वे लोक में प्रचलित हैं, बल्कि उनको बदलकर-पलटकर प्रयोग करते हैं। यह बदलना-पलटना मुहावरे की वास्तविक भूमि को बनाए रखते हुए भी नया अर्थ व्यक्त करने की सामथ्र्य रखता है। मुहावरों को अपने रूढ अर्थों से भिन्न रूप में प्रयोग करने की शक्ति व सामथ्र्य उसी कवि-रचनाकार में आती है जो आम चेतना के प्रचलित ढंाचों को तोडऩे की क्षमता रखता है। चेतना के उच्च स्तर पर रहते हुए भी कवि आम पाठक से इनके माध्यम से जीवन्त सम्पर्क बनाए रखता है।
मनमोहन की आम जन के प्रति प्रतिबद्धता उसके जीवन के चित्र खींचने, उसके शोषण दर्शाने, उसकी गरीबी-बदहाली के कारूणिक दृश्य प्रस्तुत करने, उसकी लाचारी के हृदय विदारक दृश्य बनाने, उसके संघर्षों की गाथा लिखने में प्रकट नहीं बल्कि उनकी दृष्टि में उजागर होती है। स्थितियों को देखने के ढंग में उनकी पक्षधरता है जो तमाम कविताओं में मौजूद है। शायद इसीलिए मनमोहन की कविता को आम चेतना से नहीं समझा जा सकता। चेतना के उच्च-स्तर पर पहुंचकर ही उनकी कविता को हृदयंगम किया जा सकता है। यदि कोई राजनीतिक आन्दोलनों को मनमोहन की कविता में ढूंढना चाहे तो उसे निराशा के अलावा कुछ हासिल नहीं हो सकता। स्थूल राजनीति मनमोहन की कविता का विषयवस्तु नहीं है।
लोक गीत की तरह की लोकप्रिय शैली में लिखी गई मनमोहन की वे कविताएं बहुत महत्त्वपूर्ण हैं जिनको समझने के लिए अत्यधिक बौद्धिक कसरत नहीं करनी पड़ती, वे सहज ही आम जन की जुबान का हिस्सा बन जाती है। 'देश ', 'बिना कान का ', 'फोड़े का ', 'पग्गड़ सिंह का ' विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। कथ्य और शिल्प की कोई दूरी नहीं रहती। जिस समाज तक मनमोहन अपनी कविता को पहुंचाने का संकल्प लिए हुए हैं उस तक पहुंच जाती हैं। जनभाषा और कविता की भाषा का यहां अन्तर ही मिट जाता है। जनभाषा ही कविता की भाषा हो जाती है।
मंगलेश डबराल का यह कहना है कि मनमोहन की कविता 'सहज-स्वाभाविक सी आटोमेटिक कविता ' सही नही है। मनमोहन की कविता निहायत सचेत कविता है, जिसे इस तरह तराशा गया होता है कि वह स्वत:स्फूर्त व आवेग में नहीं हो सकता। प्रस्फुटन के दौरे से किसी कविता में इतनी सूक्ष्मता संभव नही है। मनमोहन कविता को अपने हाल पर नहीं छोड़ते बल्कि उसे कारीगर की तरह बनाते हैं, अपनी रचना के लिए एक से एक प्रभावी औजारों का इस्तेमाल करते हैं।
मनमोहन की कविता मेहनतकश जनता के पक्ष को मजबूत करती है। इस पक्ष के निर्माण के लिए कविता भूमंडलीकरण के चेहरे से नकाब उतार उसके साम्राज्यवादी रूप को उदघाटित करती है। साम्राज्यवाद के पार्टनर के तौर पर उसके साथ फासीवादी विचारधारा जाति, धर्म, भाषा के नाम पर आम जनता के भाईचारे व एकता को तोड़ती है। साम्राज्यवादी षोशण से आबादी के बहुत बड़े हिस्से विकास व प्रगति से बाहर निकल रहे हैं। अपने धन व तकनीक की शक्ति के बल पर अपसंस्कृति के प्रसार से लोगों की सच्ची मानवीय भावनाओं व परस्पर मिलकर समस्याओं से निपटने के तरीकों व संकल्पों को समाप्त कर रही व्यवस्था को उजागर करते हुए इसके विरूद्ध मानवीयता के पक्ष में खड़ी होती है। मनमोहन की कविता सामाजिक जिम्मेदारी का निर्वाह करती है।

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