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December 28, 2010

ठेठ यथार्थ की भीतरी परतों का कवि : प्रदीप कासनी

ठेठ यथार्थ की भीतरी परतों का कवि : प्रदीप कासनी
सुभाष चन्द्र, एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र

प्रदीप कासनी हरियाणा के महत्त्वपूर्ण रचनाकार हैं, जिनकी कविताओं से पाठक प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं में परिचित होते रहे हैं, 'अवन्नी चवन्नी' नाम से कविताओं का संग्रह भी प्रकाशित हुआ है। प्रदीप कासनी स्वयं हरियाणा में अधिकारी हैं, नौकरशाही की कार्य-प्रणाली और नौकरशाही वर्ग की प्रवृतियों से बखूबी परिचित हैं। इस वर्ग की मानसिकता की विभिन्न परतों का ज्ञान व अनुभव उनके पास है, जो उनकी कविताओं में कभी सीधे तौर पर तो कभी पृष्ठभूमि में रहता है। भारतीय नौकरशाही औपनिवेशिक शासकों की सुरक्षा करने व ऐशो-आराम जुटाने के उपकरण के तौर पर विकसित हुई है। सत्ता पर विराजमान शासकों की सेवा-चाटुकारिता तथा जनता से घृणा उसे विरासत में मिली है, जिसे वह लोकतंत्र की स्थापना के बाद भी त्याग नहीं पाई तथा जनता के प्रति अपने उतरदायित्व को स्वीकार नहीं पाई। लोकतांत्रिक मानसिकता की अपेक्षा औपनिवेशिक मानसिकता तथा जनता की अपेक्षा राजसत्ता के प्रति उतरदायित्व भारतीय नौकरशाही के सबसे बड़े अन्तर्विरोध को बड़े लेखकों ने अपनी रचनाओं में अभिव्यक्त किया है। अंग्रेजी शासन में प्रशासकों के लिए निर्देशों व नियमों की 'नीली किताब' मार्ग दर्शक का कार्य करती थी। राजनीतिक तौर पर भारत को बेशक आजादी मिल गई है, लेकिन शासन अभी भी 'नीली किताब' साम्राज्यशाही के तौर तरीकों से ही हो रहा है। एक तरफ तो संविधान का शासन है जो हर नागरिक को समानता व स्वतंत्रता के अधिकार देता है, लेकिन वास्तविक शासन के सूत्र 'नीली किताब से' लिए जाते हैं।
''लब्बे लुबाब कि
जो-जो भी लिख गये
अंग्रेज नीली किताब में
अक्षरश: कराओ जी
''राष्ट्र अब चाहे जिनका हो
हम तो हैं नौकर सा'ब
हम तो मुरीद भई
नीली किताब के!"
भारतीय नौकरशाही जिस तरह से 'नीली किताब' यानी समाज के साम्राज्यवादी व सामन्ती गठजोड़ के समक्ष जिस तरह नतमस्तक है, लोगों के प्रति संवेदना, सहानुभूति को त्यागकर उसके प्रति जिस क्रूरता व संवेदनहीनता से पेश आता है उसका अनुभव हर शरीफ नागरिक को है। प्रदीप कासनी की कई कविताएं नौकरशाही के चरित्र को तथा सत्ता से उसके रिश्तों को अच्छी तरह से व्यक्त करती हैं। 'एक कसीदा रज्जबीरे का', 'शामिल तारीख', 'अर्जदाश्त' और 'काठ के पुतले' विशेषतौर पर रेखांकित की जा सकती हैं।
काठ के पुतले
काठ के पुतले
उजले पीले
काठ के पुतले

नाच नाचते
कोरस गाते
दरबारों में
मनसब पाते
काठ के पुतले

शेख चिल्ली
कभी भीगी बिल्ली
हो जाते
ये सोते सोते
प्रदीप कासनी की विशेष बात यह है कि वह हरियाणा के बदलते परिवेश में हो रहे परिवर्तनों को बड़े ही आलोचनात्मक ढंग से देख रहे हैं । अनूठी चीज यह है कि वे किसी तरह के अतीत-मोह का शिकार नहीं हुए हैं। ग्रामीण जीवन पर कविता रचने वाला कवि और विशेषतौर पर जो गांव की बजाए शहर में बस गया है वह गांव में वह चीजें ढूंढने लगता है, जो उसे शहर में नहीं मिलती। इस झोंक में कभी वह गांव को भाईचारे का प्रतीक मान लेता है, तो कभी सामुदायिक जीवन का आदर्श रूप। अपने कल्पित गांव को महिमामंडित करने लगता है, लेकिन गांव की वास्तविकता से परिचित नहीं होता। गांव को मूल्यों का समुच्चय मानने वाले यदि गांव की आलोचना करते भी हैं तो सिर्फ इसलिए कि वहां शहरों जैसी भौतिक सुविधाएं नहीं हैं। प्रदीप कासनी गांव में घुस रहे शहरी जीवन को देखते हैं और नष्ट होते गांव को भी। वे देख रहे हैं कि गांव में 'शहर' किस तरह से प्रवेश कर रहा है। गांव प्रदीप कासनी की कमजोरी नहीं है, बल्कि चेतना का हिस्सा है। केवल भौतिक रूप में नहीं, बल्कि जीते जागते लोगों के जरिये। इसलिए वे गांव में पल रही पुस्तैनी दुश्मनियों को देख पाते हैं और सामन्ती अवशेषों को भी। अकड़-अंहकार भरी चाल, ललकारती हुई खंखार, गालियां, पगड़ी के झूठे सवालों पर लड़ते लोग प्रदीप कासनी की नजरों से कभी ओझल नहीं होते। गांव में व्याप्त कबीलाई मानसिकता व सामन्ती-व्यवस्था के अवशेषों को बड़े गर्व से लोग धरण किए हुए हैं। इसी मानसिकता का परिणाम है कि हरियाणा के गांव में अपनी मर्जी से विवाह करने वाले युवक-युवतियों की हत्या करने में कोई शर्म महसूस नहीं करते, बल्कि गर्व महसूस करते हैं। जात-गोत के आदिम सम्बन्धों को ही अपने जीवन-मूल्य मान रही गावों की तमाम पगडिय़ां एकत्रित हो जाती हैं और मानवीय व कानूनी अधिकारों का उल्लघंन करती हैं। इसी विचारधारा के कारण कथित 'उच्च एवं इज्जतदार' जातियों की अधिकांश लड़कियां पैदा होने से पहले ही डॉक्टर की छुरी तले आ जाती हैं।

डग-डग-डग-डग हिलती धरती
कदमों के नीचे

आवाज के खंखार में
उबाल लेता लहू

सिर पर पाग
सोने से भारी
लफफ्जन-ब लफफ्जन मण-मण पक्की
जुबान

प्रदीप कासनी समाज के अन्तर्विरोधों को सूक्ष्मता से पकड़ते हैं और उसको ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में विभिन्न वर्गों की भूमिकाओं को देखते हैं। प्रदीप कासनी की कविताओं का कन्सर्न बिल्कुल स्पष्ट है। प्रदीप कासनी के लिए 'खोया हुआ गांव' के प्रति अतिरिक्त मोह नहीं है। वे गांव में हो रहे बदलाव को खुली आंखों से देख रहे हैं। गांव के बंद समाज व सांस्कृतिक दृष्टि से खाली जगह में अपसंस्कृति आसानी से खप रही है। प्रदीप कासनी इसे सिर्फ पाश्चात्य संस्कृति का हमला कहकर सरलीकृत नहीं करते, बल्कि परिस्थिति को उसकी पूरी जटिलता में समझते हैं। 'प्रापर्टी-डीलर', लाटरी-टिकटों, शेयर-पत्रों, बेसुरताल-दृश्यों, बदरंगी धुनों में झूमता-नाचता-गाता व्यक्ति इसका शिकार हो जाता है। कासनी की नजर एक बाहरी सैलानी की नजर नहीं है, बल्कि वे गांव की आबादी की तरफ से भी देखते हैं, इसलिए उनकी कविताओं में एक साथ इतने स्तर मौजूद रहते हैं कि पाठक को कुछ देर ठहरकर इन स्तरों को अलग-अलग करना और फिर समग्रता में देखना। यह प्रक्रिया बहुत ही कठिन व अपारंपरिक है, लेकिन हर कवि की कविताओं का अपना विशिष्ट सौन्दर्यशास्त्र व पद्धति होती है, इसीलिए सभी कविताओं को आत्मसात करने का कोई एक फार्मूला भी नहीं हो सकता। कविताओं में व्यक्त गांव के यथार्थ को फार्मूला-पाठन से उबरकर ही समझा जा सकता है।
बीस बरस बाद
लौटना होता है
गांव

गांव हो गया है
शहराता हुआ कस्बा

नीम की छांव
आरे की कनफोड़ चीखों में

कब्र के ऊपर
खुल गया
प्रापर्टी डीलर का दपफ्तर

बारिश और फसलों के कयास
मेले-ढेले के ब्यौरे
ताश-पत्तों पर रुका संसार
लाटरी टिकटों,
जाने किन-कैसी कंपनियों के शेयर-पत्रों
बेसुरताल दृश्यों
और बदरंगी धुनों के इर्द-गिर्द
करता गया चक्करघिन्नी

गांवों का जीवन उनकी कविताओं में समग्रता के साथ आता है। चाहे वह 'आखर दरवाजा' हो या कोई अन्य कविता वे इस जीवन को रोमांटिक ढंग से प्रस्तुत नहीं करते, बल्कि यथार्थ के साथ प्रस्तुत करते हैं. ग्रामीण महिला की परिवार व अपने समाज के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका है। श्रमशील महिला के चित्र नारी-विमर्श को दूसरे सिरे से उठाता है। स्त्री के जीवन व उसके योगदान को शोषणकारी व्यवस्था रेखांकित नहीं करती। किसान-स्त्रियां पूरे दिन मेहनत करती हैं, उनको कभी फुरसत नहीं मिलती, लेकिन उनकी मेहनत की कोई गिनती नहीं होती। घर के काम तो वह संभालती ही है, बल्कि वह खेतों में भी बराबर हाथ बंटाती हंै। स्त्री-विमर्श में भी मध्यवर्गीय स्त्री के सवाल ही छाए हुए हैं, वहां भी यह जगह नहीं पाती। प्रदीप कासनी की कविता में श्रमिक स्त्री के ऐसे दुर्लभ चित्र मौजूद हैं, जो स्त्री के महत्व को रेखांकित करते हुए उसके लिए सहानुभूति बटोरते हैं। कविताओं में न तो स्त्री की 'अबला' की छवि उभरती है कि वह दया की पात्र बन जाए और न ही अति आधुनिक की कि अपनी जमीन को छोड़ दे और कवि की काल्पनिक स्त्री हो जाए। हरियाणा के जीवन की सांस्कृतिक छवियों को पकड़ते हुए बहुत ही विश्वसनीय चित्र यहां मौजूद हैं। प्रत्येक कवि के कुछ मास्टर-पीस होते हैं, जिनमें कि उसकी समस्त प्रतिभा व प्रतिबद्धता के दर्शन होते हैं। मैं इस कविता को इसी श्रेणी में रखता हूं।

ढोर हांक कर लाने हैं
जोहड़ से
हाथों पर ओटते
चोथ

चूल्हा फूंकना है
झोंकते फेफड़े फूंकनी में
आंखों में धुंआ ही धुंआ
सोचते हाली को चूरमा
खीर संक्रांत को और दिनों खीचड़ा
भैंस के दिनों में गोजी का स्वाद
दो टीकड़े अंत में अपने लिए
नहलाने हैं टब्बर टीकर
तसले में पानी
पानी में तूड़ी और हारे की गुनगुनाहट
गोबर की गंध में धुलता है घाघरा

शिखर दुपहरी तक फावड़े
दरांतियां
खूड-दर-खूड खरपतवार
भरोटे के भार की दाब में
कौआ अटारी पर
गीत मायके के
गितवाड़े फिर थेपडिय़ां
खाद कुरडिय़ों के लिए
लाठी-जेली
जगह के झगड़े
दो-घड़ा पानी फिर
ईंढ़ी है नेज्जू है
ओढऩी में गोटा-सितारे
ओल्हा है ढ़ाठा है
ननदी से झगड़े हैं
सासू के रोने

फिर घिर्र-घिर्र घूमेगा बीजणा
उमस को मथेगा
सांसों में थमेगा
जिंदगी में उपजेगी आस

फिर लगेगी किलास

अब मुझे पढऩे जाना है
अपने कोल्हू से एक दिन

बाहर आना है

प्रदीप कासनी की कविता अपनी भाषा का निर्माण खुद करती है और नवीन भाषा में बात कहने के समस्त खतरे उठाती है। उनकी कविता-चेतना भाषा की गुलाम नहीं है। कबीर की तरह से वह भाषा की सीमाओं को लांघ जाती है और हरियाणा के महान रचनाकार बालमुकुन्द गुप्त की भाषा के निकट जा पहुंचती है। यहां भद्रजन की शिष्टता में व्याप्त कृत्रिमता के लिए कोई जगह नहीं और सहज ही अपने मौलिक रूप में कविताओं का हिस्सा बन जाती है। अपनी भाषा का निर्माण करने में सक्षम कविता की सृजनात्मकता स्वत: स्पष्ट है। कासनी की भाषा न तो लोक की भाषा है और न ही शिष्ट भद्रजन की। वे भाषा के नाम पर किसी क्षेत्रीय संकीर्णता के भी कायल नहीं। आमतौर पर हरियाणवी या कि दूसरी लोक भाषा-बोली में साहित्य रचना करने वाले साहित्यकार एक संकीर्ण मानसिकता का शिकार होते हैं। अपने क्षेत्र-प्रेम के नाम पर अतीत-मोह व नए के स्वीकार का रास्ता बंद कर देना आम बात है। वे अपने को श्रेष्ठ साबित करने के लिए दूसरे की खूबियों को भी नकार सकते हैं और अपनी उपलब्धियों को कई गुणा करके भी पेश कर सकते हैं। इस बोली-भाषा के मोह में लोकप्रियता का मुहावरा अख्तियार कर लेते हैं, और वे अपने परिवेश में लोकप्रिय हो जाते है लेकिन यह भी सच्चाई है कि वे यथार्थ पर आलोचनात्मक दृष्टि नहीं बना पाते। जिस के अभाव में वे अपने समाज को नयी नजर नहीं दे पाते और उस समाज में प्रचलित मूल्यों-मान्यताओं को ही कन्फर्म करने लगते हैं। स्वाभाविक है कि इसमें बहुत कुछ ऐसा भी होता है, जो समाज के विकास में बाधक होता है। क्षेत्रीय पहचान व प्रचलित अभिव्यक्ति के तौर तरीकों को अपनाने के कारण वे नया सृजन नहीं कर पाते। नये सृजन व चिन्तन की एक पहचान यह है कि वह अपनी भाषा भी तैयार करता है। जो पूरी तरह से न तो प्रचलित के नकार से होती है और न ही प्रचलित के सर्व स्वीकार से।
प्रदीप कासनी की कविताओं में हरियाणा के जीवन के ऐसे शब्द प्रयुक्त हुए है, जो ठेठ हरियाणवी हैं। ये शब्द पारिभाषिक शब्दों की तरह हैं, जिनको समझकर ही हरियाणा के जीवन को समझा जा सकता है। 'टब्बर-टीकर', 'छाकटे', 'टीमला', 'सांथरी', 'ढाठा', 'हारे'। हरियाणा की लोक भाषा के नाम पर न केवल हरियाणा से बाहर, बल्कि हरियाणा में भी वाक्य के अन्त में 'सै' या अन्य हरियाणवी लहजे को देवनागरी में लिपिबद्ध करने मात्र को ही हरियाणवी मान लिया जाता रहा है, जबकि प्रदीप कासनी ने हरियाणवी के इस रूढ़ प्रयोग को तुकबन्दी में भी नहीं आजमाया। उनका हरियाणावीपना उनके जीवित शब्दों में है, जो यहां के जीवन को अभिव्यक्ति देते हैं। प्रदीप कासनी का हरियाणवीपन ऊपर से ओढ़ा हुआ नहीं है, बल्कि उनके चिन्तन-मनन के भीतर से है। हरियाणा की बोली को उन्होंने अपनी पहचान के संकट के कारण कविता में नहीं अपनाया, बल्कि उनके व्यक्तित्व व सोच का अनिवार्य हिस्सा है। इसीलिए प्रदीप कासनी की रचनाओं में जीवन्त समाज के गतिमान चित्र दिखाई देते हैं। शब्द यहां सिर्फ शब्द नहीं रहतेे, बल्कि उनकी दृष्टि का स्पर्श पाकर हरियाणवी जीवन के चित्रों में तब्दील होते जाते हैं।
हाथों पर ओटते
चोथ
जिसका गांवों के जीवन से जरा सा भी परिचय रहा होगा, उसने जोहड़ से निकलते चैणे (भैंसों के झुण्ड) के पीछे चोथ (गोबर) को धरती पर गिरने से पहले हाथ में पकडऩे के लिए दौड़ती स्त्रियों और बच्चों को जरूर देखा होगा। धरती पर गोबर गिरने से पहले ही अपने हाथों पर लेने की होड़ कोई पुफर्तीले खेल का दृश्य नहीं है, बल्कि इसमें उनका जीवन संघर्ष है। गांव के इस आम दृश्य पर सबकी नजर तो पड़ी, लेकिन अपनी कविता में उतारा प्रदीप कासनी ने।
गांव के कठोर जीवन में जहां पानी की कमी हो वहां बच्चों का नहाना किसी सैलानी के नहाने जैसा नहीं होता, बल्कि तसले में पानी तथा उसमें तैरती तूड़ी (भूसा) भी सभी ग्रामीणों की स्मृति में होगी। इस पानी में हारे (एक किस्म का चूल्हा) में गोबर के ईंधन की महक का अहसास प्रदीप कासनी जैसा संवेदनशील कवि ही कर सकता है, जो छोटी से छोटी चीज को अपनी नजरों से ओझल नहीं होने देता।

नहलाने हैं टब्बर टीकर
तसले में पानी
पानी में तूड़ी और हारे की गुनगुनाहट
गोबर की गंध में धुलता है घाघरा

खंखार की आवाज गांवों में कई अभिव्यक्तियां समेटे होती है, इसमें चौधराहट की अहंकार भरी गूंज भी है और अपने विरोधी को घृणाभरी ललकार भी। सामन्ती अकड़ व ठसक है, जो मानवीय बराबरी को धता बता देती है। प्रदीप कासनी की कविता का यह चित्र गांव के जीवन में पसरे सामन्ती चिन्हों व सोच को एकदम उजागर कर जाती है।
आवाज के खंखार में
उबाल लेता लहू

किसानी जीवन के लिए फसल काटने के लिए (बूट) तथा काटी हुई फसल (सांथरी) विशेष महत्व है, जो जीवन को पूरे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को उजागर कर जाती है। इसमें किसान की श्रमशीलता के चित्र हैं। ऐसे श्रमशील चित्रों को वही रचनाकार अपनी रचनाओं में व्यक्त कर सकता है जो ग्रामीण जीवन को गहराई से समझता है। प्रदीप कासनी की कविताओं में काम करता किसान एकदम सजीव हो उठता है। ठहरी हुई जिन्दगी प्रदीप कासनी की कविताओं का हिस्सा नहीं बनती, उनकी नजर गतिमान दृश्यों, कार्यरत मानवों, बातचीत करते, राह चलते मनुष्यों को पकड़ती है, जो उनकी कविता को ताकत प्रदान करती है। प्रदीप कासनी की कविता की खासियत यह है कि उनमें आए समाज के विभिन्न वर्गों के चित्र अपने परिवेश से गहराई से संबद्ध होते हैं। उनको किसी प्रकार से उससे जुदा नहीं किया जा सकता।

आगे बूट न पीछे सांथरी

चादरे में
बाट चलता हर सख्स
पलकों पर मूढ़े से पहले

घी के अलूणेपन
और बाजरे और बासी सीत में
तैरते थक्के जिंदगानी के

तुमने कहा सच
हम उकडू़ चौकस उठंग जाते हैं

मुलुक बिछ गया चादर-सा
पधरी जब सरकार

थू थूकती है सुरजन की मां

सुरजन की मां के थू थूकने में जो घृणा विद्यमान है वह पाठक के दिमाग पर गहरे में अंकित हो जाती है। प्रदीप कासनी की कविता की भाषा अपने पाठकों के सामने चित्रों की दुनिया खोलती जाती है, जिससे वह अनदेखे पक्षों को भी देख पाता है और यथार्थ के विश्वसनीय चित्रों से कल्पनाशीलता विस्तार पाती जाती है। प्रदीप कासनी की कविता के चित्र अपने पाठक को अपनी लक्षित दुनिया में भी ले जाते हैं। मेहनतकश, संघर्षशील, उपेक्षित, अभावग्रस्त, विस्थापित, हाशिये पर धकेल दिए गए व्यक्ति के चित्र उनकी आमजन के प्रति प्रतिबद्धता को ही दर्शाते हैं। वैश्वीकरण के युग में पूंजी-प्रायोजित मीडिया से आबादी का यह बहुत बड़ा वर्ग लगभग गायब ही होता जा रहा है। सेटेलाइट में परजीवी-शोषक वर्ग की छवियां ही तैर रही हैं। गांव व शहर की श्रमशील जनता इस तरह ओझल हो गई है मानो कि है ही नहीं। प्रदीप कासनी ने इस वर्ग को अपनी कविताओं में स्थान देकर इसके प्रति प्रतिबद्धता प्रदर्शित की है।
प्रदीप की कविताओं का मुहावरा हरियाणावी है। हरियाणा के गांवों का यह मुहावरा सिर्फ शब्दों में नहीं है, बल्कि उनकी पृष्ठभूमि में भी मौजूद है। जब वे कहते है कि 'होने लायक सब होगा, कुल्हडिय़ों के बाहर' तो वे एक संदर्भ दे रहे होते हैं। हरियाणा में कहावत है 'कुल्हड़ी में गुड़ नहीं फूटेगा', (सीधी बात) जिसका अर्थ जो होगा सरेआम होगा, चुपचाप नहीं। 'अपने कोल्हू से बाहर आना है' (आखर दरवाजा) 'बधिया सी बैठी जाती थी'। हरियाणा के जीवन में इस तरह की अभिव्यक्ति आम बात है। प्रदीप कासनी की कविता में यह इसीलिए यूं की यूं आ जाती है कि वे इसके बीच में हैं। वे बाहर से यहां के जीवन को नहीं देख रहे। लोक मुहावरे व कहावतें कविता में फिट नहीं करते, बल्कि चिन्तन-प्रक्रिया के जरिये स्वत: ही आ जाते हैं। यहां ये कपड़े पर लगी थेगली की तरह नहीं, बल्कि कपड़े के ताने के रूप में ही रहते हैं, जिनको इस अभिव्यक्ति से अलग नहीं किया जा सकता।
प्रदीप कासनी की कविता में एक लय मौजूद है। यद्यपि कासनी किसी छंद के मोह में नहीं पड़े, लेकिन यह उनकी कविता का स्वभाव है कि वह छंद की ओर ही जाती है। वे सचेत तौर पर उसके छंद को तोड़ते लगते हैं। छंद हमेशा कविता की सीमा नहीं बनता, बल्कि उसकी ताकत भी बनता है। प्रदीप की कविताएं उनके सहज-स्वाभाविक अंदाज में दोहे सी बन जाती हैं।
चोर-उच्चके आये इक दिन
बन कर के सरदार
मुलुक बिछ गया चादर-सा
पधरी जब सरकार

चाटुकारों ने तलवे चाटे
चमचों ने बांटे लड्डू
नाच रहे थे भांड-मिरासी
टर्राते थे डड्डू

प्रभु रे! भगत बेचारो चीखे
'कैसी महादेवी बारात
चार्वाक सों दहन में तड़पें
कबिरा बारह बाट'।

इनकी हैं सब सरकारें
ये सबके सरदार
धेला-पाई सब समेटा
लंबा-चौड़ा कारोबार

'मालिकान' अब भये मजूरे
ये ही इक 'जमीनदार'
चक्की इनकी चरखा इनका
इनके कल और कार

रूप भी इनका रंग भी इनके
हथफेरी के उस्ताद
अंग्रेजों से घणे छाकटे
जितना हमको याद।
कविता में जिस तरह से तुक मिलाने की कोशिशें वे करते हैं, वह इस प्रवृति की ओर ही संकेत करती है। उनकी कविता की तुकबंदी मात्र तुकबंदी नहीं हैं। वह भी गम्भीर अर्थ लिए है। साम्प्रदायिक मुहिम के खतरों को बड़े हल्के-फुल्के ढंग से व्यक्त कर देने की क्षमता लिए हैं। बेशक प्रदीप कासनी ने तुकबंदी के लोकप्रिय ढंग में गम्भीर सवालों को उठाया है। हास्य कवियों ने मनोरंजन के लिए, किसी का मजाक उड़ाने के लिए तुकबंदी का प्रयोग करके खूब माल भी छका है और लोगों को गुदगुदी करते हुए उनकी रुचियां भी बिगाड़ी हैं। प्रदीप कासनी ने इसे ऐतिहासिक सवालों से जोड़ा है और राम-जन्मभूमि बाबरी-मस्जिद जैसे मुद्दे से जुड़े विभिन्न सवालों को स्थान दिया है।

गिलगिल गात पहिनकर निकर
लेकर भाला हुए वो चंडित
बाबर-बाबर करते घूमे
झोली हो गई चोखी 'फंडित'
रोज सबेरे लगते नारे
दादा नहीं तो पोता दंडित
प्रदीप कासनी की कविता का आख्यान पक्ष बहुत ही मजबूत है। वे आख्यान का प्रयोग बहुत ही सधे हुए ढंग से करते हैं। यहां किसी गरीब या वंचित-पीडि़त की कहानी सुनाकर पाठक को इमोशनल करना उनका मकसद नहीं है। और न ही कहानी को महिमामंडित करना ही। वे कथानक को अपने कथ्य के लिए प्रयोग करते हैं, न कि कथानक में उनका कथ्य तिरोहित या समाहित हो जाता है। किसी कवि का कहानी को इस तरह से साधना काफी महत्त्वपूर्ण है। 'वर्ग-च्युति और वर्ण-च्युति में कतई तली में लगा पड़ा' 'शामिल तारीख' का झगड़ू असमान विकास की निम्न वर्ग पर उसकी मार की तथा इसमें असहाय व विस्थापित होते आबादियों की प्रातिनिधिकता लिए हुए है। विविध रूपों में प्रस्तुत होता समाज का उपेक्षित, वंचित वर्ग प्रदीप कासनी की लेखकीय सहानुभूति प्राप्त करता है। पूंजीवादी विकास में बार बार उजडऩा व अपने को उजड़ते देखना झगड़ू के वर्ग की नियति है। जो सरकारी योजनाओं, नीतियों, कार्य-प्रणालियों का दर्शक भर है। जिसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं है। समाज के दो वर्ग यहां साफ तौर पर नजर आते हैं। झगड़ू को भी 'किसी और ग्रह से उतरे लगते' हैं, लेकिन वह इनके सामने अपनी जुबान नहीं खोल सकता। 'खदेड़े जाकर दूर खड़ा वह' अपनी गुजारे व जिन्दा रहने के दूसरे रास्ते तलाश कर रहा है।
छो: गटक कर
गुदड़ी ठा
अब डगमग कदमों
चल देता है:
दु:ख में
सुख में
नहीं डिगूंगा
विस्तीर्ण है क्षेत्र विकास का
मैनडेज के लाख आंकड़े
पंदरह का पचासवां हिस्सा
मिल जाएगा
मौज करूंगा
फिर दुनिया का
बाजार तो है ही
खुला हुआ,
उदार,
उन्मुक्त
लकदक-लकदक शो-केशों में
जा-जा कर भिक्षा मांगूगा
उदारीकरण की अर्थव्यवस्था में झगड़ू को अपने लिए भीख मांगने से बेहतर अवसर नजर नहीं आ रहे। यह अर्थ-व्यवस्था व विकास का रास्ता उससे रहने मात्र की जगह भी छीन रहा है और उसे दरिद्र बना रहा है। पूंजीवादी विकास में उसके पास जो गुजारे के साधन थे, इसमें वो भी छिन रहे हैं। उसके इस दर्द को कविता पूरी जटिलताओं के साथ प्रस्तुत करती है। 'शामिल तारीख' कविता पूरे वर्ग की त्रासदी को अपने में समेटे है, इतने बड़े फलक पर जिस रचनात्मक धैर्य की व अपने विषय वस्तु के साथ जिस रचनात्मक ट्रीटमेंट की जरूरत होती है, उसे प्रदीप कासनी पूरी करते हैं तभी कविता इतने विस्तार में जाकर विकास के प्रश्नों को, उसमें विभिन्न वर्गों की स्थितियों को, वर्गों की प्रतिक्रियाओं को और इस रास्ते उनके भविष्य की ओर संकेत कर पाने में सक्षम होती है। सच्चाई के महाआख्यान को उसकी जटिलता के साथ प्रस्तुत करना और उसे किसी कथारस में न डूबने देना अपने कथ्य के प्रति सचेत रचनाकार का ही काम है। झगड़ू के प्रति लेखक की सहानुभूति स्पष्ट है कि वह पूरे घटनाक्रम को कहीं दूर से नहीं, बल्कि झगड़ू के पास से बल्कि उसकी ही आंख से देख रहा है। इसमें झगड़ू की दृष्टि की कमजोरी को लेखक अपनी पैनी समझ से दूर करता जाता है और पाठक की सहानुभूति को झगड़ू से जोड़ता जाता है। इससे झगड़ू उसकी दया का पात्र नहीं होता, बल्कि अपनी मानवीय अस्तित्व के साथ उपस्थित रहता है।
प्रदीप कासनी का कवि अपने कान खोलकर रखता है, इसीलिए अपने आस पास हो रही ध्वनि विविधताओं को पकड़ पाते हैं और ध्वनि बिम्बों का अपनी कविताओं में बहुत विश्वसनीयता से प्रयोग करते हैं। 'फिर घिर्र-घिर्र घूमेगा बीजणा', 'डग-डग-डग-डग हिलती धरती', 'टुलक-टुलक टुलक-टुलक, खचड़-पचड़ खचड़-पचड़'। ये ध्वनियां छायावादी बिम्ब नहीं हैं व न ही आभिजात्य के बिम्ब हैं, बल्कि ये ग्रामीण जीवन के कठोर व अनगढ़ बिम्ब हैं, जिनमें वहां का जीवन बसता है। इनकी आवाज ही पूरे दृश्य से पर्दा उठा देती है। जो कवि इस तरह की ठेठ ध्वनियों को पकड़ सकता है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि वह इस जीवन की भीतरी सच्चाइयों को कितनी गहराई से देख रहा है। इस जीवन पर नजर ही प्रदीप कासनी की कविता एक चमत्कार सा पैदा करती है। और इस जीवन के बीच में रहते हुए भी इन पर ध्यान नहीं जाता, लेकिन इन कविताओं से यह यथार्थ कितना महत्वपूर्ण लगने लगता है। अपने परिवेश से पाठक को जोड़ देने में ही किसी लेखक की फलता है।
प्रदीप कासनी की कविताओं में दूसरे कवियों के संदर्भ स्वत: ही आ जाते हैं। वे अपने को किसी धारा से जोड़ रहे होते हैं। जो प्रदीप कासनी की अध्ययनशीलता को तो दर्शाती है, लेकिन पाठक का उससे रिश्ता न होने के कारण बाधा भी बनती है। लेकिन यदि यह संदर्भ एक बार स्पष्ट हो जाए तो कविता पूरी परम्परा को ही उद्घाटित कर देती है। 'लड़ो लड़ो जल्दी लड़ो' कविता रघुवीर सहाय की 'हंसो हंसो जल्दी हंसो' का संदर्भ दे जाती है। जिस पाठक ने यह कविता पढ़ी है वह प्रदीप की कविता को आसानी से और पूरे संदर्भ के साथ पढ़ पाता है। प्रदीप की कविता पाठक को अपनी परम्परा में ले जाती है। यदि पाठक शोधकत्र्ता है और उसके लिए ये संदर्भ बड़े मददगार होते हैं, जो अपनी परम्परा को परिभाषित करते हैं। 'प्रभु रे! भगत बेचारो चीखे, कैसी महादेवी बारात, चार्वाक सों दहन में तड़पें, कबिरा बारह बाट'। 'खच्चर रेहड़ू हाथ में सोटे, कैसे कैसे दोन किखोते काठ के पुतले',। आपातकाल पर लिखी नागार्जुन की कविता से 'कोयल की कूक' का संदर्भ देकर प्रदीप कासनी 'शामिल तारीख' कविता में 'टीले की ढीली ईंटों में, एक कोतरी कूक गयी थी' का प्रयोग करते हैं।
प्रदीप कासनी इच्छा और सच्चाई के द्वन्द्व को, भीतरी संघर्ष और बाहरी यथार्थ को, उपभोक्तावाद और मानवीय सरोकारों के बीच टकराहट को अपनी कविताओं में बहुत अच्छी तरह से व्यक्त करते हैं। ढर्रा-जीवन व औपचारिकता-निर्वाह यानी जीवन को 'निरी मुनीमी' बनाने के खिलाफ हैं। जीवन से वे कुछ अपेक्षाएं रखते हैं। 'प्रदत्त दड़बों' में कैद रहना उन्हें स्वीकार नहीं। जीवन का आक्रोश ही अपने को आत्मपीड़ा देने में व्यक्त होता है। वे बुरी से बुरी परिस्थिति में भी ठहाका लगाकर हंसने की और भयावह चुप्पी तोडऩे की हिम्मत व जीवट रखते हैं, इसी संस्कार से उनकी कविता भी सराबोर है। कवि का आत्मसंघर्ष कविताओं में साफ तौर पर नजर आता है, विशेष तौर पर 'कोशिश' व 'अनुक्रिया' कविता में। 'खाओ, पिओ और मगन रहो' 'चिंता छोड़ू सुख से जिऊं' दर्शन की सीख मनुष्य को पशु के स्तर पर ले आती है, जो 'अवन्नी चवन्नी' के कवि को स्वीकार नहीं।
प्रदीप कासनी के व्यक्तित्व का खिलन्दड़ापन उनकी कविताओं में भी दिखाई देता है, वे इसे लेकर कभी अति गम्भीर हो सकते हैं और कभी इतने नॉन सीरीयस की अपनी कविताओं के और कविता संग्रह का नाम भी बड़े ही चलताऊ ढंग से कर सकते हैं। प्रदीप कासनी की कविता से पाठक कॉमन सेंस के स्तर पर सम्पर्क नहीं साध सकता, उसके लिए पाठक को एक विशेष तैयारी की आवश्यकता होती है। कहीं तो वह अपना स्तर इतना ऊपर उठा लेती है कि पाठक के सिर से गुजरने की गुंजाइश रखती है। और कई बार कविता इस तरह से चमत्कृत करती है कि पाठक के सामने मुंह बाए देखने के अलावा कोई चारा नहीं होता। प्रदीप कासनी की कविता एक चाल से अपनी दिशा में नहीं चलती, बल्कि वे कई बार चलते चलते ब्रेक सा लगा देती है। वह एक झोल अपने अन्दर रखती है। एक ही समय में कई स्तरों पर चलने वाली कविता पाठक के लिए बोझिल हो जाती है। कविता के प्रति गम्भीर कमिटमेंट वाला ही इसे पढ़ सकता है। कविता पठन का परम्परागत संस्कार भी प्रदीप की कविता से सम्पर्क बनाने में बाधा पैदा करता है। प्रदीप कासनी हमारे समय के महत्त्वपूर्ण रचनाकार हैं, जो अपने समाज की सच्चाइयों को बड़े मौलिक ढंग से व्यक्त करने के लिए जद्दोजहद करते हैं।

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