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December 28, 2010

मध्यवर्गीय अकर्मण्यता में नश्तर : ब्रजेश कठिल

मध्यवर्गीय अकर्मण्यता में नश्तर : ब्रजेश कठिल

सुभाष चन्द्र, एसोसिएट प्रोफसर, हिंदी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र

ब्रजेश कठिल की कविताओं का संग्रह जो राख होने से बचे हैं अभी तक पिछले दिनों ही आधार प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। यद्यपि ब्रजेश कठिल की कविताएं देश की प्रमुख पत्रिकाओं में पढऩे को मिलती रही हैं, और पाठकों का ध्यान आर्कषित करती रही हैं। लेकिन कविताओं को एक साथ पढऩा एक विशिष्ट अनुभव से गुजरना है। ब्रजेश कठिल के काव्य-अनुभव से समाज को देखना अपने आप में एक सुखद है और दृष्टि विस्तार का क्षण भी। आत्मपरीक्षण का अवसर भी ये कविताएं देती हैं और समाज को समझने का भी। ये कविताएं व्यक्तिगत चौहद्दी से निकालकर सामाजिक दायित्व का अहसास करवाती हैं।
ब्रजेश कठिल की कविताओं में वर्तमान समाज की व्यक्तिवादी उदासीनता व असामाजिकता की ओर संकेत करती हैं। आज का व्यक्ति समाज में और अपने आस-पास से एकदम तटस्थ हो गया है। उसके सामने कुछ भी घटता रहे, वह उस पर कोई प्रतिक्रिया ही नहीं करता। यदि इसके प्रति उसकी कोई प्रतिक्रिया होती है तो वह परिस्थिति से बचना चाहता है, लेकिन चूंकि वह इंसान है और इंसान के जैविक-सामाजिक गुण हैं। स्थितियों से बचने के लाख उपाय करता है, परंतु वह स्वयं से तो नहीं भाग सकता। अकेले में वह अपने कार्यों व प्रतिक्रियाओं पर गौर करता है तो उसके सामने एक संकट खड़ा हो जाता है। यही पर ब्रजेश कठिल की कविताएं अपने लिए तथा मानव से आशा की जमीन तलाश करती हैं। बार बार यह विषय कविताओं का इसीलिए बनता है। तटस्थता सुनने में बहुत अच्छा शब्द है, और साहित्य में इसे काफी महिमामंडित भी किया गया है, लेकिन मनुष्यता के लिए यह अच्छा नहीं है। तटस्थता, दिनान्त पर, प्रार्थना, डायरी से एक पन्ना, खेल, जहाँपनाह और मैं, सब कुछ मेरे सामने जैसी कविताओं में इसे प्रकट किया है। ब्रजेश कठिल की कविताओं का यह मुख्य स्वर है। अपने आसपास घटित हो रही घटनाओं के प्रति उदासीनता कठिल के लिए मृत्यु का लक्षण है। अपनी मानवीय प्रतिक्रिया की छटपटाहट से ही ये कविताएं उपजी हैं।
वे आए
और उतार कर ले गए
बगल में बैठे आदमी की कमीज
मैं अपने जूतों के फीते कसता रहा
और हंसता रहा
एक महीन बेशर्म लम्बी तटस्थ हँसी
सवालों से आँख बचाकर
मैं खिसक तो आया नेपथ्य में
लेकिन खुद से
सवाल करती हुई मेरी आँख
अब मुझे जीने नहीं देती। तटस्थता
मध्यवर्गीय व्यक्ति अपने आस पास के परिवेश से बचना चाहता है। ब्रजेश कठिल की खूबी यही है कि वे समाज के अभावों-कष्टों-समस्याओं की ओर ध्यान खींचते हुए उनके प्रति हमारी प्रतिक्रियाओं को भी उदघाटित करते जाते हैं। इससे न तो पूरी तरह घटना और स्थिति ही ओझल होती है और न ही उसे देखने वाला व्यक्ति। तमाम कोशिश करने के बाद भी समाज की वास्तविक स्थितियों से मुंह नहीं मोड़ सकते। भागने का कितना ही यत्न क्यों न किया जाए आखिरकार हमारा उनसे सामना होगा ही होगा। डायरीसे एक पन्ना कविता इसे वयक्त करता है।
आज बैंक से लौटते हुए
रास्ते में मिली एक पहचान की स्त्री
वह अपने घुटनों के दर्द से
इतनी परेशान थी कि रो पड़ी मेरे सामने
मगर मैं दुखी नहीं हुआ उसकी तकलीफ से
क्योंकि मेरी जेब भरी थी
और मुझे जल्दी थी घर लौटने की

आज जहाँ खड़े होकर विरोध करना था मुझे
वहीं साध ली मैंने एक समझदार चुप्पी
खुद से यह कहते हुए कि हर गलत काम को
ठीक करने का ठेका अकेले मेरे पास नहीं है

आज मैंने पूरे शहर को पार किया
और कुछ नहीं देखा
मगर टीवी में देखी एक करूण-कथा
बेचैनी मुझे होने को थी कि मैंने चैनल बदल दिया

आज देखी मैंने अपनी तस्वीर
और खुद से डरा
आज मैं अपने ही सामने
थोड़ा-सा मरा।
स्थितियों से आँख चुराने के लिए गढे गए तर्क व कला-कौशल व्यक्ति के सामाजिक भाव के सामने चुक जाता है, उसका ग्लानि-बोध उस पर हावी होता है। हत्या, चाकू और हत्यारा सामने होते हुए भी प्रतिकार न कर पाना, बल्कि स्वयं को ही बचाना असल में व्यक्तिगत कमजोरी नहीं, बल्कि व्यवस्था की ही उपज है, वह इस स्थिति से इसीलिए बचना चाहता है, क्योंकि व्यवस्था हत्यारों को संरक्षण देती है, और ऐसा माहौल निर्मित करती है कि कोई व्यक्ति उसमें शामिल होने को उत्साहित नहीं होता।
मैं पकड़ा जाऊंगा
और घसीटा जाऊंगा अदालत में
जहाँ से हत्यारा
मुस्कराता हुआ वापस आएगा।
मैंने साचा कि मैं शहर को दस्तक दूँ
मगर शेयर बाजार के शोर में
कुछ भी तो नहीं सुनता शहर।
ब्रजेश कठिल की कविताओं में कमीज बहुत आती है। कमीज के जरिये ही वे अपनी अभिव्यक्ति को शसक्त करते हैं और कमीज से ही अपना बचाव करते हैं। कमीज उतारना और पहनना एक मूल्य के साथ जुड़ जाता है। वर्तमान समय में सत्ता के प्रति जो श्रद्धा-भाव प्रकट हो रहा है, उसने स्वतंत्र अभिव्यक्ति को चुनौती सी दे रखी है। विशेषकर विश्वविद्यालय जैसी बौद्धिक उच्च संस्थाओं में यह माहौल देखने में आता है। ब्रजेश कठिल लम्बे समय तक कथित बुद्धिजीवी वर्ग के बीच रहे हैं और उनके व्यवहार को जानते-समझते रहे हैं। यहां का परिवेश उनकी कविताओं में है। यह कहना भी कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि समाज में जो निराशा, उदासीनता, कथित तटस्थता, ठंडापन वे देखते हैं वह यहीं के माहौल से है। दूसरी तरफ समाज का दूसरा जुझारू वर्ग है, जो उनकी कविताओं में आता है। घोर संकट होते हुए भी वहां जीवन के प्रति पस्ती, उदासीनता नहीं है। एक जिजीविषा है, परिस्थितियों से संघर्ष करने की हिम्मत है, जीवन यहां समाप्त नहीं हो गया है। परिस्थिति से आँखे चुराने के लिए किसी वांसिग मशीन या गलीचे के नीचे घुसने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि उनस मुकाबला करने साहस है। पति के मरने के बाद सड़क पर छोटी सी दुकान लगाकर अपना जीवन चलाने वाली औरत हो, चाहे मकान बनाने से पहले मजदूरों का घर हो या कूड़ा बीनती लड़की हो। निम्र वर्ग के चरित्रों में एक विशेष तेज है जो मध्यवर्गीय या कि उच्च वर्गीय में दूर दूर तक भी दिखाई नहीं देता।
विश्वविद्यालय का प्रोफेसर
समाचार वाचक की उच्चारण शुद्धता
और वर्षों के अभ्यास से अर्जित
स्वर की जादूगरी के साथ
प्रान्त के अदना मन्त्री के सम्मान में
राग जै-जैवन्ती गा रहा है।

सभागार में संगत करते हुए कुछ सिर
तीन ताल में निबद्ध रचना की तरह
लगातार हिल रहे हैं।

मैं इस समय अपने लिए
तुरन्त एक जम्हाई की
जरूरत महसूस करता हूं
एक लम्बी, खुरदरी
स्पष्ट और अशिष्ट जम्हाई की
जो हिलते हुए सिरों पर गिरे
और तोड़ दे उनकी लय को।
ब्रजेश कठिल की कविताओं की खूबसूरती इसी बात में है कि वे कविताओं के सामग्री खोजने कहीं दूर नहीं जाते। कविता बिल्कुल उनके पास से ही उगती है, इसीलिए उनकी कविता की प्रभावी अभिव्यक्ति की सामग्री भी उनके बिल्कुल निकट से आती है। मसलन कमीज जो सबसे नजदीक रहती है या फिर चापलूसी करते बुद्धिजीवियों से तंग आकर जम्हाई। उस समय जम्हाई भी एक कारगर हथियार बन सकती है। रूकी हुई बस में चुटकुलों की किताब का गर्मी और उमस के खिलाफ प्रयोग किया जा सकता है। और बाजार की एकाधिकारी पूंजी से बचने के लिए खरीदी गई दातुन। प्रतिरोध के लिए उनको किसी विशेष वस्तु या हथियार की जरूरत नहीं होती, वह उनके सबसे पास होती है आर ऐसे वातावरण की स्वाभाविक उपज भी। इस स्वाभाविक उत्पति से ही कविता अपने लॉजिकल प्रवाह में भी जाती है। आगत संकट से लडऩे, मुकाबला करने और जीतन के लिए ये सर्वसुलभ औजार निहायत नाकाफी हैं। प्रतिरोध एक हास्यास्पद दुस्साहस न बने इसके लिए एक तैयारी व जद्दोजहद की आवश्यकता है। इस संघर्ष की चेतना की आवश्यकता है उसके प्राथमिक अहसास को ये कविताएं जगाती हैं।
ब्रजेश कठिल अपने समय की व्यवस्था की धूर्तता, धोखेबाजी, चालाकी को बखूबी पहचानते हैं। वर्तमान शासक-व्यवस्था ने एक सूक्ष्मता ग्रहण कर ली है, जिसे भोलाभाला व्यक्ति पहचान नहीं पाता और उसका शिकार हो जाता है। वर्तमान शासक वर्ग ने अपने को बहुत सांस्कृतिक बना लिया है अब उसकी पहचान कठिन हो गई है। उसने शरीफ आदमी का वेश धारण कर लिया है। अपनी भाषा और तौर-तरीके बदल लिए हैं। शोषक अधिक चतुर-चालाक हो गया है, वह अधिक समझदार हो गया है। ब्रजेश कठिल ने प्रसिद्ध व्यंग्यकार इब्ने इंशा की तरह हमारे संज्ञान के चौखटे को तोड़ा है, जो अक्सर ही पुरानी कथाओं पर भरोसा करता है, उनका मानना है कि अब शक्ति सम्पन्न वर्ग ने अधिक सूक्ष्म औजार विकसित कर लिए हैं। शक्तिसंपन्न वर्ग के शिकार एक सांस्कृतिक उत्सव है। उसने संरक्षक की भूमिका अख्तियार कर ली है। उससे संघर्ष करने के लिए उसकी इस तरह की चालबाजियों को समझना निहायत आवश्यक है।
शेर अब माँदों में नहीं रहते
वे बीच जंगल में सबके साथ रहते हुए
हँसते हैं जंगल की तरह
वे जंगल के हित की बात करते हैं
और अक्सर करते हैं
संगीत सन्ध्या का आयोजन
पूछते हैं खरगोश से, या मेमने से, या बकरी से
प्यारी बकरी, तू गाना गाएगी?
बकरी बिल्कुल भी नहीं जान पाती
कि अब वह अपनी
मिमयाहट भी नहीं बचा पाएगी।
ब्रजेश कठिल की कविता सोच की संरचना को तोड़ती है। हत्यारों के बारे में जो हमारी धारणाएं हैं, बनी बनाई छवि है उसके रहते हत्यारों को नहीं समझा जा सकता। उन्होंने अपनी पुरानी छवि को बदल लिया है। पहले वे कानून तोडऩे वाले थे, लेकिन अब वे कानून का सहारा ले रहे हैं और स्वयं कानून बना रहे हैं।
अब वे कतई बदसूरत नहीं होते
न ही उनकी आँखें होती हैं खूंखार
न चेहरे पर कोई कटे हुए का निशान

वे इतने सहज होते हैं
कि पहचानना मुश्किल है अलग से
उनके चेहरे पर कहीं नहीं होता
अत्याचारी होने का सबूत।

उन्हें आती है जादूगरी
वे जानते हैं हिंस्र नफरत को
खिलखिलाती हँसी के पीछे छिपाना
या अपने गुस्से पर झट चढऩा
मुस्कुराहटों का मुखौटा

वे बैठते हैं सिंहासन की बगल में
और कानून की किताब के ऊपर
होते हैं उनके पैर
उनके हाथ होते हैं बहुत लम्बे
इतने कि दबोच लें पूरे शहर को

मगर वे ऐसा नहीं करते
वे हँसते हैं भद्र भोली और निर्दोष हँसी
और धीरे-धीरे खेलते हैं शहर से
चतुर खिलाड़ी की तरह।
ब्रजेश कठिल के इतिहासकार की नजर है, जो समाज को बदलते हुए देख रहे हैं। समय के प्रवाह में जो चीजें समाप्त हो रही हैं उन पर उनकी गहरी नजर है। बदलते वक्त में वे कुछ मूल्यों-परम्पराओं को समाप्त होता हुआ देखते हैं। हड़बडिय़ा समय जीवन की लय को तोड़ रहा है, जीवन की छोटी-छोटी खुशियों को छीन रहा है। भागदौड़ में जीवन पीछे छूट रहा है, माँ अपनी बेटी के जन्म दिन पर चूमना भूल रही है, तो कविता को सुनते हुए व्यवस्था के ढांचों को तोड़ते श्रोता भी गायब हो रहे हैं।
रात भर कविताएं सुनने वाले
झूमते हुए श्रोता खो चुके हैं
अतीत मं कहीं

बेमतलब मटरगश्ती करते हुए
दोस्तां का झुण्ड अब दिखाई नहीं देता
दूर-दूर तक

उत्सवों में तौल कर हँसते हुए लोग
लौट जाना चाहत हैं घरों को
रात होने से पहले

बस पकडऩे की जल्दी मं
भूल जाती है माँ
जन्मदिन पर बेटी को चूमना

इस हड़बडिय़ा समय में
इतनी जल्दी में हैं लोग
कि वे कहीं भी आते नहीं हैं
सिर्फ जाते हुए दिखते हैं
बहुत तेजी से

भागते हुए पैरां के नीचे
जब लगातार बदल रही हैं
धरती की दृश्यवलियाँ
मैं कैसे बताऊँ बच्चे को
ठठाकर हँसने का मतलब।
ब्रजेश कठिल अपने समय के आलोचक हैं, जिसमें मनुष्य का भौगालिक विस्तार हो रहा है। मीडिया के जरिये तथा संचार के साधनों के जरिये वह बड़ी दुनिया से जुड़ रहा है, ग्लोबल हो रहा है, लेकिन उसका भाव-संसार,मानवीय भावनाएं, संवेदनाएं सिकुड़ रही हैं।
ये कैसा समय है, दोस्तो
कि फैल रही है हमारी दुनियाँ
धरती के दूसरे छोर तक
मगर कानों को सुनाई नहीं देता
बगल से आता हुआ आर्तनाद कैसा समय
ब्रजेश कठिल की कविता में कोई नास्टेलजिक भाव नहीं है। परम्परा व अतीत के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण है, जो बचाने लायक परम्पराओं और मूल्यों की चिन्ता करता है। परम्पराओं के प्रति अंधभक्ति या श्रद्धा की यहां कोई गुंजाइश नहीं है। अपने समय के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि के सृजनकार में अतीत के प्रति भी आलोचनात्मक दृष्टि होगी। इस दृष्टि से ब्रजेश कठिल की कविताएं अपने पाठक को अपने अतीत और वर्तमान के प्रति सचेत करती जाती हैं। ब्रजेश कठिल अपने समय की प्रगतिशील व प्रतिक्रियावादी शक्तियां को पहचानते हैं। कथित संस्कृति की रक्षक शक्तियां सहनशीलता की परम्पराओं और लोकतंत्र को समाप्त करती है। संस्कृति की रक्षा के नाम पर फासीवादी और तानाशाही की शक्तियां समाज को आंतकित करती हैं। संकीर्णता और साम्प्रदायिकता ने परिवेश में जो जहर घोला है उससे संवेदनशील हिन्दुस्तानी विचलित है।
उन्होंने तय कर लिया है
कि वे संस्कृति को बचा कर रहेंगे
वे देखेंगे कि कैसी हो कला
कैसा हो साहित्य
और कैसा रचा जाए इतिहास

उन्होंने सम्भाल ली है कमान
भाँजी जा रही हैं लाठियाँ
पैने किए जा रहे हैं
भाले गँडासे और बरछे
सावधान
अब किसी को नहीं छोड़ा जाएगा
कौन है अधर सिर उठाते हुए
सवाल करना मना है - बता दो उसे

बता दो उसे
कि लाठी और भाले से
मारे जाएंगे लोग
मगर बचाई जाएगी कला
बचाई जाएगी संस्कृति
बचाया जाएगा इतिहास।
ब्रजेश कठिल की कविता तानाशाही के खिलाफ गम्भीर आवाज है। तानाशाही की शक्तियां हंसी से घबराती हैं। हंसी का माहौल उसके आतंक को कम करता है। चुप्पी से ही तानाशाही को शह मिलती है, लोगों की चुप्पी ही तानाशाही की खुराक है। लेखक इसे तोडऩा चाहता है।
मुझे याद आया कि हिटलर को चुटकले नापसन्द थे
कोई भी तानाशाह पसन्द नहीं करता चुटकुले
वह डरता है हँसी से रूकी हुई बस में चुटकुलों की किताब
ब्रजेश कठिल की कविता में एक विचार, स्थिति, या विडम्बना का उद्घाटन होता है। ऐसे क्षण आ जाते हैं कि व्यक्ति असमंजस में पड़ जाता है। एक तरफ मानवीयता का तकाजा है तो दूसरी तरफ व्यवस्था का भय, लालच। ऐसी स्थिति का सामना सभी को अपने जीवन में करना पड़ता है। इस स्थिति में ब्रजेश कठिल की कविता मानवीय सरोकार को महत्त्व देती है।
ब्रजेश कठिल की कविताओं को हृदयगंम करने के लिए किसी विशेष तैयारी की आवश्यकता नहीं है। साधारण से साधारण मनुष्य से लेकर काव्य परम्परा से परिचित व्यक्ति तक इनमें आनन्द महसूस करता है। कविता में सबके काम आने वस्तुएं हैं, उनके साथ विचार जुड़ जाते हैं और चेतना का हिस्सा बनने में सहायक होती हैं। पुरानी चवन्नी अठन्नी हो या फिर छतरी या जम्हाई।
ब्रजेश कठिल की कविताओं में दो तरह का जीवन है। एक मध्यवर्गीय तथा दूसरा आम जीवन। एक का वे स्वयं हिस्सा हैं और दूसरे को एक दूरी से देखते हैं। उदास स्त्री, छ बरस की बच्ची, सामान बेचती औरत कविताओं का हिस्सा बन जाती हैं। मध्यवर्गीय व्यस्त जीवन आमतौर पर इनकी ओर देखकर भी नहीं देखता और विशेष प्रकार उपेक्षा इनके प्रति दखने में आती है, लेकिन ब्रजेश कठिल का कवि इन्हें सहज ही अपनी कविताओं में स्थान दे देता है। गरीबों के दूरी से देखे गए जीवन के वर्णन में एक विश्वसनीयता तो है,लेकिन एक ठंडी तटस्थता भी है। एक पल कवि की चेतना उस जीवन मं घुसने, शामिल होने को जोर मारती है, लेकिन अगले ही पल सोच लेने भर से संतुष्ट हो जाती है।
ये कविताएं व्यवस्था के मारे हुए तथा उनसे लडऩे वाले जीवट चरित्रों से न जुडऩे की कचोटी अहसास तो पैदा करती हैं, लेकिन उनसे जुडऩे की प्रेरणा नहीं जगाती। जीवन के भीतर से न उपजकर बाहर से उपजने वाली कविता की यही त्रासदी है कि वह मात्र सहानुभूतिपूर्ण प्रतिक्रिया बनकर रह जाती है। जिस तरह से कवि मध्यवर्गीय जीवन के भीतर की विडम्बनाओं और नैतिक-भौतिक संकटों को व्यक्त करता है, उस तरह से इस जीवन के प्रति नहीं कर पाता। यहां रचनाकार के आलोचनात्मक विवेक के नहीं, बल्कि संवेदनशील फोटोग्राफर की सी विश्वसनीयता और तटस्थता के दर्शन होते हैं।
अपने ही बोझ से दबे मध्यवर्ग के जीवन को ये कविताएं उद्घाटित करती हैं। उनका जीवन कितना पाखण्डपूर्ण है, जिससे मानवीय ऊष्मा गायब है, जीवन की छाटी छोटी खुशियां गायब हैं। सम्बन्धों में एक ठण्डापन है, जिसे वे बाजार से, सामान से, सुविधाओं से भरना चाहते हैं। मध्यवर्गीय जीवन का खालीपन ही उनको निष्क्रिय, उदास, हताश बना रहा है। इसके बरक्स अभावपूर्ण आमजीवन का वर्णन इस बात का अहसास तो देता है कि कम भी गुजारा संभव है, लेकिन इसी बिन्दू पर जीवन के अभाव व कष्ट महिमामंडित होने का आभास भी है। अभावमय जीवन के प्रति कोई आक्रोश इन चरित्रों में दिखाई नहीं देता, बल्कि मध्यवर्गीय आडम्बरयुक्त जीवन से अघाए-उकताए व्यक्ति को यह राहत प्रदान करता है।
ब्रजेश कठिल की कविताओं में दो वर्गों की उपस्थिति से सहज ही उनकी जीवन स्थितियों की तुलना हो जाती है। साहब और सेवक, बड़ी पूंजी और छोटी पूंजी, बड़े सेठ की बीवी और आम औरत को आमने-सामने रखने से समाज की विभिन्न परतों को उनके बीच मौजूद असमानता की खाई को दर्शाने में मदद करती है और दो चित्रों से पाठक को मंतव्य समझने में आसानी रहती है।
ब्रजेश कठिल की कविताएं बदलते समय की ओर संकेत करती हैं। बदलाव की यह छाया शहरों और व्यक्तियों पर पड़ रही है। शहरों में नए तौर तरीके आ रहे हैं और व्यक्ति नई संस्कृति को अपना रहे हैं। इस नई संस्कृति में बाजार की प्रमुखता है यहां आस्थाओं से लेकर इतिहास तक को व्यापार में बदलने की संस्कृति है। शहरों का चेहरा बदल रहा है और व्यक्तियों का भी।
ब्रजेश कठिल की कविताओं में अमेरिका की यात्रा के दौरान के कुछ अनुभव भी दर्ज हैं। अपने छोटे से कस्बे कुरूक्षेत्र में भी वे अमेरिका का फैलाव देखते हैं। अमरीका आज पूरी दुनिया में बर्बरता का नमूना है, लेकिन मध्यवर्गीय समाज के सपनों का देश भी है। अमेरिकन जीवन शैली और जीवन-मूल्यों के प्रति अनुराग है।
अमेरिका एक बाजार है
सफल, फैलता और लीलता हुआ बाजार
और हम नफरत करते हैं बाजारवाद से

मानवविरोधी है अमेरिका की राजनीति
इसकी नीतियाँ दुनिया के हित में नहीं हैं
और हम हैं सर्वजन हिताय के पक्षधर
इसीलिए हम विरोध करते हैं
यहां की राजनीति का

ये सर्वसुलभ वक्तव्य हैं हमारे वक्त के
मगर क्या करें हम अपनी दोगली इच्छाओं का
कि तमाम नफरत, विरोध और प्रतिरोध के बावजूद
हम जाना चाहते हैं अमेरिका
हम गाना, बजाना और बिछाना चाहते हैं अमेरिका
चाहे जैसे भी हो आज हम होना चाहते हैं
अमेरिका
सिर्फ अमेरिका

अमेरिका एक संस्कृति का प्रतीक है, जिसमें युद्ध हैं, नस्लवाद है, शोषण है, धोखेबाजी है। ब्रजेश कठिल की कविताओं में अमेरिका एक देश मात्र नहीं होता, बल्कि एक सामाजिक-राजनीतिक दर्शन है, जहां मानवीय मूल्यों की कोई गुंजाइश नहीं है, जिसमें कुछ लोगों के लिए ही समस्त सुविधाएं हैं, शेष जीवन को भुगतने के लिए हैं। अमेरिकी यानी साम्राज्यवादी संस्कृति के विरोध के समय ही ब्रजेश कठिल का कवि राजनीतिक हो जाता है और अपनी प्रतिबद्धता को बहुत ही प्रखरता से उद्घाटित करता है। यहां वह अपने मध्यवर्गीय असमंजस के खोल से बाहर आते हैं और अपनी पक्षधरता स्पष्ट करते हैं। साम्राज्यवाद के खिलाफ होना जनपक्षधरता की अनिवार्य शर्त है।
प्रसिद्ध आलोचक विष्णु खरे ने ब्रजेश कठिल की कविताओं के बारे में ठीक ही लिखा है कि उनकी अधिकांश सार्थक और प्रासंगिक कविताओं से जो बहुमूल्य शिल्पकृतियां आर्टिफैक्ट्स निकल कर आती हैं, वे हैं व्यक्ति और समष्टि को लेकर एक प्रतिबद्धता, सामाजिक और राजनीतिक पतन के खिलाफ एक संयत क्रोध, पेती बूज्र्वा संस्कृति पर एक पैनी निगाह तथा इतिहास और परम्परा के प्रति पुनरूत्थानवादी रूख नहीं बल्कि एक आलोचनात्मक लेकिन फिर भी सहानुभूतिपूर्ण, पुनर्जीवनवादी दृष्टि। एक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात शायद यह है कि कवि में आत्मपावनता कहीं नहीं है, बल्कि वह अपने निजी जीवन और आचार-विचार पर एक निर्मम निगरानी रखे हुए हैं।
ब्रजेश कठिल की कविताओं में लोकतांत्रिक संस्थाओं तथा मानव जीवन में जो आस्था व्यक्त हुई है, वह आज के वैश्वीकरण के युग में महत्त्वपूर्ण है, जो अपने साथ मानवता के तमाम मूल्यों को लीलने और बाजार के हवाले करने पर तुला है। मध्यवर्ग में मानवीय बोध जगाने में ये कविताएं काफी महत्त्वपूर्ण हैं।

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