December 28, 2010

बाबू बालमुकुन्द गुप्त

बाबू बालमुकुन्द गुप्त

हरियाणा के झज्जर जिले के गुडिय़ानी नामक गांव में 1965 में लाला पूरणमल के घर में बाबू बालमुकुन्द गुप्त का जन्म हुआ। ''गुप्त के आरंभिक काल में इस गांव की आबादी थोड़ी ही थी। गांव में दो प्रमुख जातियों के लोग रहते थे। बहुसंख्यक तो पठान थे जो घोड़ों का व्यापार करते थे और अल्पसंख्यक महाजन लोग थे जो वाणिज्य और सूद का ध्ंाधा करते थे। पठान व्यापारी अपने बच्चों को उर्दू और फारसी की शिक्षा के लिए मक़तब भेजते, परन्तु महाजन लोगों में शिक्षा का प्रचार नहीं था। बालमुकुन्द गुप्त गांव में अपनी जाति के पहले बालक थे जिनकी शिक्षा उर्दू और फारसी में हुई।"1
बालमुकुन्द गुप्त की ''प्रारंभिक शिक्षा तत्कालीन मामूली से मदरसे में हुई थी, जिसको गुप्त जी के शब्दों में 'नीम मकतब' कहा जा सकता है। ऐसे स्कूलों में न कोई पुस्तक होती थी, न उर्दू का कायदा उपलब्ध होता था। अध्यापक के बताने पर तख्तियों पर बच्चे उर्दू की वर्णमाला लिख लिया करते थे। पठन-पाठन की भाषा उर्दू के कायदे का काम चलाती थी। उस समय तक उर्दू की पहली, दूसरी तथा तीसरी किताब लिखी तो जा चुकी थी, पर दूरस्थ ग्राम मदरसों तक पहुंच न पायी थी।"2
बालमुकुन्द गुप्त का जीवन संघर्षपूर्ण था। वे पढ़ाई में बहुत होशियार थे। उनके पिता उनको शिक्षा दिलवाना चाहते थे। ''इससे पहले कि पूरणमल अपने लड़के के भविष्य के बारे में कुछ सोचते, वे चौंतीस वर्ष की आयु में चल बसे। यही नहीं, उनके निधन से पूरणमल के पिता को ऐसा धक्का लगा कि एक सप्ताह में उनका भी स्वर्गवास हो गया। तब परिवार में सबसे बड़े चौदह वर्षीय बालमुकुन्द को अपने पैतृक व्यवसाय के हिसाब-किताब को समझने, बकाया वसूल करने और लेन-देन के झगड़े निपटाने के काम में जुट जाना पड़ा। अगले ही वर्ष सन् 1880 में उनका विवाह भी कर दिया गया। वधू अनार देवी रेवाड़ी के एक व्यापारी की पुत्री थी। अब बालमुकुन्द को घर-गृहस्थी और छोटे भाइयों और बहनों की इेखरेख भी करनी पड़ी। शिक्षा के स्वप्न हवा हुए। जब पांच वर्षों की अवधि में उनके भाई काम संभालने की स्थिति में हुए तब बालमुकुन्द निर्णय कर सके कि आगे पढ़ाई की जाए। उन्होंने घर बैठकर स्वयं अध्ययन किया और 1886 में दिल्ली जाकर वहां से मिडिल की परीक्षा पास की।"3
बालमुकुन्द गुप्त जी ने उर्दू पत्रकारिता से शुरूआत की, उन्होंने 'अखबार-ए-चुनार', 'कोहिनूर' का सम्पादन किया और अपनी लेखनी से ख्याति अर्जित की। हिन्दी-पत्रकारिता में 'हिन्दी बंगवासी', 'भारत मित्र' को बुलन्दियों पर लेकर गए। कलकत्ता की जलवायु तथा काम की अधिकता के कारण गुप्त जी का स्वास्थ्य खराब हो गया। जलवायु बदलने के लिए वे बिहार में वैद्यनाथ धाम भी गए, परन्तु मन न लगने व स्वास्थ्य में सुधार न होने के कारण वे गुडिय़ानी के लिए रवाना हुए। दिल्ली पहुंचने पर उनके सम्बन्धियों ने इलाज के लिए रोक लिया। कई वैद्यों ने इलाज के प्रयास किए लेकिन गुप्त जी के स्वास्थ्य में कोई लाभ नहीं हुआ। 18 सितम्बर, 1907 को उनका छोटी सी उम्र में देहान्त हो गया।
गुप्त जी ने अपनी थोड़ी सी उम्र में ही हिन्दी साहित्य को बहुत कुछ दिया। उनके व्यक्तित्व के बारे में डा. नत्थन सिंह ने सही लिखा है कि ''बचपन से ही गुप्त जी प्रतिभावान एवं कर्मठ छात्र थे। गणित के जिस प्रश्न को अध्यापक हल करने में विफल रहे थे, उसको आपने हल कर दिया था। पिता तथा पितामह के संरक्षण से वंचित होकर भी आपने कौटुम्बिक व्यवसाय का संवर्धन तथा अध्ययन का उत्कर्ष किया था। समुचित साधनों के अभाव में विद्या का अर्जन, निस्पृह लेखन, वैष्णव संस्कृति का पोषण, साहित्य की प्रगतिशील राष्ट्रवादी परम्परा का संवर्धन, भाषा तथा लिपि के सहज तथा लोकोन्मुख रूप की रक्षा के लिए महारथियों के साथ संघर्ष, व्यग्य एवं विनोदपरक शैली के माध्यम से प्रखर आलोचना का प्रवर्तन, ज्ञान एवं मानवता के रक्षक, देशी-विदेशी विद्वानों का सम्मान करना आदि उनके व्यक्तित्व के विशिष्ट गुण थे।
उनको उर्दू, फारसी, हिन्दी तथा बंगला आदि भाषाओं का अच्छा ज्ञान था। संस्कृत तथा अंग्रेजी का जमकर अध्ययन किया था। विद्यार्जन में रुचि, निर्भीक एवं स्पष्ट कथन और भारतीयता उनके व्यक्तित्व की त्रिवेणी थी। वह अपने युग के अप्रतिम लेखक थे।"4
''गुप्त जी के कवि और लेखक का श्रीगणेश उर्दू कविता तथा गद्य से होता है। प्रारम्भिक शिक्षार्जन के पश्चात् उनका सम्पर्क झज्जर की संस्था 'रिफाहे आम सोसाइटी' के साथ हुआ। यह संस्था समस्यापूर्ति का केन्द्र स्थल थी। गुप्त जी भी समस्यापूर्ति करने लगे और शनै: शनै: उर्दू में काव्य रचना की ओर बढ़े। उनके अध्यापक मौलवी बरकतअली और मुंशी वजीर मुहम्मद साहब उनकी उर्दू कविता का संशोधन कर दिया करते थे। उनका उर्दू काव्य परम्परागत अध्कि है, किन्तु हिन्दी-काव्य परम्परा से एक कदम आगे की चीज है। इतने पर भी कविता के कलापरक निकष पर परखने पर निराशा हाथ लग सकती है, कारण केवल यह है कि कला की निरपेक्ष साधना उनका अभिप्रेत न था। यह काव्य के माध्यम से अपनी समाज-सापेक्ष विचारधारा को वाणी देने के पक्षधर थे।
गुप्त जी का यह अभिप्रेत उनके उर्दू-काव्य से भी व्यक्त होता है और हिन्दी कविता से भी। उर्दू कविता अधिकाशंत: शराब, साकी, मयखाना तक सीमित रहती है। गुप्त जी का मार्ग इससे कुछ भिन्न था। इश्क के विषय में उनकी धरणा एक शेर से प्रकट होती है -
अजायब है ए शाद! नैरंगे इश्क, लिखी खूब हैरत ने यह जंगे इश्क।
मजामीन ताजाब सरगूद है। खयालात पाकीजा और खूब है।5
गुप्त जी ने उर्दू साहित्य की नई धरा से अपने को जोड़ा वे अपनी कविताओं से समाज की बुराइयों दूर करने व व्यक्तिगत जीवन में नैतिकता व सदाचार को अपनाने के लिए प्रेरित करते थे। अल्ताफ हुसैन हाली ने उर्दू में जिस नए दौर की शुरूआत की थी, गुप्त जी ने उसे अपनाया।
समझ इस बात को नादां जो तुम में कुछ भी गैरत हो,
न कर उस काम को हरगिज कि जिसमें तुझको जिल्लत हो।
बुरे अफआल में पड़कर न हरगिज अपनी बुकअत खो,
बस वह काम कर जिसमें कि तेरे दिल को राहत हो।
अगर है साहिबे इसबाल आपे से न हो बेरंग,
कि आमद हो न पानी की तो सूखे चश्मये जेजूं।6
बालमुकुन्द गुप्त की कविता के बारे में डा. नत्थन सिंह ने सही ही लिखा है कि ''गुप्त जी का उर्दू-काव्य, उर्दू शायरी के परम्परागत रूप का एक सीमित मात्रा में स्पर्श करते हुए भी उससे अलग है। उसमें न मयखाने की बहुतायत है, न साकीवाला की, न उसमें माशूक की शोखियों का चित्रण है, न आशिक के शिकवे-शिकायत का बाहुल्य, उसमें न दजला-फरात तथा कोहकाफ की प्राकृतिक सुषमा का अंकन है, न युग यथार्थ से पलायन। उसमें प्रकृति के बिम्ब हैं और मानव की अनुभूति की अभिव्यंजना भी। वह न कोरी कल्पना का महल खड़ा करती है और न कला के उपयोगितावादी पक्ष से बचती है। वह नीति, संयम और विवेक के उपदेश भी देती है और राष्ट्र की प्रगति के साथ इन्सान को जोडऩा चाहती है।"7
कविता ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित है। तत्कालीन घटनाएं कविताओं में मौजूद हैं। साहित्य को सीधे पर तौर पर अपने समय से जोडऩा अपने आप में ऐतिहासिक काम है। अभी तक कविता आभिजात्य के मनोरंजन, मन बहलाव का विषय थी। अपने समय की समस्याओं को सीधे तौर पर इसमें संबोधित किया जा सकता है इस विचार को स्थापित करने वाले साहित्यकारों में बालमुकुन्द गुप्त का नाम अग्रगण्य है। अंग्रेजों ने बंगाल को दो टुकड़ों में बांटकर जनता को आपस में बांटने की चाल चली थी। लोगों ने इसका कड़ा विरोध किया था और उस विरोध के कारण ही बंगाल फिर से एक हो गया था। इस व्यापक स्तर पर इस आन्दोलन को अपनी कविता का विषय बनाया।8
बालमुकुन्द गुप्त जी ने अपनी कविताओं में तत्कालीन राजनीतिक सवालों को उठाया। वर्ग विभाजित समाज में कोई महान रचनाकार व रचना अपने युग की राजनीति से कटकर नहीं रह सकती। बात सिर्फ इतनी है कि वह शासक वर्गों की राजनीति की पक्षधर है या शोषित-वंचित वर्गों की। बालमुकुन्द गुप्त जहां राजनीतिक तौर पर आम जनता के पक्षधर थे। जनता के आन्दोलन व संघर्ष, जनता की आकांक्षा उनके साहित्य का आधार है। यहीं से उनका साहित्य अपने लिए विषय जुटाता है और जनता का पक्ष निर्माण करता है। उनके काव्य से यदि राजनीतिक सवालों को निकाल दिया जाए, तो उनमें कुछ नहीं बचेगा। आम लोगों के जीवन की वास्तविक स्थितियों व शोषक राजनीति को उदघाटन उनकी कविताओं का प्रधान व शक्तिशाली स्वर है। जनता के पक्ष निर्माण करने वाला कवि ही जनवादी कवि होता है। प्रगतिशील आन्दोलन 'कला के लिए कला' नहीं, बल्कि 'जीवन के लिए कला' का सुव्यवस्थित दर्शन लेकर साहित्य के केन्द्र में उभरा था, जिसने किसानों-मजदूरों के सामाजिक-सांस्कृतिक सवालों को अपने साहित्य के केन्द्र में रखा। बालमुकुन्द गुप्त की कविताओं को उसका पूर्व संस्करण कहा जा सकता है। जिन्हें कविता के छन्दों की मात्राओं को गिनने की फुरसत है, जो कविता में अंलकारों की सूची बनाने निकले हैं, कोमलकान्त पदावली में ही कलात्मकता ढूंढने निकले हैं, उन कलावादियों को गुप्त जी कविताओं में निराशा के अलावा कुछ हाथ नहीं लगेगा। जिनके लिए कविता का जीवन से जुड़ाव है, वे यहां से मोती प्राप्त करेंगें। गुप्त जी को कलावादियों से दाद की अपेक्षा नहीं थी, बल्कि वे दबे-कुचले, पीडि़त-वंचित-शोषित संघर्षरत लोगों के खुरदरे यथार्थ को व्यक्त करते थे।
बालमुकुन्द गुप्त की कविताएं कलावादियों की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरती, शायद इसीकारण निर्भीक पत्रकार और गद्य निर्माता के तौर पर तो उनके योगदान को रेखांकित किया गया, लेकिन उनकी कविताओं ने हिन्दी साहित्य में जिस नई धारा का सूत्रपात किया व उससे जो काव्य-मूल्य विकसित हुए उस पर घोर चुप्पी साध ली गई। यह बाबू बालमुकुन्द गुप्त की कविताओं के साथ ही नहीं हुआ, बल्कि जिस साहित्यकार की रचनाओं में जनता के हित सिर चढ़कर बोलते हैं, उनके साथ ऐसा होता रहा है। महाकवि कबीर की कविता को कविता की श्रेणी से निकालने के लिए कितना शोर-शराबा हुआ है, लेकिन जनता की भावनाओं को व्यक्त करने वाले साहित्य को किसी कलावादी के प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं होती। रामप्रसाद बिस्मिल की गजलें बच्चे-बच्चे की जुबान पर हैं, उनको किसी काव्यशास्त्री की सम्मति की आवश्यकता नहीं है। हाली की रचनाओं को भी ऐसे ही बेहूदे तर्क देकर नकारने की कोशिश हुई थी। बालमुकुन्द गुप्त की कविताओं में तत्कालीन सामाजिक शक्तियों की टकराहट है और गुप्त जी इसमें प्रगतिशील शक्तियों की ओर हैं, ऐसा रचनाकार अपन समय की सीमाआं को लांघकर हमेशा प्रासंगिक रहता है।
बाबू बालमुकुन्द गुप्त के पास राष्ट्रवादी-जनवादी पत्रकार की पैनी दृष्टि थी और कवि का संवेदनशील हृदय। जिस कारण वे जनता के दु:ख-तकलीफों को महसूस कर सके और निर्भीकता से व्यक्त कर किया। तत्कालीन अंग्रेजी साम्राज्यवाद अपने विरोधी स्वरों को बड़ी क्रूरता से दमन करता था, विद्रोह की आशंका से भय से इतनी बड़ी संख्या में साहित्य की जब्ती इसे बताता है। ऐसी विपरीत स्थितियों में जन पक्षधरता के लिए जिस जीवट व दृष्टि की आवश्यकता थी, वह उनके पास थी।
बालमुकुन्द गुप्त के समय में भारत का क्रांतिकारी और राष्ट्रीय आन्दोलन की दिशा व रूप ग्रहण नहीं कर पाया था, बालमुकुन्द गुप्त की कविताओं में भावी आन्दोलनों की आहट सुना जा सकता है। साम्राज्यवाद के घोर शोषण ने जनता के लिए अस्तित्व का ही संकट पैदा कर दिया था। अंग्रेजों द्वारा जनता की अधिकाधिक लूट के लिए कृत्रिम अकाल का प्रायोजित किए। बाबू बालमुकुन्द गुप्त ने कविताओं में अकाल से त्रस्त दीन जनता का मार्मिक चित्र खींचा है। 'हे राम' कविता में लिखा
केहि कारन पावत नाहिं आधे पेटहु नाज,
कौन पाप-सौं बसन बिन ढकन न पावहि लाज।
सीत सतावत सीत महं अरु ग्रीसम महं घाम,
भीजत ही पावस कटत कौन पाप सौ राम?
केते बालक दूध के बिन्ना अन्न के कौर,
रोय रोय जी देत हैं कहा सुनावैं और।
कौन पाप ते नाथ यह जनमत हम घर आये,
दूध गयौ पै अन्नहू मिलत न तिन कहं हाय।
केते बालक डोलते माता बिना विहीन,
एक कौर के फेर महं घर घर आये दीन।
मरी मात की देह को गीध रहे बहु खाय,
ताही सौं यक दूध को सिसू रह्यो लपटाय।
जहं तहं नर-कंकाल के लागे दीखत ढेर,
नरन पसुन के हाड़-सों भूम छई चहुं फेर।
हरे राम केहि पाप ते भारत भूमि मझार,
हाडऩ की चक्की चलैं हाडऩ को व्यापार।
अब या सुखमय भूमि महं नाहीं सुख को लेस,
हाड़ चाम पूरित भयो अन्न दूध को देस।
बार बार मारी परत बारहिं बार अकाल,
काल फिरत नित सीप पै खोले गाल कराल।9
बाबू बालमुकुन्द गुप्त ने किसान की दशा का जो वर्णन किया है उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि साम्राज्यवादी लूट कितनी ज्यादा थी। किसान को लगान देना पड़ता था, वह उसकी फसल से भी अधिक होता था। लगान वसूल करने के लिए जो अत्याचार व दमन किया जाता था उसका वर्णन करके अंग्रेजी राज की क्रूरता को अभिव्यक्त किया है। अंग्रेजी शासन दमन का सहारा लेता था। जिस सूक्ष्मता व समग्रता से किसान जीवन का वर्णन किया है, किसान के जानवरों को भी कुछ खाने के लिए नहीं मिलता। सारे समाज का पेट भरने वाला किसान ही भूखा है। 'सर सैयद अहमद का बुढ़ापा' कविता में किसानों के शोषण की प्रक्रियाओं का वर्णन किया, उसके दर्शन महान कथाकार प्रेमचन्द के कथा साहित्य में होते हैं। जब वे कहते हैं कि 'जिनके बिगड़े सब जग बिगडै़ उनका हमको रोवा है' तो उनकी किसानों के प्रति प्रतिबद्धता प्रकट होती है।
जिनके बिगड़े सब जग बिगडै़ उनका हमको रोवा है।
जिनके कारण सब सुख पावें जिनका बोया सब जन खावें,
हाय हाय उनके बालक नित भूखों के मारे चिल्लावें।
हाय जो सब को गेहूं देते वह ज्वार बाजरा खाते हैं,
वह भी जब नहिं मिलता तब वृक्षों की छाल चबाते हैं।
उपजाते हैं अन्न सदा सहकर जाड़ा गरमी बरसात,
कठिन परिश्रम करते हैं बैलों के संग लगे दिन रात।
जेठ की दुपहर में वह करते हैं एकत्र अन्न का ढेर,
जिसमें हिरन होंय काले चीलें देती हैं अंडा गेर।
काल सर्प की सी फुफकारें लुयें भयानक चलती हैं,
धरती की सातों परतें जिसमें आवा सी जलती हैं।
तभी खुले मैदानों में वह कठिन किसानी करते हैं,
नंगे तन बालक नर नारी पित्ता पानी करते हैं।
जिस अवसर पर अमीर सारे तहखाने सजवाते हैं,
छोटे बड़े लाट साहब शिमले में चैन उड़ाते हैं।
उस अवसर में मर खपकर दुखिया अनाज उपजाते हैं,
हाय विधता उसको भी सुख से नहिं खाने पाते हैं।
जम के दूत उसे खेतों ही से उठवा ले जाते हैं,
यह बेचारे उनके मुंह को तकते ही रह जाते हैं।
अहा बेचारे दु:ख के मारे निस दिन पचपच मरें किसान,
जब अनाज उत्पन्न होय तब सब उठवाय ले जाय लगान।
यह लगान पापी सारा ही अन्न हड़प कर जाता है,
कभी कभी सब का सब भक्षण कर भी नहीं अघाता है।
जिन बेचारों के तन पर कपड़ा छप्पर पर फूंस नहीं,
खाने को दो-सेर अन्न नहीं बैलों को तृण तूस नहीं।
नग्न शरीरों पर उन बेचारों के कोड़े पड़ते हैं,
माल माल कह कर चपरासी भाग की भांति बिगड़ते हैं।
सुनी दशा कुछ उनकी बाबा! जो अनाज उपजाते हैं,
जिनके श्रम का फल खा खाकर सभी लोग सुख पाते हैं।10
बालमुकुन्द गुप्त ने किसानों की दुर्दशा का जो वर्णन किया, वह आज भी काला हांडी के किसानों की याद दिला जाता है। गुप्त जी कविता में किसान वृक्षों की छाल चबाकर पेट भरने को विवश हैं, तो आज के किसानों कच्ची गुठलियां खाकर बीमार होने को विवश हैं। साम्राज्यवादी-पंूजीवादी शोषण के कारण एक लाख अस्सी हजार से अधिक किसान आत्महत्याएं कर चुके हैं। यह कोई प्राकृतिक विपदा के कारण नहीं है, बल्कि पूंजीपरस्त सरकारी नीतियों व योजनाओं के कारण हैं। आजादी प्राप्त करने के बाद भी किसान की हालत बहुत नहीं बदली है। अंग्रेजी साम्राज्यवादी शासन किसानों के अनाज को खलिहान से उठा ले जाता था, लेकिन आज की शोषक नीतियां फसल पकने से पहले ही खाद-तेल-दवाई-बीज के माध्यम से पहले ही लूट लेती हैं। किसान के श्रम का शोषण ही है, जिसके कारण उसकी ऐसी दयनीय हालत है, वरन् वह न तो कामचोरी करता है और न ही फिजूलखर्ची।
गुप्त जी ने केवल अंग्रेजों के शोषण व दमन को ही व्यक्त नहीं किया, बल्कि महाजनों-सेठों के शोषण को भी उजागर किया है। अकाल में पीडि़त लोगों से मुंह मोड़ लेना संवेदनशून्यता को दर्शाता है। गुप्त जी ने इसकी खबर ली है। गुप्त जी स्वतंत्रता-आन्दोलन में विभिन्न वर्गों की भूमिका को देख रहे थे। सेठ-महाजन, व्यापारी,जमींदार-सामन्तों को अपने ऐश्वर्य-विलास से ही फुरसत नहीं थी, वे अपना मुनाफा कमाने में ही व्यस्त हैं। 'ताऊ और हाऊ' कविता में उनकी इस मनोवृति को व्यक्त किया है:
लोग देश के भूखौ मरैं, उनके लिए कहो क्या करैं?
ताऊ कहै सुनो रे पूत, किन बहकाओ दोरौ ऊत?
जल्दी से घर के मूँद किवार, अपना अपना झौंको भार।
घर में बैठे चैन से खाओ, देस भेष चूल्हे में जाओ।

कपड़े की बिक्री नहीं होती, बिके न चादर बिके न धोती।
दोनों ओर देखके छूछा हाऊ ने ताऊ से पूछा।
कहिये ताऊ अब क्या करैं, कैसे अपनी पाकेट भरें?
बिकती नहीं एक भी गांठ, सब गाहक बन बैठे ठांठ।
दिये बहुत लोगों को झांसे, फंसता नहीं कोई भी फांसे।
ताऊ कहैं सुनो जी हाऊ, तुम निकले केवल गुड़ खाऊ।
फंसे उसी को खूब फंसाओ, नहीं फंसे तो चुप हो जाओ।
देश-वेश चुल्हे में जाय, 'सांसों म्हारी करै बलाय'।
खाओ-पीओ मौज उड़ाओ, अकड़ अकड़ के शान दिखाओ।11
भारत में अपनी जडें जमाने के लिए अंग्रेजी शासन ने यहां के जमींदारों-सामन्तों को अपना साथी बनाया। अंग्रेजों ने उनकी मदद लेने के लिए उनको पदवियां व जमीनें दी। इनको अपनी वफादारी साबित करनी पड़ती थी। जो अंग्रेजों से वफादारी नहीं करते थे, उन्हें उत्पीडऩ व दमन सहन करना पड़ता था। 'पंजाब में लायल्टी' कविता में बाबू बालमुकुन्द गुप्त ने बड़ी स्पष्टता व निडरता से व्यक्त किया है। उस समय में इस तरह कि कविताएं लिखना वास्तव में बहादुरी का काम था। इसके लिए घनीभूत प्रतिबद्धता की आवश्यकता थी। इस तरह की तुकबंदियों का स्वतंत्रता आन्दोलन में महत्वपूर्ण योगदान होता था, जनता की भावनाओं को ये शब्द प्रदान करती थी और देशभक्तों में नई ऊर्जा का संचार करती थी।
केवल दो डिसलायल थे वां एक लाजपत, एक अजीत,
दोनों गये निकाले उनसे नहीं किसी को है प्रीत।
हां, कुछ डिसलायल थे रावलपिंडी के पंडित लाले,
वह सब पकड़, किये फाटक में, बाहर लगा दिये ताले।
फिर एक मिला था डिसलायल का बच्चा पिंडीदास,
सोते उसे उठाकर घर से फाटक में करवाया बास।
और दिखाई दिया एक डिसलायल लाला दीनानाथ,
उसको भी एक जुर्म लगाकर पिण्डी के करवाया साथ।12

अंग्रेज अधिकारी यहां पूरे सामन्ती ठाठ का निर्वाह करते थे। सामन्ती फिजूलखर्ची व प्रदर्शन को गुप्त जी पसन्द नहीं करते थे। उन्हें इस बात से तकलीफ थी कि जनता तो दाने दाने को तरस रही है, लेकिन शासक अपनी शान बघारने के लिए करोड़ों रूपए खर्च कर रहे हैं। दिल्ली दरबार प्रसिद्ध है।
देखा सुना न जो कुछ कभी, दिल्ली में वह होगा सभी।
भर भर बीयर चले संदूकें, बीस हजार चले बन्दूकें।
मार धड़ाधड़ तोप चलें, दिल सब नामर्दों के हलें।
बिजली करैं रोशनी जाकर, भरे हाजिरी बनकर चाकर।
ऐसा आन पड़ा है जोत, दुनिया भर के आवैं लोग।
बादशाह के भाई आवैं, साथ-साथ कितनों को लावें।
बड़े लाठ की माता आवें, साथ में उनके भ्राता आवें।
अमरीका से साली सास, चलकर आवें हिये हुलास।
खूब बने श्री कर्जन लाट, होय निराला उनका ठाठ।
ऐसी हो उनकी पोशाक, सब को लगे उधर ही ताक।13
बालमुकुन्द गुप्त जनतांत्रिक परंपराओं को मजबूत करना चाहते थे। वे सत्ता पर जनता का नियंत्रण चाहते थे, उनका मानना था कि जनता द्वारा चुने हुए ही सच्चे मायनों में जनता के प्रतिनिधि हो सकते हैं। वे ही उनके हितों की रक्षा कर सकते हैं। नोमीनेशन से जनतंत्र व सत्ता में भागीदारी के ढोंग करने से जनता कोई भला नहीं होने वाला है। चुनावों का सैयद अहमद खान ने विरोध किया था। बालमुकुन्द गुप्त ने चुनावों की हिमायत की।
जारी न हो इलेक्टिव सिस्टम तब तक यह नहिं होना है,
परन्तु इसके लिये आपका अजब अनोखा रोना है।

एक्ट पास हो गया है ऋन का आफत आने वाली है।
अय! नामीनेशन के लोलुप, इधर तुम्हारा ध्यान भी है,
कब यह नियम चला कब हुआ उपस्थित इसका ज्ञान भी है।
किस किस ने इस बिल को रोका किसने वाद-विवाद किया,
किसने किया विरोध और किस किस ने इसका पक्ष लिया।
आप किया प्रस्ताव समर्थन आप ही उसको पास किया,
हां हुजूर वालों में देकर वोट खरा उपहास किया।
चुने हुए मेंबर होते तो ऐसा कब होने पाता,
इस प्रकार कौंसिल में कब नानी जी का घर बन जाता?14
बाबू बालमुकुन्द गुप्त चाटुकारिता के खिलाफ थे। सर सैयद अहमद खान पर तीखा प्रहार करते हुए लिखा ''अहा! चाटुकारों को खोके चाटुकार तुम बनते हो, अपने हाथ स्वतंत्रता लय को रच के आप ही खनते हो।" अंग्रेजी शासन से पुरस्कार पाने के लिए तत्कालीन शिक्षित मध्यवर्ग लालायित रहता था, लेकिन बालमुकुन्द गुप्त इसके खिलाफ थे।
चाटुकारिता ने बाबा तुम को औंधी बुद्धि सिखाई है,
स्वार्थान्धता पकड़ तुम्हें उलटे रस्ते पर लाई है।
जाति का अपने नामीनेशन से यह लाभ कमाओगे,
सबका एक साथ ही अपने हाथों नाम मिटाओगे।15
आधुनिक समय में कोई शासन सत्ता चाहे अपनी प्रकृति में चाहे वह कितनी भी क्रूर व तानाशाह ही क्यों न हो मध्यकालीन शासकों की तरह जनमत को नजरंदाज करके शासन नहीं कर सकते। अपने शासन का औचित्य ठहराने व जनता में अपनी साख बनाए रखने के लिए जन कल्याणकारी होने का नाटक-पाखण्ड रचती हैं। शासन सता भलिभांति जानती हैं कि इसी नैतिक सता से ही शासन किया जा सकता है। अंग्रेजी शासन भी अपने जनतांत्रिक होने का ढिंढोरा पीटता था, लेकिन वास्तव में प्रकृति से साम्राज्यवादी था और शोषण करना उसका उद्देश्य था। अंग्रेजी शासन भी कानूनों व नियमों पर आधरित नहीं था, बल्कि व नौकरशाहों की मर्जी व इच्छा पर आधारित था। अपनी शोषक नीतियों को जारी रखने के लिए वे हर तरह के हथकण्डे अपनाते थे। बालमुकुन्द गुप्त ने शासन सत्ता की असलियत को उद्घाटित किया।
बड़े लाट के जी में आई, दिखलावै अपनी सच्चाई।
सभा जोड़ तब यह फरमाया, जुग जुग रहे हमारा साया।
हम ही भारत का कल्याण, करके दंगे पद निरवान।
कल जो कुछ कौंसिल में किया, वह तो तुम ने सब सुन लिया।
है कानून जबान हमारी, जो नहीं समझते वही अनारी।
हम जो कहैं वही कानून, तुम तो हो कोरे पतलून।
हम से सच की सुनो कहानी, जिससे मरे झूठ की नानी।
सच है सभ्य देश की चीज, तुमको उसकी कहां तमीज।
औरों को झूठा बतलाना, अपने सच की डींग उड़ाना।
ये ही पक्का सच्चापन है, सच कहना तो कच्चापन है।
बोले और करे कुछ और यही सत्य है करलो गौर।
झूठ को जो सच कर दिखलावैं, सोई सच्चा साधु कहावै।
मुंह जिसका हो सके न बन्द, समझो उसे सच्चिदानन्द।16

आत्मनिर्भरता को देश के विकास के लिए अनिवार्य समझते थे। इसलिए आर्थिक आत्मनिर्भरता पर बार बार जोर देते हैं।
टेसू आये लो आसीस, भारत जीवे कोटि बरीस।
कभी न उसमें पड़े अकाल, सदा वृद्धि से रहे निहाल।
अपना बोया आप ही खावे, अपना कपड़ा आप बनावें।
बढ़े सदा अपना व्यापार, चारों दिस हो मौज बहार।
माल विदेशी दूर भगावें, अपना चरखा आप चलावें।
कभी न भारत हो मुंहताज, सदा रहे टेसु का राज।

भोग विलास सभी दो छोड़, बाबूपन से मुंह लो मोड़।
छोड़ो सभी विदेशी माल, अपने घर का करो ख्याल।
अपनी चीजें आप बचाओ, उनसे अपना अंग सजाओ।17
बालमुकुन्द गुप्त ने हिन्दू देवी-देवताओं को केन्द्र में रखकर कविताओं की रचना की है। उनकी धार्मिक आस्था थी, लेकिन उनकी कविताओं को भक्ति की कविताएं नहीं कहा जा सकता। उनके सामने कोई परलोक की दुनिया नहीं है, जिसको सुधारने के लिए उन्होंने ईश-प्रार्थना की हो। उनकी भक्ति विषयक कविताएं 'राम भरोसा' 'जय रामचन्द्र', 'दुर्गा स्तुति', 'प्रार्थना', 'जय लक्ष्मी', 'लक्ष्मी स्त्रोत' कोई भी कविता हो, उनमें भक्ति काव्य की तरह मोक्ष-प्राप्ति के लिए अपने इष्ट से आराधना नहीं है। भक्ति काव्य में जो वैयक्तिक 'सुधार' की कामना होती है उससे ये कविताएं मुक्त हैं। इनकी कविताओं में दीन-हीन समाज के सुधार का निवेदन है। यहां भक्त का कारूणिक प्रलाप नहीं है, दास्य बोध नहीं है और न ही ईश्वर व भक्त के सोपानिक संबंध हैं। अपने इष्ट की महिमा का भी यहां अतिश्य वर्णन नहीं है, न विशेष इष्ट की आराधना की ओर भक्तों को पे्ररित करती हैं। बालमुकुन्द गुप्त की कविताओं में भक्ति के फल का प्रसाद पाने को महिमामंडित नहीं किया गया। यहां सामाजिक दुर्दशा का विश्वसनीय चित्र खींचते हुए उसे सुधारने पर जोर है।
सिंहासन अरु राजपाट को नाहि उरहनों,
ना हम चाहत अस्त्र-वस्त्र सुन्दर पट गहनों।
पै हाथ जोरि हम आज यह,
रोय रोय विनतीं करैं,
या भूखे पेट पापी पेट कहं,
मात कहो कैसे भरैं?18

बारेक नयन उघारि देखि जननी निज भारत,
साक अन्न बिन चहुं दिसि डौलै हाथ पसारन।
फाटै चिथरन जोरि देह की लाज निवारैं,
जब सोऊ नहिं मिलै विवश ह्वै फिरै उधरे।
सूखे कर पद, फूले उदर,
दीन, हीनबल, मलिन मुख।
अब मात बेगि करुना करो,
मेटहु मेटहु दुसह दुख।19

चाहै चंवर न छत्र राज भूषण गजबाजी,
अन्न दूध भर पेट मिलैं वाही मैं राजी।
मोटो मोटो वस्त्र मिलैं तन ढाकन कारन,
केवल चाहत सीत धूप को कष्ट निवारन।20

धनबल, जनबल, बाहुबल बुद्धि विवेक विचार,
मान तान मरजाद को बैठे जूओ हार।
हमरे जाति न बर्न है नहीं अर्थ नहिं काम,
कहा दुरावै आप से, हमरी जाति गुलाम।
बहु बीते राम प्रभु! खोये अपनो देस,
खोवत है अब बैठि के भाषा भोजन भेस।
नहीं गांव में झूंपड़ो नहिं जंगल में खेत,
घर ही बैठे हम कियो अपनो कन्चन रेत।
पसु समान विडरत रहैं पेट भरन के काज,
याही में दिन जात हैं सुनिये रघुकुल राज।
दो दो मूठी अन्न हित ताकत पर मुख ओर,
घर ही मैं हम पारधी घर ही मैं चोर।21

अब तुमसों बिनती यहै राम गरीब निवाज,
इन दुखिया अंखियान महं बसै आपको राज।
जहं मारी को डर नहीं अरु अकाल को त्रास,
जहां करै सुख सम्पदा बारह मास निवास।
जहं प्रबल को बल नहिं अरु निबलन की हाय,
एक बार सो दृश्य पुनि आंखिन देहु दिखाय।
करहिं दसहरो आपको दु:ख ताप सब भूल,
पुनि भारत सुखमय करौं होहु राम अनुकूल।22
बालमुकुन्द 'हिन्दू मर्यादा, 'हिन्दूपन' की बात करते हैं, लेकिन उनका 'हिन्दूपन' कर्मकाण्डी व पूजा-पाठी नहीं है। उनके लिए हिन्दूपन नैतिकता में है, व्यवहार व आचरण में है। वे मध्यकालीन संतों की तरह धार्मिक शिक्षाओं को महत्व देते हैं, न कि उसके कर्मकाण्डी स्वरूप को। हिन्दूपन के हवाले से नैतिकबोध व सामाजिक दायित्व का अहसास पैदा करते हैं, न कि दूसरे धर्म के लोगों के प्रति घृणा नफरत पैदा करते हैं, उनके हिन्दूपन में अपने धर्म को श्रेष्ठ तथा अन्य को निकृष्ट साबित करने का भाव भी नहीं है।
मेटे वेद पुरान न्याय निष्ठा सब खोई।
हिन्दू कुल-मरजाद आज हम सबहि डुबोई।
पेट भरन हित फिरें हाय कूकर से दर दर।
चाटहिं ताके पैर लपकि मारहिं जो ठोकर।23

सदा रखें दृढ़ हिय महं निज सांचो हिन्दुपन।
घोर विपदहू परैं डिगै नहिं आन ओर मन।24
धर्म के नाम पर हिन्दू व मुसलमान को बांटने व साम्प्रदायिकता पैदा करने के अंग्रेजी साम्राज्यवाद के षडय़न्त्र को समझते थे और इसके खतरों का भी उनको अहसास था। अंग्रेजी शासन ने अदालतों की भाषा बदलकर हिन्दू व मुसलमानों में वैमनस्य पैदा करने की कोशिश की थी, जिसमें वे कुछ हद तक कामयाब भी हुए थे। साम्प्रदायिकता का हमेशा उच्च वर्ग के लोगों के हितों को पोषित करती है, साम्प्रदायिकता का आम जनता के हितों से कोई वास्ता नहीं होता। साम्प्रदायिकता की उत्पति भी उच्च वर्गों के हितों के टकराहट से ही हुई है, इस बात को बाबू बालमुकुन्द गुप्त ने समझ लिया था। लिपि के सवाल पर लिखा कि ''नागरी प्रचारिणी की थोड़ी-सी सफलता पर भी हमको बड़ा हर्ष है। हम उसके उद्योगी मेम्बरों के दृढ़ता से नागरी आन्दोलन करने की प्रशंसा करते हैं और उनको बधाई देते हैं। परन्तु इस विषय को लेकर जो आन्दोलन खड़ा हुआ है उसकी हड़बंगू में फंसने से उनको रोकते भी हैं। हम देख रहे हैं कि एक तरफ तो देवनागरी प्रचारिणी वाले इससे इतने प्रसन्न हुए हैं कि अपने को आप ही धन्यवाद दे रहे हैं। दूसरी ओर मुसलमानों ने यह समझ लिया है कि उनके साथ मानो बड़ा वज्र अन्याय हुआ है। इस समय उनका कर्तव्य है कि मुसलमानों को शान्त करें। उनको समझाएं कि वह कुछ लुट नहीं गए हैं और न उनका हक छीनकर हिन्दुओं को दे दिया गया है। देवनागरी को केवल अदालत तक आने की आज्ञा मिली है। जब फारसी अक्षरों के जानने वालों से देवनागरी जानने वाले कई गुना अधिक हैं तो क्या उनका कुछ भी लिहाज नहीं होना चाहिए। .... मुसलमानों के जितने अखबार हैं, सब इस विषय को मजहबी रंग में रंगकर इसे उर्दू-हिन्दी की लड़ाई बता रहे हैं। यदि इस विषय को केवल हिन्दू-मुसलमान के मेल में कुछ झमेल पड़े तो अच्छी बात नहीं। नागरी प्रचारिणी सभा वालों को चाहिए कि जब तक यह बखेड़ा शान्त नहीं हो जाये तब तक खूब शान्ति से काम करें। झूठमूठ के आनन्द में उन्मत होने की कोई जरूरत नहीं है। मुसलमानों को यह जानना चाहिए कि जिस भाषा को वह उर्दू कह रहे हैं, वह हिन्दी से अलग नहीं है। उर्दू के आदि कवियों ने उस भाषा को हिन्दवी कह कर पुकारा है"25
बाबू बालुमुकुन्द गुप्त 'देवनागरी' का समर्थन किया, लेकिन वे उर्दू के खिलाफ नहीं थे। वे उर्दू की आलोचना साम्प्रदायिक कारणों से नहीं करते, बल्कि उसकी सीमाओं की ओर संकेत करते हैं। उन्होंने उर्दू के माध्यम से ही शिक्षा ग्रहण की थी और उर्दू पत्रकारिता से ही हिन्दी की ओर आए थे, तथा ऐसे क्षेत्र से ताल्लुक रखते थे, जहां उर्दू का बोलबाला था। वे भाषायी संकीर्णता के कायल नहीं थे, जो अन्तत: साम्प्रदायिक चेतना में तब्दील होती है।
बालमुकुन्द गुप्त ने सर सैयद अहमद खान को भी लताड़ लगाई कि वे चुनाव प्रणाली का विरोध करके साम्प्रदायिक आधार पर नोमीनेशन की वकालत कर रहे हैं। सर सैयद ने साम्प्रदायिक सद्भाव की वकालत की थी, 'सर सैयद अहमद का बुढ़ापा' कविता में उसको भी याद करवाया।
बोलो तो बूड्ढे बाबा क्या उस सनेह का हुआ निचोड़,
भूल गये पंजाब-यात्रा में तुम आंख रहे थे अपनी फोड़।
हिन्दू और मुसलमानों को एक हिसा बतलाते थे,
आंख फोडऩे को अपने झटपट प्रस्तुत हो जाते थे।26
बाबू बालमुकुन्द गुप्त के समय में प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के समक्ष एक तरफ तो साम्राज्यवादी वैचारिक हमले की चुनौती थी, जो भारतीय समाज को पिछड़ा, अवैज्ञानिक तथा कोरे अध्यात्मिक व पारलौकिक जगत के मनीषी साबित करते थे। दूसरी ओर भारतीय मिथकीय-परम्परा को महिमामंडन से बचने की चुनौती थी। ये दोनों ही भारत की दार्शनिक-वैज्ञानिक उपलब्धियों को नकारती थी। बालमुकुन्द गुप्त भारत के बहुलतापूर्ण समाज की बनावट को पहचानते थे। साम्प्रदायिक दृष्टि के आलोचक थे, भारत की साझी संस्कृति को उजागर करने वाली कविताओं की रचना की है। हिन्दू व मुसलमान भारत में सदियों से साथ साथ रहते आए हैं। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान जनता की एकता को बनाए रखने के लिए 'हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई, आपस में सब भाई भाई' का नारा खूब लगाया जाता था। उसी तरह की एकता की ओर बालमुकुन्द गुप्त ने संकेत किया है।
'अल्ला गाड अरु निराकार में भेद न जानो भाई रे।
इन तीनों को जी में अपने अपने जानो भाई-भाई रे।
तहमद और पतलून एक भये एक कोट मिरजाई रे।
चोटी डाढ़ी क्रोस जनेऊ गड्डम-गड्ड मचाई रे।।27
हिन्दी भाषा के निर्माण में बाबू जी का महत्त्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने हिन्दी के उत्थान में विशेष योगदान दिया। वे जनभाषा के पक्षधर थे। वे न तो पण्डिताऊ हिन्दी को चाहते थे और न ही फारसी बहुल उर्दू को। जन भाषा को साहित्य में अपनाने पर जोर दिया। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी से भी इस मामले में भिड़ गए। उन्होंने लिखा कि ''भाषा का एक दोष जटिल लिखना भी है। द्विवेदी जी मानो इस समय इसके आचार्य हैं। दास आत्माराम 77 बालमुकुन्द गुप्त जी ने इसी नाम से लिखा था 88 को यही बात समझाते-समझाते कई सप्ताह लग गये। जिस वाक्य में अर्थात् की जरूरत पड़ती है, उसको सरल-स्वच्छ भाषा लिखने वाले कभी पसन्द नहीं करते। पर द्विवेदी जी का काम बिना अर्थात् के चलता ही नहीं है।"28
बालमुकुन्द गुप्त का भाषा के प्रति संकीर्ण दृष्टिकोण नहीं था, वे आम बोलचाल की भाषा में साहित्य रचना करते थे। लोगों की भाषा में ही लोगों से संवाद हो सकता है। जनता के प्रति प्रतिबद्धता के कारण ही उनकी भाषा की वकालत की। आमजन के व्यवहार की भाषा का यही रूप बाद की जनवादी-प्रगतिशील साहित्य की भाषा बनी। प्रेमचन्द ने इसे ठोस आधार प्रदान किया।
इसी कारण से उनकी कविताओं में विभिन्न भाषाओं के शब्द धड़ल्ले से प्रयोग होते हैं। उनका ध्यान भाषा की सजावट पर उतना नहीं था, जितना कि संप्रेषण पर। संप्रेषण ही उनकी भाषा की कसौटी थी। इसी से अंग्रेजी के, फारसी, उर्दू व अन्य बोलियों के शब्द भी उनकी कविताओं में हैं। वे स्वयं उर्दू पत्रकारिता से ही हिन्दी में आए थे, उर्दू विरोध की मानसिकता उनकी नहीं थी। वे हिन्दी व उर्दू मूलत: एक ही भाषा मानते थे। अंग्रेजी के शब्दों स भी उनको परहेज नहीं था।
जारी करें सरकुलर लायन,
और एमरसन ठोकें फायन,
हाकिम पुलिस हुए कम्पाइन,
पर यह समय बड़ा है डाइन,
छोड़ चले शाइस्ता-खानी।29
ग्रामीण मुहावरों के प्रयोग ने भाषा को बहुत प्रभावी बना दिया है। हरियाणा क्षेत्रा के कितने ही शब्द उनकी कविता के माध्यम से हिन्दी साहित्य में स्थायी हो गए। 'खेवा', 'पचपच', 'तत्ता', 'कचाई', 'घाऊघप्प', 'उलझेड़ा', 'निटेड़ा', 'तप्पर टाटा', 'रिण के तूदे', , 'चिकने बर्तन पर', 'चोखी', 'ऐनक चपकनदार', 'इलेक्टिव सिस्टम', 'वोट', 'लायल्टी', 'बागड़बिल्लापन', 'नानी जी का घर' 'भारत की रग मैने पाई', 'मार दुहत्थड़ सिर कूटा','पीटो पेट बजाओ बाजा', 'वही ढाक के तीनों पात', 'लाल बुझक्कड़ काले टेसू', 'ऊंट चढ़े को कुत्ता खाय', 'कोई लो तुक्का कोई लो तीर', 'एक रंग सब से पचरंगा, जल गई धेती रह गये नंगा', ऐरा गैरा नत्थू खैरा','हृदय और मस्तक दोनों की फूट गई', 'देखें घर फूक तमाशा', 'तुम तो हो कोरे पतलून'।
बाबू बालमुकुन्द गुप्त ने जिस भाषा को अपनाया था वही भावी कविता का आधार बनी। कविता जब भी जनता के दुख तकलीफों से दूर हटकर आभिजात्य के गलियारों में भटकी, तो गुप्त जी की भाषा ने उसे उसकी सही जगह बताया। गुप्त जी ने जन जीवन के चित्र अपनी कविताओं में खूब उकेरे हैं। किसान जीवन की वास्तविकता को व्यक्त करने के लिए उसी की शब्दावली प्रयोग की है, जिससे ये चित्र वास्तविक व विश्वसनीय बन पड़े हैं। वर्षा, वसन्त, मेघ, वसन्तोत्सव आदि प्रकृति संबंधी कविताओं में केवल प्रकृति की छटा का ही वर्णन नहीं है, बल्कि लोक जीवन के चित्र दे जाती हैं। 'वसन्तोत्सव' कविता में ग्रामीण जीवन के चित्र सजीव हो उठे हैं।
आस पास पालों के वट वृक्षों का झूमर,
जिसके नीचे वह गायों भैसों का पोखर,
ग्वाल बाल सब जिनके नीचे खेल मचाते,
बूट चने के लाते होले करते खाते।
पशुगण जिनके तले बैठ के आनन्द मनाते,
पानी पीते पगुराते स्वछन्द विचरते।
पास चने के खेतों में बालक कुछ जाते,
दौड़ दौड़ के सुरुचि साग खाते घर लाते।
आपस में सब करते जाते खिल्ली ठट्ठा ,
वहीं खोलकर खाते मक्खन रोटी मट्ठा
बातें करते कभी बैठ के बांधे पाली,
साथ साथ खेतों की करते रखवाली।30
बालमुकुन्द गुप्त ने लोक शैली में कविता रचना की, टेसू और जोगीड़ा लोकगीतों को विशेषतौर। ''टेसू लोकगीत शैली हरियाणा के हिसार और रोहतक जिलों में, उत्तरप्रदेश के आगरा, मथुरा, मेरठ, मुजफफरनगर, एटा और इटावा आदि जिलों और पूर्वी राजस्थान के भागों में प्रचलित है। वहां छोटे-छोटे बच्चे आश्विन महीने में मिट्टी और लकड़ी के पुतलों को घर-घर लेकर जाते हैं वहां गीत गाते हैं तथा पैसे और गन्ना मांगते हैं। पुतलों को तथा गीतों को टेसू भी कहा जाता है। इसमें हास्य और व्यग्ंय रहता है। शासकों तथा राजनीतिक नेताओं और उनकी करतूतों के बारे में व्यग्ंय और प्रहसन के लिए टेसू का खूब प्रयोग किया। लार्ड कर्जन और गवर्नर फुलर को तो आड़े हाथों लिया ही, दिल्ली दरबार का वैभव, भारतीय सैनिकों का अफ्रीका में दुरुपयोग, भारत की निर्धनता, यहां के अकाल तथा रोग का व्यग्ंयात्मक शैली में चित्रण किया:
बन के सच्चों के सरदार, करके खूब सत्य परचार।
धन्यवाद सुनते थे कर्जन, उतरी एक स्वर्ग से दर्जिन।
उसने लेकर धगा सुई, जादू की खोदी एक कुई।
उससे निकली फौजी बात, चली तबेले में तब लात।
भिड़ गए जंगी मुल्की लाट, चक्की से चक्की का पाट।
गुत्थम गुत्था धींगा मुश्ती, खूब हुई दोनों में कश्ती।
ऊपर किचनर नीचे कर्जन, खड़ी तमाशा देखे दर्जिन। (मल्लयुध्द्ध)

जोगीड़ा लोकगीतों में व्यग्ंय रहता है परन्तु इसमें श्रृंगार-रस प्रधान होता है। गुप्त जी ने जोगीड़ा का प्रयोग धार्मिक तथा सामाजिक कुरीतियों, साधुओं और उनके चेलों तथा पाश्चात्य रहन-सहन के समर्थकों की खिल्ली उड़ाने के लिए किया। जैसे बाबा जी वचनम में:
हां सदाशिव गोरख जागे-सदाशिव गोरख जागे
लण्डन जागे पेरिस जागे, अमरीका भी जागे
ऐसा नाद करूं भारत में सोता उठकर भागे।
मन्तर मारूं, जन्तर मारूं, भूत मसान जगाऊं
सब भारत वालों की अक्किल चुटकी मार उड़ाऊं।
अक्कड़ तोडूं, कंकड़ तोड़ूं, तोड़ूं पत्थर रोड़े
सारे बाबू पकड़ बनाऊं बिना पूंछ के घोड़े।
सदाशिव गोरख जागे।"31
बालमुकुन्द गुप्त जी सामाजिक वास्तविकताओं को प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त करने के लिए नई नई शैलियों का प्रयोग करते थे। मौजूदा यथार्थ को प्रस्तुत करने के लिए कभी फैंटेसी, कभी पैरोड़ी तो कभी उलटबांसियों का सहारा लेते हैं। इन शैलियों से वे पाठक के सामने मौजूदा यथार्थ की सीमाओं को उजागर भी करते जाते हैं और वैकल्पिक यथार्थ की रचना भी करते जाते हैं। भारतीय समाज में स्त्री की सोचनीय दशा की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए 'जोरूदास' कविता दर्शनीय है।
सैंया हमारे सांचे कन्धैया,
नित राखें कान्धे पै लेवे बलैया।
सारी उठाय पिया साया पहिनावें।
मेमन में हमका नचावें ताथैया।
सास मोरी पीसे ससुर भरे पानी,
हम भैलें कुरसी के नाविल पढ़ैया।
आपै सिखाब सैंया लेक्चर दिवावैं,
जलसनमां हमरी करावैं बडैय़ा।
ग्रामीण बालगीतों की तर्ज पर बालमुकुन्द ने कविताओं की रचना की। जनता से जुडऩा ही उनका मकसद था, इसीलिए उन्होंने लोक प्रचलित मुहावरे को ही अपनी कविता का मुहावरा बनाया।
अमली की जड़ से निकली पतंग, तिसमें निकला शाह मलंग।
शाह मलंग चलावै सौटी, उसमें निकली लम्बी चोटी।
लम्बी चोटी चिन्दक चिन्दू तिसमें निकले पक्के हिन्दू।
पक्के हिन्दू भवन बनाया, तिस पर कब्बा बैठा पाया।
कब्बे ने की काली बीट, तिसमें निकला चूना ईंट।
चूने ईंट से निकला हाल, उसमें निकला आटा दाल।
आटा-दाल से निकली रोटी, कोई पतली कोई मोटी।
रोटी खाई छुटी अंघाई, गंगा किरिया रामदुहाई।
तब बैठे पंचायत जोर, कहत कहानी हो गई भोर।
सेख सलीम ने कही कहानी, चैमासे भर भया न पानी।32
व्यग्य बाबू बालमुकुन्द गुप्त की प्रभावी शैली का अनिवार्य अंग है। अपने निबन्धों में बड़ी निर्भीकता से उन्होंने इसका प्रयोग करते हुए पत्रकारिता के आदर्श की नींव रखी ही, इनकी कविता भी व्यंग्य लिए हुए है। यद्यपि इनका व्यंग्य बहुत महीन नहीं, स्थूल है।
गुप्त जी की कविताओं में जितनी वैचारिक स्पष्टता है, वह उस समय के शायद ही किसी कवि में हो। उनसे पहले राजभक्ति और राष्ट्रभक्ति के बीच साहित्य झूल रहा था। इसलिए साहित्यकार अंग्रेजी साम्राज्य के शोषक रूप का वर्णन करते थे, तो साथ ही उसकी प्रशंसा भी कर देते थे। भारत के समाज में अंग्रेजी शासन की सकारात्मक भूमिका देखने वालों की संख्या काफी थी, लेकिन बालमुकुन्द गुप्त इस मामले में स्पष्ट थे, वे साम्राज्यवाद को भारत की प्रगति में बाधक मानते थे, उन्हें अंग्रेजी शासन से कोई सकारात्मक अपेक्षा नहीं थी। इसीलिए उनके साहित्य में उनकी प्रशंसा नहीं मिलती। वे साम्राज्यवादी पार्टियों में भी कोई भेद नहीं करते थे। बहुत से लोग समझते थे कि इग्लैंड में शासन परिवर्तन होने से भारत को राहत मिल सकती है, लेकिन गुप्त जी का मानना था कि भारत के लिए 'लिबरल और टोरी' में कोई अन्तर नहीं है।
नहीं कोई लिबरल नङ्क्षह कोई टोरी, जो परनाला सोई मोरी
दोनों का है पंथ अघोरी, होली है भाई होली है।
करते फुलर विदेशी वर्जन, सब गोरे करते हैं गर्जन,
जैसे मिन्टो वैसे कर्जन, हाली है भाई होली है।33
बालमुकुन्द गुप्त ने हिन्दी कविता को सामाजिक सरोकारों से जोड़ा और जनता की पीड़ा को व्यक्त करने के लिए कविता की भूमिका को रेखांकित किया। साहित्य को अपने समाज के संघर्षों से जोडऩे व तत्कालीन संघर्षों को कविता में सीधे तौर पर अभिव्यक्त करना उस समय की जरूरत थी। बालमुकुन्द जी की कविताओं में एक अनगढ़ व खुरदरा यथार्थ है, जो अपने मौलिक रूप में वहां मौजूद है। बालमुकुन्द की कविताओं का ऐतिहासिक महत्व है। उनकी कविताओं की भावभूमि व भाषा नए युग के सूत्रपात का आभास हैं। उनकी कविताएं समसामयिक सवालों पर टिप्पणियों व राजनीतिक विचारों को सीधे तौर पर व्यक्त करती हैं। इन नए विषयों के लिए कविता के परम्परागत ढर्रे को तोडऩे की आवश्यकता थी, इसे तोड़कर उन्होंने नए ढंग से कविताएं लिखनी शुरू की। छंद का अनुशासन तोडऩा कविता में क्रांति की तरह का काम था। छंद समसामयिक अभिव्यक्ति में बाधा बनकर खड़ा था। बाद के समय में कविता लेखन का जो ढंग सबसे अधिक लोकप्रिय और प्रासंगिक हुआ उसकी नींव बाबू बालमुकुन्द गुप्त ने रख दी थी। कविता को विलास की चीज समझने की बजाए उसे समाज से जोडऩे का ऐतिहासिक काम किया।

संदर्भ
1 मदन गोपाल; बालमुकुन्द गुप्त; साहित्य अकादमी, दिल्ली;1990; पृ.-7
2 नत्थन सिंह; बालमुकुन्द गुप्त ग्रन्थावली; हरियाणा साहित्य अकादमी,पंचकूला; द्वितीय सं. 2008; पृ.-12
3 मदन गोपाल; बालमुकुन्द गुप्त;पृ.-8
4 नत्थन सिंह; बालमुकुन्द गुप्त ग्रन्थावली; पृ.-26
5 वही, पृ.-309 6 वही, पृ.-
315 7 वही, पृ.-109 8
9 वही, पृ.-174-175 10 वही, पृ.-194-195
11 वही, पृ.-207 12 वही, पृ.-213
13 वही, पृ.-205 14 वही, पृ.197
15 वही, पृ.-192 16 वही, पृ.-205
17 वही, पृ।-207 18 वही, पृ।-170
19 वही, पृ।-172 20 वही, पृ।-173
21 वही, पृ।-179 22 वही, पृ.-176
23 वही, पृ.-163 24 वही, पृ.-167
25 वही, पृ।-4-5 26 वही, पृ.-191
27 वही, पृ.-199 28 वही, पृ.-60
29 वही, पृ.-212 30 वही, पृ.-170
31 मदनगोपाल, पृ.-64 32 नत्थन सिंह, पृ.-203
33 वही, पृ.-200

No comments:

Post a Comment

नींद में एक घरेलू स्त्रीः बाजारवाद से संघर्ष

  नींद में एक घरेलू स्त्रीः बाजारवाद से संघर्ष डा. सुभाष चन्द्र,  हिन्दी-विभाग,  कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र हरियाणा के प...