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December 30, 2010

हिन्दी दुर्दशा

हिन्दी दुर्दशा
सुभाष चन्द्र, एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र

मनुष्य के सांस्कृतिक विकास में भाषा का महत्त्वपूर्ण योगदान है। मनुष्य के साथ-साथ भाषा और भाषा के साथ-साथ मनुष्य विकसित हुआ है। भाषा विचारों के आदान प्रदान का ही नहीं, बल्कि सोचने का माध्यम भी है। भाषा की सीमा और विस्तार का अर्थ मनुष्य के ज्ञान और विस्तार से है। इसीलिए महापुरुषों ने अपनी भाषा व समाज को समृद्ध करने के लिए दूसरी भाषा के ज्ञान को अपनी भाषा में अनुवाद किया है।
भारत बहुभाषी तथा बहुसांस्कृतिक देश है, जिसमें सैंकड़ों भाषाओं और बोलियों को बोलने वाले लोग रहते हैं। शायद ही दुनिया के किसी देश में ऐसी भाषायी विविधता देखने को मिले, जिसमें एक से एक समृद्ध भाषाएं हों, जिनमें विपुल साहित्य हो और समस्त कार्य की क्षमता हो। लेकिन यह भी सही है कि शायद ही दुनिया में कोई देश ऐसा हो, जिसमें आजादी के 63 साल बाद भी राजकार्य में विदेशी भाषा का इतना बोलबाला हो, कि अपनी भाषा में काम को प्रोत्साहन देने के लिए 'हिन्दी-दिवस', 'हिन्दी-सप्ताह', 'हिन्दी-पखवाड़ा' मनाना पड़े और तरह-तरह के तो इनाम के रूप में लालच देने पड़ते हों।
भारत के संविधान की आठवीं सूची में में स्वीकृत भाषाओं की संख्या 23 हैं। संविधान निर्माताओं ने राजभाषा के सवाल पर गम्भीर विचार-विमर्श के बाद अनुच्छेद 343 में देवनागरी लिपि में लिखित हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिया। तात्कालिक तौर पर अंग्रेजी को सहयोगी भाषा के तौर पर स्वीकार करते हुए उन्होंने संघ का कत्र्तव्य निर्धारित किया कि सन् 1965 तक हिन्दी राजभाषा के रूप में विकसित करे, परन्तु आजादी के तिरेसठ साल के बाद भी हिन्दी-दिवसों का मनाया जाना हमारे राजनेताओं, अफसरशाही की जनता की भाषा के प्रति प्रतिबद्धता व संविधान की भावनाओं के प्रति आदर तथा राष्ट्रीय स्वाभिमान को दर्शाता है। अंग्रेजी साम्राज्यवाद में पली-बढ़ी नौकरशाही इस बात को मानने को तैयार ही नहीं कि अंग्रेजी बिना देश प्रगति कर सकता है, जबकि रूस, चीन, जर्मनी, जापान, फ्रांस, इटली जैसे देशों का उदाहरण भी सारी दुनिया के समक्ष है कि उन्होंने विज्ञान और तकनीकी विकास अपनी भाषा में ही किया है।
भाषा का सवाल मात्र भाषा का सवाल नहीं है व्यक्तिगत भावनाओं-विचारों की अभिव्यक्ति के साथ-साथ उसके तार देश-समाज के विकास और सत्ता संरचना से जुड़े होते हैं, विशेषकर लोकतंत्र में। भाषा संपर्क का सबसे विश्वसनीय माध्यम है और लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जितना वह जनता के निकट आता है। सरकार तथा जनता में देश की नीतियों, उपलब्धियों तथा भावी योजनाओं के संवाद का जरिया भाषा ही है। जनता की भाषा में कामकाज से ही सरकार-प्रशासन व जनता के बीच की दूरी को कम किया जाता है। लेकिन यहां तो इसका उलटा ही होता है। जिसे एक स्थानीय अनुभव से समझा जा सकता है। हरियाणा के फतेहाबाद जिले की कोर्ट में किसान अपने मुकदमे की पैरवी स्वयं कर रहा था, तो जज महोदय ने कहा कि मुझे आपकी भाषा समझ नहीं आ रही है। आप वकील कर लीजीए। किसान ने सहज समझ जबाव दिया कि यदि आपको मेरी भाषा समझ नहीं आ रही, तो आप करो वकील। किसान का यह उत्तर सरकारी कामकाज की कार्यप्रणाली पर प्रश्रचिह्न लगाता है। सूचना के अधिकार के युग में जब पारदर्शिता की मांग की जा रही है तो इसके सबसे पहले जनता की भाषा में कामकाज की जरूरत है। भाषा राजकाज के कामों को जनता से दूर करने का सबसे बड़ा हथियार बन जाती है। सत्ता में भागीदारी से रोकने को सबसे विश्वसनीय और मारक हथियार।
हिन्दी को राजभाषा के तौर पर स्वीकृति संविधान निर्माताओं के दिमाग की उपज नहीं थी, बल्कि यह स्वतंत्रता आन्दोलन के मूल्यों का हिस्से के तौर पर था। स्वतन्त्रता प्राप्ति के आन्दोलन में भाषायी गुलामी से भी मुक्ति प्राप्त करनी थी। धीरे धीरे गुलामी के तमाम कारकों से विशेषकर मानसिक गुलामी से छुटकारा पाना था, लेकिन आज जब हम यह बात कर रहे हैं तो गुलामी का अहसास ही समाप्त हो गया है। गुलामी के इस चिह्न को अपनी शोभा-आभूषण बना लिया है और इस आभूषण को धारण करने की होड़ लगी हुई है। अंग्रेजी सीखना बुरी बात नहीं है। आजादी के आन्दोलन के दौरान के उन सभी नेताओं को बहुत बढिया अंग्रेजी आती थी, जिन्होंने हिन्दी की राष्ट्रभाषा-राजभाषा के तौर पर स्वीकार करने की वकालत की थी। हां, हिन्दी न आना या अपनी भाषा न आना शर्म की बात जरूर है। इस शर्म को अंग्रेजी स्कूलों में तैयार की गई पीढी तो पी चुकी है, उसको हिन्दी की गिनती भी अंग्रेजी में बताकर समझानी पड़ रही है। मां-बाप बच्चे को हिन्दी अथवा स्थानीय भाषा की वर्णमाला की बजाए अंग्रेजी की वर्णमाला, अंग्रेजी में शरीर के अंगों के उच्चारण को गर्व से सिखाते हैं। यह सब अचानक नहीं हुआ, इसके लिए समाज की अभिजात्य वर्ग का तथा नौकरशाही का पूरा दिमाग लगा है। सन् 1948 में डा. राधाकृष्ण की अध्यक्षता में बना 'विश्वविद्यालय आयोग', सन् 1952 में डा. लक्ष्मण स्वामी मुदलियर की अध्यक्षता में बने 'माध्यमिक शिक्षा आयोग', सन् 1964 में डी.एस. कोठारीकी अध्यक्षता में बने 'शिक्षा आयोग' आदि स्वतंत्र हिन्दुस्तान में जितने भी शिक्षा आयोग बने उन सबने मातृभाषा को शिक्षा का माध्यम बनाने की सिफारिश की। भारतीय भाषाओं और हिन्दी को विकसित करने के लिए त्रि-भाषा सूत्र जैसे कितने ही उपाय सुझाए। लेकिन औपनिवेशिक मानसिकता और वर्ग स्वार्थों का वायरस सबको निकल गया। लोक सेवा आयोग की प्रतियोगी परीक्षाओं में अंग्रेजी माध्यम बने रहने के कारण मेधावी व महत्त्वाकांक्षी छात्रों को अंग्रेजी की ओर धकेलने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। पूरे देश में अंग्रेजी माध्यम और कान्वेट स्कूलों के कारोबार फलने-फूलने के पीछे यही कारण है। इनकी परिकल्पना में ही था कि जो यहां पढ़ेगा वह अफसर बनकर ही निकलेगा, इसीलिए अफसरशाही की प्रतीक 'टाई' इनकी वर्दी का अनिवार्य हिस्सा बनी। सत्ता में भागीदारी का द्वार बनकर उभरे अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय और स्थानीय मातृभाषाओं के विद्यालय में रह गई प्रजा। जब इस दोहरी व्यवस्था की आलोचना होने लगी और शासनकर्ताओं की मंशा को कटघरे में खड़ा करना शुरू किया तो हरियाणा जैसे राज्य जो हिन्दी भाषा के आधार पर ही अस्तित्व में आया, उसमें भी सरकारी विद्यालयों में भी प्रथम कक्षा से ही अंग्रेजी विषय अनिवार्य कर दिया। पहले अंग्रेजी के भूत से बच्चों का पांचवी कक्षा के बाद वास्ता पड़ता था अब नौनिहालों के पल्ले पड़ गया। यह सिर्फ आलोचना से बचने का माध्यम था कोई गम्भीर चिंतन इसके पीछे नहीं था। इसीलिए अंग्रेजी अध्यापक का एक भी स्कूलों में सृजित नहीं किया गया।
शिक्षण संस्थाओं में अंग्रेजी और हिन्दी के बीच भेदभाव सतह पर ही नजर आता है। हिन्दी शिक्षण के लिए विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता है, लेकिन अंग्रेजी को समाज-विज्ञान के अध्यापक ही पढ़ा देते हैं। उच्च शिक्षा में हिन्दी विषय का वर्कलोड बहुत ही कम है अंग्रेजी आधा तथा समाज विज्ञान के दूसरे विषयों से भी आधा। भाषा के प्रति वर्तमान शासकों-प्रशासकों व नीति-निर्माता बुद्धिजीवियों का बहुत ही उदासीन रुख है और हिन्दी के प्रति तो नकारात्मक है। भाषा का पाठ्यक्रम समाज और वर्तमान की जरुरतों के अनुसार नहीं, बल्कि परीक्षा में अधिक से अधिक प्राप्त करने के अनुसार तैयार किए जा रहे हैं। परीक्षा में अधिक से अधिक अंक ही सफलता व ज्ञान की कसौटी बन गए हैं। इसका मंत्र है कम से कम पाठ्यक्रम और सुविधाजनक प्रश्र। स्कूलों में तो ऐसा माना जाता है कि हिन्दी तो कोई भी पढ़ा देगा। पी.टी.आई. आदि भी हिन्दी की कक्षाएं ले लेते हैं। कालेजों-विश्वविद्यालयों में संकीर्ण सोच काम कर रही है। केवल अपने विषय का वर्कलोड बढ़ाने की होड़ लगी है। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से संबंधित महाविद्यालयों में कामर्स संकाय के लिए भाषा की अपेक्षा कामर्स के अध्यापक ही पढ़ाते हैं। मीडिया विभाग में स्नातक के विद्यार्थियों को हिन्दी के अध्यापक पढायेंगे या कि मीडिया के यह बात भी विवाद का विषय बनी हुई है। विभिन्न महाविद्यालयों में दोनों विभागों के अध्यापकों के बीच खींचतान देखी जा सकती है। प्रबन्धन, गृह विज्ञान, फार्मेसी व विधि आदि कितने ही पाठ्यक्रमों में हिन्दी भाषा विषय ही नहीं है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि अपना ज्ञान व कौशल विकसित करने के पश्चात जिन लोगों को इस ज्ञान की सेवाएं देनी है उनसे किस तरह से तालमेल कर पायेंगे।
आज कल सभी यह कहते पाए जाते हैं कि एम.ए. करने के बाद भी प्रार्थना-पत्र तक लिखते वक्त उच्च-डिग्रीधारी तक के हाथ कांपने लगते हैं। अखबार वाले नव-पत्रकारों को भाषा नहीं आती का रोना रोते हैं तो पाठक अखबारों में अत्यधिक गलतियों का रोना रोते हैं। दुकानों के साईनबोडऱ्ों, निमन्त्रण-पत्रों, विभिन्न किस्म की प्रचार सामग्री में बहुत अधिक भाषायी त्रुटियां मिलेंगी। कारण जानने की कोशिश करो तो उच्च शिक्षा से जुड़े शिक्षक स्कूली-शिक्षा में दोष निकाल कर छुट्टी पा जाते हैं। स्कूल शिक्षक छात्रों के मां-बाप, छात्रों की अरुचि व वातावरण को जिम्मेदार ठहराते हैं।
भाषा की अशुद्धता दो स्तर पर है, एक उच्चारण के स्तर पर दूसरा लेखन के स्तर पर। स्थानीय लहजे व बोलियों की विशिष्टताओं के कारण उच्चारण की विविधता और मानक दृष्टि से अशुद्धता स्वाभाविक है। लेकिन लेखन के स्तर पर तो पूरी तरह शिक्षा-प्रणाली का दोष है। जिसमें शिक्षक, पाठ्यक्रम, परीक्षा-प्रणाली तथा भाषा-नीति भी शामिल हैं। भाषा के प्रति जो थोड़ी बहुत जागरुकता है भी तो केवल उच्चारण पर। इसीलिए अंग्रेजी बोलना सिखाने वाले सैंकड़ों प्रतिष्ठान शहरों में मिल जायेंगे, लेकिन शुद्ध अंग्रेजी लिखने पर कोई ध्यान नहीं।
संविधान निर्माताओं के समक्ष भाषा का स्वरूप दिन के उजाले की तरह साफ था। हिन्दी को राजभाषा स्वीकार करते हुए अनुच्छेद 351 में इसके स्वरूप की परिकल्पना की ओर भी संकेत किया था, जिसको यहां देना अप्रासंगिक नहीं होगा। ''संघ का यह कत्र्तव्य होगा कि वह हिन्दी का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तथ्यों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिंदुस्तानी के और आठवीं सूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं के संयुक्त रूप, शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहां आवश्यक हो या वांछनीय हो, वहां उसके शब्द-भंडार के लिए मुख्यत: संस्कृत से और गौणत: अन्य भाषाओं से ग्रहण करते हुए उसकी संवृद्धि सुनिश्चित हो सके।ÓÓ
संविधान निर्माताओं ने हिन्दी-भाषा में बहुसांस्कृतिक, बहुधर्मी, बहुभाषी देश को एकता के सूत्र में पिरोये रखने की क्षमता को रेखांकित किया था। हिन्दी को उसका स्वरूप प्रदान करने का श्रेय असंख्य सुफियों-संतों-भक्तों, पीरों-फकीरों, लोक गायकों, सिद्धों, जन नायकों तथा स्वतंत्रता सेनानियों और लेखकों को है। हिन्दी हमेशा सत्ता के विरुद्ध पनपी व विकसित हुई है, अपने साथ कबीर, मीरा, निराला की परम्परा समेटे हुए है। शासन-सत्ता की भाषा और जनता की भाषा में जो अन्तर होता है, वह हिन्दी की प्रकृति में मौजूद है। अमीर खुसरो हिन्दी कहते थे कि हिन्दवी में अपने विचार अच्छी तरह व्यक्त कर सकते हैं। उन्हें अपने हिन्दी के ज्ञान पर गर्व था। वे कहते थे कि
चू मन तूति-ए-हिन्दम अर रास्त पुरसीं ।
जेे मन हिन्दवी पुर्स, ते नग्ज गुयम।
''मैं हिन्दुस्तान का तोता हूं। मुझसे मीठा बोलना चाहो तो मुझसे हिन्दवी में पूछो जिससे मैं भलिभांति बात कर सकूं।ÓÓ
इसी ग्रन्थ में उन्होंनेेेेे कहा कि ''मैं एक भारतीय तुर्क हूं और आपको हिन्दी में उत्तर दे सकता हूं मेरे अंदर मिस्री शक्कर नहीं है कि मैं अरबी में बात करूं-
तुर्क हिन्दुस्तानम मन हिंदवी गोयम जबाव,
शक्करे मिस्री नदारम कज अरब गोयम सुखन।
अमीर खुसरो ने अपने बेटे को नसीहत देते हुए कहा कि ''मैं हिंद को ही अपना मुल्क मानता हूं और यहां के आम लोगों की जुबान को ही अपनी जुबान।
''अगर हम तुर्कों को हिन्द में रहना है और सदा के लिए यहीं बसना है तो सबसे पहले हमें यहां के लोगों के दिलों में बसना होगा। और दिलों में बसने के लिए सबसे पहली जरूरत है इनकी जबान में इनसे बातें करना; इनके दिल की बात को शायरी में बांधना। तभी बंध पायेंगे हम इनसे। तुर्कों को हिंदवी जुबान सिखाने के खयाल से ही मैने 'खालिकबारी' नाम की किताब लिखी है।
''1318 के आसपास लिखे गए अपने प्रसिद्घ फारसी महाकाव्य 'नूर सिपहर' नौ आकाश में खुसरो ने अपने भारत में बोली जाने वाली भाषाओं की शिनाख्त की और उन सबको हिन्दी से जोड़कर दिखाया:
सिंदी-ओ-लाहोरी-ओ कश्मीर-ओ गर,
धर समंदरी तिलगी ओ गुजर।
माबरी-ओ गोरी-ओ बंगाल-ओ अवध,
दिल्ली-ओ पैरामकश अंदरहमाहद,
ईं हमा हिंदवीस्त जि़ अयाम-ए-कुहन,
आम्मा बकारस्त बहर गूना सुखन।
सिंधी, पंजाबी, कश्मीरी, मराठी, कन्नड़, तेलगु, गुजराती, तमिल, असमिया, बंगला, अवधी, दिल्ली और उसके आसपास जहां तक उसकी सीमा है, इन सबको प्राचीन काल से हिंदवी नाम से जाना जाता है। बहरहाल अब मैं अपनी बात शुरु करता हूं।
अमीर खुसरो ने अपने बेटे को तीन नसीहतें दी' 'दूसरी नसीहत यह कि क्योंकि तू भी शायरी करने लगा है, इसलिए मैं चाहूंगा कि हिन्दवी में ही शायरी करना ।'
मैथिल कोकिल कहे जाने वाले विद्यापति ने भी देसी भाषा यानी लोगों की जुबान को ही महत्त्व देते हुए कहा था कि
देसिअ बअना सब जन मिट्ठा।
ते तैसन जम्पओ अवहट्ठा।
देसी भाषा सबको मीठी लगती है यही जानकर मैने अवहट्ठ में रचना की है। अवहट्ठ हिन्दी का पूर्वरूप है।
हिन्दी के महाकवि तुलसीदास ने कथित देववाणी की बजाए आम लोगों की जुबान में रामचरित लिखा तो तत्कालीन वर्चस्वी पंडितों ने उनको जाति बाहर कर दिया और उनको सामाजिक बहिष्कार का दण्ड भुगतना पड़ा।
इन सबका यहां जिक्र करने का मतलब इतना ही है कि जिसने भी भारतीय जनता से संवाद स्थापित करना चाहा है, उसने जनभाषा हिन्दी को अपनाया है। बिना जनभाषा को अपनाए उससे संवाद स्थापित करने का ओर कोई जरिया अभी तक ईजाद नहीं हुआ है। लेकिन शासन सत्ताओं को जन से संवाद की बजाए एकतरफा प्रलाप करते ही अपना शासन टिकाऊ नजर आता है। शासन का यही तरीका उसे सबसे विश्वसनीय लगता है।
हिन्दी का पथ राजपथ नहीं है और इसको उस पर चलने की आदत है। यह तो देश की जनता के अनगढ़ता को वाणी देती रही है। इसी दौरान उसमें सांस्कृतिक एकता को वाणी देने में सक्षम हुई। इसी क्षमता के कारण ही स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान गैर हिन्दी भाषियों ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के लिए बिल्कुल उपयुक्त पाया था। राजामोहन राय बंगाली थे, उन्होंने हिन्दी के बारे कहा था कि 'हिन्दी में अखिल भारतीय भाषा बनने की क्षमता है।' गुजराती भाषी स्वामी दयानन्द सरस्वती ने कहा था कि 'हिन्दी द्वारा सारे भारत को एकसूत्र में पिरोया जा सकता है।' महात्मा गांधी भी गुजराती भाषी थे उन्होंने कहा था कि 'राष्ट्रभाषा की जगह हिन्दी ही ले सकती है, कोई दूसरी भाषा नहीं।' लोकमान्य तिलक का कहना था कि 'राष्ट्र के एकीकरण के लिए सर्वमान्य भाषा से अधिक बलशाली कोई तत्त्व नहीं। मेरे विचार में हिन्दी ही ऐसी भाषा है।' नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने कहा था कि 'देश के सबसे बड़े भू-भाग में बोली जाने वाली भाषा हिन्दी ही राष्ट्रभाषा पद की अधिकारिणी है।' सुब्रह्मण्य भारती ने कहा कि 'राष्ट्र की एकता को यदि बनाकर रखा जा सकता है तो उसका माध्यम हिन्दी ही हो सकती है।' बंकिमचन्द्र चटर्जी ने कहा था कि 'अपनी मातृभाषा बांग्ला में लिखकर मैं बंग-बंधु तो हो गया, किंतु भारत-बंधु मैं तभी हो सकूंगा जब भारत की राष्ट्रभाषा में लिखूंगा'। इन महापुरुषों ने हिन्दी की महत्ता को व गौरव को सही रेखांकित किया था।
हिन्दी पर आरोप लगाया जाता है कि उसमें काम काज की क्षमता नहीं है। असल में यह अपनी अक्षमता को हिन्दी भाषा पर थोंपना है। फिर भाषाओं क्षमता क्या अचानक आ जाती है? सोचने की बात है कि जब अंग्रेजों ने अपने शासन का कामकाज अंग्रेजी में शुरू किया तो भारत के कितने लोग अंग्रेजी में पारंगत तो छोड़ो उसका सामान्य ज्ञान भी कितने लोगों को था। लेकिन अंग्रेजी शासकों की अपनी भाषा व साम्राज्य के प्रति निष्ठा ने उसे कुछ ही सालों में राजकाज की भाषा के तौर पर स्थापित कर दिया।
हिन्दी को दोहरी मार झेलनी पड़ी है। एक तरफ तो विदेशी भाषा से दूसरी तरफ हिन्दी के अभिजन से, हिन्दी के पंडिताऊपन से। राजभाषा को निर्मित करने का जिम्मा जिन हिन्दी-प्रेमियों को मिला उन्होंने उसकी रक्षा में हत्या की। संविधान निर्माताओं ने जिस जन भाषा की जो सामासिक संस्कृति की उत्पति थी उसको त्यागकर संस्कृतनिष्ठ-कलिष्ट, शास्त्रीय-पंडिताऊ भाषा को अपनाया। जन प्रयोग के शब्दों तथा दूसरी भाषा के शब्दों विशेषकर उर्दू के शब्दों को चुन-चुनकर हिन्दी-निकाला दिया गया। सहज प्रयोग को निहायत कृत्रिम, उबाऊ बना दिया। अंग्रेजी भाषा विश्व की भाषा ऐसे नहीं बन गई, उन्होंने भाषायी संकीर्णता अपनाई होती और अपनी श्रेष्ठता के खोल में ही रहते तो उनकी राजसी भाषा इतना विकसित नहीं होती। कितने ही शब्द हैं जो हिन्दी व उसकी बोलियों से अंग्रेजी शब्दकोश का सम्माननीय हिस्सा बने हैं। इसके विपरीत हिन्दी में दूसरी ही बयार चली, जो चुन-चुनकर हिन्दी के शब्दों की पूंछ उठाकर देखते और उसे बाहर कर देते।
इसीलिए आम स्थानों पर ऐसे बेहूदे व फूहड़ शब्द देखने को मिलेंगे कि आप मातृभाषा को इस तरह बलात्कृत होते देखकर आप सिर पीट लेंगे। आपको देखने में आयेगा कि 'प्रवेश निषेध' है, क्या 'अन्दर आना मना है' में कोई मूलभूत खराबी है? आपको पानी की टंकियों पर लिखा मिलेगा 'शीतल जल', क्या 'ठण्डा पानी' में कोई जहर है? आपको लिखा मिलेगा 'धूम्रपान वर्जित है' क्या लोग 'बीड़ी-सिगरेट पीना मना है' को नहीं समझते? ये सब हो रहा है भाषा की शुद्धता व मानकीकरण के नाम पर। मानकीकरण की आड़ में सबसे पहले हमला होता है जनभाषा पर यानी जन के अभिव्यक्ति के औजारों पर। ऐसा करने के लिए चाहे भाषाओं का घालमेल ही क्यों न करना पड़े। ऐसे प्रयोग इसी मानसिकता के उदाहरण हैं जैसे 'दुग्ध-डायरी' अब आप बताइए कि 'दूध' का 'दुग्ध' तो शुद्ध पर्यायवाची मिल गया, लेकिन डायरी कहां से प्रयोग हो रहा है।
भाषायी शुचिता का तर्क पोंगापंथ की हद तक गया, जिसके चलते हिन्दी ऐसी बनी कि अंग्रेजी से भी मुश्किल। मूल भाषा, संस्कृति व परम्परा के नाम पर अपने अभिजात्य की रक्षा करने के काम आई कठिनता। सरलता और कलिष्टता का संघर्ष भाषा के क्षेत्र में रहा है और यह मात्र भाषा विज्ञान का नियम नहीं है कि भाषा कलिष्टता से सरलता की ओर जाती है, बल्कि इसमें सामाजिक शक्तियों के संघर्ष भी दिखाई देते हैं। कबीर जब कहते हैं कि 'संसकिरत भाषा कूप जल, भाखा बहता नीर' तो वे एक अन्तर्विरोध की ओर संकेत करते हैं। 'बहते नीर' वाली भाषा ही विकसित होती है और अपनी प्रासंगिकता नहीं खोती।
भाषाओं में श्रेष्ठता के दावे नहीं चलते, जिस भाषा जो अभिव्यक्ति करता है उसके लिए वही भाषा महान होती है। दूसरी भाषाओं की कद्र करके ही हम अपनी भाषा के लिए सम्मान पा सकते हैं। भाषाओं में ऐसी संकीर्णताएं नहीं होती, ऐसी कोई भाषा नहीं जिसने दूसरी भाषाओं से शब्द न लिए हों। एक जगह से शब्द दूसरी जगह तक यात्रा करते हैं। जिस भाषा में ग्रहणशीलता को ग्रहण लग जाता है वह भाषा जल्दी ही मृत भी हो जाती है। दुनिया की कितनी ही समृद्ध भाषाएं इसीलिए आज व्यवहार से बाहर मात्र शब्दकोशों और संस्थानों में शोभा बढ़ा रही हैं कि उनकी ग्राह्य क्षमता उदार नहीं रही।
यदि भाषा को जन अभिव्यक्ति से दूर किया जायेगा तो इस तरह की हास्यास्पद स्थिति पैदा हो जाएगी। शादी के मंडप के नीचे फेरों के अवसर पर पुरोहित लड़की वालों से सामग्री अपनी संस्कृतनिष्ठ भाषा में मंगवा रहा था। उसने अपनी ही रौ में कहा कि 'कन्या को लाओ', तो घरवालों ने आंखें तरेर कर कहा कि 'पंडित जी, कल क्यों नहीं बताया वो तो बाजार से लाए ही नहीं।' संस्कृतनिष्ठ-कलिष्ट भाषा व जन भाषा की बहस को यह वाक्या सही बयान करता है। बारात को तरह तरह के व्यंजन परोसे जा रहे थे और आवाज देकर खाने का आग्रह किया जा रहा था। एक व्यक्ति 'जलजी' 'जलजी' कहता हुआ आ रहा था तो किसी बाराती ने उसका स्वाद लेने के लिए पी लिया। बाद में जब खाने की चर्चा चली तो बारात में सब खाने की तारीफ कर रहे थे। सबका ख्याल था थे कि बाकी तो सब ठीक था लेकिन 'जलजी' बिल्कुल 'पानी' ही था।
हिन्दी समाज के साथ एक समस्या रही है कि साम्प्रदायिकता व साम्प्रदायिक संकीर्णता की, जिसका प्रभाव हिन्दी भाषा पर भी पड़ा। उन्मादी हिन्दी-भाषियों का भाषायी प्रेम उर्दू-विरोध तथा अंग्रेजी के नकार में ही फला-फूला। हिन्दी प्रेम का यह मतलब दूसरी भाषाओं को न सीखना और उनमें व्याप्त ज्ञान से वंचित रहना तो कतई नहीं। भाषाओं को धर्मों से जोड़कर देखा जाएगा तो उनमें इस तरह की संकीर्णता पैदा होगी। उर्दू मुसलमानों की भाषा नहीं है, पंजाबी सिखों की भाषा नहीं है और न ही हिन्दी हिन्दुओं की भाषा है। भाषा का रिश्ता धर्मों से कम और संस्कृतियों से अधिक हुआ करता है। संस्कृति से भाषा को विचार-दृष्टि मिलती है तो भाषा संस्कृति को वाणी देती है। केरल का मुसलमान उर्दू नहीं मलयालम बोलता है, तमिलनाडू का तमिल, बंगाल का बंगला, आंध्र पद्रेश का तेलगु और पंजाब का पंजाबी। इसीतरह विभिन्न प्रदेशों के हिन्दू अपने अपने प्रदेशों की भाषाएं बोलते हैं न कि हिन्दी। संस्कृति का विकास संकीर्णताओं से नहीं उदारता से होता है। जहां तक हिन्दी, उर्दू और पंजाबी या अन्य आधुनिक भारतीय भाषाएं हैं वे सब एक ही समय में पैदा हुई हैं और एक दूसरे का हाथ पकड़कर आगे बढ़ी हैं। बिल्कुल जुड़वां बहनों की तरह से एक दूसरे का सुख-दुख बांटते हुए, गमी-खुशी साझी करते हुए।
भाषाओं का चरित्र धर्मनिरपेक्ष होता है। शब्द एक भाषा व क्षेत्र से दूसरी भाषा व क्षेत्र में प्रवेश करते हैं। भाषाओं का परस्पर आदान-प्रदान से ही वे फलती-फूलती हैं। महात्मा गांधी ने हिन्दी भाषा की व्याख्या करते हुए सही परिभाषित किया था ''हिन्दी भाषा वह भाषा है, जिसको उत्तर में हिंदू व मुसलमान बोलते हैं और जो नागरी अथवा अरबी लिपि में लिखी जाती है। वह हिन्दी एकदम संस्कृतमयी नहीं है न वह एकदम फारसी शब्दों से लदी हुई है। देहाती बोली में जो माधुर्य मैं देखता हूं वह न लखनऊ के मुसलमान भाइयों की बोली में है, न प्रयागजी के पंडितों की बोली में पाया जाता है"
ऐसी मिली जुली जन हिन्दी में ही पूरे देश की संपर्क भाषा बनने की क्षमता है। नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने 'आजाद हिंद फौज' का गठन किया तो फौजी टुकडिय़ों को कमांड देने के लिए हिन्दी भाषा को ही अपनाया। आजाद हिंद फौज के लिए कौमी तराना बनाया उसकी हिन्दी का स्वरूप आदर्श नमूना है।
कदम-कदम मिलाए जा, खुशी के गीत गाए जा।
ये जिंदगी है कौम की, तू कौम पर लुटाए जा।।
बहुसंख्यक भाषा भाषियों में दूसरी भाषाओं के प्रति संवेदनाशीलता का अक्सर अभाव पाया जाता है। वे यही कहते पाए जाते हैं हिन्दुस्तान की भाषा हिन्दी है और वही श्रेष्ठ भी है, और अनुकरणीय भी। लेकिन उनसे कोई पूछे कि उन्होंने दूसरी कौन सी भाषा सीखी है कि दूसरे उनकी भाषा अपनाएं और सीखें तो बतीसी निपोरने के अलावा उनके पास कुछ कहने के लिए नहीं होता। अपनी भाषा को दूसरों पर थोंपने की बजाए सभी भाषाओं का सम्मान करने की आवश्यकता है। महाकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने बहुत ही महत्त्वपूर्ण ढंग से रेखांकित किया कि ''आधुनिक भारत की संस्कृति एक विकसित शतदल-कमल के समान है, जिसका एक-एक दल, एक-एक प्रांत, भाषा और उसका साहित्य-संस्कृति है। किसी एक को मिटा देने से उस कमल की शोभा नष्ट हो जाएगी। हम चाहते हैं कि भारत की सब प्रांतीय बोलियां, जिनमें सुंदर साहित्य की सृष्टि हुई है, अपने-अपने घर में रानी बनकर रहें, ... और आधुनिक भाषाओं के हार की मध्य मणि हिन्दी भारत-भारती होकर विराजती रहे।ÓÓ
सरकारी विभागों, बैंकों आदि में सितम्बर का महीना हिन्दी-भाषा के लिए बजट समाप्त करने का महीना बनकर रह गया है। एक कर्मकाण्ड हर साल होता है। वही अधिकारी मुख्य अतिथि के पद को सुशोभित करते हैं, जो पूरे साल हिन्दी में काम को हतोत्साहित करते हैं। हिन्दी में काम करने के संकल्प के साथ कर्मकाण्ड प्रारम्भ होता है और उसी के साथ खत्म। भाषा की महिमा का समूहगान होता है और साल भर वही ढाक के तीन पात। अगले साल फिर उन्हीं पुरानी फाइलों से धूल झाड़ ली जाती है और पुन: काम शुरू हो जाता है। सालों से यह क्रम जारी है।
भाषा सामाजिक और सामूहिक संपति है। आज जिस समय में हम रह रहे हैं वहां व्यक्तिगत विकास के लिए आपा धापी मची है। भाषा के सवालों पर सोचने के लिए किसी के पास वक्त ही नहीं है। जब व्यक्ति अपने समाज से आगे निकलने की सोचता है तो वह उसके सामूहिक विकास की चीजों की नहीं, बल्कि अपनी शान-विकास की ही सोचता है और इसमें अपना विवेक भी खो देता है। अपने भौतिक विकास के लिए अपने आत्मिक विकास को वह त्यागने के क्षण नहीं लगाता। दूसरों से आगे निकलने का आसान रास्ता ही चुनता है। वह आसानी से अपने विकास की भाषा और काम की भाषा में अन्तर कर लेता है। हिन्दी सिनेमा में काम करने वाले सुपरस्टारों के भाषा के प्रति व्यवहार से इसको समझा जा सकता है। हिन्दी अथवा अन्य क्षेत्रीय भाषा के अच्छे जानकार और उसमें नाम व धन कमाने वाले कलाकार जब अपनी कला का पुरस्कार लेते हैं तो अक्सर अंग्रेजी बोलते मिलते हैं। जब काम की भाषा और जीवन व्यवहार की भाषा अलग हो जाए तो किसी भाषा के प्रति चाहे वह अपनी मातृभाषा ही क्यों न हो हीनता के भाव आना अस्वाभाविक नहीं है।
आम जन और शासक वर्ग की भाषा का अन्तर तो हम संस्कृत के क्लासिक नाटकों में भी देख सकते हैं, जिनमें आम जीवन के चरित्रों की भाषा तथा शासकीय चरित्रों की भाषा अलग अलग है। इस तरह की भाषायी विविधता व स्तर तो समाज में हमेशा ही रहे हैं। लेकिन आज साम्राज्यवाद के दौर में भाषाओं में हीनता बोध पैदा करना तो राजनीतिक रणनीति का हिस्सा ही है। अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए तो चाहे दुनिया की बड़ी से बड़ी कंपनी भी धुर देसी भाषा में विज्ञापन प्रसारित करती है। उसके प्रतीकों का प्रयोग करती है, लेकिन जब अपनी योजनाएं बनाती है तो उसके सोचने की भाषा कोई ओर ही होती है।
बाबू भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कहा था कि चाहे हम किसी भी भाषा में बात करें लेकिन सोचें तो अपनी भाषा में और लिखें तो अपनी भाषा में। इसी से ही भाषाओं में ज्ञान का प्रविष्ट होता है जो उस समाज तक जाता है। इसीलिए उन्होंने देश के विकास की उन्नति का मूल कहा था और सभी क्षेत्रों में उसके प्रसार की बात कही थी।
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल,
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटै न हिय को सूल।।

प्रचलित करो जहान में निज भाषा करि जत्न।
राज काज दरबार में फैलावहु यह रत्न।।


डा.सुभाष चन्द्र
एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र

December 29, 2010

आम्बेडकर : मानवाधिकार कार्यकर्ता

आम्बेडकर : मानवाधिकार कार्यकर्ता
सुभाष चन्द्र, एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र

विश्व के उत्पीडि़त वर्गों के संघर्षों के प्रतिफल के रूप में मानवाधिकारों की घोषणा बेशक 1948 में हुई और 1993 में भारत में भी राष्ट्रीय मानवाधिकार का आयोग गठित किया गया। राज्य द्वारा मानवाधिकारों की स्वीकृति से निश्चित तौर पर उत्पीडि़त वर्गों के आन्दोलनों को बल मिला है, लेकिन उत्पीडि़त वर्गों के संघर्ष तभी से शुरू हो गए थे, जब से उन पर अत्याचार शुरू हुए थे। पश्चिम में 1215 में मैग्राकार्टा, 1628 में अधिकारों के लिए आवेदन, 1689 में बिल आफ राइटस, 1776 में अधिकारों का वर्जीनिया घोषणापत्र, 1791 में आम लोगों के अधिकारों की फ्रांस उदघोषणा आदि दस्तावेज आम लोगों संघर्षों के संघर्षों का ही नतीजा थे। यह बात सही है कि आधुनिक काल में इस प्रक्रिया ने तेजी पकड़ी और साम्राज्यवादी शक्तियों ने जहां पूंजी को वैश्विक रूप दिया वहीं श्रमिक वर्गों को भी वैश्विक स्तर पर एकजुट होने के अवसर अधिक मिले। विश्व की उत्पीडि़त शक्तियों की तरह भारत में मानवाधिकारों के लिए संघर्ष का इतिहास उतना ही पुराना है जितना कि उत्पीडऩ। मनुस्मृति के कठोर दण्डविधानों में छुपे उनको नियंत्रित करने में उनके आन्दोलन व भावना को समझा जा सकता है।
कथित भारतीय आम चेतना, नैतिक चेतना, सहज विवेक कमोबेश ब्राह्मणवादी विचारधारा से नियंत्रित व निर्देशित है और ब्राह्मणवादी विचारधारा की जेळी के दो सिंगड़ हैं - वर्ण-व्यवस्था और पितृसत्ता। इन्हीं दो सिंगड़ों से ब्राह्मणवाद ने भारतीय लगभग अस्सी प्रतिशत आबादी के मानवाधिकारों कोंचा है। भारत में वर्चस्वशाली व शासक वर्गों ने मानवाधिकारों के हनन की विचारधारा यानी ब्राह्मणवाद को अपनाकर ही अपनी क्रूरताओं व शोषण को वैध ठहराया है। शासन चाहे धुर हिन्दूवादी हो, तुर्कों का हो, मुगलों का हो अथवा अंग्रेजों का हो वे इसी विचारधारा में अपनी सुरक्षा पाते रहे हैं। इसीलिए भारत में जितने भी सामाजिक आन्दोलन हुए हैं उन्होंने ब्राह्मणवादी मूल्यों और संरचनाओं को नकारा है। चाहे चावार्क का आन्दोलन हो, महात्मा बुद्ध का आन्दोलन हो या कबीर-नानक-रविदास का आन्दोलन हो, या फिर जोतीबा फूले, ताराबाई शिन्दे और आम्बेडकर के आन्दोलन हों। भारतीय इतिहास में एक समानान्तर परम्परा व धारा है जो कभी प्रखर रूप में तो कभी मंद गति से चलती रही है। भारत में मानवाधिकारों का आन्दोलन असल में ब्राह्मणवाद के वर्चस्व के नकार का ही आन्दोलन है। इसीलिए जिस भी महापुरुष मानवाधिकारों के लिए संघर्ष किया है उसने अपनी परम्परा इसी में पहचानी है। डा. भीमराव आम्बेडकर ने इसीलिए अपनी परम्परा को पहचानते हुए महात्मा बुद्ध, कबीर और महात्मा जोतीबा फूले को अपना गुरू घोषित किया था। स्वाभाविक ही है कि इनमें से उस समय कोई भी जिन्दा नहीं था, उनको गुरू बनाने का अर्थ उनके परम्परा और विचार को ही अपनाना था।
1938 में रेलवे कामगारों को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा था कि ''दो शत्रु हैं जिनसे इस देश के मजदूरों को निपटना ही होगा। वे दो शत्रु हैं - ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद। ब्राह्मणवाद से मेरा आशय एक जाति समुदाय के रूप में ब्राह्मणों की शक्ति, उनके अधिकारों और हितों से नहीं है। ब्राह्मणवाद से मेरा मतलब है - स्वतंत्रता, समानता और बन्धुत्व की भावना का निषेध। उस अर्थ में यह सभी वर्गों में व्याप्त है और सिर्फ ब्राह्मणों तक ही सीमित नहीं है, हालांकि यह बात अपनी जगह बिल्कुल सही है कि वे ब्राह्मण ही थे, जो इस निषेधात्मक भावना के आदि प्रणेता और प्रर्वतक रहे। .... ब्राह्मणवाद का प्रभाव महज अन्तरजातीय खान-पान और अन्तरजातीय विवाह सम्बंधों तक ही सीमित नहीं है। इसका दायरा तो उन नागरिक अधिकारों के क्षेत्र तक फैला हुआ है। सार्वजनिक स्कूलों, सार्वजनिक कुंओं और सार्वजनिक परिवहन के साधनों और सार्वजनिक भोजनालयों का उपयोग नागरिक अधिकारों के विषय हैं। हर वह चीज जो सार्वजनिक उपभोग और आम लोगों के इस्तेमाल के लिए उद्दिष्ट हो या फिर सार्वजनिक कोष के द्वारा कायम की गई हो, प्रत्येक नागरिक के इस्तेमाल के लिए खुली तो होना ही चाहिए। लेकिन ऐसे लोगों की संख्या करोड़ों में है जिनके लिए ये अधिकार निषिद्ध हैं। ब्राह्मणवाद का ही परिणाम है जो इस देश को हजारों सालों से जकड़े हुए है और आज भी विद्युत-प्रवाह युक्त बिजली के नंगे तार की भांति क्रियाशील है। ब्राह्मणवाद इतना सर्वव्यापी है कि यह आर्थिक अवसरों के क्षेत्र को भी प्रभावित करता है।"
डा. आम्बेडकर के मन में मानवाधिकारों के लिए संघर्षकत्र्ताओं के लिए बहुत सम्मान था, उन्होंने कहा कि ''वे धन्य हैं जो अनुभव करते हैं कि जिन लोगों में हमारा जन्म हुआ है, उनका उद्धार करना हमारा कर्तव्य है। धन्य हैं वे, जो गुलामी का खात्मा करने के लिए सब कुछ न्योछावर करते हैं, और धन्य हैं वे, जो सुख और दुख, मान और सम्मान, कष्ट और कठिनाइयों, आंधी और तूफान की परवाह किए बिना तब तक संघर्ष करते रहेंगे जब तक कि अस्पृश्यों को उनके मानवीय जन्मसिद्ध अधिकार न मिल जाएं।" आम्बेडकर के आन्दोलन मानवाधिकारों को स्थापित करने वाले थे। 1927 के महाड़ आन्दोलन में चवदार तालाब से पानी पीने के अधिकार के दौरान उन्होंने कहा भी था कि ''हम तालाब पर इसलिए जाना चाहते हैं कि हम भी औरों की तरह मनुष्य हैं और मनुष्य की तरह जीना चाहते हैं।" मनुष्यता प्राप्त करने के आन्दोलन में मनुस्मृति को सरेआम जलाने के पीछे भी शूद्रों और स्त्रियों के अधिकारों को जन्मना वंचित करती थी। कालाराम मन्दिर में प्रवेश का आन्दोलन भी आध्यात्मिक भूख शान्त करने अथवा मोक्ष व पुण्य की प्राप्ति के लिए नहीं था, बल्कि उसके मूल में भी मानवीय अधिकार पाने की भावना थी। 10 फरवरी 1933 को मंदिर-प्रवेश के संबंध में जारी प्रेस के लिए वक्तव्य में स्पष्ट किया कि ''हिन्दू धर्म को सामाजिक समता वाला धर्म बनाना है तो उसकी संहिता में मंदिर-प्रवेश संबंधी संशोधन करना पर्याप्त नहीं होगा। होना यह चाहिए कि उसमें से चातुर्वण्र्य के सिद्धांत को निकाल दिया जाए। वही जाति-प्रथा और अस्पृश्यता की जननी है। चातुर्वर्ण्य और जातिप्रथा दलित वर्गों के आत्मसम्मान के प्रतिकूल है। वे (दलित) अपने आप को तभी हिन्दू कह सकते हैं, जब चातुर्वर्ण्य और जातिप्रथा के सिद्धांत को तिलांजलि दे दी जाए और शास्त्रों से उसका बहिष्कार कर दिया जाए। इससे कम में दलित वर्ग संतुष्ट नहीं होंगे और मंदिरों में प्रवेश भी नहीं करेगे। मंदिर-प्रवेश को स्वीकार करना और उससे संतुष्ट हो जाना बुराई से समझौता कर लेना है और अपने मानवीय व्यक्तित्व की गरिमा को बेच डालना है" खोती व्यवस्था के खिलाफ आन्दोलन, श्रमिकों के लिए हड़ताल के अधिकार की वकालत के पीछे भी यही भावना थी, इसीलिए उन्होंने कहा था कि हड़ताल का अधिकार छीनना दास बनाना है।
हिन्दू धर्म को त्यागकर बौद्ध धर्म ग्रहण करने का आन्दोलन भी धार्मिक भावना, आध्यात्मिक शान्ति, व पूजा के लिए नहीं था, वह भी जन्म के आधार पर ज्ञान, संपति व सत्ता से वंचित करने की मान्यता के नकार से प्रेरित था। मानवाधिकारों में निजता व आस्था-विश्वास के अधिकार को सम्मिलित किया गया। अपनी मान्यता के आधार पर धर्म का चुनाव डा. आम्बेडकर ने मानवाधिकार का प्रयोग किया था।
सामाजिक अपमान को वे सबसे बड़ा अभिशाप मानते थे। आर्थिक प्रगति सामाजिक हैसियत पाने का औजार थी, इसीलिए वे आरक्षण चाहते थे, लेकिन वे आरक्षण के लिए अछूत बने रहने के हामी नहीं थे। राजकीय समाजवाद की कल्पना भी उनकी इसी सोच से उपजी थी कि राज्य ही वंचितों के अधिकारों व सुरक्षा को स्थापित कर सकता है। जिस दौर में विभिन्न देशों में समाजवादी व्यवस्थाएं व्यक्तिगत सम्पति को समाप्त करके सम्पति पर राज्य के अधिकार को स्थापित कर रही थी, उसी दौर में मानवाधिकारों में व्यक्तिगत सम्पति की रक्षा का भार राज्य को दिया। जिस पूंजीवादी व्यवस्था के पैरोकारों से बाबा साहब घिरे हुए थे वे उसमें व्यक्तिगत सम्पति के अधिकार को अनदेखा नहीं कर सकते थे, लेकिन आम्बेडकर की राजकीय समाजवाद की पुरजोर वकालत के पीछे उनकी इस संबंध में मंशा-भावना को समझा जा सकता है। परम्परागत तौर पर वर्ण-धर्म की कठोर-व्यवस्था के तहत दलितों को संपति विहीन कर दिया गया था, जिसकारण संपति के नाम पर दलितों के पास ठन-ठन गोपाल ही था।
यहां भी डा. आम्बेडकर और गांधी में मूलभूत अन्तर है गांधी संपतिशाहों के संरक्षण में श्रमिकों को रहने की सलाह देते थे तो आम्बेडकर राज्य द्वारा संपति का अधिग्रहण। यूं तो प्राचीन भारत के राजनीतिज्ञ कौटिल्य ने भी प्रजा के जीवन, संपति और सुरक्षा को राजा का कत्र्तव्य माना है, लेकिन यहां प्रजा का मतलब वर्ण-धर्म में विभाजित प्रजा है, जिसमें शूद्रों-स्त्रियों के पास तो संपति थी ही नहीं। निश्चित तौर पर यह संपतिशाली वर्गों के हितों की रक्षा की ही बात है। डा. आम्बेडकर शोषणकारी को समस्त मानवाधिकारों को लीलने वाली कहा है, उन्होंने लिखा कि ''कार्य करने की स्वतन्त्रता केवल वहीं पर होती है, जहां शोषण का समूल नाश कर दिया गया है, जहां एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग पर अत्याचार नहीं किया जाता, जहां बेरोजगारी नहीं है, जहां गरीबी नहीं है, जहां किसी व्यक्ति को अपने धंधे के हाथ से निकल जाने का भय नही है, अपने कार्यों के परिणामस्वरूप जहां व्यक्ति अपने धंधे की हानि तथा रोजी-रोटी की हानि के भय से मुक्त है।"
धर्म, जाति, नस्ल, भाषा, रंग, शिक्षा व संपति के आधार पर भेदभाव बिना कानून के समक्ष सभी मनुष्यों की बराबरी के सिद्धांत को मानवाधिकारों में जगह दी गई, जिससे परम्परागत तौर पर वंचितों-उत्पीडि़तों के संघर्षों के लिए नई आशा का संचार हुआ। डा. आम्बेडकर के चिंतन व आन्दोलनों की यह मूल भावना थी। दूसरी गोलमेज कांफ्रेस में 'फेडरल स्ट्रक्चर कमेटी' के सदस्य के तौर पर भारत के संविधान के प्रारूप पर विमर्श के दौरान उन्होंने व्यस्क मताधिकार का सवाल उठाते हुए कहा कि ''मत के अधिकार का अर्थ है अपनी जिन्दगी, सम्पति और आजादी की रक्षा करने का अधिकार। युवावस्था में कदम रखने वाले नागरिक को संपति, शिक्षा या अन्य किसी भी कारण से मत के अधिकार से वंचित करना उचित नहीं है। अनपढ़ होते हुए भी व्यक्ति बु।िमान होता है वह अपनी भलाई को अच्छी तरहसमझता है। गरीबी के कारण किसी को राज्य-प्रतिनिधि के रूप में चुनने से वंचित रह जाना अन्याय है। लोग अपने अनुभव से सीखते हैं। इसी आधार पर ही स्वतंत्र व जनता की पक्षधर सरकार का निर्णय होता है। उन्होंने कहा कि 'कुछ चुनिंदा लोगों को मत का अधिकार देना बहुसंख्यकों का भविष्य अल्पसंख्यकों के हाथ में सौंपना है' ।"
बाबा साहब का आन्दोलन सरकारी और साम्राज्यवादी पूंजी पर पलने वाले आज के अधिकांश एन.जी.ओ. की तरह बहस-चर्चाएं करना नहीं था, बल्कि मानवाधिकारों को प्राप्त करने के लिए लोगों को संगठित करना तथा उनके लिए संघर्ष करने तक जाता था। बाबा साहब उत्पीडि़तों की राजनीतिक लामबंदी के जरिये शासकीय भेदभाव व क्रूरताओं को ही नहीं, बल्कि सामाजिक भेदभाव की संरचनाओं को भी उखाड़ फेंकना चाहते थे। इसी मायने में उनका मुक्तिकामी आन्दोलन महात्मा गांधी के आन्दोलन संरक्षणवादी आन्दोलन से मूलत: भिन्न था, महात्मा गांधी की दीन व विनम्र मुद्रा में उत्पीड़क व वर्चस्वी वर्गों से करुणा व दया की अपील तो है, लेकिन उनकी दलित वर्गो में बराबरी हासिल करने वाली परिवर्तनकारी चेतना नहीं।
बाबा साहब आम्बेडकर का आक्रोश और तिक्तता का मूल किसी व्यक्तिगत रंजिश अथवा बदले की भावना में नहीं था, बल्कि उत्पीडऩकारी बौद्धिक व सामाजिक संरचनाओं के आमूल-चूल परिवर्तन के संकल्प में था। आम्बेडकर चिन्तन-दर्शन व आन्दोलन की सम्पूर्ण चेतना में स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के आदर्श व मूल्य थे। धर्म, जाति, नस्ल, भाषा, रंग के आधार पर संकीर्ण पहचान व विभाजन के नकार को मानवाधिकारों ने आधिकारिक मान्यता दी।

बुल्लेशाह

बुल्लेशाह
सुभाष चन्द्र, एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र

पंजाब विभिन्न संस्कृतियों, नस्लों, परम्पराओं और धर्मों के समन्वय का केन्द्र बिन्दु रहा है। यहां लगभग 4000 साल पहले सिन्धु घाटी की सभ्यता पली थी। उसके बाद यहां मध्य एशिया से आर्य आए, इसके बाद सीथियन, हूण, ग्रीक, तुर्क, फारसी, अफगान, मुगल आए। सभी ने भारत की साझी संस्कृति को समृद्घ किया।
बुल्लेशाह 16वीं शती में, कसूर में हुए। इनका असली नाम अब्दुल्ला शाह था, ये बुल्लेशाह के नाम से प्रसिद्घ हुए। पंजाब के सभी लोगों को चाहे वे किसी भी धर्म या जाति से संबंधित हों, बुल्लेशाह पर नाज है। बुल्लेशाह के गीतों को पंजाब के सभी लोग गाते हैं। उनकी कविताओं ने हिन्दू मुसलमान में समन्वय स्थापित किया। बुल्लेशाह की कविताएं सभी धर्मों की सीमाओं को लांघकर आम लोगों तक अपनी पहुंच बनाने में सक्षम हैं। बुल्लेशाह किसी एक धर्म से नहीं बंधे, उन्होंने सभी धर्मों और मतों पंथों से परम्पराओं और विचारों को ग्रहण किया। बुल्ले शाह की कविताओं में नाथपंथ और वैष्णव पंथ का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। बुल्लेशाह ने कर्मकाण्ड को महत्त्व नहीं दिया।
इश्क दी नवियों नवीं बहार,
फूक मुसल्ल भन सिट लोटा,
न फड़ तस्बी कासा सोटा,
आलिम कहन्दा दे दो होका,
तर्क हलालों खह मुर्दार।
इश्क तो हमेशा नया होता है, आसन फूको, लोटा फेंक के तोड़ दो, जपमाला, प्याला, और दंड न पकड़ो, ऊंची आवाज में विद्वान सत को छोड़कर असत को अपनाने की बात कहता है। जिन वस्तुओं का यहां जिक्र किया है, वे सभी पूजा-उपासना से संबंधित हैं।

उमर गवाई विच मसीती,
अन्दर भरिया नाल पलीती,
कदे नमाज़ वाहदत ना कीती,
हूण कियों करना ऐं धाड़ो धाड़।
तूने मस्जिद में उम्र गंवा दी, तेरी आत्मा मैली है, प्रभु से जुडऩे के लिए कभी नमाज़ नहीं पढी, अब तू क्यों रोता है।

जां मैं सबक इश्क दा पढिय़ा,
मस्जिद कोलों जिवड़ा डरिया,
भज भज ठाकर द्वारे वडिय़ा,
घर विच पाया माहरम यार।
जब मैने प्रेम का पाठ पढ़ा, मस्जिद से आत्मा को डर लगा, मन्दिर में भागा गया, प्रीतम को अपने ही घर पाया

जा मैं रमज़ इश्क दा पाई,
मैं नां तूती मार गवाई,
अन्दर बाहर हुई फाई,
जित वल वेखां यारो यार।
जब प्रेम का रहस्य जाना, मैं-मैं, तू-तू को मार दिया, भीतर-बाहर की सफाई हो गई, सब तरफ प्रभु ही पाया।

वेद कुराना पढ़-पढ़ थक्के,
सिज्दे कर दियां घस गए मथ्थे,
न रब्ब तीरथ न रब्ब मक्के,
जिन पाया तिन नूर अँवार।
वेद-पुराण पढ़-पढ़ कर थक गए, प्रार्थनाएं करके सिर भी घिस गए, ईश्वर न तीर्थ में मिला और न ही मक्के में, उसे पाने वाले में तेज और सौन्दर्य आया
इश्क भुलाया सिज्दे तेरा,
हूण कियों आईवें ऐवैं पावें झेड़ा,
बुल्ला हो रहो चुप चुपेरा,
चुक्की सगली कूक पुकार।
तेरे प्रेम ने प्रार्थना भुला दी, अब झगड़ा क्यों करता है? बुल्ला चुप होकर कह रहा है, सारी हाहाकार शान्त हो गई है

बुल्लेशाह किसी धर्म की सीमा में नहीं बंधे वे अपने को न तो हिन्दू मानते थे और न ही मुसलमान मानते थे। वे हिन्दू और मुस्लिम धर्म की संकीर्णताओं से अलग हटकर मानवतावादी धर्म की ओर बढ़ रहे थे। इसलिए दोनों धर्मो की संकीर्ण पहचान को मिटाने की कोशिश कर रहे थे और दोनों की कट्टरता को नकार रहे थे।
मस्जिद ढा दे, मंदिर ढा दे,
ढा दे जो कुछ ढैंदा,
पर किसी दा दिल ना ढाइं ,
रब्ब दिलां विच रैंदा।
इस तरह कहा जा सकता है कि हिन्दू और मुसलमानों में एक दूसरे के धर्म को समझने की ललक थी। एक दूसरे के धर्म का आदर करते थे, जिसका परिणाम यह निकला कि दोनों की मान्यताओं और विश्वासों को मिलाकर कुछ और ही बन गया।
मेरी बुक्कल दे विच चोर,
साधो किसनूं कूक सुणावां,
मेरी बुक्कल दे विच चोर।
किते रामदास किते फतेह मुहम्मद
इहो कदीमी शोर,
मुसलमान सिवें तो चिढ़दे,
हिन्दू चिढ़दे गोर,
चुक गए सभ झगड़े झेड़े,
निकल गया कोई होर,
साधे किसनूं कूक सुणावां,
मेरी बुक्कल दे विच चोर।
मेरी बगल में चोर है, साधो किसको बताऊं, मेरी बगल में चोर है। कहीं वह राम दास है, कहीं $फतेह मुहम्मद है, युगों युगों से यही शोर सुनाई दे रहा है। मुसलमान शव-दहन से चिढते हैं, हिन्दू शव दफनाने से। अब सारे झगड़ खत्म हो गए हैं, कोई और ही निकल गया है। हे साधो, किसे बताऊं कि मेरी बगल में चोर है।
पुराना शोर मिट गया, झगड़ा मिट गया और कुछ नया पैदा हो गया है। बुल्लेशाह ने जिस 'कुछ नए' की ओर संकेत किया है वह मिली जुली संस्कृति और मानवता है। बुल्लेशाह की रचनाओं में और अन्य सूफी-संतों की रचनाओं में यह संस्कृति साफ दिखाई देती है।
बुल्ले शाह धार्मिक कट्टरता के खिलाफ थे। सूफी सदा से ही उदारता के पक्षधर रहे और उनको इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी थी। कट्टर इस्लामियों ने सूफियों को शहीद किया। अपने स्वतंत्र विचारों के कारण मंसूर को सूली पर टांग दिया था। बुल्ले शाह ने उदारता की परम्परा को आगे बढ़ाया। उन्होंने अपनी रचनाओं में बार-बार मंसूर, शम्स, जकरिया का नाम लिया है।
शाह शमस दी खाल लहायो,
मंसूर नूं च सूली दिवायो
जक्रीए सिर कल्क्तर धरायो,
कि लिख्या रह गया बाकी दा?

बेली जित घर तेरा फेर होया,
उह जल बल माटी ढेर होया,
तन राख उड़ी तां सेर होया,
इश्क़ा मैंथे आया हैं,
तूं आया हैं मैं पाया हैं।
ओ मित्र, जिस घर में तू घुसता है, उसको भस्म कर देता है, राख उड़ाकर तू संतुष्ट हुआ। अरे महबूब, तू मेरे नजदीक आया है, तू आया है, मैंने तुझे पाया है।

जकड़ीए सिर कल्वतर दित्तोई।
जुसब हतोहत विकियोई,
इब्राहिम छिखा विच पाइओई,
औ मैनूं किया लै आया है।
जकरिया का सिर काटा था, जोस$फ को हाट में बेचा था, इब्राहिम को चिता की आग में तूने ही $फेका था, अब मेरे लिए क्या लाया है

इकनां दे पोश लहाई दे,
इक आरिया नाल छिवाई दे,
इक सूली चाए दिवाई दे,
कर किस गल दा सघराइया हैं।
कुछ की खालों को छीला था, कुछ को आरों से चीरा था, कुछ को सूली पे चढ़ाया था, अब मेरे लिए क्या है

बुल्लेशाह ने हिन्दुओं में पूज्य माने जाने वाले श्रीकृष्ण को केन्द्रित करके रचनाएं की। कृष्ण की बांसुरी की बहुत तारीफ की। उन्होंने श्रीकृष्ण को प्रेम का देवता बताया।
बंसी वालिया चाका रांझा,
तेरा सुर है सब नाल सांझा
तेरीयां मौजंा साढा मांझा,
साढी सुर तैं आप मिलाई
बंसी काह्न अचरज बजाई

बंसी सब को सुणे सुणावे,
अरथ इसका कोई बिरला पावे
जो कोई अनहद की सुर पावे,
सो इस बंसी का सैदाई
बंसी काह्न अचरज बजाई
राधा और कृष्ण को माध्यम बनाकर मानवता का संदेश दिया। उन्होंने शैव मत के प्रतीकों का भी प्रयोग किया। इनकी रचनाओं में वैष्णव, शैव, नाथ पंथ तथा इस्लाम की विभिन्न मान्यताओं का समन्वय हुआ। बुल्लेशाह की रचनाएं तत्कालीन समाज में पनपी साझी संस्कृति को व्यक्त करती हैं, ये प्रसिद्घ भी इसीलिए हुर्इं और लोगों की जुबान पर चढऩे का कारण भी यही था कि ये रचनाएं लोगों की बात कह रही थीं।


रसखान

रसखान
सुभाष चन्द्र, एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र

रसखान 16वीं शती के हिन्दी भाषा के प्रमुख कवि थे। इनका बचपन का नाम इब्राहिम खान था। ये वर्तमान उतरप्रदेश के हरदोई जिले के पिहानी गांव में पठान परिवार में पैदा हुए। रसखान ने कृष्ण भक्ति से संबंधित कविताएं लिखीं। इनकी 'प्रेम वाटिका' और 'सुजान रसखान' रचनाएं प्रसिद्घ हैं। वे कृष्ण भक्त कैसे बने इसके बारे में कई तरह की कथाएं प्रचलित हैं। लेकिन चाहे जिस भी कारण से वह कृष्ण भक्ति शाखा में आए हों, लेकिन वे इस सम्प्रदाय में अच्छी तरह रच बस गए। कृष्ण भक्ति कवियों में उनका नाम आदर से लिया जाता है। रसखान ने एक मुस्लिम परिवार में जन्म लेकर हिन्दुओं के परम पूजनीय देवता की भक्ति की। वे हिन्दू और मुसलमानों को जोडने वाली कड़ी बने।
रसखान ने अपनी कविताओं में कृष्ण की बाल लीलाओं का, गौ चारण लीलाओं का, कुंज लीलाओं का, रास लीलाओं का, पनघट लीलाओं का और कृष्ण की मुरली का वर्णन किया है। वे श्रीकृष्ण की भक्ति में इतने लीन थे और उनके व्यक्तित्व से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने इच्छा व्यक्त की कि यदि उन्हें अगला जन्म मिले तो ब्रज में ही पैदा हों और कृष्ण के ही भक्त बनें। यदि पशु की योनि में जन्म मिले तो वे नन्द की गायों में ही चरें। यदि पत्थर बनूं तो उसी पहाड़ पर जाऊं, जिसे श्रीकृष्ण ने धारण किया है, यदि पक्षी बनूं तो यमुना के किनारे बसेरा करूं।
मानुष हौं तो वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गांव के ग्वारन।
जो पसु हौं तो कहा बस मेरो चरौं नित नन्द की धेनु मंझारन।।
पाहन हौं तो वही गिरि को जो धर्यौ कर छत्र पुरन्दर-धारन।
जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदी-कूल कदंब की डारन।।

वा लकुटी अरु कामरिया पर राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
आठहु सिधि नवै निधि को सुख नंद की गाइ चराइ बिसारौं।
ए रसखानि जबै इन नैनन तैं ब्रज के बन-बाग निहारौं।
कोटिकहुं कलधौत के धाम करील की कुंजन ऊपर बारौं।।
रसखान वृदांवन की एक- एक चीज से प्यार करते थे। वे वहां के फूल, पत्ते, पेड़ पौधे आदि प्रकृति की सभी चीजों से प्रेम करते थे। वे श्रीकृष्ण की लाठी और कम्बली पर स्वर्ग को न्यौछावर कर सकते हैं, नंद की गाय चराने का सुख प्राप्त करने के लिए आठों सिद्धि और नवों निधियों को न्यौछावर कर सकते हैं। ब्रज के बाग-बगीचों के दर्शन के लिए करोड़ों स्वर्गों को न्योछावर कर सकते हैं। इस तरह की दृढ़ आस्था व विश्वास वही मनुष्य कर सकता है, जो उसे पूर्णत: उसके रंग में रच बस गया हो।
रसखान ने ब्रजभाषा में बहुत सी रचनाएं लिखी। प्रेम-वाटिका इनकी प्रसिद्घ रचना है। इनमें 53 पद हैं। ये पद अधिकतर आध्यात्मिक प्रेम से संबंधित हैं, कृष्ण और राधा के पे्रम को परमात्मा के प्रेम का प्रतीक माना है।
रसखान को कृष्ण पर इतना विश्वास है कि वे उसको सब संकटों को टालने वाला मानते हैं। उनकी भक्ति में अटूट आस्था है, उनका मानना है कि विपति के समय विष्णु भगवान अपने भक्तों की मदद करते हैं, और श्रीकृष्ण उसी के अवतार हैं अत: किसी प्रकार की चिन्ता करने की कोई बात नहीं है। जैसे द्रौपदी की लाज रखी और अपने अन्य भक्तों को संकट के समय मदद की, उसी तरह हमारी भी मदद करेंगे।
द्रौपदी और गनिका गज गीध अजामिल सों कियो सो न निहारो।
गौतम गोहिनी कैसी तरी प्रहलाद को कैसे हर्यो दुख भारो।।
काहे कौं सोच करै रसखानि कहा करिहैं रविनंद विचारो।
ता खन जा खन राखिए माखन चाखन हारो सो राखनहारो।।
रीति-रिवाज व त्योहार लोक संस्कृति में ऐसे रच बस गए थे, कि यह पहचान करना मुश्किल था कि कौन सा त्यौहार हिन्दुओं का है और कौन सा मुसलमानों का। रसखान ने होली का बड़ा ही मोहक वर्णन किया है। बंसत का बहुत ही सुंदर वर्णन किया है। हिन्दुओं में ही नहीं दिवाली मुसलमानों में भी उतने ही चाव से मनाई जाती थी। ये हिन्दू और मुसलमान दोनों के साझे त्योहार हो गए थे। रसखान ने दिवाली का जैसा वर्णन किया है नफरत करने वाला व्यक्ति वैसा वर्णन नहीं कर सकता। इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि हिन्दू और मुसलमान एक दूसरे से लड़ते झगड़ते नहीं थे बल्कि एक दूसरे से घुलमिल कर रहते थे।
वृषभानु के गेह दिवारी के द्यौस अहीर अहीरिनी भोर भई
जित ही तितही धुनि गोधन की सब ही कुज ह्वै रह्यौ राग मई।
मानव-जीवन के विकास में नदियों का महत्त्वपूर्ण योगदान है। नदियों के प्रति आदर एवं पूजा-भाव इसकी महत्ता का ही परिणाम है। हिन्दू गंगा नदी को पवित्र एवं पूजनीय मानते हैं। रसखान ने गंगा की महिमा का बहुत सुन्दर शब्दों में वर्णन किया है:-
एरी सुधामई भागीरथी नित पथ्य-अपथ्य बने तोहिं पोसें।
आक धूतरौ चबात फिरै, विष खात फिरै सिव तेरे भरोसें।।
''रसखान ने पंरपरा का निर्वाह करते हुए हरिशंकरी, शिव की स्तुति और गंगा-गरिमा का भी एक-एक सवैये में जो वर्णन किया है उसमें मात्र पंरपरा का निर्वाह ही नहीं, वर्णन की स्वछन्दता, वाणी की मधुरिमा और भक्त-हृदय की मिठास है"1
सामन्ती बंधनों को तोडऩे के लिए रचनाकारों ने प्रेम का सहारा लिया। प्रेम के संबंधें में बराबरी की कल्पना मौजूद है। रसखान ने प्रेम का वर्णन किया है
बिनु गुन जोबन रूप धन, बिन स्वारथ हित जानि।
सुध, कामना तें रहित, प्रेम सकल रसखानि।।
प्रेम हरी को रूप है, त्यौं हरि प्रेम-सरूप।
एक होइ द्वै यों लसै, ज्यौं सूरज औ धूप।।

दंपति-सुख अरू बिषय-रस, पूजा निष्ठा ध्यान।
इन तें परे बखानियै, सुद्ध प्रेम रसखानि।।
प्रेम सब धर्मों से ऊपर, परम धर्म है। कोई धर्म उसकी समता नहीं कर सकता। ज्ञान, कर्म और उपासना - सभी के मूल में अहंकार है। अनुकूल प्रेम के बिना निश्चयात्मक बुद्धि का उदय नहीं होता। शास्त्र का पठन-पाठन भले ही पंडित बना दे, कुरान का पाठ मौलवी बना दे, परन्तु प्रेम से परिचित हुए बिना सब व्यर्थ है।
''रसखान जिस रसखानि यानी श्रीकृष्ण पर रीझे थे, उसकी लीलाओं का गान करते समय उनके बोल, बुद्धि की ऊंचाई से नहीं, हृदय की गहराई से उभरे थे और भारतीय कृष्ण काव्य की इस महती देन को प्रस्तुत करने में जिन भक्त कवियों का योगदान रहा, उनमें रसखान का नाम आदर के साथ लिया जाता है।
स्वछन्द काव्य-धारा के कवियों की एक उल्लेखनीय विशेषता यह भी रही है कि वे 'लीक' को छोड़कर अपना मार्ग अपने ढंग से बनाते हैं। रस में उन्मुक्त हुए, फक्कड़पन और भावुकता के साथ इस 'तलवार की धार' वाली डगर पर चले हैं बिना डगमगाये, बिना समर्पण भाव के साथ। रसखान इसी तरह के प्रेम-पथिक हैं और आगे आने वाले स्वछन्द कवियों के लिए उन्होंने दिशा निर्देशक का काम किया है।2
रसखान को कृष्ण भक्ति के कवियों में उच्च कोटि का कवि माना जाता है। उन्होंने कृष्ण भक्ति के प्रति जो निष्ठा दिखाई वह किसी भी कृष्ण भक्ति के कवि से कम नहीं है। मुसलमान होने के बावजूद श्रीकृष्ण को केन्द्रित करके ब्रज भाषा में कविताएं करना इस बात का सूचक है कि मध्यकाल के लोग एक दूसरे के धार्मिक विश्वासों का बहुत आदर करते थे। उनके मन में एक दूसरे के प्रति कोई आशंका नहीं थी। वे एक दूसरे की संस्कृति को जानने के इच्छुक थे।

संदर्भ:
1-श्याम सुन्दर व्यास; रसखान; साहित्य अकादमी; दिल्ली; 1998; पृ. 22
2-वही, पृ. 38

रहीम

रहीम
सुबहश चन्द्र, एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र

प्रख्यात कवि अब्दुर्रहीम खाननखाना यानी रहीम अकबर के मन्त्री और सेनापति थे। ये अकबर के नवरत्नों में थे। मुगल बादशाह ''हुमायूं ने हिन्दुस्तान के जमींदारों से सम्बन्ध बनाने के लिए उनकी पुत्रियों से विवाह किया। हुसैन खां मेवाती का चचेरा भाई जमाल खां हुमायूं के पास आया। उसकी बड़ी पुत्री का विवाह हुमायूं से और छोटी का बैरम खां से कर दिया। इसी मेव कन्या से 17 दिसम्बर, 1556 को लाहौर में अब्दुर्रहीम का जन्म हुआ।"1 रहीम के पिता बैरम खां मुगल बादशाह हुमायूं के विश्वास पात्र थे, उन्होंने बैरम खां को अकबर का संरक्षक बना दिया था। रहीम के जन्म के चार वर्ष बाद ही उनके पिता को गुजरात में एक पठान ने मार डाला। अकबर ने रहीम का पालन-पोषण व शिक्षा का उचित प्रबन्ध किया। अकबर ने अपनी धाय माहम अनगा की बेटी महाबानू से रहीम का विवाह करा दिया।
रहीम बहादुर योद्घा थे। अपने रण-कौशल, सूझ-बूझ, शौर्य और पराक्रम का परिचय देकर शत्रु सेना पर विजय प्राप्त की। गुजरात विजय की खुशी में अकबर ने इन्हें पांच हजारी मनसब और खाननखाना की उपाधि प्रदान की। रहीम ने भी गुजरात विजय पर अपने मित्रों, सम्बधियों, सेवकों को उपहार भेंटस्वरूप प्रदान किए। मुगल शासन की सर्वोच्च उपाधि 'वकील' भी इन्हें प्राप्त हुई। टोडरमल के बाद यह उपाधि रहीम को ही मिली थी।
रहीम का जीवन संघर्षपूर्ण रहा। ''रहीम ने अपने जीवन में कभी सुख-संतोष की सांस नहीं ली। किशोरावस्था से वृद्घावस्था तक युद्घ और राजनीतिक संघर्षों से उन्हें जूझना पड़ा। पारिवारिक दृष्टि से भी वे कभी सुखी नहीं रहे। पत्नी, चारों पुत्र और दामाद की मृत्यु का शोक उनके साथ बना रहा। जवान बेटों को खोकर रणभूमि में अडिग भाव से खड़े रहे, यह कम आश्चर्य की बात नहीं है। रहीम ने अपने पुत्र का कटा सिर अपनी आंखों से देखा, अपने पौत्रों का वध देखा और निर्मम हत्याओं का भीषण हाहाकार। रहीम ने अपने जीवन में ऐश्वर्य का भोग नहीं किया। धन-ऐश्वर्य उनके पास आता-जाता रहा, किन्तु विलास की ओर उनका ध्यान नहीं गया। अपने जीवन के अन्तिम दिनों में वे लाहौर में थे किन्तु उनकी इच्छा दिल्ली में ही प्राण छोड़ऩे की थी। लाहौर से बीमारी की हालत में ही दिल्ली पहुंचे और सन् 1627 ई. के अप्रैल मास में उनका प्राणांत हो गया। मरण के समय उनकी आयु साढ़े इकहतर वर्ष की थी। दिल्ली में हुमांयू के मकबरे के समीप उन्होंने अपनी बीवी का मकबरा बनवाया था, उसी मकबरे में इन्हें भी दफनाया गया। आज भी यह मकबरा खड़ा है और एक सच्चे भारत सपूत के पार्थिव शरीर को अपने आंचल में दबाये उसकी याद को ताजा कर रहा है। इस मकबरे में उस महान विभूति का पार्थिव शरीर दबा हुआ है जो अपने उदात्त चरित्र, अद्भुत प्रतिभा, धार्मिक सहिष्णुता और साहित्यिक संवेदना के कारण सदैव स्मरण किया जाता रहेगा।"2
अकबर स्वयं हिन्दुस्तान की मिली-जुली संस्कृति के निर्माताओं में थे। रहीम पर इसकी गहरी छाप थी। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' ने 'संस्कृति के चार अध्याय' पुस्तक में लिखा कि ''अकबर के दीन-ए-इलाही में हिन्दुत्व को जो स्थान दिया होगा, रहीम ने कविताओं में उसे उससे भी बड़ा स्थान दिया। प्रत्युत् यह समझना अधिक उपयुक्त है कि रहीम ऐसे मुसलमान हुए हैं जो धर्म से मुसलमान और संस्कृति से शुद्घ भारतीय थे।"3 रहीम के व्यक्तित्व को किसी धर्म, जाति या स्थान तक सीमित नहीं किया जा सकता, ''जन्म से तुर्क, मजहब से मुसलमान और नागरिकता से भारतीय होने पर भी रहीम इन संकीर्ण सीमाओं में बंधे न होकर एक सच्चे मानव का प्रतिरूप थे। जाति, धर्म और देश की सीमाओं का उन्होंने अपनी काव्यात्मक रचनाओं में जिस उदात्त शैली से अतिक्रमण किया है वह संस्कृति-पुरुष का आदर्श है।"4
रहीम ने अपने व्यस्त व उलझन भरे जीवन के बावजूद बहुत महत्त्वपूर्ण साहित्यिक रचनाओं का सृजन किया। उनकी प्रमुख रचनाओं में 'दोहावली', 'नगर शोभा', 'बरवै नायिका भेद', 'बरवै', 'श्रृंगार सोरठ', 'मदनाष्टक', 'फुटकर पद', 'संस्कृत श्लोक', 'खेद कौतुकजातकम' व फारसी की दो रचनाएं 'वाकेआत बाबरी' तथा 'फारसी दीवान' हैं।
कहा तो जाता है कि रहीम ने 'सतसई' की रचना की थी, लेकिन कोई प्रामाणिक कृति उपलब्ध नहीं है। सम्पादकों ने उनके दोहों को संकलित किया उनमें 300 से कम दोहे ही मिलते हैं। सुरेन्द्रनाथ तिवारी ने 'रहीम कवितावली' में 254 दोहे; लक्ष्मीनिधि चतुर्वेदी ने 'रहिमन-नीति दोहावली' में 203 दोहे; रामनरेश त्रिपाठी ने 'रहीम' में 233 दोहे; अयोध्या प्रसाद ने 'रहीमन विनोद' में 268 दोहे; मायाशंकर याज्ञिक ने 'रहीम रत्नावली' में 270 दोहे; ब्रजरत्न दास व रामनारायण लाल ने 'रहिमन विलास' में 279 दोहे तथा विद्यानिवास मिश्र व गोविन्द रजनीश ने 'रहीम ग्रंथावली' में 300 दोहे संकलित किए हैं।
रहीम को कई भाषाओं में दक्षता हासिल थी। ये तुर्की, फारसी, अरबी, संस्कृत और हिन्दी का प्रयोग अपनी रचनाओं में बड़ी सफलता से करते थे। ''रहीम का काव्य प्रयोगधर्मी है। जिस प्रकार परम्परागत छन्दों के साथ नये छन्दों में काव्य रचना की ओर वे प्रवृत्त हुए; उसी प्रकार भाषा-वैविध्य को अपनाते हुए उन्होंने फारसी, खड़ी बोली, संस्कृत, अवधी, ब्रज के अतिरिक्त राजस्थानी और पंजाबी आदि का भी उन्होंने प्रयोग किया है। मिश्र भाषा में काव्य रचना का प्रयास अमीर खुसरो तथा शांर्गधर कर चुके थे। कुछ लोगों ने 'मदनाष्टक' की भाषा को रेख्ता माना है, जिसका प्रयोग उस समय दक्षिण में होने लगा था।"5
रहीम की हिन्दी के प्रसिद्घ कवि तुलसीदास से दोस्ती थी। जब तुलसीदास ने 'रामचरितमानस' की रचना की तो रहीम ने 'हिन्दुआन को वेद सम, तुरुकहिं प्रगट कुरान' कहकर उसकी प्रशंसा की और यह स्वीकार किया कि यह हिन्दुओं के लिए वेद है और मुसलमानों के लिए कुरान है।6 रहीम की रचना 'बरवै नायिका भेद' नायिका-भेद संबंधी ग्रंथों में सबसे प्राचीन है। अवधी भाषा में रचित रहीम के बरवों से ही तुलसीदास को 'बरवै रामायण' रचने की प्रेरणा मिली।
रहीम हिन्दी के कवियों से घिरे रहते थे और उनको इनाम देते थे। इनकी दानशीलता और उदारता मिथक और लोकाख्यान बन गई थी। हिन्दी के अधिकांश कवि उनके द्वारा पुरस्कृत हुए। इनमें हिन्दी के कवि - गंग को एक छन्द पर सर्वाधिक राशि 36 लाख रूपए प्राप्त हुई। हिन्दी-फारसी के कवियों ने रहीम की प्रशंसा की--केशव दास, गंग, मंडन, हरनाथ, अलाकुली खां, ताराकवि, मुकुन्द कवि, मुल्लामुहम्मद रजा 'नबी', मीर मुगीस माहवी हमदानी, युलकलि बेग, उरफी नजीरी, हयाते जिलानी के आदि नाम उल्लेखनीय हैं। रहीम दान देते समय आंख उठाकर ऊपर नहीं देखते थे। याचक के रूप में आए लोगों को बिना देखे वे दान देते थे। गंग कवि और रहीम के बीच इस सम्बन्ध में हुआ संवाद प्रसिद्घ है। गंग कवि ने रहीम से पूछा -
सीखे कहां नवाबजू, ऐसी दैनी देन
ज्यों-ज्यों कर ऊंचा करो त्यों-त्यों नीचे नैन।।
रहीम ने गंग कवि की बात का उत्तर बड़ी विनम्रतापूर्वक दिया-
देनदार कोऊ और है, भेजत सो दिन रैन।
लोग भरम हम पर करें, याते नीचे नैन।।
रहीम की कविताओं में हिन्दू देवता शिव, विष्णु और हिन्दुओं में पूज्य मानी जाने वाली नदी गंगा का श्रद्धा पूर्वक वर्णन किया है।
अच्युत-चरण-तरंगिणी, शिव-सिर-मालति-माल।
हरि न बनायो सुरसरी, कीजो इंदव-भाल।।
विष्णु भगवान के चरणों में प्रवाहित होने वाली और महादेव जी के मस्तक पर मालती माला के समान सुशाभित होने वाली हे गंगे, मुझे तारने के समय महादेव बनाना न कि विष्णु।
रहीम ने अपनी कविताओं में श्रीकृष्ण की भक्ति को विषय बनाया है। उन्होंने श्रीकृष्ण को पूरा काव्य अर्पित किया। उन्होंने जितनी सहजता के साथ श्रीकृष्ण के विरह के चित्र खींचे हैं । उससे उनकी श्रीकृष्ण के प्रति गहरी आस्था की झलक मिलती है। रहीम कहते हैं कि उसका मन चकोर की तरह है, जिसका ध्यान हमेशा अपने प्रेमी इष्ट चांद की ओर लगा रहता है। रहीम का कहना है कि उसका मन भी चकोर की तरह है जिसका ध्यान हमेशा अपने इष्ट देव श्रीकृष्ण की ओर की लगा रहता हैं
तैं रहीम मन आपुनो, कीन्हों चारु चकोर ।
निसि बासर लागो रहै, कृष्णचन्द्र की ओर ।।
श्रीकृष्ण की जीवन लीलाओं और उसके प्रेम की गहरी जानकारी थी इस का अनुमान उनके बारे में प्रसिद्घ इस कहानी से आसानी से लगाया जा सकता है। एक बार तानसेन ने अकबर के दरबार में एक पद गाया--
जसुदा बार बार यों भाखै।
है कोउ ब्रज में हितू, हमारो चलत गोपालहिं राखै।
अकबर ने अपने सभासदों से इसका अर्थ करने को कहा। तानसेन ने कहा कि यशोदा 'बार बार' का अर्थ पुन: पुन: यह पुकार लगाती है कि है कोई ऐसा हितू जो गोपाल को ब्रज में रोक ले। शेख फैजी ने अर्थ किया , 'बार बार' रो-रोकर यह रट लगाती है। बीरबल ने कहा कि 'बार बार' का अर्थ द्वार द्वार जाकर यशोदा प्रतिदिन यही रटती है। अन्त में अकबर ने खानखाना रहीम से पूछा । रहीम ने कहा कि तानसेन गायक हैं, इनको एक ही पद को अलापना रहता है, इसलिए इन्होंने 'बार बार' का अर्थ पुनरुक्ति किया। शेख फैजी फारसी के शायर हैं, इन्हें रोने के सिवा और क्या काम है। राजा बीरबल द्वार द्वार घूमने वाले ब्राह्मण हैं, इसलिए इनको बार बार का अर्थ द्वार ही उचित लगा। खाने आजम कोका ज्योतिषी हैं उन्हें तिथि-बार से ही वास्ता रहता है इसलिए उन्होंने'बार बार' का अर्थ दिन दिन किया। परन्तु वास्तविक अर्थ यह है कि यशोदा का बाल बाल यानि रोम रोम पुकारता है कि कोई तो मिले जो मेरे गोपाल को ब्रज में रोक ले।
इससे रहीम की साहित्यिक प्रतिभा का तो पता चलता ही है, इसका भी पता चलता है कि वे हिन्दुस्तानी रंग में कितने अधिक रंगे हुए थे। उनका श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम किसी कृष्ण भक्ति के कवि से कम नहीं है। रहीम के कृष्ण के प्रति गहरी अनुरक्ति से सहज ही ये अनुमान लगाया जा सकता है कि रहीम हिन्दू और मुस्लिम को जोडऩे वाली कड़ी हैं, इनका जीवन साम्प्रदायिक सद्भाव और एकता की मिसाल है।
रहीम की एक ज्योतिष संबंधी छोटी सी रचना है 'खेटक कौतुकम'। इसमें संस्कृत, फारसी और हिन्दी तीनों भाषाओं का मिश्रण है।
यदामुश्तरीकर्कटेवाकमाने,यदाचश्मखोराजमीवासमाने
तदा ज्योतिषी क्या कहै, क्या पढैगा? हुआ बालका पादशाही करैगा।
रहीम ने संस्कृत के श्लोक श्रीकृष्ण को, राम को ओर गंगा को संबोधित किये हैं। ये तीनों हिन्दुओं के परम आदरणीय हैं। रहीम ने इनका वर्णन करके हिन्दू-मुस्लिम एकता की नींव को मजबूत किया। कृष्ण को संबोधित श्लोक में तो रहीम अपने हृदय के गहन अंधकार में माखनचोर श्रीकृष्ण को छिप जाने का निमन्त्रण देते हैं। यह बड़ी सुरक्षित जगह है, यहां तुम्हें कोई नहीं पकड़ सकता।
नवनीतसारमपहृत्य शंकया स्वीकृतं यदि पलायनं त्वया।
मानसे मम घनान्धतामसे नन्दनन्दन कथे न लीयसे।।

''प्राचीन भारतीय साहित्य से ही सूक्ति की एक परम्परा चली आ रही है। वह सूक्ति जीवन के निरीक्षण और गहरी अनुभूति से जब उभरती है तो सटीक होती है और तब वह जनजीवन की स्मृति का ही नहीं, बल्कि उसकी मति का भी और उसकी प्रज्ञा का भी अंग बन जाती है। इन सूक्तियों को आदमी केवल याद ही नहीं रखता, उनको जीता भी है और उनसे प्रेरित होकर अपने कर्तव्य का निर्धारण भी करता है। रहीम की सूक्तियों की विशेषता यह है कि उनके सारे दृष्टांत या तो पुराणों से लिए गए हैं या फिर सामान्य जीवन से। दृष्टांतों के चयन में मौलिकता और उनकी निरीक्षण शक्ति का पता चलता है।"7
रहिमन धोखे भाव से, मुख से निकसे राम ।
पावत पूरन परम गति, कामादिक को धाम।।
रहीम ने अपनी रचनाओं में हिन्दू देवी देवताओं तथा उन चीजों का बहुत अधिक प्रयोग किया जिनको हिन्दू धर्म में आदर से देखा जाता है। इसी से अनुमान लगाया जा सकता हे कि उस समय हिन्दू और मुसलमान आपस में कितने गहरे से जुड़े हुए थे। एक दूसरे के विश्वासों को जानना समझना चाहते थे।
भज मन राम सियापति, रघुकूल ईस।
दीन बंधु दुख टारन, कौसलधीस ।।
रहीम के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है कि ''रहीम ने अपने उदार और ऊंचे हृदय को संसार के वास्तविक व्यवहारों के बीच रखकर जो संवेदना प्राप्त की है उसकी व्यंजना अपने काव्य में की है। तुलसी के वचनों के समान रहीम के वचन भी हिन्दी-भाषी भू-भाग में सर्वसाधरण के मुंह पर रहते हैं। इसका कारण है जीवन की परिस्थितियों का मार्मिक अनुभव। रहीम के दोहे वृन्द और गिरधर के पद्यों के समान नीति पद्य नहीं हैं। उनमें मार्मिकता है, उनके भीतर एक सच्चा हृदय झांक रहा है। जीवन की सच्ची परिस्थितियों के मार्मिक रूप को ग्रहण करने की क्षमता जिस कवि में होगी, वही जनता का प्यारा होगा। रहीम का हृदय द्रवीभूत होने के लिए कल्पना की उड़ान की अपेक्षा नहीं रखता। वह संसार के सच्चे और प्रत्यक्ष व्यवहारों में ही अपने द्रवीभूत होने के लिए पर्याप्त स्वरूप पा जाता था"।8
अपने जीवन में रहीम ने बहादुरी से युद्घ किए, कितनी ही उल्लेखनीय विजयें प्राप्त कीं। युद्घों की योजना, रणनीतिक व्यूहरचना में पारंगत थे। लेकिन गौर करने की बात है कि उनकी कविता में न तो युद्घों को महिमामंडित किया गया है और न ही युद्घों का वर्णन है। जीवन में तो युद्घों ने कभी पीछा नहीं छोड़ा , लेकिन उनकी कविता से लगभग गायब हैं। प्रेम, सद्भाव व जन-व्यवहार ही उनकी कविता की केन्द्रीय विषयवस्तु है। रहीम की कविताओं का प्रेम न तो रीतिकाल के कवियों की तरह वासना से परिपूर्ण है और न ही भक्तिकाल के कवियों की तरह उसमें पराभौतिक बिम्ब हैं।
लोक अनुभव उनके काव्य की पूंजी है। लोक-व्यवहार को उनके दोहे अपने में समेटे हुए हैं।
अब रहीम मुश्किल पड़ी, गाढ़े दोऊ काम।
साँचे से तो जग नहीं, झूठे मिले न राम।।

काज परै कछु और है, काज सरै कछु और।
रहिमन भँवरी के भए नदी सिरावत मौर।।

कहु रहिम संपति सगे, बनत बहुत बहु रीत।
बिपति कसौटी जे कसे, ते ही साँचे मीत।।

कहु रहीम कैसे निभै, बेर केर को संग।
वे डोलत रस आपने, उनके फाटत अंग।।

थोथे बादर क्वार, ज्यों रहीम घहरात।
धनी पुरुष निर्धन भये, करै पाछिली बात।।

कहि रहीम धन बढि़ घटे, जात धनिन की बात।
घटै बढ़ै उनको कहा, घास बेंचि जो खात।।

चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।
जिनको कछु न चाहिए, वे साहन के साह।।

जे गरीब पर हित करैं, ते रहीम बड़ लोग।
कहाँ सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग।।

दीन सबन को लखत है, दीनहिं लखै न कोय।
जो रहीम दीनहिं लखै, दीनबंधु सम होय।।

रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।
जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तलवारि।।

कैसे निबहैं निबल जन, करि सबलन सों गैर।
रहिमन बसि सागर बिषे, करत मगर सों वैर।।

जो रहीम ओछो बढै़, तौ अति ही इतराय।
प्यादे सों फरजी भयो, टेढ़ो टेढ़ो जाय।।

टूटे सुजन मनाइए, जौ टूटे सौ बार।
रहिमन फिरि फिरि पोहिए, टूटे मुक्ताहार।।

रहिमन राज सराहिए, ससिसम सुखद जो होय।
कहा बापुरो भानु है, तपै तरैयन खोय।।

संदर्भ:
1 विद्यानिवास मिश्र; रहीम ग्रंथावली; पृ.-28
2- विजेन्द्र स्नातक; रहीम; साहित्य अकादमी; दिल्ली; पृ. 20
3- विजेन्द्र स्नातक; रहीम; पृ. 11
4- विजेन्द्र स्नातक; रहीम; पृ. 7
5 रहीम ग्रंथावली; पृ.-64
6- रामधारी सिंह दिनकर; संस्कृति के चार अध्याय; पृ. 34
7 रहीम ग्रंथावली; पृ.-17
8- विजेन्द्र स्नातक; रहीम; पृ. 50


रैदास

रैदास
सुभाष चन्द्र, एसोसिएट प्रोफेसर , हिंदी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र

मध्यकालीन संतों और भक्तों के जन्म-मृत्यु व पारिवारिक जीवन के बारे में आमतौर पर मत विभिन्नताएं हैं। संत रविदास की कृतियों में उनके रैदास, रोहीदास, रायदास, रुईदास आदि अनेक नाम देखने को मिलते हैं। काव्य-ग्रन्थों में रैदास का तत्सम रूप रविदास प्रयुक्त हुआ है। संत रविदास के नाम के बारे में ही नहीं, बल्कि जन्म के बारे में भी कई अटकलें लगाई जाती हैं। ''रविदासी सम्प्रदाय में निम्नलिखित दोहा शताब्दियों से प्रचलित है -
चौदह सौ तैंतीस की माघ सुदी पंदरास।
दुखियों के कल्यान हित प्रगटे स्री रविदास।।
संत रविदास का जन्म बनारस छावनी के पश्चिम की ओर दो मील दूरी पर स्थित मांडूर गांव में हुआ, जिसका पुराना नाम मंडुवाडीह है। 'रैदास रामायण के अनुसार
काशी ढिग मांडूर स्थाना, शूद्र वरण करत गुजराना।
मांडूर नगर लीन अवतारा, रविदास शुभ नाम हमारा।।
रविदास के पिता का नाम राघव अथवा रघू तथा उनकी माता का नाम करमा देवी तथा पत्नी का नाम लोना था। रविदास ने अपनी वाणी में अपने पेशे व जाति के बारे में बार बार लिखा है। वे मृत पशु ढोने का कार्य करते थे।
मेरी जाति कुट बाढ़ला ढोर ढुवंता,
नितहि बंनारसी आसपासा।।
जाति ओछी पाती ओछी, ओछा जनम हमारा।

कहि 'रविदास' खलास चमारा।
जो हम सहरी सो मीत हमारा।।
रविदास-सम्प्रदाय के पक्षधर मानते हैं कि रविदास का निर्वाण चैत्र मास की चर्तुदशी को हुआ था। कुछ विद्वानों का विचार है कि उनकी मृत्यु सं. 1597 में हुई थी। यह तिथि 'भगवान रैदास की सत्यकथा' ग्रंथ में दी गई है। 'मीरा स्मृति ग्रंथ' में रैदास का निर्वाण-काल सं. 1576 दिया गया है। यह भी विश्वास किया जाता है कि उन्हें 130 वर्ष की दीर्घायु मिली थी।
अनन्तदास ने लिखा:-
पन्द्रह सौ चउ असी, भई चितौर महं भीर।
जर-जर देह कंचन भई, रवि रवि मिल्यौ सरीर।।
महापुरुषों के जीवन से संबधित चमत्कारिक घटनाएं समाज में प्रचलित हैं। जनश्रुतियों एवं किंवदंतियों के माध्यम से लोग अपने आदर्श पुरुष, महापुरुष एवं नायक के प्रति श्रद्घा व्यक्त करते हैं या अप्रिय के प्रति घृणा अथवा निन्दा व्यक्त करते हैं। किंवदंतियों की रचना व प्रसार निरुद्देश्य नहीं होता, बल्कि किसी विचार, मान्यता या मूल्य को लोगों में स्थापित करने के लिए होता है। किंवदंतियां चुपचाप अपना प्रभाव छोड़ती रहती हैं और एक समय के बाद सामान्य चेतना का अविभाज्य हिस्सा बनकर समाज की चेतना को स्वत: ही प्रभावित करती रहती हैं। वर्गों में विभक्त समाज में ये वर्चस्वी वर्ग के संस्कारों-विचारों के संवाहक का काम करने लगती हैं। इसलिए वर्गीय जरूरतों के साथ-साथ ये किंवदंतियां भी बदलती रहती हैं, इनमें जोड़-घटाव होता रहता है। कई बार तो किसी व्यक्ति के बारे में ऐसी किंवदंतियां प्रचलित हो जाती हैं जिससे उस व्यक्ति का मूलभूत विरोध रहा है। मध्यकालीन संतों के साथ भी कुछ इसी तरह का हुआ।
संत रविदास के बारे में ऐसी ऐसी जनश्रुतियां हैं कि यदि रविदास को वे सुना दी जातीं जो वे अपना सिर धुन लेते। संत रविदास का ब्राह्मणवाद से विरोध था। रविदास के प्रभाव को समाप्त करने के लिए उनके बारे में कई तरह की कहानियां व चमत्कार ठूंस दिए गए और कालान्तर में वही आम लोगों में इन संतों का परिचय करवाने लगे।
''गुरु रविदास जी के जीवन से संबंधित अनेक चमत्कारिक घटनाएं जनश्रुतियों के रूप में प्रचलित हैं। उनमें भगवान का स्वयं साधु रूप में आकर इन्हें पारसमणि प्रदान करने पर अस्वीकार करना, भगवान के सिंहासन के नीचे से सोने की पांच मोहरों का नित्य प्राप्त होना, गंगा का हाथ निकालकर ब्राह्मण से रविदास की भेंट स्वीकार करके बदले में रत्न जडि़त सोने का कंगन प्रदान करना, राजा की सभा में ब्राह्मणों का विवाद में पराजित होना, जल में शालिग्राम की मूर्ति तिराना तथा सिंहासन से मूर्ति का रविदास जी की गोद में आ बैठना, भोज में अनेक रूप धारण कर प्रत्येक ब्राह्मण के मध्य एक एक रविदास का विराजमान होना आदि सर्वाधिक प्रचलित हैं। इन अनुश्रुतियों में गुरु रविदास जी की भक्ति, संतभाव, सिद्घत्व तथा अनुपम ख्याति की छाया स्पष्टत: प्रतिबिम्बित हुई है।"
संत रविदास के प्रभाव को समाप्त करने के लिए ही उनके साथ इस तरह की कथाएं रची गई हैं। उनके साथ चमत्कार जोड़कर उनको एक सनातनी पंडित की तरह पूजा करता दिखाया गया है। इस सारी कवायद में रविदास में से असली रविदास निकाल कर उसकी जगह एक मनघडंत रविदास लोगों के दिमागों में प्रतिष्ठित कर दिया जाता है जो वही सिद्घांत लिए हैं जिनके खिलाफ रविदास ने ललकार दी थी। यह भी सच है कि वे अपने मकसद में कामयाब भी हुए हैं।

धर्म और साम्प्रदायिकता
रविदास ने स्पष्ट तौर पर कहा कि राम और रहीम, कृष्ण और करीम, ईश्वर और खुदा में कोई अन्तर नहीं है। ये सब एक ही हैं। ये मन में ही बसते हैं, इनको प्राप्त करने के लिए घर त्यागने की जरूरत नहीं है। रविदास के लिए ईश्वर की प्राप्ति किसी कर्मकाण्ड का हिस्सा नहीं है, बल्कि उसके लिए अपने आचरण को पवित्र करने की जरूरत है।
राघो क्रिस्न करीम हरि, राम रहीम खुदाय।
'रविदास' मोरे मन बसहिं, कहुं खोजहूं बन जाय।।
रविदास ने बार बार इस बात को रेखांकित किया है कि जिस ईश्वर को हिन्दू मानते हैं और जिस खुदा को मुसलमान मानते हैं वे कोई अलग अलग नहीं हैं। वे सब एक ही हैं। सबका मालिक एक ही है, जो लोग ईश्वर के नाम पर लड़ते हैं वे ईश्वर की ही अवहेलना करते हैं। केशव, कृष्ण और करीम सभी एक ही तत्व है। रविदास इस बात पर जोर देने के लिए ही बार बार कहते हैं कि उन्होंने विचार करके देख लिया है कि सिर्फ नाम का ही फर्क है, तत्वत: कोई अन्तर नहीं है।
'रविदास' हमारो सांइयां, राघव राम रहीम।
सभ ही राम को रूप हैं, केसो क्रिस्न करीम।।

अलख अलह खालिक खुदा, क्रिस्न-करीम करतार।
रामह नांउ अनेक हैं, कहै 'रविदास' बिचार।।
रविदास ने न केवल राम और रहीम की एकता के बारे में बार बार जिक्र किया, बल्कि हिन्दू और मुसलमानों के सबसे पवित्र माने जाने वाले स्थलों के बारे में जिनकी इन धर्मों के मानने वालों की सर्वाधिक आस्था है, उनके बारे में भी कोई अन्तर नहीं किया। रविदास का मानना था कि काबा और कासी में कोई अन्तर नहीं है।
'रविदास' हमारो राम जोई, सोई है रहमान।
काबा कासी जानीयहि, दोउ एक समान।।
जब से समाज वर्गों में विभाजित हुआ है, तभी से समाज के विभिन्न वर्गों के हित परस्पर टकराते रहे हैं। अपने अपने हितों की रक्षा के लिए और अपने शत्रु या विरोधी वर्ग के हितों के विरुद्घ समाज में समीकरण बनते रहे हैं। मध्यकाल में कई तरह की पहचानें समाज में थीं। एक पहचान धर्म के आधार पर भी थी। विभिन्न धर्मों के लोग एक साथ रहते थे। यद्यपि विभिन्न धर्मों में कोई मूलभूत अन्तर नहीं था, लेकिन विभिन्न धर्मों के मानने वालों के स्वार्थों में टकराहट थी। शासक वर्ग के लोगों ने इस टकराहट को धर्मों की टकराहट के तौर पर पेश करने की कोशिश की।
रविदास जैसे संतों ने उनकी इस चालाकी को पहचान लिया और साफ तौर पर कहा कि हिन्दू और मुसलमान दोनों में कोई मूलभूत अन्तर नहीं है। कोई प्राकृतिक अन्तर भी नहीं है। हिन्दू व मुसलमान दोनों के दो दो हाथ, दो दो पैर, दो दो कान और दो दो आंखें हैं। जब दोनों की बनावट एक जैसी है तो दोनों को अलग कैसे माना जाए। असल में दोनों एक ही हैं। उनमें कोई अन्तर नहीं है जिस तरह सोने और सोने के कंगन में कोई अन्तर नहीं है। सोने से ही कंगन बना है, उसी तरह हिन्दू और मुसलमान में कोई अन्तर नहीं है, दोनों एक ही तत्त्व की उपज हैं। रविदास ने कहा कि हिन्दू माना जाने वाला ब्राह्मण और मुसलमान माना जाने वाला मुल्ला सबको एक ही नजर से देखना चाहिए, उनमें कोई मूलभूत अन्तर नहीं है।
जब सभ करि दोउ हाथ पग, दोउ नैन दोउ कान।
'रविदास' पृथक कैसे भये, हिन्दू मुसलमान।।
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'रविदास' कंगन अरू कनक मंहि, जिमि अंतर कछु नांहि।
तैसउ अंतर नहीं, हिन्दुअन तुरकन मांहि।।
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'रविदास' उपजइ सभ इक नूर तें, ब्राह्मन मुल्ला शेख।
सभ को करता एक है, सभ कूं एक ही पेख।।
रविदास ने इस बात को पहचान लिया था कि हिन्दू और मुसलमान के आधार पर भेदभाव करना असल में जन सामान्य की एकता को तोडऩा है। शासक वर्ग अपना शासन कायम रखने के लिए जन-सामान्य की एकता तोड़ते हैं और शासित-वर्ग एकता को कायम रखते हैं। रविदास ने एकता पैदा करने के लिए शासक वर्ग द्वारा धर्म के आधार पर जो विभाजन करना चाहा था उसका विरोध किया। धर्म के नाम पर समाज में वैमनस्य पैदा करना मानवता के प्रति अपराध है, जबकि धर्म के आधार पर कोई भेद ही नहीं है। गुरु रविदास ने हिन्दू और मुस्लिम में कोई अन्तर नहीं किया। उनको एक ही माना।
'रविदास' पेखिया सोध करि, आदम सभी समान।
हिंदू मुसलमान कऊ, स्रिष्टा इक भगवान।।
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मुसलमान सों दोसती, हिंदुअन सों कर प्रीत।
'रविदास' जोति सभ राम की, सभ हैं अपने मीत।।
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हिंदू तुरुक मंहि नहीं कुछ भेदा, सभ मंह एक रत्त अरुमासा।
दोऊ एकहू दूजा कोऊ नांहि, पेख्यो सोध 'रविदासा'।।
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हिंदू तुरुक मंह नहीं कुछ भेदा, दुइ आयहु एक द्वार।
प्राण पिंड लोहु मांस एकहू, कहि रविदास बिचार।।
रविदास के लिए धर्म वर्चस्व स्थापित करने का साधन नहीं, बल्कि एक नैतिक सत्ता का है, जिसे अपनाकर ही सच्चा धार्मिक हुआ जा सकता है, न कि धार्मिक पाखण्ड को अपना कर। सच्चे अर्थों में धार्मिक व्यक्ति ईश्वर को सर्वोच्च सत्ता मानता है और ईश्वर के समक्ष सभी धर्मों को मानने वाले बराबर हैं। संत रविदास ने साम्प्रदायिक दृष्टि अपनाकर मनुष्यों में भेदभाव को स्वीकृति नहीं दी, बल्कि मानवतावादी दृष्टि को अपनाकर मनुष्यों में धार्मिक व सामाजिक एकता व बराबरी को मान्यता दी।
कहा जा सकता है कि दलित-चिन्तकों व साहित्यकारों की परम्परा ने साम्प्रदायिक विचारों को शुरू से ही नकारा। दलित-मुक्ति का आदर्श रहा है - समाज में बराबरी की चाह पैदा करना तथा इसे हासिल करने के लिए प्रेरित करना। संत रविदास ने अपने अनुयायियों के लिए स्पष्ट रास्ता बताया है कि साम्प्रदायिकता की विचारधारा को मान्यता देने का अर्थ है - समाज में सामाजिक भेदभाव, शोषण व अन्याय को वैधता देना। वर्तमान दलित आन्दोलन व चिन्तन गुरु रविदास से इस सम्बन्ध में प्रेरणा ले सकता है।
संत रविदास की परम्परा के कवियों ने साम्प्रदायिक सद्भाव को अपनी वाणी का विषय बनाया है। ये कवि सभी धर्मों की शिक्षाओं का आदर करते थे तथा उनको अपने जीवन में उतारने पर बल देते थे। सभी धर्मों के दार्शनिक सिद्घांतों पर विचार-विमर्श करते थे तथा सभी धर्मों के बाहरी आडम्बरों का विरोध करते थे। धर्म की शिक्षाओं को व्यवहार में लाने वाला, सिद्घान्तों पर तर्क-वितर्क करने वाला तथा कर्मकाण्डों की आलोचना करने वाला व्यक्ति साम्प्रदायिक नहीं हो सकता। साम्प्रदायिकता न तो विचार-विमर्श व तर्क को बढ़ावा देती है और न ही धर्म की शिक्षाओं को आचरण में उतारने पर जोर देती है। साम्प्रदायिकता तो मात्र आडम्बरों-कर्मकाण्डों पर व धार्मिक चिन्हों पर जोर देती है। इस तरह साम्प्रदायिकता मध्यकालीन समस्त संतों की विचारधारा के विरुद्घ है।
संतों को विभिन्न धर्मों में कोई मूलभूत अन्तर नजर नहीं आया। लोगों के जीवन में भी कोई अन्तर नहीं था, चाहे वे किसी भी धर्म से ताल्लुक क्यों न रखते हों। शासक वर्गों का जीवन एक सा था, चाहे वे अलग अलग धर्मों से ताल्लुक क्यों न रखते हों। संतों का किसी एक धर्म से विरोध नहीं था, बल्कि वे सभी धर्मों में व्याप्त बुराइयों का विरोध करते थे। संस्थागत धर्म के संरक्षक धार्मिक तत्ववादी हमेशा ही समाज की प्रगतिशील शक्तियों के खिलाफ रहे हैं। साम्प्रदायिक विचारधारा भी अपने को धर्म के प्रगतिशील रूप को नष्ट करके रूढि़वादी व साम्प्रदायिक रूप को स्वीकारती हैं। संस्थागत धर्म ही धर्म स्थलों को बढ़ावा देता है, उनके भव्य निर्माण पर जोर देता है और धर्म के नाम पर तमाम बुराइयों के संरक्षण की शुरूआत भी यहीं से होती है। संत रविदास व अन्य संतों ने अपनी धार्मिक-आध्यात्मिक जिज्ञासा व जरूरतों को पूरा करने के लिए किसी धर्म-स्थल के निर्माण पर जोर नहीं दिया। धार्मिक व्यक्ति कभी धार्मिक स्थलों के लिए दूसरे धर्म के लोगों से नहीं लड़ता और न ही दूसरे धर्म के पूजा-स्थलों को गिराने या नुक्सान पहुंचाने के काम को धार्मिक कार्य मानता है। मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर व गुरुद्वारों के लडऩे वाले लोग रविदास व अन्य संतों की दृष्टि में धार्मिक नहीं हैं। गुरु रविदास ने लिखा है कि ईश्वर भक्त को अपने इष्ट की आराधना करने या ढूंढने के लिए किसी पूजा-स्थल में जाने की जरूरत नहीं है।
तुरुक मसीति अल्लह ढूंढइ, देहरे हिंदू राम गुंसाई।
'रविदास' ढुंढिया राम रहीम कूं, जंइ मसीत देहरा नांहि।।
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देहरा अरु मसीत मंहि, 'रविदास' न सीस नवांय।
जिह लौं सीस निवावना, सो ठाकुर सभ थांय।।
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रविदास न पुजहूं देहरा, अरु न मसजिद जाय।
जंह जंह ईस का वास है, तंह तंह सीस नवाय।।
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हिंदू पूजह देहरा, मुसलमान मसीति।
'रविदास' पूजह उस राम कूं, जिह निरन्तर प्रीति।।
संत रविदास व उनकी परम्परा के संतों-भक्तों ने समाज में साम्प्रदायिक विचारधारा के आधार धार्मिक तत्ववाद पर प्रहार करके एकता के तत्वों को स्थापित किया था। तत्कालीन समाज में व्याप्त रूढि़वादी तत्वों ने इन संतों का विरोध किया था। साम्प्रदायिक सद्भाव संतों की वाणी का अपरिहार्य संदेश है, जो आज भी प्रासंगिक है और आज के समाज के बारे में इस समस्या पर विचार करने पर विवश करता है और मानवता के पक्ष को मजबूत करने के लिए साम्प्रदायिक तत्वों का विरोध करने की प्रेरणा देता है।

जाति और वर्ण
भारतीय समाज जातियों में विभाजित रहा है। समाज के प्रभावशाली लोगों ने अपने हितों की पूर्ति के लिए इस तरह का विभाजन किया। जाति-व्यवस्था की श्रेष्ठता की मान्यता के कारण किसी को तो सभी अधिकार बिना किसी योग्यता के ही मिल जाते हैं और कोई समस्त गुण सम्पन्न होते हुए भी वैधानिक, मानवीय और यहां तक कि प्राकृतिक अधिकारों से भी वंचित हो जाता है। इसलिए जाति का अर्थ समाज में सबके लिए एक जैसा न होकर अलग अलग हो जाता है किसी के लिए जाति एक प्रथा है, जिसका उसे हर कीमत पर पालन करना है। किसी के लिए एक दंभ बन जाता है, कोई इसे एक भ्रम ही समझता है, एक मानसिकता है, एक मिथक है, एक अंधविश्वास है, एक रूढि़ है, किसी के लिए यह एक चेतना है, जिसे वह धारण किए हुए है, और किसी के लिए यह अभिशाप है, गुलामी है, शोषण का माध्यम है। जाति-व्यवस्था को लेकर भारतीय समाज में समय समय पर विभिन्न वर्गों की प्रतिक्रियाएं होती रही हैं। जाति कोई स्थिर वस्तु या स्थिति नहीं रही, बल्कि यह समय व स्थिति के अनुसार बदलती रही है। सामाजिक-आर्थिक हैसियत बदलते ही जाति की सामाजिक स्थिति भी बदलती रही है।
जाति भारतीय धर्म व नीति के विमर्श के केन्द्र में रही है। वर्णों की उत्पति और वर्ण-धर्म के पालन का आग्रह स्मृतियों और अन्य ग्रन्थों में भरा पड़ा है। राजा को इसके पालन के निर्देश दिए गए हैं और राजाओं ने भी जाति आधारित व्यवस्था को ही अपनाने में समझदारी दिखाई। वे समाज के प्रभावशाली लोगों को नाराज करके अपना शासन कायम नहीं रख सकते थे। मुस्लिम शासकों ने भी जाति प्रथा को तोडऩा तो क्या बल्कि इसे मजबूती ही प्रदान की और अंग्रेंजों ने भी जो तमाम आधुनिक प्रगति का दावा करते रहे, उन्होंने भी जाति प्रथा को न केवल यथावत कायम रखा, बल्कि अधिक मजबूत किया। शासकों ने जहां जाति प्रथा को स्थापित करने में रुचि ली वहीं समाज सुधारकों ने इसके विरुद्घ संघर्ष किया। महात्मा बुद्घ, महावीर जैन के आन्दोलनों के बाद सिद्घों-नाथों से होती हुई कबीर, नानक, रविदास आदि संतों की वाणी व संघर्ष में इसके विरुद्घ आन्दोलन मुख्य रहा है। इन संतों ने इस बात को पहचान लिया था कि जाति के रहते हुए समाज में मानवता स्थापित नहीं हो सकती। मानवता और जाति में मूल रूप से ही विरोध है। जाति की कब्र पर ही मानवता की नींव रखी जा सकती है।
रविदास ने पहचान लिया था कि समाज में जाति के विष की अनेक परतें हैं। समाज में जाति के अन्दर जातियां मौजूद हैं। जैसे केले के पत्तों में पत्ते होते हैं, उसी तरह से जातियां समाज में हैं। जाति व्यवस्था का महल इस तरह से खड़ा है जैसे कि केले के पत्ते। जाति व्यवस्था का ढांचा हर स्तर पर मौजूद है। यह समाज में विभिन्न स्तर बना देता है और लोगों में स्थायी विभाजन पैदा करती है। रविदास ने इस बात को भी पहचान लिया था कि जाति व्यवस्था के रहते मनुष्य मनुष्य में भाईचारा कायम नहीं हो सकता। वे एक दूसरे के निकट नहीं आ सकते। जब तक समाज से जाति का नाश नहीं हो जाता, तब तक मानवों में एकता कायम नहीं हो सकती। मानव जाति की एकता और मनुष्यता के मूल्यों के प्रसार व स्थापना में जाति सबसे बड़ी बाधा है। इसीलिए रविदास ने लिखा कि:
जात पांत के फेर मंहि, उरझि रह्इ सभ लोग।
मानुषता कूं खातहइ, जात कर रोग।।

जात जात में जात है, ज्यों केलन में पात।
'रविदास' न मानुष जुड़ सकैं, जौं लौं जात न जात।।
जाति के आधार पर मनुष्य-मनुष्य में भेदभाव करने को रविदास ने मनुष्यता का अपमान समझा। उनका मानना था कि सभी मनुष्यों को एक ही भगवान ने बनाया है, सबको बनाने वाला एक ही ईश्वर है, वह सब में समान रूप से मौजूद है। उसी से सबका विस्तार हुआ है, इसलिए जो वर्ण-अवर्ण, ऊंच-नीच पर विचार करते हैं, वे मूर्ख हैं। वर्ण या जाति के आधार पर भेद करने वालों को अज्ञानी व मूर्ख बताना असल में ब्राह्मणवादी विचारधारा को सिरे से नकारना है।

एकै माटी के सभ भांडे, सभ का एकौ सिरजन हारा।
'रविदास' ब्यापै एकौ घट भीतर, सभकौ एकै घड़ै कुम्हारा।।

'रविदास' उपिजइ सभ इक बुंद ते, का ब्राह्मन का सूद।
मूरिख जन न जानइ, सभ मंह राम मजूद।।

'रविदास' इकही बूंद सों, सभ ही भयो बित्थार।
मूरिख हैं जो करत हैं, बरन अबरन विचार।।

सभ महिं एकु रामहु जोति, सभनंह एकउ सिरजनहारा।
'रविदास' राम रमहिं सभन मंहि, ब्राह्मन हुई क चमारा।।

नीच नीच कह मारहिं, जानत नाहिं नदान।
सभ का सिरजनहार है, 'रविदास' एकै भगवान।।
रविदास जिस समय हुए उस समय धर्म संबंधी चिंतन ही मानव-जीवन व चिंतन के केन्द्र में था। उस समय सोचने के ढंग में ईश्वर की उपस्थिति लगभग अनिवार्य सी थी। उसे दूर करके सोचा ही नहीं जाता था। विज्ञान की खोजों ने अभी यह सिद्घ नहीं किया था कि जीवन विकसित हुआ है, इसके विपरीत यही माना जाता था कि इस संसार को ईश्वर ने बनाया है। संसार में मौजूद तमाम चीजों का निर्माता ईश्वर ही है। इसलिए ईश्वर के समक्ष ही मानव मानव में भेद न मानने के तर्क को ही सर्वाधिक मान्यता प्राप्त थी। संत रविदास भी बार बार इस बात को अपने दोहों में कहते हैं कि कथित उच्च जाति व कथित नीच जाति के लोगों को भगवान ने ही बनाया है और जब ईश्वर ने ही सबको बनाया है तो उनमें ऊंच नीच कैसे हो सकती है। असल में ऊंच नीच की सामाजिक निर्मिति को संत कवि ईश्वर निर्मिति के हवाले से समाप्त करना चाहते हैं। यद्यपि प्रारम्भ में जाति व वर्ण के निर्माताओं ने ईश्वर के हवाले से ही वर्णों के ऊंच नीच को वैधता देने की कोशिश की थी, लेकिन जल्दी उन्होंने इसको गुण के आधार पर स्थापित करने की बात कही थी और इसके पेशागत आधार को भी तर्क के तौर पर प्रस्तुत किया था। यद्यपि जन्म से वर्ण को मानना तो किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है, लेकिन गुणों के आधार पर भी इसे स्वीकार इसलिए नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसमें भी एक सांसारिक काम और दूसरे सांसारिक काम में भेदभाव किया जाता है और इस आधार पर मनुष्य मनुष्य में भेदभाव किया जाता है। संत रविदास की यह बात बहुत ही महत्त्वपूर्ण है और वर्तमान दलित-मुक्ति आन्दोलन व चिन्तकों का विशेष ध्यान आकर्षित करती है। ब्राह्मणवादी विचारधारा ने अपनी जगह समाज में इस तरह बनाई है कि जिन वर्गों व समुदायों के वह खिलाफ है, वे भी उसको आदरणीय मानकर अपने व्यवहार का हिस्सा बनाए हुए हैं व उसकी नैतिकता और मूल्य-चेतना ही मुख्यतौर पर उनको परिचालित करती है। दलित मुक्ति के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती के तौर पर यही बात है कि ब्राह्मणवादी विचारधारा को दलितों से कैसे मुक्त किया जाए। जब तक दलित वर्ग इसे संजोये रहेंगे और इससे परिचालित होंगे तब तक समाज में इसका प्रभुत्व बना रहेगा।
संत रविदास ने जन्म के आधार पर जाति प्रथा या वर्ण-व्यवस्था को मानने से स्पष्ट इनकार कर दिया। जन्म को इसका आधार न मानकर व्यक्ति के कर्म को इसका आधार माना। उन्होंने कहा कि जन्म के कारण न तो कोई ऊंचा होता है और न ही कोई नीचा। मनुष्य को उसके काम ही ऊंचा या नीचा बनाते हैं। मनुष्य के जन्म को मुख्य न मानकर उसके कामों पर ही विचार करना चाहिए। बात बिल्कुल सही है कि जन्म पर किसी का अधिकार नहीं है लेकिन संसार में अच्छे या बुरे काम करना काफी कुछ व्यक्ति पर निर्भर करता है।
'रविदास' जन्म के कारनै, होत न कोउ नीच।
नर कूं नीच करि डारि है, ओछे करम कौ कीच।।

जन्म जात कूं छांडि करि, करनी जात परधान।
इह्यौ बेद कौ धरम है, करै 'रविदास' बखान।।
संत रविदास ने समाज में प्रचलित मनुस्मृति की व्यवस्था को नकारा। मनुस्मृति में वर्ण को जन्म के आधार पर मान्यता दी गई थी लेकिन कर्म का सिद्घांत भी पुनर्जन्म के साथ मिलकर जाति विभाजन को औचित्य प्रदान करता है। इसीलिए जाति चेतना पीढ़ी दर पीढ़ी का पुनर्जन्म हो रहा है। कभी यह आर्थिक ईकाई के तौर पर स्थापित रही, तो कभी सामाजिक इकाई के तौर पर। वर्तमान में इसके ये आधार टूट रहे हैं तो यह राजनीतिक इकाई के रूप में मजबूत हो रही है।
संत रविदास के युग के चिन्तन की सीमा उसका ईश्वरवाद था। वे समाज की समस्त समस्याओं को इसी दृष्टिकोण से देखते थे और इसी को उनका समाधान मानते थे। किसी भी सामाजिक समस्या को ईश्वर देन मानना और उसका निदान भी ईश्वर के भरोसे छोड़ देना तत्कालीन चिन्तन सबसे बड़ी कमजोरी कहा जा सकता है। जो समस्याओं के सामाजिक कारणों से ध्यान हटाता था। उस समय के सभी विचारकों-संतों में यह प्रवृति मिलती है। संत रविदास भी इससे अछूते नहीं हैं।
वेद पढई पंडित बन्यो, गांठ पन्हीं तऊ चमार।
'रविदास' मानुष इक हइ, नाम धरै हइं चार।।
मनुस्मृति में एक वर्ण को दूसरे से श्रेष्ठ माना गया। जैसे यह कहा गया कि ब्राह्मण की हर हाल में पूजा करनी चाहिए चाहे वह इसके योग्य हो चाहे न हो और शूद्र में चाहे जितने गुण हों उसको दुत्कार व प्रताडऩा का ही विधान किया है। रविदास ने इसे स्वीकार न करके गुणों के आधार पर पूजा या सम्मान करने को कहा। यदि ब्राह्मण में कोई गुण नहीं है तो उसकी पूजा सिर्फ इसलिए नहीं करनी चाहिए कि वह ब्राह्मण कुल में पैदा हुआ है और यदि चांडाल कहे जाने व्यक्ति में गुण हैं तो उसका सम्मान करना चाहिए। आदर-मान या पूजा के अधिकारी होने का आधार जन्म न मानकर गुणों को मानना महत्त्वपूर्ण है।

'रविदास' बाह्मन मति पूजिए, जउ होवै गुनहीन।
पूजहिं चरन चंडाल के, जउ होवै गुन परवीन।।

ऊंचे कुल के कारणै, ब्राह्मन कोय न होय।
जउ जानहि ब्रह्म आत्मा, 'रविदास' कहि ब्राह्मन सोय।।

काम क्रोध मद लोभ तजि, जउ करइ धरम कर कार।
सोइ ब्राह्मन जानिहि, कहि 'रविदास' बिचार।।
संत रविदास के समय में वर्ण के आधार पर समाज में व्यक्ति का सम्मान तय होता था और व्यक्ति अपने कथित वर्ण के कर्तव्यों पर खरा उतरता है या नहीं यह भी जरूरी नहीं था। रविदास ने वर्ण के कर्तव्यों को पुनर्परिभाषित किया। उसे इस तरह से व्याख्यायित किया जिससे कि पीडि़त व्यक्ति का पक्ष ही मजबूत होता था। मनुस्मृति की वर्ण सम्बन्धी कार्यों में क्षत्री उसी को कहा गया जो राज्य की रक्षा करता है या जो शासन करता है। लेकिन रविदास ने उसी को सच्चा क्षत्री कहा जो दीन-दुखी के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर कर सकता है। केवल भुजाओं के जोर पर किसी को क्षत्री नहीं कहा जा सकता। शारीरिक बल के होने मात्र से ही कोई क्षत्रिय का दर्जा नहीं पा जाता, बल्कि उस ताकत का प्रयोग दीन-दुखियों के लिए करने वाले को ही कहा जा सकता है। जो व्यक्ति समाज के पीडि़त के लिए अपने प्राण तक देने के लिए तैयार है वही इसका अधिकारी है।
दीन दुखी के हेत जउ, बारै अपने प्रान।
'रविदास' उह नर सूर कौं, सांचा छत्री जान।।
वैश्य के लिए मात्र व्यापार करना ही काफी नहीं है। व्यापार में तो धोखा, ठगी, बेइमानी, निजी स्वार्थ भी होता है। संत रविदास ने सब के सुख के लिए व्यापार करने वाले को ही वैश्य कहा।
'रविदास' वैस सोइ जानिये, जउ सत्त कार कमाय।
पुंन कमाई सदा लहै, लोरै सर्वत्त सुखाय।।

सांची हाटी बैठि कर, सौदा सांचा देइ।
तकड़ी तोलै सांच की, 'रविदास' वैस है सोइ।।
मनु की वर्ण-व्यवस्था में शूद्र को सबसे नीचे का दर्जा दिया और उसे इस तरह परिभाषित किया मानो कि वह समाज पर बोझ व कलंक हो। रविदास ने शूद्र को असत्य न कहने वाला धन कहकर प्रतिष्ठापित किया।
'रविदास' जउ अति पवित्र है, सोई सूदर जान।
जउ कुकरमी असुध जन, तिन्ह ही न सूदर मान।।
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हरिजनन करि सेवा लागै, मन अंहकार न राखै।
'रविदास' सूद सोइ धंन है, जउ असत्त न भाखै।।
रविदास के समय में वर्णों से ही सोचा जाता था, इसलिए इस शब्दावली को तो वे नहीं छोड़ पाए, लेकिन उन्होंने वर्ण की परिभाषा जरूर बदल दी। वर्ण को जन्म से न जोड़कर उन्होंने उसे आचरण से जोड़ा। एक बात खासतौर पर देखने की यह है कि सभी वर्णों को परिभाषित करते हुए कहा कि सच्चाई को धारण किया व्यक्ति ही क्षत्री, वैश्य और शूद्र है। इसका अर्थ यह हुआ कि सच्चाई ही रविदास के लिए महत्त्वपूर्ण है। वे व्यक्ति को इसी आधार पर देखते थे।
वर्ण-व्यवस्था में सेापानिक क्रम है। संत रविदास ने वर्ण-व्यवस्था को जन्म के आधार पर तथा इसमें व्याप्त ऊंच-नीच को तो स्वीकार नहीं किया, लेकिन यह भी सच है कि उन्होंने वर्ण-व्यवस्था के खात्मे के लिए भी कोई संकेत नहीं किया। असल में कर्म के आधार पर वर्ण मानना व उनमें श्रेष्ठ-निम्न श्रेणी की मान्यता में मूलभूत अन्तर्विरोध यही है कि यदि कोई जन्म के आधार पर उच्च दर्जा पा ले तो कर्म के आधार पर उसे निम्न कैसे किया जाए? वर्ण-व्यवस्था के रहते समाज में भेदभाव व काम के छोटे-बड़े होने की मान्यता तो मिलती ही है। इसलिए समाज से भेदभाव व असमानता समाप्त करने के लिए वर्ण-व्यवस्था को ही समाप्त करना जरूरी है।
जाति की उत्पति का वर्ण से गहरा रिश्ता है। यूं कहना भी कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि वर्ण-व्यवस्था की कोख से ही जाति का जन्म हुआ है और असल में यह वर्ण-व्यवस्था का विस्तार ही है। जाति-प्रथा और वर्ण-व्यवस्था को अलग अलग भी मान लिया जाए तो दोनों में एक बात तो समान रूप से मौजूद है और वही बात सर्वाधिक आपत्तिजनक है कि यह वर्णों में भेदभाव है। एक वर्ण को दूसरे से श्रेष्ठ समझा जाता है। यहीं से पक्षपात, भेदभाव को मान्यता मिलती है अन्तत: जिसका विस्तार घृणा में होता है।
प्रत्येक समाज ने समय परिवर्तन के साथ परम्परागत तौर पर प्रचलित मान्यताओं और धारणाओं को अपने समय के अनुकूल परिभाषित किया है। धर्म-दर्शन से लेकर सामाजिक-सांस्कृतिक मान्यताओं तक में परिवर्तन किया है। किसी जमाने में धर्म को ही सत्य कहा जाता था, लेकिन रविदास ने इसे पलटकर सत्य को धर्म के रूप में स्थापित किया।
जिन्ह नर सत्त तियागिया, तिन्ह जीवन मिरत समान।
'रविदास' सोई जीवन भला, जहं सभ सत्त परधान।।
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'रविदास' सत्त मति छांडि़ए, जौ लौं घट में प्रान।
दूसरो कोउ धरम नाहिं, जग मंहि सत्त समान।।
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जो नर सत्य न भाषहिं, अरू करहिं बिसासघात।
तिन्हहुं सो कबहुं भुलिहिं, 'रविदास' न कीजिए बात।।

भक्ति
संत रविदास ने कहा कि मानव-प्रेम ही ईश्वर की भक्ति है। जिस व्यक्ति के मन में मानव के प्रति प्रेम नहीं है वह चाहे जितनी मर्जी भक्ति कर ले, चाहे जितनी तपस्या कर ले उसको ईश्वर की प्राप्ति नहीं हो सकती।
बन खोजइ पिय न मिलहिं, बन मंह प्रीतम नांह।
'रविदास' पिय है बसि रह्यो, मानव प्रेमंहि मांह।।
रविदास ने मानव प्रेम को महत्त्व दिया और उसे ईश्वर की तपस्या के नाम पर किए जाने वाले कर्मकाण्डों से अधिक महत्त्वपूर्ण माना। रविदास ने कहा कि ईश्वर कहीं जंगल में गुम नहीं हुआ कि उसे ढूंढना है बल्कि वह तो एक भावना है जिसका संबंध मनुष्य के दिल से है। यदि वह अपने दिल की मैल साफ कर लेता है और मानव से प्रेम करने में उसे लगाता है तभी वह ऐसा कर सकता है। ईश्वर कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे कि मनुष्य को प्राप्त करना है। मानवों के प्रति अपने प्रेममय आचरण से उस अहसास को पा सकता है।
ब्राह्मणवाद 'शुचिता' 'पवित्रता' का ढोंग रचता है। रविदास ने उसकी पोल खोलते हुए सवाल लगाया। वे पूजा में जो दूध का प्रयोग करते हैं, उसे बछड़ा झूठा करता है, फूलों को भंवरा झूठा कर देता है :
दूधु त बछरै थनहु बिटारिओ।
फूलु भवरि जलु मीनि बिगारिओ।।
माई गोबिन्द पूजा कहा लै चरावउ।
अवरु न फूलु अनूपु न पावउ।।
मैलागर बेर्हे है भुइअंगा।
बिखु अमृतु बसहि इक संगा।।
धुप दीप नईबेदहि बासा।
कैसे पूज करहि तेरी दासा।।
तनु मनु अरपउ पूज चरावउ।
गुर परसादि निरंजनु पावउ।।
पूजा अरचा आहि न तोरी।
कहि रविदास कवन गति मोरी।।
***
भाई रे भरम-भगति सुजान, जौ लौं सांच सूं नहिं पहिचान।।
भरम नाचन, भरम गावन, भरम जप, तप, दान।
भरम सेवा, भरम पूजा, भरम सूं पहचान।।
भरम षट-कर्म सकल संहितां, भरम गृह, बन जान।
भरम कर कर कर्म कीये, भरम की यह बान।।
भरम इन्द्री निग्रह कीयां, भरम गुफा में बास।
भरम तौ लौं जानिये, शून्य की करै आस।।
भरम शुध् शरीर तो लौं, भरम नांव बिनावं।
भरम मन 'रैदास' तौ लौं, जौ लूं चाहै ठांव।।

रविदास ने भक्ति के उन रूपों का खंडन किया, जिनमें बाहरी दिखावों पर जोर रहता है। भक्ति को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा कि जब मनुष्य में भक्ति कही जा सकती है, तो वह अपनी प्रशंसा त्याग देता है। रविदास ने कहा कि नाचने, गाने, तप करने, और पैर धोने से क्या होता है? सिर मुंडाने से कया होता है? तत्व को पहचानने में ही भक्ति हैं
भगति ऐसी सुनहु रे भाई।
आइ भगति तब गई बड़ाई।। टेक।।
कहा भयो नाचे अरू गाये, कहा भयो तप कीन्हे।
कहा भयो जे चरन पखारे, जौं लौं तत्व न चीन्हे।
कहा भयो जे मूंड मुंडायो, कहा तीर्थ व्रत कीन्हे।
स्वामी दास भगत अरू सेवक, परम तत्व नहिं चीन्हे।
कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलिक ह्वै चुनि खावै।।

ऐसी भगति न होइ रे भाई।
राम नाम बिनु जो कछु करिये, सो सब भरमु कहाई।।
भगति न रस दान, भगति न कथै ज्ञान।
भगति न बन में गुफा खुदाई।।
भगति न ऐसी हांसी, भगति न आसा-पासी।
भगति न यह सब कुल कान गंवाई।।
भगति न इंद्री बांधा भगति न जोग साधा।
भगति न अहार घटाई, ये सब करम कहाई।।
भगति न इंद्री साधे, भगति न वैराग बांधे।
भगति न ये सब वेद बड़ाई।।
भगति न मूड़ मुंड़ाए, भगति न माला दिखाये।
भगति न चरन धुवाए, ये सब गुनी जन कहाई।।
भगति न तौ लौं जाना, आपको आप बखाना।
जोइ जोइ करै सो सो करम बड़ाई।।
आपो गयो तब भगति पाई, ऐसी भगति भाई।
राम मिल्यो आपो गुन खोयो, रिधि सिधि सबै गंवाई।।
कह रैदास छूटी आस सब, तब हरि ताही के पास।
आत्मा थिर भई तब सबही निधि पाई।।
***
भेष लिया पै भेद न जान्यो।
अमृत लेइ विषै सो मान्यो।।
काम क्रोध में जनम गंवायो।
साधु संगति मिलि राम न गायो।
तिलक दियो पै तपनि न जाई।
माला पहिरे घनेरी लाई।।
कह रैदास मरम जो पाऊं।
देव निरंजन सत कर ध्याऊं।।
संत रविदास ने धर्म के नाम पर बाहरी ढकोसलों का विरोध किया। संत रविदास ने कहा कि ईश्वर की भक्ति के लिए मंदिर या मस्जिद में जाकर सिर झुकाना जरूरी नहीं है। मंदिर या मस्जिद में जिस ईश्वर को विद्यमान समझकर सिर झुकाया जाता है वह तो सभी स्थानों पर विद्यमान है। धर्म-स्थलों की वास्तविकता को रविदास जानते थे। धर्म-स्थलों का और व्यक्ति की आध्यात्मिक-धार्मिक जरूरत का कोई अनिवार्य सम्बन्ध नहीं है।
देहरा अरु मसीत मंहि, 'रविदास' न सीस नंवाय।
जिह लौ सीस निवावना, सो ठाकुर सभ थांय।।

रविदास कर्मकाण्डी भक्ति को नहीं मानते थे, बल्कि वे आचरण में नैतिक मूल्यों को ही भक्ति मानते थे, इसलिए उन्होंने न तो ईश्वर का कोई रूप निश्चित किया और न ही किसी विशेष प्रकार के पूजा-विधान की वकालत की। इसके विपरीत उन्होंने कहा कि जब तक मन पवित्र नहीं है, तब तक ईश्वर नहीं मिल सकता। मन की पवित्रता का अर्थ यहां अपनी बुराइयों को दूर करने से है।
देता रहे हज्जार बरस, मुल्ला चाहे अजान।
'रविदास खुदा नंह मिल सकइ, जौ लौं मन शैतान।।
***
जे ओहु अठि सठि तीरथ न्हावै। जे ओहु दुआदस सिला पूजावै।।
जे ओहु कूप तटा देवावै। करै निंद सभ बिरथा जावै।।
साध् का निंदकु कैसे तरै। सरपर जानहु नरक ही परै।।
जे ओहु ग्रहन करै कुलखेति। अरपै नारी सीगार समेति।।
सगली सिंमृति स्रवनी सुनै। करे निन्द कवनै नहीं गुनै।।
जे ओहु अनिक प्रसाद करावै। भूमिदान सोभा मंडपि पावै।।
अपना बिगारि बिरांना सांढै। करै निंद बहु जोनी हांढै।।
निन्दा कहा करहु संसारा। निन्दक का परगटि पाहारा।।
निन्दकु सोधा साधि वीचारिआ। कहु रविदास पापी नरकि सिधरिआ।।

श्रम की गरिमा
रविदास का संबंध समाज के ऐसे वर्ग से था जो कि मेहनत करके अपना पालन करता था। अपने अनुभव से ही सिद्घांतों को निर्मित किया था। बिना श्रम के खाने को उन्होंने हेय समझा। उन्होंने श्रम को ईश्वर के बराबर का दर्जा दिया।
जिह्वां सों ओंकार जप, हत्थन सों कर कार।
राम मिलहिं घर आई कर, कहि 'रविदास' बिचार।।
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नेक कमाई जउ करहि, ग्रह तजि बन नंहि जाय।
'रविदास' हमारो राम राय, ग्रह मंहि मिलिंहि आय।।
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'रविदास' स्रम करि खाइहि, जौ लौं पार बसाय।
नेक कमाई जउ करइ, कबहुं न निहफल जाय।।
रविदास ने कहा कि जहां तक हो सके व्यक्ति को श्रम करके खाना चाहिए। श्रम की कमाई को रविदास ने नेक कमाई कहा जो कभी निष्फल नहीं जाती। रविदास ने जहां इसकी ओर संकेत किया कि समाज में बिना श्रम के खाने वाले भी हैं, वहीं इसे बड़ी हेय दृष्टि से देखा और इसे बड़ा नेक कर्म माना। शोषणकारी सामाजिक व्यवस्था में बिना श्रम किए खाने वाले तो सम्मान पाते हैं और जो मेहनत करते हैं वे अपमानित होते हैं। जो जितनी अधिक मेहनत करता है, वह उतना ही पीडि़त होता है, उसका उतना ही अधिक शोषण होता है। दलित हमेशा समाज के निचले पाएदान पर रहे, इसलिए वे उच्च वर्ण के श्रेष्ठता-दम्भ का शिकार रहे। रविदास ने इस पीड़ा से छुटकारे के लिए मेहनत करने वाले वर्ग को सम्मान का दर्जा दिया।
रविदास ने श्रम को ईश्वर के बराबर दर्जा दिया जिसका अर्थ है कि श्रम करने वालों को समाज में उच्च स्थान पर बिठाना। अभी तक 'पोथी', 'तप', माला जपने को ही पूजा के तौर पर लिया जाता था और इसका प्रभाव यह होता था कि शारीरिक श्रम करने वालों को हेय नजर से देखा जाता था, जो उनके सामाजिक-आर्थिक शोषण को वैधता देता था। श्रम को सुख-चैन का आधार बताया। रविदास ने इस सच्चाई को भांप लिया था कि जो व्यक्ति बिना श्रम के संसार के ऐश्वर्य का आनन्द उठाता है वह कहीं न कहीं सुख से वंचित रहता है।
स्रम कउ ईसर जानि कै, जउ पूजहि दिन रैन।
'रविदास' तिन्हहि संसार मंह, सदा मिलहि सुख चैन।।
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प्रभ भगति स्रम साधना, जग मंह जिन्हहिं
तिन्हहिं जीवन फल भयो, सत्त भाषै 'रविदास'।।
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धरम करम दुइ एक हैं, समुझि लेहु मन मांहि।
धरम बिना जौ करम है, 'रविदास' न सुख तिस मांहि।।
***
'रविदास' हौं निज हत्थहिं, राखौं रांबी आर।
सुकिरित ही मम धरम है, तारैगा भव पार।।
***
रविदास ने राज्य के बारे में लिखा
ऐसा चाहौं राज मैं, जहां मिलै सबन कौ अन्न।
छोट बड़ो सभ सम बसैं, 'रविदास' रहैं प्रसन्न।।
असल में ये केवल रविदास के ही नहीं, बल्कि उस पूरे वर्ग के विचार हैं, जिनसे रविदास ताल्लुक रखते थे और जिसका प्रतिनिधित्व करते थे। रविदास को अपनी प्रसन्नता की उतनी चिन्ता नहीं थी, जितनी कि समस्त पीडि़तों-वंचितों की। असल में रविदास की प्रसन्नता तो सबकी प्रसन्नता में ही निहित है। राज से उनका अर्थ असल में मात्र शासन व्यवस्था से नहीं है, बल्कि समय से है, काल से है, व्यवस्था से है। भारतीय मानस इसी तरह अपनी आकांक्षा को अभिव्यक्त करता रहा है।
रविदास ने बेगमपुरा नगर की कल्पना करके समाज के प्रति अपनी सोच को उजागर किया है। बेगमपुरा की कल्पना असल में एक फैंटेसी की तरह है। ऐसा नगर शायद ही दुनिया में कहीं मौजूद हो, लेकिन रविदास के मन व चेतना में उसकी स्पष्ट छवि है।
बेगमपुरा सहर को नाउ।
दुखु अंदोहु नहीं तिहि ठाउ।
नां तसवीस खिराजु न मालु।
खऊु न खता न तरसु जवालु।।
अब मोहि खूब वतन गह पाई।
ऊहां खैरि सदा मेरे भाई। ।
काइमु दाइमु सदा पातिसाही।
दोम न सेम एक सो आही।
आबादानु सदा मसहूर।
ऊहां गनी बसहि मामूर।।
तिउ तिउ सैल करहि जिउ भावै।
महरम महल न को अटकावै।
कहि रविदास खलास चमारा।
जो हम सहरी सु मीतु हमारा।।
गुरु रविदास ने जिस तरह के शहर की कल्पना की है, उस तरह से शायद ही किसी संत-भक्त या अन्य दार्शनिक ने की हो। वे मनुष्य को हर प्रकार के कष्ट से मुक्त देखना चाहते हैं। उनके दिमाग में एक न्यायपूर्ण समाज की कल्पना है, जिसमें ताकतवर और कमजोर दोनों रह सकते हों। जिसमें कोई ताकतवर कमजोर को न सताए, अपने बल का प्रयोग करके उसका जीना दूभर न कर दे। ताकतवर और कमजोर एक दूसरे के साथ सह-अस्तित्व के साथ रह सकें न कि एक दूसरे की कीमत पर।
इस तरह के समाज में तो सही मायने में समाजवाद की ही कल्पना की गयी है। काफी बाद में जाकर हम इस विचार को मुकम्मल दर्शन का और इसे प्राप्त करने के तरीकों व शक्तियों का विचार कर पाए हैं। गुरु रविदास ने समस्त समाज की सुखी रहने की स्वाभाविक वृति को इसमें व्यक्त किया है, लेकिन समाज में स्वार्थी शक्तियां भेदभाव पैदा करके अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए इसे साकार नहीं होने देतीं।

गुरुनानक और सांझी संस्कृति की विरासत

गुरुनानक और सांझी संस्कृति की विरासत
 सुभाष चन्द्र, एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र

बाबा नानक शाह फकीर
हिन्दू का गुरु,
मुसलमान का पीर 1

गुरु नानक का जन्म 1469 में, पंजाब प्रान्त के ननकाना साहब नामक स्थान पर हुआ, जो आज कल पाकिस्तान में है। वे महान विचारक और समाज सुधारक थे। उनका व्यक्तित्व साम्प्रदायिक सद्भाव का प्रतीक है। उन्होंने इनसान की समानता का संदेश दिया। वे सभी धर्मों का आदर करते थे। उन्होनें सभी धर्मों के महापुरुषों का सम्मान किया। उन्होंने लोगों में चेतना जागृत की कि राम और रहीम एक हैं, कृष्ण और करीम में कोई अन्तर नहीं है। उन्होंने सभी धर्मों की उच्च शिक्षाओं को अपनाया। उन्होंने संन्यासियों, मुल्ला, मौलवियों, सूफियों, योगियों, पंडितों और वैरागियों सबसे बात की। बेहतर समाज के लिए सूत्र जहां मिले, उन्हें ग्रहण किया। उन्होनें सभी धर्मों के देवदूतों को--श्रीकृष्ण, गौतम बुद्घ, हजरत मुहम्मद को मान्यता प्रदान की। वे हर धर्म के मुख्य तीर्थ स्थलों पर गए। वे इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हजरत मुहम्मद की जन्म भूमि गए, बौद्घ धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्घ की जन्मभूमि गए। गुरु नानक की इन यात्राओं को 'उदासी' कहते हैं। गुरु नानक ने देश-विदेश की जितनी यात्राएं कीं, शायद ही किसी संत ने की होंगी। ''ये यात्राएं उन्होंने कई दिशाओं में कीं। सबसे पहले वे पूर्व की ओर हिन्दुओं के धर्म-स्थल यथा कुरुक्षेत्र, हरिद्वार और बनारस से होते हुए सुदूर उड़ीसा, बंगाल और आसाम पहुंचे। वर्षों की लम्बी यात्राओं के दौरान जहां-जहां वे गये, वहां उन्होंने मित्रता और बंधुत्व की भावना का, संकीर्णता को छोडऩे का प्रचार किया और अनन्य परमेश्वर की उपासना पर बल दिया, जो सभी का सर्जनहार है और जिसकी दृष्टि में सब समान हैं। इस तरह उन्होंने अनगिनत संकीर्ण मतवादों को खत्म करने और सभी लोगों को प्रेम के बंधन में बाँधने का उपक्रम किया। वे हिन्दुस्तान में और हिन्दुस्तान के बाहर सुदूर मक्का और बगदाद तक मुसलमानों के धार्मिक केन्द्रों में भी गए। मुसलमानों को उन्होंने करुणा और वैराग्य का संदेश दिया। उन्होंने हिन्दुओं और मुसलमानों को भाइयों की तरह रहने की शिक्षा दी। ... योगियों के साथ उनकी बहसें हुई, जिनमें उन्होंने एकाकी जीवन की अपर्याप्तता की ओर संकेत किया जबकि विश्व पाप और बुराई तले जल रहा हो। उन्होंने उनसे कहा 'लोगों के बीच जाओ और सच्चे रास्ते पर उनका पथ-प्रदर्शन करो। यहां तुम पर्वतीय गुफाओं में, तन पर भस्म रमाये हुए अपना जीवन बरबाद कर रहे हो। उन्होंने बड़ी ईमानदारी से इन आदर्शों का प्रचार किया और जहां कहीं भी वे गये वहां लोगों ने उनकी बातों को बड़े सम्मान और श्रद्धा से सुना। ....अपनी यात्राओं के दौरान गुरु नानक, अरब देशों के अलावा हिमालय की ऊंची चोटियों पर और मध्य भारत के बीहड़ जंगलों में सभ्य, धार्मिक विचारों से शून्य, ठगों और आदमखोरों के बीच भी गए थे। कहा जाता है कि वे श्रीलंका भी गए थे और वहां के राजा शिवनाथ को उन्होंने उपदेश दिया था। हिमालय के योगियों को जो ध्यान और अन्य गुह्य साधनाओं में जुटे रहते थे, उन्होंने धार्मिक जिन्दगी के दायित्व को महसूस करने, अज्ञान में पड़े हुए लाखों लोगों के दुख और यातना को दूर करने का उदबोधन किया था।"2 गुरुनानक के बारे में लोक में एक कहानी प्रसिद्घ है कि जब गुरुनानक मक्का गए तो वे उस ओर पैर करके सो रहे थे, तो एक मुल्ला ने उनको उस ओर पैर करके सोने से मना किया। गुरु नानक ने उससे कहा कि मेरे पैर उधर कर दीजिए जिधर मक्का नहीं है।3 गुरुनानक अंधविश्वासों और धार्मिक आडम्बरों के कितने खिलाफ थे, इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है -- वे भ्रमण करते हुए हिन्दुओं के प्रसिद्घ तीर्थ स्थल हरिद्वार गए वहां उन्होंने देखा कि पण्डे पूर्व दिशा की ओर मुंह करके सूर्य को पानी दे रहे हैं, तो गुरुनानक ने इसके विपरीत दिशा यानि पश्चिम की ओर पानी देना आंरभ कर दिया। इस पर पण्डों ने पूछा कि वह क्या कर रहा है, तो उन्होंने कहा कि वे अपने पंजाब के खेतों को पानी दे रहे हैं। इस पर पण्डे हंसे और नानक से कहा कि पंजाब यहां से बहुत दूर है, यह पानी पंजाब नहीं पहुच सकता तो उन्होंने उत्तर दिया कि जब तुम्हारा पानी सूरज पर पहुंच सकता है तो मेरा पंजाब तो उससे बहुत पास है, फिर वहां तक पानी क्यों नहीं पहुंच सकता।4
गुरुनानक ने हिन्दू-मुस्लिम एकता पर जोर दिया, उन्होंने कहा कि हिन्दू और मुसलमान एक ही ईश्वर के बन्दे हैं, दोनों में कोई भेद नहीं है। जो ईश्वर के नाम पर लोगों को बांटते हैं और लड़वाते हैं, वे धार्मिक नहीं हैं, वे धर्म के नाम पर लोगों को धोखा दे रहे हैं, वे बेईमान हैं-
'बन्दे एक खुदाय के हिन्दू मुसलमान,
दावा राम रसूल कर, लडदे बेईमान।'
''गुरुनानक और उनका साथी मरदाना पूर्वी भारत की यात्रा करने निकल पड़े। इस समय गुरु जी ने अपनी वेशभूषा बड़ी विचित्र बना रखी थी। वे अंबुआ रंग का चोला पहने हुए थे। उस पर सफेद रंग का दुपट्टा पड़ा हुआ था। सिर पर टोपी ऐसी थी जैसे मुसलमान कलंदर पहनते हैं। साथ ही मस्तक पर उन्होंने केसरिया तिलक लगा रखा था। इस वेशभूषा का कुछ भाग हिन्दुओं जैसा था और कुछ भाग मुसलमानों जैसा। उन्हें देखकर यह अनुमान लगाना कठिन था कि वे हिन्दू हैं या मुसलमान"5
गुरुनानक ने हिन्दू-मुसलमानों में एकता स्थापित करने के लिए, तथा ऊंच-नीच का भेद मिटाने के लिए केवल प्रवचन ही नहीं दिए, बल्कि ठोस परम्पराएं भी शुरू कीं। उन्होंने 'लंगर' और 'संगत' की प्रथा चलाकर समाज में व्याप्त भेदभाव को समाप्त करने की दिशा में कदम उठाया। इनका महत्त्व समझाते हुए कहा कि संगत का अर्थ है --एक साथ मिलकर भजन कीर्तन और ध्यान करें और लंगर का अर्थ है कि एक ही पंक्ति में बैठकर बिना किसी भेदभाव के एक साथ मिलकर भोजन करें। इस तरह गुरुनानक ने धर्म के दार्शनिक पक्ष पर एकता स्थापित करने तथा समाज में व्याप्त सामाजिक भेदभाव को मिटाने के लिए ठोस कार्य किए।
ग्ुारुनानक धर्म, जाति, वर्ण आदि की श्रेष्ठता में विश्वास नहीं करते थे। गुरुनानक के समानता आधारित मानवीय धर्म को हिन्दू और मुसलमान दोनों धर्मों के लोगों ने अपनाया। गुरुनानक के मत का मुसलमान बहुत आदर करते थे। धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं था, क्योंकि गुरुनानक के बहुत से अनुयायी मुसलमान थे और बहुत मुसलमान उनके प्रशसंक रहे हैं। बचपन में नानक ने मौलवी मुहम्मद हसन से शिक्षा प्राप्त की। मुसलमान फकीरों से उनका घनिष्ठ संबंध रहा। मरदाना गुरु नानक का शिष्य था। वह हमेशा उनके साथ रहता था। अन्त तक वह गुरुनानक के साथ रहा। जब गुरुनानक गाते थे तो मरदाना रबाब बजाता था।
शाह अशरफ पानीपत के रहने वाले थे। गुरुनानक उनके पास गए तो शाह अशरफ ने उनसे पूछा कि तुमने गृहस्थी के कपड़े क्यों पहने हैं और सिर को क्यों नहीं मुंडवाया। गुरुनानक ने जबाब दिया कि सिर मुंडवाने की बजाए मन को मुंडवाना चाहिए और जहां तक कपड़ों को त्यागने का सवाल है तो हमें मोह-माया व अहंकार का त्याग करना चाहिए। सूफी साधक शाह अशरफ उनके जवाब से इतने प्रसन्न हुए कि गुरुनानक के हाथों को चूमने लगे और कहा कि ''आपके अन्दर मुझे अल्लाह का नूर दिखाई देता है"। इनके अतिरिक्त मियां मिठ्ठा जलाल, बाबा बुढन शाह, वली कन्धारी, पीर अब्दुल रहमान, सज्जन जैसे मुसलमान गुरुनानक के अनुयायी रहे।
''यह कहा जा सकता है कि वे विभिन्न धर्मों में समन्वय बैठाने वाले महान साधक थे। इसका अभिप्राय यह है कि उन्होंने विभिन्न धर्मों के प्रचारकों से अपने धर्मों के बुनियादी तत्वों से समझौता करने के लिए नहीं कहा, न ही उन्होंने विभिन्न धर्मों की विभिन्न बातों को मिलाकर कोई नया मिश्रित धर्र्म तैयार करने का प्रयत्न किया। उन्होंने कहा कि हर मनुष्य को अपने धर्म पर, जिसमें उसकी आस्था है, सच्चाई से चलना चाहिए और उसके प्रति निष्ठावान रहना चाहिए। उसे अपने धर्म का पालन इस रूप में करना चाहिए जिससे उसके धर्म और विश्वास की मूल्यगत विश्वजनीनता और मानवता की चेतना अभिव्यक्त हो सके। सार्वभौम विश्वजनीन नैतिक गुणों के प्रचार का यह महत् प्रयत्न था। उन्होंने कहा कि ''मुसलमान कहलवाना कठिन है, परन्तु यदि कोई सचमुच मुसलमान है तो उसे ऐसा कहलाने का अधिकार है। इसके लिए सबसे पहली शर्त धर्म-प्रेम है, फिर हृदय के पाप के धब्बों का साफ करना अपेक्षित है। जब कोई व्यक्ति मुसलमान बनता है तथा धर्म को अपना कर्णधार स्वीकार करता है तो उसे अपने जन्म-मरण की सारी चिन्ता त्याग देनी चाहिए। उसे ईश्वरेच्छा के सम्मुख पूरी तरह नतमस्तक होना, ईश्वर की आज्ञा का पालन करना तथा आत्म-विसर्जन करना अपेक्षित है। ऐसा व्यक्ति तभी सभी जीवधारियों के लिए वरदान होगा और तभी सच्चा मुसलमान कहला सकता है।
मुसलमान कहावणु मुसकलु जा होई ता मुसलमाणु कहावै।
अवलि अउलि दीनु करि मिठा मसलमाना मालु मुसावै।।
होइ मुसलिमू दीन मुहाणै मरणा जीवण का भरम चुकावै।
रब की रजाई मैने सिर उपरि करता मैने आपु गवावै।।
तऊ नानक सरब जीआ मिहरमति होइ त मुसलमाण कहावै।।6
गुरुनानक ने समाज में व्याप्त मूर्ति-पूजा, अवतारवाद, अंधविश्वास, रूढि़वाद, वर्ण-व्यवस्था की ऊंच-नीच व छुआछूत आदि बुराइयों का विरोध किया जो समाज की समानता में रुकावट पैदा कर रहे थे। धर्म के नाम पर फैले पाखंडों को, बाहरी आडम्बरों का खुलकर विरोध किया। उनका मानना था कि ईश्वर को प्राप्त करने के लिए किसी मंदिर, मस्जिद और मठ में जाने की आवश्यकता नहीं है। धर्म के नाम पर पाखण्ड फैलाने वालों का उन्होंने विरोध किया। जो लोग अपने आप को गुरु और पीर कहलाते हैं, किन्तु भीख मांगने जाते हैं, उनके चरणों पर कभी नहीं पडऩा चाहिए। वही व्यक्ति सच्चा मार्ग पहचानता है जो स्वयं परिश्रम करके खाता है और उसमें से कुछ अपने हाथों से कुछ देता है।
गुरु पीरू सदाए मंगण जाए। ता के भूलि न लगिऐ पाए।।
घालि खाइ किछु हथहु देइ। नानक राहु पछाणिहि सेइ।।
जो मनुष्य झूठ बोलकर दूसरों का हक खाता है, तथा इसके विपरीत समझाता है, ऐसे उपदेशक की कलई खुल जाती है। वह स्वयं तो ठगा ही जाता है, अपने साथियों को भी लुटवा देता है।
कूडु बोलि मुरदारू खाइ। अवरी नो समझावणि जाइ ।
मुठा आपि मुहाए साथै। नानक ऐसा आगू जापै ।।
यदि कपड़े पर खून लग जाए तो वह अपवित्र हो जाता है। परन्तु जो लोग मनुष्यों का खून पीते हैं, शोषण करते हैं, उनका चित्त किस प्रकार निर्मल रह सकता है ?
जे रतु लगै कपडै़ जामा होइ पलीतु ।
जो रतु पीवहि माणसा तिन किउ निरमलु चीतु ।।
पांखडी लोग संसार को ठगने के लिए आंखें बंद करके नाक पकड़ते हैं। ये लोग दो उंगलियों से नाक पकड़कर यह दावा करते हैं कि उन्हें तीनों लोकों का ज्ञान है;किन्तु अपने पीछे रखी चीज इन्हें दिखाई नहीं देती। यह कैसा पद्मासन है !
अखी त मीटहि नाक पकडहि ठगण कउ संसारू ।।
आंट सेती नाकु पकडहि सूझते तिनि लोअ ।
मगर पाछै कछु न सूझै एहु परमु अलोअ ।।
गुरु नानक ने धर्म के नाम पर आम जनता का शोषण करने वाले कथित धार्मिक नेताओं के अधार्मिक व्यवहार की तीखी आलोचना की, जो धर्म का वास्ता देकर भोले भाले लोगों की धार्मिक भावनाओं का शोषण करते हैं। उन्होंने लिखा कि 'काजी झूठ बोल-बोलकर हराम की कमाई खाता है। ब्राह्मण जीवों को दु:ख देकर नहाता फिरता है। योगी अंधा अज्ञानी है, वह युक्ति नहीं जानता। ये तीनों उजाड़ के समान हैं।
कादी कूडु बोलि मलु खाइ। ब्राह्मणु नावै जीब धई।।
जोगी जुगति न जाणै अंधु। तीने ओजाड़े का बंधु।
गुरु नानक ने कर्मकाण्डों और खोखले रिवाजों का विरोध किया। उन्होंने आचरण की शुद्घता पर जोर दिया। धर्म का कर्मकाण्डी रूप हमेशा मानवता के विकास के लिए बाधक रहा है। व्यवहार की पवित्रता पर जोर देने के लिए गुरु नानक ने जीवन की नई परिभाषाएं दीं, हिन्दू और मुसलमान पण्डे-पुजारियों और मुल्ला-मौलवियों से बाहरी आडम्बरों को छोड़कर आन्तरिक शुद्घता पर बल देने के लिए कहा। हिन्दुओं से उन्होंने कहा कि ''मुझे ऐसा जनेऊ पहनाओ जिसमें दया की कपास हो, संतोष की सूत हो, संयम की गांठ हो और सत्य उस जनेऊ की पूरन हो। यह जनेऊ न टूटता है,न इसमें मैल ही लगता है। वह न जलता है और न ही यह खोता ही है। हे नानक वे मनुष्य धन्य हैं जो अपने गले में इस प्रकार का जनेऊ पहनकर परलोक जाते हैं। ओ पंडित, जो जनेऊ तुम पहनते-फिरते हो, यह तो तुमने चार कौड़ी देकर मंगवा ली है और अपने यजमान के चौके में बैठकर उसके गले में पहना दिया है। तत्पश्चात् उसके कानों में यह उपदेश दिया कि आज से तेरा गुरु ब्राह्मण हो गया। आयु समाप्त होने पर जब वह यजमान मर गया तो वह जनऊ उसके शरीर से गिर गया। जनेऊ के बिना ही संसार से विदा हो गया।
दइया कपाह संतोखु सूतु जतु गंढी सतु वटु।
एहुं जनेउ जीअ का हई त पाडे घतु।।
ना एहु लूटै न मलु लगै न एहु जले न जाइ।
धनु सु माणस नानका जो गलि चले पाइ।।
चउकडि़ मुलि अणइया बहि चनद्रकै पाइया।
सिखा कानि चड़ाइया गुरु ब्राह्मनु थिआ।
ओहु मुआ ओहु झडि़ पाइया वे तगा गइया।।
गुरु नानक ने कहा कि अपने संबंधियों की आत्माओं की शान्ति के लिए किया गया दान अगर ईमानदारी की कमाई में से नहीं है, तो वह चोरी है।
''यदि कोई ठग पराया घर लूटे और उस घर को लूटकर अपने पितरों के श्राद्ध के रूप में अर्पित करे तो परलोक में वे वस्तुएं पहचान ली जायेगी और पितर लोग चोर साबित होंगे। परमात्मा वहां न्याय करेगा कि दलाल का हाथ काट लिया जाए। हे नानक, आगे तो मनुष्य को वही मिलता है जो वह कमाता है और अपने हाथों से देता है।"
जे मोहाका घरु मुहै थरु मुहि पितरी देई।
अगै बसतु सिजाणीऐ तिपरी चोर करेई।।
बड़ी अहि हथ दलाल के मुसकी एह कोई।
नानक अगै सो मिलै जि खटै घाले देई।।
देवताओं और दूसरे पितरों के निमित पिंड बनाने के पीछे ब्राह्मण स्वयं भोजन करते हैं। जबकि परमात्मा की कृपा का जो पिंड है वह कभी समाप्त नहीं होता।
इक लोकी होरु छमिछरी ब्राह्मण वटि पिंडु खाइ।
नानक पिंडु बखसीस का कबहु निखूटसि नाहि।।
लोग तीर्थ में स्नान करने तो जाते हैं, किन्तु वे अपने मन के खोट और तन के चोर होते हैं। स्नान करने से बाहरी मैल तो उतर जाता है, लेकिन मैल का दूसरा भाग यानी अंहकार व पाखंड, और अधिक बढ़ जाता है। तुमड़ी यानी कड़वी लौकी को बाहर चाहे जितना धो दिया जाए किन्तु भीतर वह बड़ी जहरीली या कड़वी होती है। साधु लोग बिना नहाए भी सज्जन रहते हैं पर जो चोर हैं वे नहाकर भी चोर ही रहते हैं।
नावण चले तीरथी मनि खोटे तनि चोर।
इकु भाउ लथी नातिआ दुइ भा चड़ी असु होर।।
बाहरि धेती तुमड़ी अंदरि विसु निकोर।
साथ भले अणनातिया चोर सि चोरा-चोर।।
योग की प्राप्ति न तो कंथा में है, न डंडा लेने में है और न शरीर पर भस्म लगाने में। योग न तो कानों में मुद्रा पहनने में है, न मंूड़ मुंड़वाने में और न श्रृंगी बजाने में। योग की वास्तविक युक्ति माया में रहकर भी माया से अलिप्त रहने में है। इसी से योग की प्राप्ति होती है। निरी कोरी बातों से योग की प्राप्ति नहीं होती। जो सभी को एक दृष्टि से देखता है, वही वास्तविक योगी कहलाने का अधिकारी है। कब्रों या शमशानों में पड़े रहना भी योग नहीं है और बाह्य वस्तु में ध्यान लगाना भी योग नहीं है। देश-देशान्तरों का भ्रमण करना भी योग नहीं है और न तीर्थादिकों के स्नान करने से ही योग की प्राप्ति होती है। यदि माया के बीच रहते हुए निरंजन से युक्त रहा जाए तो यही योग की वास्तविक युक्ति है और इसी से योग प्राप्त होता है। सद्गुरु मिले तभी भ्रम टूट सकता है। जब विषयों की ओर दौड़ते हुए मन को रोककर रखा जा सके तभी आत्मानंद का निर्झर झरने लगता है और सहजावस्था में ही वृत्ति रम जाती है और अपने घर ही में प्रिय का परिचय प्राप्त हो जाता है।
जोगु न खिंथा जोगु न डंडै जोगु न भसम चडाइऐ ।
जोगु न मुंदी मुंडी मुंडाइऐ जोगु न सिंगी वाइऐ ।
अंजन माहि निरंजनि रहीऐ जोग जुगति इव पाइऐ ।
गल जोगु न होइ ।
एक दृस्टि करि समसरि जाणै जोगी कहीऐ सोइ ।।
जोगु न बाहरि मड़ी मसाणी जोगु न ताड़ी लाईए।
जोगु न देसि दिसंतरि भविए जोग न तीरथि नाईए।
अंजन माहि निरंजन रहीऐ जोगु जुगति इव पाइए।।
सतिगुरु पे हाटै सहसा लुटै धवत बरजि रहाईए।
निढरु झरै सहज धुनि लागै घर ही परचा पाइए।।
लालच कुत्ता है, झूठ भंगी है, ठग कर खाना मरे हुए पशु को खाने के समान है। पराई निंदा मुंह में गिरी पराई मैल है। क्रोध की अग्नि ही चांडाल है। हे करतार , आत्म-श्लाघा ही विविध प्रकार के कसैले रस हैं।
लबु कुता कूडु चूहड़ा ठगि खाध मुरदारू ।
पर निंदा परमलु मलु मुखसुधी अगनि क्रोध् चंडालु
रस कस आपु सलाहण ए करम मेरे करतार ।
गुरुनानक बचपन में अपनी बहन नानकी के पास रहते थे। वे कहते थे कि ''ना कोई हिन्दू है ना कोई मुसलमान" इस पर कट्टरपंथी हिन्दू और मुसलमान दोनों नाराज होने लगे। शहर के काजी ने नबाब दौलतखान से शिकायत की। नबाब ने उन्हें बुला भेजा और पूछा - ''यह आपको क्या हो गया है? आप कहते हैं कि न कोई हिन्दू है, न कोई मुसलमान। इसका क्या मतलब होता है?"
नानक ने कहा- ''मैं इंसान और इंसान के बीच कोई फर्क नहीं मानता। ईश्वर मनुष्य की पहचान उसके अच्छे गुणों से करता है, न कि उसके हिन्दू और मुसलमान होने के कारण।"7
धर्मों के मुख्य स्थलों पर व्याप्त पाखण्डों व आडम्बरों से गुरु नानक चिंतित थे। इनके कारण धर्म की वास्तविक सीख धुंधली पड़ रही थी, बाहरी आडम्बरों को ही धर्म का पर्याय मान लिया गया था। ''मुसलमान काजी तथा अन्य हाकिम हैं तो मनुष्य भक्षी पर वे पढ़ते हैं नमाज। उसके मुंशी ऐसे खत्री हैं जो छुरी चलाते हैं पर उनके गले में जनेऊ है। उनके घर जाकर ब्राह्मण शंख बजाते हैं, इसलिए उन ब्राह्मणों को भी उन्हीं पदार्थों के स्वाद आते हैं। झूठ की पूंजी है और झूठा व्यापार है। झूठ बोलकर ही वे लोग गुजारा करते हैं। शर्म और धर्म का डेरा दूर हो गया है । हे नानक सभी स्थानों में झूठ ही झूठ व्याप्त हो गया है।
माणस खाणो करहि निवाज। छूरी वगाइनि तिन गलि ताग।।
तिन घरि ब्राह्मण पूरहि नाद। उना भी आबहि कोई साद।।
कूड़ी रासि कूड़ा वापारु, कूडू बेली करहि आहारु।।
सरम ध्रम का डेरा दूरि। नानक कुडू रहिआ भरपूरि।।
अथै टिका तेडि़ धेति करवाई। हथि छुरी जगत कसाई।।
नानक ने मुसलमानों से कहा कि --'दया को अपनी मस्जिद बना, सच्चाई को मुसलमान बना, इंसाफ को कुरान बना, विनय को खतना समझ, सज्जनता को रोजा रख तब तू सच्चा मुसलमान बनेगा। नेक कामों को तू अपना काबा बना, सच्चाई और ईमानदारी को अपना पीर बना, परोपकार को अपना कलमा समझ, खुदा की मर्जी को अपनी तसबीह, तब ऐ नानक , खुदा तेरी लाज रखेगा।'
मिहर मसीति सिदकु मुसला हकु हलालु कुराणु ।
सरम सुनति सीलु रोजा होहु मुसलमाणु ।।
करणी काबा सचु पीरू कलमा करम निवाज ।
तसबी सा तिसु भावसी नानक रखे लाज ।।
गुरुनानक ने संस्थागत धर्म के बाहरी कर्मकाण्डों को छोड़कर धर्म की मानवीय शिक्षाओं पर बल दिया। उन्होंने पांच वक्त की नमाज के बारे में अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि ''पहली नमाज सचाई है, ईमानदारी की कमाई दूसरी नमाज है, खुदा की बंदगी तीसरी नमाज है, मन को पवित्र रखना चौथी नमाज है, और सारे संसार का भला चाहना उसकी पांचवीं नमाज है। हे काजी ! जो ऐसी नमाज पढ़ता है वह सच्चा मुसलमान है। इस तरह की नमाजों और कलमों से रहित जितने भी लोग हैं, वे सब झूठे हैं और झूठे की प्रतिष्ठा भी झूठी होती है।"
पंजि निवाजा बखत पंजि पंजा पंजे नाउ।
पहिला सचु हलाल दुइ तीजा खैर खुदाई।।
चऊथी नीअति रासि मनु पंजवी फिति सनाइ।
करणी कलमा आखै कै ता मुसलमाणु सदाइ।
नानक जेते कुडिय़ार कूड़ै कूड़ी पाई।।
गुरुनानक ने बेइमानी और शोषण को अधर्म बताया और अपने हक की कमाई करने वाले को सच्चा धार्मिक बताया है। उन्होंने कहा कि पराया हक मुसलमान के लिए सुअर और हिन्दू के लिए गाय के समान है। गुरु और पीर उसी की हामी भरते हैं जो बेइमानी की कमाई नहीं खाता। केवल लम्बी बातें करने से स्वर्ग नहीं जाया जा सकता। सच की कमाई करने से ही छुटकारा पाया जा सकता है। हराम के मांस में चतुराई का मसाला डाल देने से वह हलाल नहीं बन जाता। झूठी बातें करने से झूठ ही पल्ले पडता है।
हकु पराइया नानका उसु सूअर उस गाय ।
गुरु पीर हामा ता भरै जा मुरदारु न खाइ ।
गली भिसति न जाईऐ छुटै सचु कमाइ ।
मारण पाहि हराम महि होइ हलालु न जाइ ।।
नानक गली कूडीई कुडो पले पाइ ।।
गुरु नानक ने छुआछूत का विरोध किया और वे ऊंच-नीच में विश्वास नहीं करते थे। उन्होंने कहा कि मैं, नीची जाति में जो नीच हैं और उन नीचों में भी जो बहुत नीच हैं, उनके साथ हूं :
नीची अन्दर नीच जाति नीची हूँ अति नीचु ।
नानकु तिनके संगि साथि वडिया सिउ किया रीस।
जिथै नीच समालीअनि तिथै नदरि तेरी बखसीस।।
जातिगत श्रेष्ठता को त्यागने पर जोर देते हुए कहा
जाति का गरब न कर मूरख गवारा ।
इस गरब ते चलहिं बहुत विकारा ।
परमात्मा के द्वार से न कोई जाति है और न जोर ही है। परमात्मा के यहां तो जीवों का नया ही विधान चलता है। वहां तो वे ही कोई कोई व्यक्ति भले गिने जाते हैं जिन्हें कर्मों के लेखे यानी हिसाब का उस समय आदर प्राप्त होता है।
अगै जाति न जोरु है जीव नवै।
जिसकी लेखै पति पवै चंगे सेई केई।।
गुरुनानक ने नारी को सम्मान दिया है, उन्होंने कहा कि ''स्त्री द्वारा ही हम गर्भ में धारण किए जाते हैं, और उसी से जन्म लेते हैं। उसी से हमारी प्रगति होती है और उसी से विवाह होता है। उसी से सृष्टि क्रम चलता है। एक स्त्री के मर जाने पर दूसरी स्त्री खोजनी पड़ती है। स्त्री हमें सामाजिक बंधन में रखती है फिर हम उस स्त्री को मंद यानि नीच, क्यों कहें, जिससे महान पुरुष जन्म लेते हैं।"
पितृसत्ता की विचारधरा ने स्त्री को पाप की जननी कहकर उसे मानवीय गरिमा प्रदान नहीं की। स्त्री मानव-शिशु को जन्म देकर सृष्टि को आगे बढ़ाती है, लेकिन उसे ही अस्पृश्य व्यवहार सहन करना पड़ता है। शिशु के चालीस दिन तक घर अपवित्र मान लिया जाना अंधविश्वास ही है। गुरु नानक ने सूतक सम्बन्धी अंधविश्वास पर प्रश्न चिह्न लगाकर स्त्री को मानवीय दर्जा दिया। उन्होंने कहा कि 'यदि सूतक मानना ही है तो इस प्रकार का सूतक मानो कि मन का सूतक लोभ है, जिह्वा का सूतक झूठ है। आंखों का सूतक दूसरे का धन तथा दूसरे की स्त्री का रूप देखना है। कानों का सूतक यह है कि बेफिक्र होकर दूसरे की चुगली सुनी जाए। हे नानक, बाह्य वेश में हंसों के समान मनुष्यों में भी यदि उपर्युक्त सूतक हैं तो वे बंधे हुए यमपुरी जाते हैं। सूतक सब भ्रम ही है, जो द्वैत भाव में फंसे हुए मनुष्यों को लग जाता है।
मन का सूतकु लोभु है जिह्वा सुतकु कूडू।
अखी सूतकु वेखणा परतृअ परधन रुप।।
कनी सुतकू कनि पै लाइत बारी खाहि।
नानक हंसा आदमी बधे जमपुरि जाहि।।
सभी सूतकु भरमु है दूजै लगै जाई।।
आज के राजा व्याघ्र के समान हिंसक हो गये हैं। इनके चौधरी कुत्तों के समान लालची हैं। ये लोग अपनी शांत-सुप्त प्रजा को अनायास सताते रहते हैं। राजाओं के नौकर अपने तेज नाखूनों से लोगों पर घाव करते हैं और उनका खून राजाओं के चौधरी चाट जाते हैं। जिस स्थान पर प्राणियों के कर्मों की छान-बीन होगी, वहां उन नाएतबारों की नाक काट ली जाएगी।
राजे सीह मुकद्दम कुत्ते।
जाइ जगाइन बैठे सुत्ते ।।
चाकर नहदा पाइन्हि घाउ ।
रतू पितू कुतिहो चटि जाहु ।।
जिथै जीआं होसी सार ।
नकीं वढीं लाइतबार ।।
कलियुग छुरी की तरह है, इस युग के राजे कसाई हैं, धर्म पंख लगा कर उड़ गया है, झूठ की अमावस छाई हुई है, इसमें सचाई का चन्द्रमा कहीं दिखाई नहीं देता। मैं उस चन्द्रमा को ढूंढ-ढूंढ कर व्याकुल हो गयी हंू। अंधेरे में कोई मार्ग नहीं सूझता। जीवात्मा अहंकार के दु:ख में रो रहा है। हे नानक ! इस दु:खपूर्ण स्थिति से किस प्रकार छुटकारा हो ?
कलि काते राजे कासाई ध्रमु पखु करि उडिआ ।
कूडु अमावस सचु चंद्रमा दीसै नाही कह चडिआ ।।
हउ भालि विकुंनी होई ।
आधेरै राहु न कोई ।।
विचि हउमै करि दुखु रोई ।
कहु नानक किनि बिध् गति होई ।।
जीभ का लालच मानो राजा है, पाप वजीर और झूठ बनाने वाला सरदार अथवा चौधरी है। काम नायब है, इसे बुलाकर सलाह पूछी जाती है और यह बैठे-बैठे ही विचार करता है। प्रजा ज्ञान से विहिन होने के कारण अंधी हो गई है जिससे कि अग्निरूपी तृष्णा को रिश्वत दे रही है।
लबु पापु दुर राजा महता कूडू होआ सिकदारु।
कामु नेवू सदि पूछिऐ बहि बहि करै बीचारु।
अंधी रयति गिआन बिहूणी भाहि भरै मुरदारु।
राजा, प्रजा और भूमिपति भी नहीं बच पाएगा। दुकानें, नगर, बाजार उसके हुक्म से नष्ट हो जायेंगें। सुदृढ़ और भव्य महल तथा वस्तुओं से भरे भंडार जिन्हें मूर्ख व्यक्ति अपनी समझे बैठा है, एक क्षण में रिक्त हो जायेंगें। अरबी घोड़े, रथ और ऊंट, लोहे का झूल, बाग, जमीन घर बार अब कहां गए? तंबू, नीवार वाले पलंग, रेशमी कनातें सभी नष्ट हो जायेंगें। गुरु नानक कहते हैं कि हे मनुष्य तुम्हारी पहचान इन चीजों से नहीं होगी बल्कि स्वत्व से होगी।
राजे रैयत सिकदार कोई न रहसिऊ।
हट्ट पट्टन बाजार हुकुमी ढहसीऊ।।
पक्के बंक दुआर मूरख जाणै आपणै।
दरबि भरे भंडार रीते इकि खणै।।
ताजी रथ तुखर हाथी पाखरे।
बाग पलंग निवार सराइचे लालती।
नानक सच दातारु सिनाखतु कुदरती।।
''गुरु नानक भविष्य द्रष्टा थे। उन्होंने आध्यात्मिकता और नैति़़कता से प्रेरित संश्लिष्ट कर्मयुक्त जीवन का स्वप्न देखा था और ऐसे समाज की कल्पना की थी जो एक ओर स्वार्थी पुराहित वर्ग से मुक्त हो, दूसरी ओर निरंकुश राजाओं और उनके अत्याचारी चाटुकारों से।"8 अपने समय के भ्रष्टाचार और अन्याय को उदघाटित किया है। तत्कालीन शासन-व्यवस्था की पदसोपानिकता को उदघाटित किया है।
गुरुनानक का हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों में कितना आदर था इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनकी मृत्यु के संबंध में कहावत समाज में प्रचलित है। कहावत है कि गुरुनानक की मृत्यु के समय हिन्दू उनका दाह-संस्कार करना चाहते थे, जबकि मुसलमानों की जिद्द थी कि उन्हें दफनाया जाए।9 इससे यह जरूर स्पष्ट होता है कि गुरुनानक हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल हैं . गुरुनानक देव ने सभी धर्मों का आदर किया और सभी धर्मों के लोग उनके अनुयायी थे। उनका जीवन और सिद्घांत साम्प्रदायिक सदभाव की मिसाल है। उनके सिद्घांत मिली-जुली संस्कृति और विचारों का परिणाम हैं। समाज में व्याप्त भेदभावों को मिटाने के लिए तथा सामाजिक समानता व साम्प्रदायिक सद्भाव बनाने के लिए गुरुनानक देव के विचार आज भी प्रासंगिक हैं।

संदर्भ:
1-कर्तार सिंह दुग्गल; धर्मनिरपेक्ष धर्म; नेशनल बुक ट्रस्ट, दिल्ली; 2006; पृ.-1
2- गुरुबचन सिंह तालिब; गुरुनानक; साहित्य अकादमी, पृ.-9 से 12
3-सर्वपल्ली राधाकृण; हमारी संस्कृति; पृ.-96
4-वही; पृ. 96
5-महीप सिंह; गुरुनानक; सरस्वती विहार, दिल्ली; 1989; पृ.-27
6- गुरबचन सिंह तालिब; पृ.-17
7-वही पृ.-16
8- गुरुबचन सिंह तालिब; गुरुनानक; साहित्य अकादमी, दिल्ली; 2002; पृ.-7
9- कर्तार सिंह दुग्गल; धर्मनिरपेक्ष धर्म; नेशनल बुक ट्रस्ट, दिल्ली; 2006; पृ.-1