फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ः मुक्ति और प्रेम के कवि
डा. सुभाष चन्द्र, एसोशिएट प्रोफेसर, हिन्दी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र
फैज़ अहमद फैज का जन्म 13 फरवरी, 1911 को अविभाजित पंजाब के सियालकोट में हुआ। उनके पिता का नाम सुल्तान मोहम्मद और माता का नाम सुल्तान फातिमा था। चार साल की उम्र में उनकी शिक्षा आरम्भ हुई और उन्होंने कुरान को कठस्थ कर लिया था। प्रथम श्रेणी में मैट्रिक और इंटरमीडियट की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर से...
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अज्ञेय की कविता में विभाजन की त्रासदी
By प्रोफेसर सुभाष सैनी अप्रैल 25, 2011
अज्ञेय की कविता में विभाजन की त्रासदी
डा. सुभाष चन्द्र, एसोशिएट प्रोफेसर, हिन्दी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय,कुरुक्षेत्र
हिन्दी साहित्य-जगत की विलक्षण प्रतिभा सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का जीवन और साहित्य विवादास्पद रहा है। अंग्रेजी और संस्कृत साहित्य से प्रतीकों और बिम्बों का प्रयोग, समाज से कटकर व्यक्तिवादिता के खोल में सिमटे कलावादी होने के उन पर कई तरह के आरोप लगते रहे हैं। निस्संदेह इन आरोपों में कुछ सच्चाईयां हैं। इसके...
बाबूराव बागुल
By प्रोफेसर सुभाष सैनी अप्रैल 21, 2011

बाबूराव बागुल
सुभाष चन्द्र, एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र
मराठी के चिंतक-साहित्यकार बाबूराव बागुल ने अपने उपन्यास, कहानियों, कविताओं के साथ-साथ चिंतनपरक साहित्य-सृजन से दलित साहित्य को विस्तृत आधार तथा दृष्टि प्रदान की है। वे अपने वर्ग के प्रतिबद्ध रचनाकार हैं, जिन्होंने दलित जीवन की पीड़ा को व्यक्त करने सचेत तौर दायित्व लिया। उन्होंने...
हाशिये के लोगों की औपन्यासिकता का विमर्श
By प्रोफेसर सुभाष सैनी जनवरी 26, 2011
हाशिये के लोगों की औपन्यासिकता का विमर्श
सुभाष चन्द्र, एसोसिएट प्रोफेसर,हिन्दी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र
वीरेन्द्र यादव रचित 'उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता' पुस्तक हिन्दी आलोचना और विशेषकर उपन्यास आलोचना के लिए महत्त्वपूर्ण है। आधुनिक काल के अन्तर्द्वन्द्वों को उपन्यास ने मुख्यत: व्यक्त किया है। अपने समय के विमर्शें को भी स्थान दिया है। यद्यपि आधुनिक काल में जन सामान्य के जीवन के विभिन्न पहलुओं को साहित्य में प्रमुखता...
संस्कृति और साम्प्रदायिकता
By प्रोफेसर सुभाष सैनी जनवरी 17, 2011
सुभाष चन्द्र, एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र साम्प्रदायिकता अपने को संस्कृति के रक्षक के तौर पर प्रस्तुत करती है, जबकि वास्तव में वह संस्कृति को नष्ट कर रही होती है। साम्प्रदायिक लोग अपने को सांस्कृतिक पुरूष, अपनी राजनीति को संस्कृति के रूप में पेश करते हैं, संस्कृति की शुद्धता व सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की लफ्फाजी के लिए प्रख्यात है। हिन्दी के महान रचनाकार मुन्शी प्रेमचन्द ने कहा था कि 'साम्प्रदायिकता हमेंशा...
साम्प्रदायिकता
By प्रोफेसर सुभाष सैनी जनवरी 16, 2011
साम्प्रदायिकतासुभाष चन्द्र, एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र
साम्प्रदायिकता मात्र दो धर्मों के बीच विवाद, झगड़ों व हिंसा की घटनाओं का ही नाम नहीं है दो धार्मिक समुदायों के विवादों तक सीमित नहीं बल्कि एक विचारधारा का नया रूप धारण कर लिया है, अपनी एक तर्क-पद्धति विकसित कर ली है जिसके आधार पर वह समाज के विभिन्न पक्षों पर विचार करती है। समझ के स्तर पर साम्प्रदायिकता को एक विचारधारा के रूप में न देख पाना साम्प्रदायिकता...
धर्म बनाम साम्प्रदायिकता
By प्रोफेसर सुभाष सैनी जनवरी 16, 2011
धर्म बनाम साम्प्रदायिकता
सुभाष चन्द्र, एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र
आधुनिक भारत पर साम्प्रदायिकता की काली छाया लगातार मंडराती रही है। साम्प्रदायिकता के कारण भारत का विभाजन हुआ और अब तक साम्प्रदायिक हिंसा में हजारों लोगों की जानें जा चुकी हैं और लाखों के घर उजड़े हैं, लाखों लोग विस्थापित होकर शरणार्थी का जीवन जीने पर मजबूर हुए हैं। साम्प्रदायिकता के साथ धर्म जुड़ा रहता है, जिस कारण साम्प्रदायिकता की समस्या...