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January 26, 2011

हाशिये के लोगों की औपन्यासिकता का विमर्श

हाशिये के लोगों की औपन्यासिकता का विमर्श
सुभाष चन्द्र, एसोसिएट प्रोफेसर,हिन्दी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र

वीरेन्द्र यादव रचित 'उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता' पुस्तक हिन्दी आलोचना और विशेषकर उपन्यास आलोचना के लिए महत्त्वपूर्ण है। आधुनिक काल के अन्तर्द्वन्द्वों को उपन्यास ने मुख्यत: व्यक्त किया है। अपने समय के विमर्शें को भी स्थान दिया है। यद्यपि आधुनिक काल में जन सामान्य के जीवन के विभिन्न पहलुओं को साहित्य में प्रमुखता से स्थान मिला है और वही कृति कालजयी हो पाई है जिसमें जन सामान्य के जीवन संघर्ष के विश्वसनीय चित्र दिए हैं। सृजनात्मक लेखन के साथ साथ आलोचना भी जनपक्षधरता लिए रही है। विरेन्द्र यादव ने 'वर्चस्व की सत्ता' को विश्लेषित करने के लिए पिछले वर्षों में चर्चा में रहे हिन्दी व अंग्रेजी के उपन्यासों को अपना आधार बनाया है। उपन्यासों के साथ उपन्यास पठन व आलोचना के बारे में उनका ज्ञान उनकी विद्वता को तो दर्शाता ही है, उसमें से अपना नया रास्ता भी बनाया है। 'उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता' दलित और स्त्री विमर्श के युग में नए ' कैनन फारमेशन' निर्मित करने के संकल्प से उपजी है। इसलिए इसमें एक पक्ष अपने विविध तर्कों के साथ प्रस्तुत है।

दो सौ साठ पृष्ठों की पुस्तक में कुल ग्यारह अध्याय है 'हिन्दी उपन्यास : एक सबाल्टर्न प्रस्तावना'; 'औपनिवेशिकता, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और भारतीय किसान: संदर्भ 'गोदान'; 'राष्ट्रवाद, मुस्लिम अलगाववाद और नारी प्रश्र : संदर्भ 'झूठा सच'; 'विभाजन, इस्लामी राष्ट्रवाद और भारतीय मुसलमान : संदर्भ 'आधा गांव'; 'क्षुद्रताओं के महावृत्तान्त से महानताओं की क्षुद्रता तक : संन्दर्भ 'राग दरबारी'; 'एक बेदखल इतिहास का 'पाहीघर'; 'उपन्यास का जनतन्त्र और हाशिए का समाज'; 'नारी का उपन्यास बनाम उपन्यास की नारी'; 'महज 'उन्माद' नहीं है फासीवाद'; 'घेरबन्दी के समय में 'आखिर कलाम'; 'दि इंडियन इंग्लिश नॉवेल और भारतीय यथार्थ'। इन अध्यायों के शीर्षकों से ही अनुमान लगाया जा सकता है कि यह उपन्यासों का समाजार्थिक अध्ययन है। उपन्यासों में व्यक्त यथार्थ के जरिये राष्ट्रवाद, अलगाववाद, जनतन्त्र, फासीवाद, साम्प्रदायिकता, धर्मनिरपेक्षता, ग्रामीण विकास पर विचार किया है। उपन्यासों के आधार पर समाज-राजनीति के सवालों पर विचार उपन्यास को ठोस आधार प्रदान करता है तो इस विमर्श को उपन्यास को विश्वसनीय आधार प्रदान करते हैं। विभिन्न समस्याओं व सवालो की जडें पहचानने के लिए सामाजिक जीवन में झांकना जरूरी है और उपन्यास जीवन को व्यक्त करता है। बिना जीवन अनुभवों के विमर्श शब्दों की जुगाली मात्र है तो बिना दृष्टि के अनुभव वर्णन अनुभववाद और प्रकृतवाद का शिकार होता है। उपन्यासकारों के लिए तथा उनके पाठकों के लिए उपन्यास में व्यक्त सवालों के विभिन्न पहलुओं पर विचार करना निहायत जरूरी है। विरेन्द्र यादव की यह पुस्तक दोनों के लिए ही महत्त्वपूर्ण साबित होगी।

हिन्दी के महत्त्वपूर्ण उपन्यासों का पुनर्पाठ भी कहा जा सकता है। और यह पुर्नपाठ मात्र फिर से पढऩा नहीं है, बल्कि नए दृष्टिकोण से इन्हें देखा है। वीरेन्द्र यादव की दृष्टि उपेक्षितों की दृष्टि है। हिन्दी आलोचना और साहित्य अभी आभिजात्यता से ही जकड़ा हुआ है। साहित्य में उपेक्षितों के सवाल अथवा जीवन व्यक्त भी होता है तो वह आलोचना की नजर से छूट जाता है और विमर्श का हिस्सा नहीं बन पाता है। यदि कहीं उसका जिक्र होता भी है तो मात्र इसलिए कि लेखक की दृष्टि में विस्तार है और समाज का कोई छूटा नहीं है। लेकिन उसकी विचारधारात्मक कमजोरी अथवा कलात्मकता पर विचार नहीं होता। वीरेन्द्र यादव ने न तो दृष्टि से इसे ओझल होने दिया।

पिछले कई दशकों से भारतीय समाज और राजनीति में परम्परागत तौर पर हाशिये पर धकेल दिए गए वर्गों का समाज व राजनीति में दखल जोरदार ढंग से बढ़ा है। सामाजिक-राजनीतिक जीवन में प्रभावी हस्तक्षेप का ही परिणाम है कि साहित्य में भी इन वर्गों का स्वर प्रमुखता से उभरा है। इस साहित्य की सैद्धांतिकी भी निर्मित हो रही है। उपेक्षितों की दृष्टि से साहित्य का पाठ हो रहा है, साहित्य की पड़ताल हो रही है, जिससे साहित्य के अनछुये पक्षों की ओर ध्यान जा रहा है तथा साहित्य पाठ की सीमाएं भी इसके साथ ही रेखांकित हो रही हैं। वीरेन्द्र यादव की आलोचना-दृष्टि इसी परिवेश व इन्हीं सवालों के इर्द-गिर्द बनी है। पिछले दशकों में भारतीय राजनीति ने मुख्यत: साम्प्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता, दलित, पिछड़ों व स्त्रियों की मुक्ति व भागीदारी के सवालों तथा वैश्वीकरण व विकास की विभिन्न धारणाओं, निम्र वर्ग तथा उच्च वर्ग के हितों की टकराहट के बीच ही अपना स्वरूप ग्रहण किया है। साहित्य में भी इन सवालों की अभिव्यक्ति हुई है, विशेषतौर पर उपन्यासों में तो हुई ही है।

प्रेमचन्द का लेखन विशेष तौर उनके उपन्यास किसी भी उपन्यास आलोचक के लिए प्रस्थान बिन्दू हैं। प्रेमचन्द के उपन्यासों के पाठ की भी विभिन्न व्याख्याएं सामने आई हैं। किसान जीवन के दस्तावेज के तौर पर भी पढ़ा गया और स्वतन्त्रता आन्दोलन के सवालों को व्यक्त करने के तौर भी, गांधीवाद की नजर से भी और माक्र्सवाद की नजर से भी। लेकिन सभी किस्म के आलोचकों की व्याख्याएं अपने समय की सीमाओं को नहीं लांघ पाई। विरेन्द्र यादव ने नए डा. रामविलास शर्मा तथा निर्मल वर्मा की दृष्टि की सीमाओं को रेखांकित करते हुए 'गोदान' को नए संदर्भों में समझने की कोशिश की है। स्वतन्त्रता आन्दोलन के नेतृत्व की दृष्टि, औपनिवेशिक शोषण तथा स्त्री सवालों को सही परिप्रेक्ष्य में रखने की कोशि श की है। प्रेमचन्द के लेखन को लेकर पिछले दिनों कुछ दलित चिन्तकों व कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाए। विरेन्द्र यादव ने 'गोदान' पर विचार करते हुए इसका जबाब तलाशने की कोशिश की है और प्रेमचन्द को दलित के संबंध न केवल संवेदनशील पाया, बल्कि रेडिकल चित्र दिए हैं। दलित प्रसंग में ऐसी व्याख्याएं बहुत से भ्रमों को दूर करती है।

पिछले कुछ समय से समाज के विभिन्न क्षेत्रों में नारी-विमर्श की खूब चर्चा है। नारी मुक्ति के सवालों को केन्द्र लाने वाली साहित्यिक रचनाएं आई हैं, जिसने नारी विमर्श को पुख्तगी दी है। नारी अनुभवों की विशिष्टता को उभारते हुए मानव-मुक्ति के संघर्ष के साथ जोड़कर देखा है। नारी विमर्श भी वर्ग-स्वार्थों से अछूता नहीं है, उसमें कोई एकरूपता नहीं है, बल्कि सामाजिक वर्गों के स्वार्थों को व्यक्त करने वाली दृष्टियां यहां मौजूद हैं। नारी विमर्श ने उच्च वर्ग तथा उच्च मध्यवर्ग की स्त्रियों के सवालों को लांघकर ग्रामीण और निम्र वर्गों की स्त्रियों के सवालों को तक अपना विस्तार किया है। पहले जहां कुछ गिनी-चुनी महिलाएं ही साहित्य के क्षेत्र में थी, लेकिन नारी-विमर्श व चेतना ने इस क्षेत्र को खोल दिया है और महिला लेखकों की एक पूरी जमात है जो नारी जीवन के विशिष्ट अनुभवों से लेकर समाज के बृहत्तर सवालों पर अपनी लेखनी चला रही हैं। विरेन्द्र यादव ने इस क्षमता को पहचानते हुए 'नारी का उपन्यास बनाम उपन्यास की नारी' में पांच लेखिकाओं के गीताजंलि श्री के 'तिरोहित', अलका सरावगी के 'शेष कादम्बरी', अनामिका के 'अवान्तर कथा', मैत्रेयी पुष्पा के 'विजन', मधु कांकरिया के 'खुले गगन के लाल सितारे' उपन्यासों पर चर्चा में स्त्री सवालों को केन्द्र रखते हुए उनकी विशिष्टता को रेखांकित किया है। उनकी पूरी रचनाशीलता में नारी सवाल के विभिन्न पहलुओं को उद्घाटित करते हुए नारी-विमर्श को केन्द्र में रखा है। ''नारी अस्मिता के भिन्न धरातलों की पड़ताल करते ये उपन्यास भारतीय समाज में स्त्री-प्रश्र का कोलाज-सा रचते हैं। जहां 'तिरोहित 'स्त्री-सच का बेबाक बयान है। वहीं 'शेष कादम्बरी' का कथा-वृतान्त स्त्री-अस्मिता के पार जाकर अपने होने का अर्थ ढूंढता है। 'अवान्तर कथा 'यदि भावनात्मक खालीपन को भरने का रूमानी उपक्रम है, तो 'विजन' पुरुष सत्ता से टकराती कैरियर वुमेन का साहस-भरा पराक्रम। 'खुले गगन के लाल सितारे' की मणि के रूमान से रूमान तक के सफर की सार्थकता उपन्यास के उस स्त्री-विमर्श में है, जो धर्म की पुरुष-केन्द्रित सत्ता-संरचना का विखण्डन करती है।" पृ.-177

वीरेन्द्र यादव वर्तमान में मानवता के समक्ष चुनौती बनी समस्याओं की पड़ताल करते हैं। वे उन्हीं उपन्यासों को अपने विमर्श में शामिल करते हैं जिनमें अपने समाज के अन्तर्द्वन्द्वों तथा व्यापक सवालों को समेटा है। पिछले दशकों में दलित, स्त्री और साम्प्रदायिकता के सवाल मुख्यत: चर्चा के विषय रहे हैं। इनको केन्द्रित करते हुए रचनाएं भी प्रकाश में आई हैं। भारतीय जनतन्त्र व विकास की भेड़चाल के चलते हाशिये पर ढकेल दिए जाने को अभिशप्त समाज उपन्यास में केन्द्रीयता प्राप्त कर रहा है। भगवानदास मोरवाल का 'काला पहाड़', संजीव का 'जंगल जहां शुरू होता है', श्रीप्रकाश का 'जहां बांस फूलते हैं', तेजिन्दर का 'काला पादरी' की यहां विशेष चर्चा की गई है। आंचलिकता की रूढ़ आलोचना जो क्षेत्र विशेष की बोली और प्रकृति के वर्णन में ही अपनी पूरी ताकत लगा देती है उससे बाहर निकालकर जनता के बुनियादी सवालों को केन्द्र में लाने व उनके आधार पर इन उपन्यासों के पाठ की संकल्पना को स्थापित करती है, जो उपन्यास आलोचना को नए संदर्भ प्रदान करेगी। आंचलिक उपन्यासों की आलोचना से उस क्षेत्र विशेष के विकास के सवाल अनदेखे रहते रहे हैं और उनकी भाषा व प्रकृति के बारे में ही अधिकांश चर्चा होती रही है।

समाज की समस्याओं से काटकर किसी उपन्यास को पढऩा उसके महत्त्व को कम करता है और वह महज एक रचना तक ही सीमित रह जाती है। कमलाकान्त त्रिपाठी ने अपने 'पाहीघर' और 'बेदखल' उपन्यासों में अवध के जीवन को व्यक्त किया है। इतिहास दृष्टि जन-इतिहास को केन्द्र में लाती है। 1857 की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर इस आन्दोलन पर फिर से विचार विमर्श हुआ। 'पाहीघर' ने उसे एक नया आयाम प्रदान किया था। 'पाहीघर' उन गिने चुने उपन्यासों में हैं, जिसमें 1857 को अपना विषय वस्तु बनाया गया है। जन इतिहास को केन्द्र में लाने वाले इस उपन्यास पर मुख्य धारा की आलोचना ने अनदेखा ही किया है। विरेन्द्र यादव ने इसके विश्लेषण के जरिये जन इतिहास की ओर ध्यान खींचने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। इतिहास और उपन्यास के संबंधों की पड़ताल करने की कोशिश करके उसकी सैद्धांतिकी की ओर भी दृष्टि दी है।

साम्प्रदायिकता की समस्या स्वतन्त्र भारत की विशेष तौर पर उदारीकरण-भूमंडलीकरण के दौर की प्रमुख समस्या है। इस समस्या को लेखकों ने अपनी सृजना का आधर बनाया है। विभाजन को आधार बनाकर कुछ बहुत ही बेहतरीन उपन्यासों की रचना हुई थी। साम्प्रदायिकता को केन्द्रित करने वाले कई उपन्यासों पर इस पुस्तक में विचार-चर्चा की गई है जो साम्प्रदायिकता को समझने की लेखक की तड़प को ही दर्शाता है। राही मासूम रजा का 'आधा गांव' सांझी संस्कृति को साम्प्रदायिक एकता का आधार दिखाया है। यहां हिन्दू और मुसलमान के उस तरह के दंगे नहीं, बल्कि चेतना को उद्घाटित किया है और इस चेतना के वर्गीय चरित्र को भी उद्घाटित किया है। मनुष्यविरोधी ब्राह्मणवादी संरचना को बेपर्दा करने तथा धर्मनिरपेक्ष शक्तियों के उस पोले आधार को उजागर करते दूधनाथ सिंह के 'आखिरी कलाम' को भी विरेन्द्र यादव ने विचार का विषय बनाया है और साम्प्रदायिक चेतना के स्रोतों को समझने की कोशिश की है। ''आखिरी कलाम जहां धर्मोन्मादी फासीवाद की निर्माण प्रक्रिया से साक्षात् कराता है वहीं इसके मूल उत्स पर प्रहार का भी आवाहन करता है।" भगवान सिंह का 'उन्माद' अन्यथा हिन्दी में विशेष चर्चित नहीं हुआ, लेकिन वह एक ऐसी समस्या से जुड़ा है जो समकालीन भारत में सत्ता और संस्कृति के चरित्र तय कर रहा है। इसलिए वीरेन्द्र यादव ने उसकी पड़ताल करना उचित समझा। साम्प्रदायिकता और फासीवाद को ठोस स्वार्थों की पूर्ति करने राजनीतिक विचारधारा की अपेक्षा महज मानवीय मनोविकार तक सीमित करना समस्या को अलग ही परिप्रेक्ष्य में पेश करता है। ''भगवान सिंह साम्प्रदायिकता को निश्चित सामाजिक व राजनीतिक दृष्टिकोण का परिणाम न मानकर इसे मनोविकार व दमित व्यक्तित्व की विकृत परिणतियों के रूप में प्रस्तुत करते हैं।" समस्या की गम्भीरता को समझते हुए तथा उपन्यास में उसके प्रस्तुतिकरण पर टिप्पणी सही है कि ''फासीवाद व साम्प्रदायिक दंगों की सरलीकृत व्याख्या से न तो साम्प्रदायिकता के उभार को समझा जा सकता है और न हिन्दुत्व के एजेंडे की पड़ताल। उपन्यासकार साम्प्रदायिकता को संकीर्ण राजनीतिक हितों से विछिन्न मानकर इसे मॉब बिहैवियर के रूप में विश्लेषित करता है।" साम्प्रदायिकता को समझने के लिए जीवन को समझना जरुरी है। जीवन में साम्प्रदायिक चेतना को आधार प्रदान करने वाले तत्त्वों की पहचान के बिना सरलीकरण करके इसे नहीं समझा जा सकता।



अंग्रेजी के भारतीय उपन्यासकारों की आभिजात्य व औपनिवेशिक दृष्टि का खुलासा करता लेख 'दि इंडियन इंग्लिश नावेल और भारतीय यथार्थ' लेख विशेषतौर पर इस पुस्तक की उपलब्धि है। हिन्दी साहित्य आलोचना की पुस्तकों में अंग्रेजी के प्रति अनभिज्ञता ही है। बाजारवाद व उपभोक्ता संस्कृति ने ऐसे साहित्य को अपने विस्तार व जरुरत के लिए पैदा किया है। जिसमें समाज की वास्तविकता से कोई वास्ता नहीं है। इन उपन्यासों के माध्यम से ही भारतीय समाज और साहित्य की छवि पूरी दुनिया में बन रही है। भारत की वास्तविक जमीन से उपजा साहित्य अनदेखा हो रहा है। पिछले वर्षों में चर्चित भारतीय अंग्रेजी उपन्यास सलमान रुश्दी का 'मिडनाइट चिल्ड्रेन', पंकज मिश्रा का 'दि रोमांटिक्स', अरुधंती राय का 'दि गॉड ऑफ स्माल थिंग्स', विक्रम सेठ का 'ए सूटेबल ब्वाय', राजकमल झा का 'दि ब्लू बेडस्प्रेड' विशेषतौर पर चर्चित हुए।
''दरअसल सच यह है कि भारतीय अंग्रेजी औपन्यासिक लेखन की बाजारोन्मुखता उसे देशज यथार्थ से विमुख करती है, जो अभी तक हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य में सुरक्षित है। अंग्रेजी के इस बाजारवाद की आहट अब हिन्दी साहित्य की दहलीज पर भी दस्तक देने लगी है। ... यह वास्तव में गम्भीर चिन्ता का विषय है कि भारतीय अंग्रेजी लेखन की सेक्स और मिथकीय रूढिय़ां एवं अन्य नकारात्मक प्रवृतियों का प्रवेश हिन्दी साहित्य में अब होने लगा है, लेकिन हिन्दी के बेहतर और श्रेष्ठ साहित्य के कोई लक्षण भारतीय अंग्रेजी उपन्यासकारों के बहुसंख्यक वर्ग पर नहीं दीखते। आखिर क्यों भारतीय विकास की जो पारम्परिक अवधारणा 'डूब'और 'इदम्नमम्'उपन्यासों के विमर्श के माध्यम से प्रश्रों के घेरे में है, वह अंग्रेजी उपन्यासों की चिन्ता का विषय नहीं बनती?" पृ.- 259
हिन्दी फिल्मों की तरह हिन्दी उपन्यास और कहानियां भी पश्चिम से नकल करते रहे हैं। जिनमें भारतीय समाज की सच्चाइयों से कोई लेना देना नहीं होता और बाजार की मेहरबानी से रातो-रात प्रतिष्ठित साहित्यकार व बेस्ट सेलर की श्रेणी में आ जाते हैं। जयदेव ने अपने अध्ययन में इसका काफी पहले खुलासा किया था। विरेन्द्र यादव ने भी इस ओर कुछ संकेत दिए हैं।

वीरेन्द्र यादव की विशेषता यह है कि वे जब एक उपन्यास का विश्लेषण करते हैं तो उनकी नजर में उपन्यास में आई मुख्य समस्या पर केन्द्रित अन्य उपन्यास ओझल नहीं होते। एक दूसरे की तुलना में विश्लेषण उपन्यास की विशिष्टता को उभारता है। जिन उपन्यासों के संदर्भ से विचार किया है वे निरपेक्ष रूप से वहां मौजूद नहीं हैं, बल्कि उस तरह के दूसरे उपन्यासों का जिक्र करते हुए उस उपन्यास की विशिष्टता को रेखांकित किया है। साम्प्रदायिकता के सवाल पर जहां 'झूठा सच' का विश्लेषण है, वहीं 'तमस' और 'आधा गांव' के साथ उसे जोड़कर देखा गया है। जब वे 'उन्माद' पर बात करते हैं तो यशपाल का 'झूठा सच', राही का 'आधा गांव', मंजूर एहतेशाम का 'सूखा बरगद', अब्दुल बिस्मिल्लाह का 'मुखड़ा क्या देखे' सामने रहते हैं। जब झूठा सच पर बात करते हैं तो राही का 'आधा गांव' और भीष्म साहनी का 'तमस' और जब वे 'आधा गांव' पर बात करते हैं तो 'राग दरबारी' उनकी नजरों से ओझल नहीं होता।

वीरेन्द्र यादव आलोचकों से भी टकराते हैं और उनकी दृष्टि की कमजोरियों को भी रेखांकित करते चलते हैं। और इस ढंग में वे उपन्यास के विमर्श को पलटते चलते हैं और जो महत्त्वपूर्ण पक्ष जाने-अनजाने आलोचकों की नजर से छूट गए या कि वे पकड़ नहीं पाए उनको रेखांकित करते चलते हैं। वीरेन्द्र यादव अध्यापकीय आलोचना की कमजोरी से पूर्णत: मुक्त हैं और अति बौद्धिकता से भी जो उपन्यास पर विचार करते करते यह भूल जाते हैं कि वे किसी उपन्यास पर बात कर रहें हैं। उसमें बहुत से अन्य उपन्यासों का जिक्र होगा बहुत से महान चिन्तकों का जिक्र भी होगा और साहित्यिक अपेक्षाओं-दायित्वों का जिक्र भी होगा, विचारधाराओं का जिक्र भी होगा जो पाठक पर आलोचक के ज्ञान की धाक तो जमा देगा, लेकिन उसमें जिस उपन्यास पर बात होगी उसका जिक्र सबसे कम होगा और एक समान्य समझ तो बढ़ेगी, लेकिन उपन्यास के बारे में कोई विशेष अध्ययन नहीं होगा। वीरेन्द्र यादव ने अपनी पूरी विचारधारात्मक समझ को केन्द्र में रखते हुए उपन्यास पर ही मूलत: केन्द्रित किया है। जो किसी उपन्यास के बारे में समग्र विचार रखता है। 'उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता' में हिन्दी के सैंकड़ों उपन्यासों का जिक्र किया है, जिससे यह हिन्दी उपन्यास आलोचना की महत्त्वपूर्ण पुस्तक बनी है और उपेक्षितों-वंचितों के पक्ष को फोकस में लाती है। हिन्दी उपन्यास आलोचना को यह पुस्तक नए आयाम प्रदान करेगी।

January 16, 2011

संस्कृति और साम्प्रदायिकता

संस्कृति और साम्प्रदायिकता
सुभाष चन्द्र, एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र
साम्प्रदायिकता अपने को संस्कृति के रक्षक के तौर पर प्रस्तुत करती है, जबकि वास्तव में वह संस्कृति को नष्ट कर रही होती है। साम्प्रदायिक लोग अपने को सांस्कृतिक पुरूष, अपनी राजनीति को संस्कृति के रूप में पेश करते हैं, संस्कृति की शुद्धता व सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की लफ्फाजी के लिए प्रख्यात है। हिन्दी के महान रचनाकार मुन्शी प्रेमचन्द ने कहा था कि 'साम्प्रदायिकता हमेंशा संस्कृति का लबादा ओढ़कर आती है क्योंकि उसे अपने असली रूप में आते हुए लज्जा आती है।' सांस्कृतिक श्रेष्ठता, दम्भ व जातीय गौरव साम्प्रदायिकता के साथ आरम्भ से जुड़े हैं। साम्प्रदायिकता के असली चरित्र को समझने के लिए उसके सांस्कृतिक लबादे को, उसके खोल को समझना और इस खोल के साथ उसके संबंधों को समझना निहायत जरूरी है। संस्कृति में लोगों के रहन-सहन, खान-पान, मनोरंजन, रूचियां- स्वभाव, गीत-नृत्य, सोच-विचार, आदर्श-मूल्य, भाषा-बोली सब कुछ शामिल होता है। जो जीवन में जीता है उस सबको मिलाकर ही संस्कृति बनती है।
किसी विशेष क्षेत्र के लोगों की विशिष्ट संस्कृति होती है चूंकि जलवायु व भौतिक परिस्थितियां बदल जाती हैं, भाषा-बोली बदल जाती है, खान-पान, व रहन-सहन बदल जाता है जिस कारण एक अलग संस्कृति की पहचान बनती है। इस तरह कहा जा सकता है कि संस्कृति का संम्बन्ध भौगोलिक क्षेत्र से होता है और संस्कृति की पहचान भाषा से होती है। मनुष्य के खान-पान, रहन-सहन के तौर तरीकों, उसके पूजा-उपासना व रीति-रिवाजों पर जलवायु का प्रभाव पड़ता है। पहाड़, मरुस्थल, बरसाती, समुद्र तट के किनारे रहने वाले लोंगों की स्थितियां अलग-अलग होने के कारण जीवन के साथ धार्मिक रिवाज भी अलग होते हैं। जहाँ एक जगह मुर्दे को फूका जाता है, एक जगह दबाया जाता है, एक जगह पानी में बहाया जाता है। कोई रिवाज श्रेष्ठ या निम्न नहीं होता। साम्प्रदायिकता लोगों के धार्मिक विश्वासों का शोषण करके फलती-फूलती है इसलिए इसका जोर इस बात पर रहता है कि व्यक्ति की पहचान धर्म के आधार पर हो। न केवल व्यक्ति की पहचान बल्कि वह संस्कृति व भाषा को भी धर्म के आधार पर परिभाषित करने की कोशिश करती है। धर्म को जीवन की सबसे जरूरी व सर्वोच्च पहचान रखने पर जोर देती है। इसलिए हिन्दू संस्कृति और मुस्लिम संस्कृति जैसी शब्दावली का निर्माण किया । धर्म के आधार पर संस्कृति की पहचान करना ही साम्प्रदायिकता की शुरूआत हैं। साम्प्रदायिकता की विचारधारा संस्कृति और धर्म को एक दूसरे के पर्याय के तौर पर प्रयोग करके भ्रम पैदा करने की कोशिश करती है जबकि धर्म संस्कृति का एक अंश मात्र है। बहुत सी चीजों के समुच्चय योग से संस्कृति बनती है धर्म भी उसमें एक तत्त्व है। धर्म संस्कृति का एक अंग है, धर्म में सिर्फ आध्यात्मिक विचार, आत्मा-परमात्मा, परलोक, पूजा-उपासना आदि ही आते हैं। साम्प्रदायिक शक्तियां संस्कृति के सभी तत्त्वों के उपर धर्म को रखती है। संस्कृति को धर्म के साथ जोड़कर साम्प्रदायिक विचारधारा एक बात और जोड़ती है कि एक धर्म के मानने वाले लोगों की संस्कृति एक होती है, उनके हित एक जैसे होते हैं। ऐसा स्थापित करने के बाद फिर वे एक कदम आगे रखकर कहते हैं कि एक संस्कृति दूसरी संस्कृति से टकराती है। दो धर्मों के व दो संस्कृतियों के लोग मिल जुलकर नहीं रह सकते। एक को दूसरे से खतरा है । अत: संस्कृति की रक्षा के लिए हमारे (साम्प्रदायिकों) पीछे लग जाओ । इसी आधार पर साम्प्रदायिक लोग जनता को इस बात का झांसा देकर रखती है कि वह संस्कृति की रक्षा कर रहे हैं जबकि वे सांस्कृतिक मूल्यों यानी मिल जुलकर रहने, एक दूसरे का सहयोग करने, एक दूसरे का आदर करने को नष्ट कर रहे होते हैं । यह बात बिल्कुल बेबुनियाद व खोखली है कि समान धर्म को मानने वालों की संस्कृति भी समान होगी । भारत के ईसाई व इंग्लैंड के ईसाई का, भारत के मुसलमान व अरब देशों के मुसलमानों का, भारत के हिन्दू व नेपाल के हिन्दुओं का, पंजाब के हिन्दू और तमिलनाडू के हिन्दू का, असम के हिन्दू व कश्मीर के हिन्दू का धर्म तो एक ही है लेकिन उनकी संस्कृति बिल्कुल अलग-अलग है। न उनके खान-पान एक जैसे हैं, न रहन-सहन, न भाषा -बोली में समानता है न रूचि स्वभाव में । इसके विपरीत अलग-अलग धर्मों को मानने वालों की संस्कृति एक जैसी हो सकती है, होती है क्योंकि संस्कृति का सम्बन्ध क्षेत्र से है। काश्मीर के हिन्दू व मुसलमानों का धर्म अलग-अलग होते हुए भी उनकी बोली, खान-पान, रूचि-स्वभाव में समानता है। तमिलनाडू के हिन्दू और मुसलमान की संस्कृति लगभग एक जैसी है। धर्म के आधार पर संस्कृति की पहचान अवैज्ञानिक तो है ही, साम्प्रदायिकरण की कोशिश भी है।भाषा संस्कृति का महत्त्वपूर्ण पक्ष है। भाषा की उत्पति के साथ ही मानव जाति का सांस्कृतिक विकास हुआ है। भाषा के माध्यम से ही सामाजिक -व्यक्तिगत जीवन के कार्य चलते हैं। भाषा में ही मनोरंजन करते हैं, हंसते -रोते हैं, सुख-दुख की अभिव्यक्ति करते हे। भाषा-बोली में व्यवहार करने वाले लोगों की रूचियों - स्वभाव की भाव-भूमि एक ही होती है। लेकिन साम्प्रदायिकता की विचारधारा और इसमें विश्वास करने वाले लोग भाषा को धर्म के आधार पर पहचान देकर उसका साम्प्रदायिकरण करने की कुचेष्टा करते रहते है। जैसे हिन्दी को हिन्दुओं की भाषा मानना, पंजाबी को सिखों की और उर्दू को मुसलमानों की भाषा मानना। साम्प्रदायिक लोगों के लिए भाषा भी दूसरे धर्म के लोगों के प्रति नफरत फैलाने का औजार है, इनका भाषा प्रेम दूसरी भाषा को कोसने-दुत्कारने में नजर आता है। अपनी भाषा के विकास के लिए कुछ न करके दूसरी भाषा को गालियां देना तो बहुत ही आसान मगर ओछे किस्म का भाषा प्रेम हैं। हिन्दी उर्दू को लेकर यह विवाद काफी गहरा है । उर्दू को मुसलमानों की भाषा मानकर ही शायद इसे पाकिस्तान की राज्य-भाषा घोषित किया गया, जबकि पाकिस्तान में उर्दू बोलने वालों की संख्या बहुत कम है। यदि देखा जाए तो हिन्दी और उर्दू तो जुडवां बहनों की तरह हैं जो एक ही क्षेत्र से, एक ही मानस से पैदा हुई हैं। अमीर खुसरो को कौन सी भाषा का कवि कहा जाए। यदि हिन्दी कथाकार मुंशी प्रेमचंद या अन्य किसी साहित्यकार की रचनाओं से उर्दू के शब्दों को निकाल दिया जाए तो वह कैसी रचनांए बचेंगी, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। साधारण हिन्दी और उर्दू दोनों जन सामान्य की भाषांए है। इसका मिला जुला रूप ही जन साधारण की भाषा है। भाषा के नाम पर किए जाने वाले साम्प्रदायिकरण से समझा जा सकता है कि भाषा का विवाद खड़ा किया जाता है उर्दू व हिन्दी का, लेकिन समाप्त की जाती है जन साधारण की भाषा। उदाहरण के पहले सार्वजनिक स्थानों पर 'पीने का पानी', 'ठण्डा पानी' लिखा होता था अब उनकी जगह लिखा है 'पेयजल', 'शीतल जल'। लोग हमेशा पानी मांगते हैं लेकिन लिखा जाता है संस्कृतनिष्ठ 'जल'। बस में लिखा होता था 'बीड़ी सिग्रेट पीना मना है' अब लिखा है 'धुम्रपान निषेध/ वर्जित है', 'अन्दर आना मना है' की जगह 'प्रवेश निषेध', 'दाखिला' की जगह 'प्रवेश' आदि सैकड़ों प्रयोग हैं जिन पर अनजाने ही साम्प्रदायिक मुहिम का प्रभाव पड़ा है। भाषा के इस प्रयोग से साफ समझा जा सकता है कि वर्ग-विभक्त समाज में संस्कृति का रूप भी वर्ग विभक्त होता है। यद्यपि वह इतनी साफ तौर पर अलग-अलग दिखाई नहीं देती। आम बोल चाल की हिन्दी या उर्दू मिश्रित हिन्दी के स्थान पर संस्कृतनिष्ठ हिन्दी का प्रयोग संस्कृति के वर्गीय रूप की ओर संकेत करता है। खेती करने वाले किसान-मजदूर की तथा बिना मेहनत किए ऐश करने वाले जमींदार व सेठ की रूचियों में निश्चित रूप से भिन्नता होती है।साम्प्रदायिकता हमेंशा शासकों की संस्कृति यानि शोषण की संस्कृति की हिमायती होती है। साम्प्रदायिकता की विचारधारा और इसको माननेवाले गैर-बराबरी को उचित ठहराते हैं। महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद ने 'साम्प्रदायिकता और संस्कृति' लेख में इस पर गहराई से विचार किया है कि ''अब संसार में केवल एक संस्कृति है, न कहीं हिन्दू-संस्कृति, न कोई अन्य संस्कृति, मगर हम आज भी हिन्दू और मुस्लिम संस्कृति का रोना रोए चले जाते है। ईरानी संस्कृति है, अरब संस्कृति है, लेकिन ईसाई-संस्कृति और मुस्लिम या हिन्दू संस्कृति नाम की कोई चीज नहीं है।" मुसलमानों व हिन्दुओं के पूजा-विधान में, ईश्वर के प्रति धारणाओं में भी समानता है, भाषा, रहन-सहन, खान-पान व संगीत और चित्र-कला आदि हिन्दू-मुसलमानों में समानता है। रहन-सहन, खान-पान से धर्म का संबंध होता है, उसी के अनुरूप उसका स्वरूप बनता है न कि धर्म के कारण रहन-सहन व खान-पान का। मनुष्य जिस क्षेत्र की जैसी परिस्थितियों में रहा है। उसी के अनुसार उसकी संस्कृति व उसके घटक धर्म का रूप बना है। इसलिए पूरी दुनिया में धर्म का एक सा रूप नहीं है। स्थान के अनुसार उसका रूप बदल जाता है। जैसे-जैसे परिस्थितियां बदलती हैं तो धर्म का व यहाँ तक कि ईश्वर का रूप भी बदलता है और उसके रिवाज और पूजा विधान तो लगातार बदले ही हैं। एक संस्कृति जैसी या पवित्र संस्कृति जैसी कोई चीज नहीं है। संसार के एक समुदाय के लोगों ने दूसरे समुदाय के लोगों से काफी कुछ ग्रहण किया है। इस आदान-प्रदान से ही समाज का विकास हुआ है। विशेषकर भारत जैसे देश में जहां विभिन्न क्षेत्रों से लोग आकर बसे वहां तो ऐसी किसी शुद्ध संस्कृति की कल्पना भी नहीं की जा सकती। यहां शक, कुषाण, पठान, अफगान, तुर्क, मुगल आए जो विभिन्न प्रदेशों के रहने वाले थे, वे अपने साथ कुछ खान-पान की आदतें, कुछ पहनने के कपड़ों का ढंग, कुछ पुजा विधान, कुछ विचार व काम करने के नए तरीके भी लेकर आए, जिनका भारतीय समाज पर गहरा असर पड़ा। कितनी ही खाने की वस्तुएं व पकाने का ढंग, इस तरह यहां के जीवन में शामिल हो गई कि कोई यह नहीं कह सकता कि ये बाहर की चीजें हैं, वे यहां के लोगों के जीवन का हिस्सा ही बन गई।संस्कृति जड़ वस्तु नहीं होती और न यह स्थिर रहती है, बल्कि यह हमेशा परिवर्तनशील है।जब संस्कृतियां मिलती हैं तो समाज विकास करता है और संस्कृति समृद्ध होती है। दो संस्कृतियों के मिलन से नए बदलाव होते हैं, जिससे किसी देश या समुदाय की संस्कृति में कुछ नया जुड जाता है और कुछ पुराना पीछे छूट जाता है। भारत की संस्कृति विविधतापूर्ण संस्कृति है। इसमें विभिन्न धर्मों, जातियों , सम्प्रदायों , विभिन्न भाषाओं को बोलने वाले लोग रहते हैं। भारत में 4635 विभिन्न समुदाय हैं, जिनकी अपनी-अपनी आनुवंशिक विशेषताएं, भाषाएं, पहनावे, आराधना की विधियाँ, खानपान और रिश्तेदारी और शादी-ब्याह की रीतियां हैं। भारत के लोगों की उत्पति प्रोटो-आस्टेलाइड, पैलियो-मेडिटरेनियन, काकेशसाइड, नीगोइड और मंगोलीय नस्लों के मिलन से हुई है। भारत में करीब 325 भाषाएं और 25 लिपियां प्रचलन में हैं। ये विभिन्न भाषाई परिवारों हिंद आर्य, तिब्बती बर्मी, हिंद यूरोपीय, द्रविड़, आस्त्रो एशियाई, अंडमानी और हिंद-ईरानी से उपजी हैं।यहां कई संस्कृतियों के लोग आकर बसे और एक दूसरे का परस्पर जो प्रभाव पड़ा उसके कारण यहां की संस्कृति बहुत ही खूबसूरत बन गई है। यहां बाहर के कई क्षेत्रों से कई जातियों के लोग जैसे हुण,शक कुषाण, अफगान, पठान, मंगोल, तुर्क आदि आए। ये सभी धर्म से मुसलमान थे, परन्तु इनकी संस्कृति अलग अलग थी। ये हिन्दुस्तान में आए और संस्कृतियों का मिश्रण हुआ और इन्होंने एक दूसरे को प्रभावित किया। यहां के लोगों ने इनसे काफी कुछ सीखा और वहां से आए लोगों ने यहां के लोगों से काफी कुछ सीखा। दोनों ने एक दूसरे को गहरे से प्रभावित किया। इस प्रभाव से एक नई किस्म की संस्कृति का निर्माण हुआ। एक ऐसी संस्कृति का जन्म हुआ जिसमें दोनों धर्मों की संकीर्णताओं को छोड़कर, दोनों धर्मों में व्याप्त मानवता और उदारता के बिन्दुओं को लिया। इसमें बहुत संतों - सूफियों का योगदान है। जब से मुसलमान यहां आए तभी से इस बात के उदाहरण मिलते हैं। बाबा फरीद, निजामुद्दीन औलिया, जो कभी सत्ता के दरबार में नहीं गए और माना कि पूजा की उतनी ही विधियां हैं जितने कि रेत के कण। अमीर खुसरो जिसने हिंदी को अपनी भाषा माना और हिन्दुस्तान की तुलना स्वर्ग के बगीचे से की। कबीर दास ने दोनों धर्मों की कट्टरता और बाहरी दिखावे को बेकार की चीज मानते हुए आचरण की पवित्रता पर जोर दिया और अल्लाह और ईश्वर में कोई अन्तर नहीं माना। गुरूनानक ने सभी धर्मों के पवित्र माने जाने वाले तीर्थों की यात्राएं की और व्याप्त आडम्बरों का विरोध करते हुए मानव एकता संदेश दिया और लंगर-संगत की ऐसी परम्पराएं शुरू की जिससे वास्तव में मानव में एकता स्थापित हो सके। बुल्लेशाह, जायसी ने यहां की लोक कथाओं को आधार बनाकर काव्य रचना की और यहां की लोक रीतियों को गहराई से समझा। रसखान को किसी भी कृष्ण भक्त कवि से कम नहीं माना जा सकता, श्रीकृष्ण के प्रति उनकी भक्ति बेजोड है। दादू दयाल ने हिन्दू मुस्लिम एकता के बिन्दुओं की पहचान करवाई। रहीम की कृष्ण भक्ति और तुलसीदास से दोस्ती तो सभी जानते हैं इस तरह एक लम्बी परम्परा है जो हिन्दू मुस्लिम एकता की कड़ियां हैं। जिन्होंने हिन्दू और मुसलमानों में समन्वय स्थापित करने के लिए कार्य किया। असल में मध्यकाल में हिन्दू मुस्लिम का सवाल नहीं था, यदि ऐसा होता तो हिन्दुओं और मुसलमानों में इतनी एकता नजर नहीं आती। इस संस्कृति के निर्माण में सूफी संतों के अलावा कुछ शासकों का योगदान है, जिन्होंने अपनी राजसत्ता चलाने के लिए ऐसी नीतियां अपनाई, जिससे कि किसी धर्म के मानने वालों की भावनाओं को ठेस न लगे। दोनों धर्मों के विश्वासों का आदर किया। बाबर ने अपने बेटे हुमायुं का सभी धर्मों का आदर करने की नसीहत दी। हुमायूँ को शेरशाह सूरी से एक हिन्दू ने ही बचाया था, हुमायुं को मेवाड की रानी ने राखी भेजी थी। अकबर तो पैदा ही हिन्दू घराने में हुआ था और वह सभी धर्मों की शिक्षाओं को सुनता था। धर्मों की कट्टरता से तंग आकर उसने एक नया धर्म ही चला दिया था। उसने ऐसे अनेक काम किए जिससे यह कहा जा सकता है कि वह सभी धर्मों का आदर करता था। औरगंजेब जिसे सबसे अधिक कट्टर माना जाता है उसने इलाहाबाद नगर पालिका में पड़ने वाले सोमेश्वर नाथ मंदिर को, उज्जैन में महाकेश्वर मंदिर को,चित्रकूट में बाला जी मंदिर, गुहावटी में उमानन्द मंदिर, शत्रुंजय में जैन मंदिर और उतरी भारत में फैले गुरूद्वारों को दान दिया और अपने शासन में हिन्दू या मुसलमान के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया और धार्मिक कारणों से पूजा स्थल नहीं गिराये। शिवाजी और गुरू गोबिन्द सिंह को मुसलमानों के दुश्मन के रूप में पेश किया जाता है, जबकि इसमें जरा भी सच्चाई नहीं है, इनके मुसलमानों से बहुत अच्छे ताल्लुक थे। शिवाजी की सेना में तो मुसलमान बहुत अधिक और बहुत ऊँचे पदों पर थे और गुरू गोबिन्द सिंह के जीवन में कई ऐसी घटनाएं हैं जहां मुसलमानों ने उनकी मदद की। टीपु सुल्तान और बहादुर शाह जफर, महारनी लक्ष्मी बाई के जीवन से जुड़ी घटनाओं से हिन्दू मुस्लिम की एकता, आपसी विश्वास और धार्मिक सद्भाव को आसानी से समझा जा सकता है।बहुत सी परम्पराएं व त्यौहार ऐसे हैं , जो हिन्दुओं के हैं और मुसलमान उनमें बढ चढकर भाग लेते हैं और बहुत सी परम्पराएं ऐसी हैं जो मुसलमानों की हैं और हिन्दू बढ चढकर भाग लेते हैं और बहुत सी परम्पराएं ऐसी भी हैं जो दोनों की साझी हैं। बहुत से रिवाजों और परम्पराओं में इस तरह से घुल मिल गई हैं कि यह बताना मुश्किल है कि कौन सी परम्परा हिन्दू है और कौन सी परम्परा मुस्लिम। यह परम्पराएं भारत की सांझी संस्कृति की ओर इशारा करती हैं। दिल्ली का ‘‘फूल वालों की सैर’’ और अवध का ‘‘कैसर बाग का मेला’’ इस बात का उदाहरण है। अहमदशाह वली के उर्स पर होने वाली परम्पराएं इस बात का जीता जागता नमूना है। इस तरह के उदाहरण पूरे देश में बिखरे पडे हैं। खान-पान,व रहन-सहन की अन्य परम्पराओं पर हिन्दुओं ने मुसलमानों से सीखा और मुसलमानों ने हिन्दुओं से सीखा। हिन्दुओं ने मुसलमानों से एक- से-एक व्यंजन बनाने सीखे और मुसलमानों ने हिन्दुओं से। संगीत में , चित्रकला में, स्थापत्य में, ज्योतिष, और साहित्य में और जीवन के अन्य क्षेत्रों में दोनों का एक दूसरे पर गहरा प्रभाव देखा जा सकता है।साझी संस्कृति का नमूना इस रूप में देखा जा सकता है कि मुस्लिम धर्म में कुछ परम्पराएं ऐसी शुरू हुई, जो केवल हिन्दुस्तान में ही हैं जैसे ताजिये निकालने की परम्परा भारत के अलावा ओर कहीं नहीं है, यह यहां का ही प्रभाव है। जैसे ‘बिस्मिल्लाह’ और ‘अकीका’ जैसे संस्कार यहां का प्रभाव हैं। यहां के लोगों ने मुसलमानों से बहुत कुछ सीखा। सिक्ख धर्म को देखा जा सकता है। सिक्ख धर्म में गुरूद्वारों के ढांचे में मीनारों और गुम्बदों का प्रयोग ईरानी वास्तुकला का प्रभाव है। सिर्फ ढांचे में ही नहीं बल्कि दार्शनिक स्तर पर एकेश्वरवाद का अपनाया जाना और सिर पर कपड़ा रखकर पूजा करने की पद्धति भी मुसलमानी प्रभाव है। इस तरह एक-दूसरे को बहुत अधिक प्रभावित किया है। इससे एक नई संस्कृति ने जन्म लिया। जिसमें सभी के रीति रिवाज शामिल थे, आज तक यह सीखने सिखाने की परम्परा जारी है और इसी से किसी देश का विकास होता है। जब पवित्र या शुद्ध संस्कृति जैसी चीज ही नहीं है ''फिर हमारी समझ में नहीं आता कि वह कौन सी संस्कृति है, जिसकी रक्षा के लिए सांप्रदायिकता इतना जोर बांध रही है। वास्तव में संस्कृति की पुकार केवल ढोंग है, निरा पाखंड और इसके जन्मदाता भी वही लोग हैं, जो साम्प्रदायिकता की शीतल छाया में बैठे विहार करते हैं यह सीधे-सादे आदमियों को साम्प्रदायिकता की ओर घसीट लाने का केवल एक मंत्र है और कुछ नहीं। हिन्दू और मुस्लिम संस्कृति के रक्षक वही महानुभाव और वही समुदाय हैं, जिनको अपने ऊपर, अपने देशवासियों के ऊपर, सत्य के ऊपर कोई भरोसा नहीं, इसलिए अनंत तक ऐसी शक्ति की जरूरत समझते हैं, जो उनके झगड़ों में सरपंच का काम करती है।"(मुंशी प्रेमचंद)संस्कृति लगातार निर्मित होती है। सामाजिक स्थितियों में परिवर्तन से संस्कृति में परिवर्तन होता है। जबसंस्कृति परिवर्तनशील है तो कौन सी संस्कृति की रक्षा करनी है।

साम्प्रदायिकता

साम्प्रदायिकता
सुभाष चन्द्र, एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र


साम्प्रदायिकता मात्र दो धर्मों के बीच विवाद, झगड़ों व हिंसा की घटनाओं का ही नाम नहीं है दो धार्मिक समुदायों के विवादों तक सीमित नहीं बल्कि एक विचारधारा का नया रूप धारण कर लिया है, अपनी एक तर्क-पद्धति विकसित कर ली है जिसके आधार पर वह समाज के विभिन्न पक्षों पर विचार करती है। समझ के स्तर पर साम्प्रदायिकता को एक विचारधारा के रूप में न देख पाना साम्प्रदायिकता को पूरे तौर पर न समझना है ''आखिरकार साम्प्रदायिकता सबसे पहले एक विचारधारा है, एक विश्वास प्रणाली है जिसके जरिए समाज, अर्थव्यवस्था और राजतंत्र को देखा जाता है। यह समाज और राजनीति को देखने का एक तरीका है।"साम्प्रदायिकता एक राजनीतिक दृष्टिकोण है जिसमें यह माना जाता है कि एक धार्मिक समुदाय के सभी लोगों के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व धार्मिक हित एक जैसे होते हैं। साम्प्रदायिकता एक कदम आगे रखकर कहती है कि अलग-अलग समुदायों के हित न केवल अलग-अलग होते हैं, बल्कि एक-दूसरे के विपरीत होते है। इस तरह साम्प्रदायिकता एक नकारात्मक सोच पर टिकी होती है। यदि इस बात को समझा जाए तो इसका अर्थ निकलेगा कि जैसे भारत में हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी आदि विभिन्न धर्मों-सम्प्रदायों के लोग रहते हैं तो साम्प्रदायिकता की विचारधारा के तर्क के अनुसार सभी हिन्दुओं के हित एक जैसे हैं, सभी मुसलमानों के एक जैसे, सभी सिक्खों के एक जैसे व सभी ईसाईयों के एक जैसे। एक समुदाय के हित न केवल एक जैसे हैं बल्कि दूसरे के विपरीत हैं। हिन्दुओं के हितों की मुसलमानों, सिक्खों, ईसाईयों के हितों से टकराहट है। इसी तरह मुसलमानों व अन्य धर्मों के लोगों की अन्य धर्मों के समुदायों के साथ। इस धारणा के अनुसार तो भारत में हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई शान्तिपूर्ण तरीके से साथ-साथ रह ही नहीं सकते और साम्प्रदायिक झगड़े तो अवश्यभावी हैं। यह धारणा न तो तर्क के आधार पर सही है और न ही तथ्यपरक है।
यह बात बिल्कुल भी सही नहीं है कि एक धर्म के मानने वाले लोगों के हित एक समान होते हैं। जब तक समाज वर्गों में बंटा है, समाज में गरीब और अमीर हैं तब तक एक धर्म के लोगों के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक हित एक समान हो ही नहीं सकते बल्कि एक ही धर्म के मानने वाले गरीब और अमीर के सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक हित परस्पर विरोधी होते हैं और दूसरी तरफ अलग-अलग धर्मों को मानने वाले अमीरों के हित एक जैसे होते हैं और गरीबों के हित एक जैसे होते हैं। उदाहरण के लिए एक मजदूर हिन्दू या मुसलमान अपने ही धर्म के पूंजीपति के कारखाने में काम करते हैं तो उनके आर्थिक हित एक जैसे कैसे हो सकते हैं जहां पूंजीपति हमेशा अपने लाभ को बढ़ाने के लिए मजदूर की मेहनत का शोषण करने की नई-नई योजनाएं बनाता रहता है। इसके विपरीत पूंजीपति हिन्दू और पूंजीपति मुसलमान के हित एक जैसे होते हैं। गरीब हिन्दू व गरीब मुसलमान के जीवन जीने के ढंग में, रहन-सहन, शिक्षा-स्वास्थ्य, कार्य-स्थितियों में समानता होती है जबकि अमीर हिन्दू या मुसलमान की जीवन शैली, रहन-सहन, ठाठ-बाट व ऐश-विलास में समानता होती है। साम्प्रदायिक शक्तियां और साम्प्रदायिकता की विचारधारा गरीबों में एकता न हो जाए, उनमें वर्गीय-एकता को कमजोर करने के लिए व दरार पैदा करने के लिए यह सवाल उठाते रहे है। यदि गरीब लोगों (जो कि इसलिए गरीब हैं क्योंकि उनकी मेहनत का फल कोई और यानी अमीर चख रहा है) को इस बात का अहसास हो जाए कि और उनमें एकता स्थापित हो जाएगी और फिर पूंजीपति हिन्दू व मुसलमान गरीब हिन्दू व मुसलमान को लूट नहीं सकेंगे। अपने इस ठाठ-ऐश्वर्य को जारी रखने के लिए 'फूट डालो और राज करो' की नीति के तहत साम्प्रदायिकता की यह घिनौनी चाल उनके बहुत काम आती है।
साम्प्रदायिकता हमेशा इस बात पर जोर देती है कि दो धर्मों के लोग इकट्ठा नहीं रह सकते। इसी बात को आधार बनाकर 'द्वि-राष्ट्र' का सिद्धांत गढ़ा गया और भारत के दो टुकड़े हुए-भारत और पाकिस्तान बने, लेकिन यह सिद्धांत कितनी झूठ और कृत्रिमता पर खड़ा था। यह तब साबित हुआ जब पाकिस्तान के भी दो टुकड़े हो गए और धर्म के आधार बनने वाले राष्ट्र और एक धर्म एक देश की अवधारणा का थोथापन उजागर हो गया। साम्प्रदायिकता की दृष्टि धारण किए हुए लोगों की यह बात तथ्यपरक भी नहीं है कि विभिन्न धर्मों के लोग शांति के साथ एक जगह नहीं रह सकते। भारत में ही विभिन्न धर्मों के लोग हजारों सालों तक शांतिपूर्ण ढंग से रहते आए हैं। विभिन्न धर्मों के लोग एक-दूसरे से इतने घुल-मिल गए हैं कि यह अनुमान लगाना कठिन है कि कौन सा विश्वास या रिवाज किस धर्म का है। विभिन्न धर्मों के लोगों ने खान-पान, रहन-सहन, वेश-भूषा व आचार-विचार में एक दूसरे से बहुत कुछ सीखा है। आधुनिक चिन्तक व समाज सुधारक सर सैयद अहमद खान ने लिखा है कि ''भारत हिन्दू और मुसलमान दोनों का घर है। दोनों भारत की फिज़ा में साँस लेते हैं और पवित्र गंगा और जमुना का पानी पीते हैं। दोनों इसी धरती की उपज खाते हैं। लंबे समय से यहाँ रहने के कारण दोनों का खून बदला है, दोनों का रंग भी समान हो गया है, चेहरे भी एक ही तरह के हो गए हैं। मुसलमानों ने हिंदुओं के सैंकड़ों रीति-रिवाज सीख लिए हैं तथा हिन्दुओं ने भी मुसलमानों से सैंकड़ों चीजें सीखी हैं। दोनों का इतना मेलजोल हुआ है कि इससे एक नई जबान उर्दू का जन्म हुआ है, जो इन दोनों में से किसी की भाषा नहीं है। भारत के साझे निवासी होने से हिंदू और मुसलमान एक जाति हैं तथा देश के साथ-साथ इस दोनों की उन्नति परस्पर सहयोग, सद्भाव और प्रेम से ही संभव है। एक दूसरे के प्रति विरोध कलह और विभेद से हम परस्पर का विनाश ही करेंगे। यह हमारा दुर्भाग्य है कि जो लोग इन बातों को नहीं समझते और हिंदू-मुस्लिम के बीच विभेद पैदा करते हैं, यह नहीं समझ पाते कि ऐसी स्थिति में उनका ही नुकसान होगा और वे इन बातों से स्वयं को ही आघात पहुंचा रहे हैं। दोस्तो! मैंने बार-बार कहा है कि हिन्दुस्तान एक दुल्हन की तरह है जिसकी दो खूबसूरत चमकीली आँखें हैं - हिन्दू और मुसलमान। यदि ये दोनों आपस में लड़ाई करेंगी तो खूबसूरत दुल्हन बदशक्ल हो जाएगी और यदि एक आँख दूसरे को नष्ट कर देगी, तो दुल्हन एक आँख ही गंवा बैठेगी। हिन्दुस्तान के लोगों अब यह तुम्हारे हाथ में है कि इस दुल्हन को भैंगी बनाओ या कानी।"

साम्प्रदायिकता दो तरह की होती है - एक को नर्म या उदार साम्प्रदायिकता कहा जा सकता है दूसरी फासिस्ट/कट्टर साम्प्रदायिकता। नर्म/उदार साम्प्रदायिक लोगों का मानना है कि एक धर्म या सम्प्रदाय के लोगों की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक हित विशिष्ट भी होते हैं, जिनको हासिल करने के लिए बातचीत से या दबाव से जैसे भी हो पूरा करना चाहिए लेकिन साथ ही उदार/नर्म साम्प्रदायिक यह भी मानते हैं कि विभिन्न धर्मों के लोगों के सांझे हित हैं और इस साझेपन के कारण ही वे राष्ट्र बनते हैं इसलिए उन्हें अपनी राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक विकास के संघर्ष में साथ रहना चाहिए। दूसरे सम्प्रदाय या धर्म के प्रति उदार रूख के कारण ही इसको उदार सम्प्रदायिकता कहा जाता है। जो अपने सम्प्रदाय के हितों की पूर्ति के लिए जोर रखती है और इसके लिए अन्य सम्प्रदायों या धर्मों से सौदेबाजी भी करती है। स्वतन्त्रता संघर्ष के दौरान सन 1936 तक हिन्दू महासभा, मुस्लिम लीग व अकाली दल के उदार साम्प्रदायिक लोग बैठकर आपस में विचार विमर्श भी करते थे और अपने झगड़े सुलझाते थे व अंग्रेजी सरकार पर दबाव डालकर अपनी बात भी मनवाने की कोशिश भी करते थे। आज की राजनीति में उदार साम्प्रदायिक दलों में अकाली दल, केरल व तमिलनाडु की मुस्लिम लीग को और केरल के ईसाई राजनीतिक समूहों को इस श्रेणी में रखा जा सकता है।
फासिस्ट साम्प्रदायिकता, दूसरे धर्म व सम्प्रदायों के प्रति झूठ, घृणा और हिंसा पर आधारित होती है। इस किस्म की साम्प्रदायिकता दूसरे धर्म या सम्प्रदाय के अनुयायिओं के प्रति घृणा पैदा करती है, उसके बारे में तरह-तरह के झूठ-मिथक गढ़ती है व इनको जोर-शोर से प्रचारित करती है तथा हिंसा का सहारा लेती है। फासिस्ट साम्प्रदायिक बड़ी आक्रामक तेवर के साथ इस बात को लोगों की चेतना का हिस्सा बनाने की कोशिश करते हैं कि एक समुदाय को खत्म करने में ही दूसरे समुदाय का हित है, दोनों समुदायों के हित परस्पर विरोधी हैं इसलिए वे साथ-साथ नहीं रह सकते। स्वतन्त्रता-संघर्ष के दौरान सन 1937 के बाद इस किस्म की साम्प्रदायिकता ने जोर पकड़ा। मुस्लिम लीग व जिन्ना ने तथा हिन्दू महासभा व वीर सावरकर दोनों ने कहा कि हिन्दू और मुस्लिम दो अलग-अलग राष्ट्र हैं, दोनों एक राष्ट्र में नहीं रह सकते। हिन्दू साम्प्रदायिकों ने इस बात का खूब प्रचार किया कि हिन्दू राष्ट्र में अल्पसंख्यक दास, गुलाम और दूसरे दर्जे के नागरिक बनकर रहें तो जिन्ना ने धर्म के आधार पर अलग राष्ट्र की मांग रखी जो दुर्भाग्यवश पाकिस्तान के रूप में पूरी हुई। घृणा, अलगाव, निंदा और हिंसा पर टिकी साम्प्रदायिकता को आजादी के बाद आर।एस।एस.व इसके आनुषंगिक संगठनों ने अपनाया, जिसने मुसलमानों के बारे में झूठ, घृणा का इतना आक्रामक दुष्प्रचार किया कि उनको सभी समस्याओं का दोषी ठहरा दिया। इसी तरह सिक्खों में भिंडरावाला ने और मुसलमानों में जमात-ए-इस्लामी आदि ने इस किस्म की साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया। साम्प्रदायिकता ने हमेशा उच्च वर्ग के राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक हितों की रक्षा करने में तत्परता दर्शाई है जब से साम्प्रदायिकता का जन्म हुआ तभी से ऐसा हो रहा है बल्कि यह कहा जा सकता है कि उच्च वर्ग के स्वार्थों की टकराहट के नतीजे के तौर पर साम्प्रदायिकता का जन्म हुआ है। बिल्कुल प्रारम्भ से इसका उच्च-वर्गीय चरित्र रहा है। साम्प्रदायिकता की उत्पति पर विचार करना इसके वर्गीय चरित्र की पहचान करने में जरूरी है। अंग्रेजों के आने के पहले की सामन्ती शासन-प्रणाली में शासकों का चुनाव नहीं होता था बल्कि तलवार की ताकत के आधार सत्ता हथियाई जाती थी और जो भी सत्ता पर काबिज होता था वह सभी सम्प्रदायों से वफादारी व सहयोग की अपेक्षा करता था। सरकारी नौकरियां भी उन्हीं को मिलती थी जो राजा के प्रति वफादार होते थे, चाहे कोई किसी भी धर्म से ताल्लुक क्यों न रखता हो। राजा के प्रति वफादारी ही शासन-व्यवस्था में पद पाने का साधन थी। अर्थव्यवस्था में भी प्रतिस्पर्धा नहीं थी। आम तौर पर अपनी स्थानीय जरूरतों को पूरा करने के लिए उत्पादन किया जाता था न कि बाहर के बाजार में बेचने के लिए। अंग्रेजों ने जब भारत की शासन सत्ता संभाली तो इस व्यवस्था में भारी फेर बदल हुआ। उत्पादन भी प्रतिस्पर्धात्मक हो गया और अपनी स्थानीय जरूरतों के अलावा बाजार में बेचे जाने के लिए होने लगा। अंग्रेजों की औपनिवेशिक व्यवस्था पहले की सामन्ती व्यवस्था से अधिक लोकतान्त्रिक व प्रतिस्पर्धात्मक थी। इस नई व्यवस्था में हिन्दुओं व मुसलमानों के उच्च वर्ग में राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी तथा सरकारी नौकरियां प्राप्त करने की होड़/प्रतिस्पर्धा के कारण ही साम्प्रदायिकता का जन्म हुआ। अंग्रेजों ने अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए हिन्दू व मुस्लिम उच्च वर्ग के हितों की टकराहट को हवा दी, क्योंकि वे सन 1857 में हिन्दुओं-मुसलमानों की एकता को देख चुके थे और हिन्दू व मुसलमानों में फूट डालने के लिए यह नीति काम कर गई। स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी सुंदरपाल की सन 1929 में 'भारत में अंग्रेजी राज' नामक पुस्तक प्रकाशित हुई जिसमें अंग्रेजी शासकों की 'फूट डालो और राज करो' की नीति के तहत साम्प्रदायिकता का प्रसारित करने की मंशा को उनके दस्तावेजों के माध्यम से बताया है। ''इसके कुछ साल एक अंग्रेज अफसर ने लिखा था- ''हमारे राजनैतिक, मुल्थी और फौजी तीनों तरह के भारतीय शासन का उसूल, 'फूट फैलाओ और शासन करो' होना चाहिए।"
''..... अभी तक हमने साम्प्रदायिक और धार्मिक पक्षपात के द्वारा ही मुल्क को वश में रखा है - हिन्दुओं के खिलाफ मुसलमानों को और इसी तरह अन्य जातियों को एक-दूसरे के खिलाफॅ।" विप्लव के बाद कर्नल जॉन कोक ने, जो इस समय मुरादाबाद की पलटनों का कमांडर था, लिखा कि- ''हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि भिन्न-भिन्न धर्मों और जातियों के लोगों में हमारे सौभाग्य से जो अनैक्य मौजूद है उसे पूरे जोरों में कायम रखा जाए, हमें उन्हें मिलाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। भारत सरकार का उसूल यही होना चाहिए- 'फूट फैलाओ और शासन करो।"
सन 1883 में जब वायसराय कार्यकारिणी परिषद में पहली बार स्थानीय स्वशासन बिल प्रस्तुत किया तो मुस्लिम समाज सुधारक सर सैयद अहमदखान ने दो सम्प्रदायों के बीच नगरपालिका में सीटों की संख्या के बंटवारे को लेकर विरोध किया। इस तरह चुनावों के माध्यम से सत्ता में हिस्सेदारी को लेकर हिन्दू व मुसलमानों के उच्च वर्ग में विवाद का जन्म हुआ और धर्म का नाम लेकर निम्न वर्ग को अपने इर्द-गिर्द इकट्ठा करने के लिए यानी अपनी संख्या बढ़ाने के लिए साम्प्रदायिक चेतना का प्रचार शुरू किया और अंग्रेजों ने इसको पूरी हवा दी। ज्यों-ज्यों स्वतन्त्रता-आन्दोलन तेज होता गया तो सत्ता में हिस्सेदारी प्राप्त करने के लिए उच्च वर्ग भी साम्प्रदायिकता के माध्यम से तेज होता गया। स्वतन्त्रता की संभावना जितनी बढ़ी सत्ता में हिस्सेदारी की स्पर्धा भी सघन हुई जिससे हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष तेज होता गया।
साम्प्रदायिकता के वर्गीय चरित्र को एक अन्य ऐतिहासिक संदर्भ से भी समझा जा सकता है। अंग्रेजों के विरूद्ध संघर्ष को लेकर मुसलमानों का निम्न वर्ग, निम्न-मध्यवर्ग और उच्च वर्ग व उच्च-मध्यवर्ग परस्पर विरोधी विचार रखते थे। उच्च वर्ग के विचारों का प्रतिनिधित्व करने वाले सर सैयद अहमद खान ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल होने का विरोध किया जबकि अधिकतर उलेमाओं ने अंग्रेजों का विरोध किया और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का साथ दिया। शाह वली उल्लाही स्कूल के उलेमाओं ने कांग्रेस से गठबन्धन किया, देवबन्द के दारूल-उलम के मौलाना रशीद अहमद गंगोही ने मुसलमानों को कांग्रेस से सम्बन्ध् स्थापित करने का फतवा जारी किया। बहावियों ने सौ फतवों का संग्रह 'नुसरत-अल-अहरार (स्वतन्त्रता सेनानियों की मदद) नामक पुस्तक प्रकाशित करके अंग्रेजों को भारत से खदेडऩे का संकल्प दोहराया।
अंग्रेजों के विरोध या समर्थन के पीछे वर्गीय चरित्र ही काम कर रहा था। अधिकतर उलेमा या तो गांव के गरीब थे या फिर कारीगर वर्ग से सम्बंधित थे और गौर करने की बात है कि अंग्रेजों की नीतियों ने किसानों को और हस्तशिल्पियों-कारीगरों के आर्थिक आधार को तबाह कर दिया था। मशीन से बने ब्रिटेन के कपड़ों ने भारत के जुलाहों का धंधा बिल्कुल चौपट कर दिया था। इन वर्गों पर अंग्रेजी नीतियों की सबसे अधिक मार पड़ी थी इसीलिए ये वर्ग अंग्रेजी शासन के विरूद्ध पूरी निष्ठा से लड़े। दूसरी तरफ मुस्लिम लीग में या तो उच्च मध्य वर्ग के शिक्षित लोग थे या फिर राजे-रजवाड़े और जमींदार। शिक्षित मध्य वर्ग नौकरी पाने के लिए तथा राजे-रजवाड़ों ने राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के लिए अंग्रेजों का साथ दिया। धर्म की आड़ लेकर लोगों को एकत्रित करने की कोशिश की चूँकि मुस्लिम लीग का न तो धर्म से कोई लेना देना था और न ही आम लोगों की तकलीफों से, इसलिए मुस्लिम लीग की पकड़ कभी भी आम मुसलमानों में नहीं हुई और कभी भी उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली। विशेषकर बंगाल और पंजाब जैसे राज्यों में जहां मुसलमानों की संख्या अन्य समुदायों से अधिक थी। महान कथाकार मुंशी प्रेमचन्द ने 'साम्प्रदायिकता और संस्कृति' लेख में साम्प्रदायिकता के वर्गीय चरित्र को उद्घाटित किया है कि ''इन संस्थाओं (साम्प्रदायिकता) को जनता के सुख-दुख से कोई मतलब नहीं, उनके पास ऐसा कोई सामाजिक या राजनैतिक कार्यक्रम नहीं है, जिसे राष्ट्र के सामने रख सकें। उनका काम केवल एक-दूसरे का विरोध करके सरकार के सामने फरियाद करना और इस तरह विदेशी शासन को स्थायी बनाना है। उन्हें किसी हिन्दू या किसी मुस्लिम शासन की अपेक्षा विदेशी शासन कहीं सहज है। वे ओहदों और रिआयतों के लिए एक-दूसरे से चढ़ा-ऊपरी करके जनता पर शासन करने में शासक के सहायक बनने के सिवा और कुछ नहीं करते। मुसलमान अगर शासकों का दामन पकड़कर कुछ रिआयतें पा गया है, तो हिंदू क्यों न सरकार का दामन पकड़े और क्यों न मुसलमान की ही भांति सुर्खरू बन जाए। यही उनकी मनोवृत्ति है। कोई ऐसा काम सोच निकालना, जिससे हिंदू और मुसलमान दोनों एक होकर राष्ट्र का उद्धार कर सकें, उनकी विचार शक्ति से बाहर है। दोनों ही साम्प्रदायिक संस्थाएं मध्यवर्ग के धनिकों, जमींदारों, ओहदेदारों और पद-लोलुपों की है। उनका कार्य क्षेत्र अपने समुदाय के लिए ऐसे अवसर प्राप्त करना है, जिससे वह जनता पर शासन कर सकें, जनता पर आर्थिक और व्यावसायिक प्रभुत्व जमा सकें। साधारण जनता के सुख-दुख से उन्हें कोई प्रयोजन नहीं। अगर सरकार की किसी नीति से जनता को कुछ लाभ होने की आशा है और इन समुदायों को कुछ क्षति पहुंचने का भय है, तो वे तुरंत उसका विरोध् करने को तैयार हो जाएंगी। अगर और ज्यादा गहराई तक जाएं, तो हमें इन संस्थाओं में अधिकांश ऐसे सज्जन मिलेंगे जिनका कोई-न-कोई निजी हित लगा हुआ है और कुछ न सही तो हुक्काम के बंगलों पर उनकी रसाई ही सरल हो जाती है।"
स्वतन्त्रता के बाद भी साम्प्रदायिकता हमेशा उच्च-वर्ग के हितों की सेवा करने का औजार रही है। समाज के सामान्य लोगों के दुख-दर्दों से साम्प्रदायिकता का कोई-लेना-देना नहीं है। अपने ही सम्प्रदाय के बीच अशिक्षा, गरीबी, कुपोषण, अंध्-विश्वास, बेकारी, भ्रूण-हत्या, स्त्री विरोधी पुरातन मानसिकता, जाति की अमानवीय प्रथा के प्रति कभी आवाज नहीं उठाई क्योंकि साम्प्रदायिक दृष्टि में ये समस्याएं ही नहीं है। इसके लिए गरीबी समस्या नहीं है बल्कि गरीब समस्या है उनकी मैनेजमेंट करना और उनके रोष को उन्हीं के खिलाफ प्रयोग करना उनकी चिंता है और इस कुत्सित कार्य को सिद्ध करने के लिए वह साम्प्रदायिकता का विषैला नाग लोगों में लेकर आता है।

धर्म बनाम साम्प्रदायिकता

धर्म बनाम साम्प्रदायिकता
सुभाष चन्द्र, एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र

आधुनिक भारत पर साम्प्रदायिकता की काली छाया लगातार मंडराती रही है। साम्प्रदायिकता के कारण भारत का विभाजन हुआ और अब तक साम्प्रदायिक हिंसा में हजारों लोगों की जानें जा चुकी हैं और लाखों के घर उजड़े हैं, लाखों लोग विस्थापित होकर शरणार्थी का जीवन जीने पर मजबूर हुए हैं। साम्प्रदायिकता के साथ धर्म जुड़ा रहता है, जिस कारण साम्प्रदायिकता की समस्या का समाधान चाहने वाले लोग कई बार इस नतीजे पर पहुंच जाते हैं कि साम्प्रदायिकता की जड़ धर्म में है। साम्प्रदायिकता का धर्म से गहरा ताल्लुक होते हुए भी धर्म उसकी उत्पति का कारण नहीं है। इसलिए धर्म और साम्प्रदायिकता के अन्त:संबंधों को समझना निहायत जरूरी है।
धर्म का क्षेत्र और साम्प्रदायिकता का क्षेत्र बिल्कुल भिन्न है। धर्म में ईश्वर का, परलोक का, स्वर्ग-नरक का, पुनर्जन्म का, आत्मा-परमात्मा का विचार होता है। सच्चे धार्मिक का और धर्म का सारा ध्यान पारलौकिक आध्यात्मिक जगत से संबंध होता है, धर्म में भौतिक जगत की कोई जगह नहीं होती जबकि इसके विपरीत साम्प्रदायिकता का अध्यात्म से कुछ भी लेना-देना नहीं है और साम्प्रदायिक लोग अपने भौतिक स्वार्थों जैसे राजनीति, सत्ता, व्यापार आदि की चिन्ता अधिक करते हैं।
किसी समाज में विभिन्न धर्मों के होने मात्र से ही साम्प्रदायिकता पैदा नही होती। साम्प्रदायिकता स्वत: स्फूर्त परिघटना नहीं होती बल्कि साम्प्रदायिक उन्माद पैदा करने के लिए साम्प्रदायिक शक्तियां वातावरण का निर्माण करती हैं, एक-दूसरे समुदाय के बारे भ्रम फैलाते हैं और एक-दूसरे के विरूद्ध नफरत फैलाते हैं। भारत में बहुत से धर्मों के लोग रहते हैं, भिन्न-भिन्न धर्मों के होना साम्प्रदायिकता नहीं है। लोगों के, समुदायों के धार्मिक हित कभी नहीं टकराते इसलिए उनमें कोई हिंसा-तनाव होने का सवाल ही नहीं उठता। कुछ लोगों के सांसारिक हित (सत्ता-व्यापार) टकराते हैं तो वे अपने स्वार्थों को पूरा करने के लिए इस बात का धूंआधार प्रचार करते हैं कि एक धर्म के मानने वाले लोगों के हित समान हैं और भिन्न-भिन्न धर्मों को मानने वाले लोगों के हित परस्पर विपरीत एवं विरोधी हैं। बस यहीं से साम्प्रदायिकता की शुरूआत होती है। साम्प्रदायिकता को फैलाने वाले स्वार्थी लोग इतने चालाकी से इस काम को करते हैं कि लोग उन कुछ लोगों के हितों को अपने हित मानने की भूल कर बैठते हैं। उन स्वार्थी-साम्प्रदायिक लोगों के भौतिक स्वार्थ लोगों को अपने आध्यात्मिक हित नजर आएं इसके लिए वे धर्म का सहारा लेते हैं। चूंकि धर्म से लोगों का भावनात्मक लगाव होता है, लोगों की आस्था जुड़ी होती है इसलिए इसका सहारा लेकर उनको आसानी से एकत्रित किया जा सकता है। लोगों की आस्था व विश्वास को साम्प्रदायिकता में बदलकर, दूसरे धर्म के लोगों के खिलाफ प्रयोग करके स्वार्थी-साम्प्रदायिक लोग अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं।
धर्म और साम्प्रदायिकता न केवल भिन्न है, बल्कि परस्पर विरोधी है। साम्प्रदायिक व्यक्ति कभी धार्मिक नहीं होता, लेकिन वह धार्मिक होने का ढोंग अवश्य करता है। साम्प्रदायिक व्यक्ति की धार्मिक आस्था तो होती नहीं इसलिए वह ऐसे कर्मकाण्ड करता है जिससे कि बहुत बड़ा धार्मिक दिखाई दे। मंदिरों-मस्जिदों के लिए अत्यधिक धन जुटाएगा, कथाओं-कीर्तनों का आयोजन करेगा। धार्मिक सभाएं-जुलूस आयोजित करेगा ताकि वह सबसे बड़ा धार्मिक और धर्म की सेवा करने वाला नजर आए। अपने धर्म के मूल्यों से, धर्म की शिक्षाओं से उसका कोई लेना-देना नहीं होता। साम्प्रदायिक लोग साम्प्रदायिक-दंगें आयोजित करके-हिंसा, आगजनी, लूट-खसोट, बलात्कार आदि अपराध करते है, जबकि उनका धर्म उन कुकृत्यों की कोई इजाजत नहीं देता। ये काम कोई धर्म-सम्मत काम नहीं है बल्कि धर्म के विरोधी हैं लेकिन स्वार्थी साम्प्रदायिक लोग इसको धर्म की आड़ में बेशर्मी से करते हैं। साम्प्रदायिक हिन्दू हिंसा करके धर्म की उदारता और सहिष्णुता को समाप्त करते हैं तो साम्प्रदायिक मुस्लिम इस्लाम यानि शान्ति के संदेश का अपमान करते हैं। साम्प्रदायिक हिन्दू और साम्प्रदायिक मुसलमान या अन्य धर्म का साम्प्रदायिक व्यक्ति दूसरे धर्म के लोगों को तो नुक्सान पहुंचाकर मानवता को नुक्सान पहुंचाता ही है, इसके साथ वह सबसे पहले अपने धर्म का और उसको मानने वाले लोगों को नुकसान पहुंचाता है। कट्टर या साम्प्रदायिक व्यक्ति की शत्रुता दूसरे धर्म के कट्टर और साम्प्रदायिक व्यक्ति से नहीं होती बल्कि अपने ही धर्म को मानने वाले उदार व्यक्ति और सच्चे धार्मिक से होती है। कट्टर व साम्प्रदायिक लोगों की दोस्ती उसी तरह होती है जिस तरह कहावत है कि 'चोर-चोर मौसेरे भाई' इसलिए वे उदार लोगों के लिए अपमानजनक मुहावरे और वाक्य प्रयोग करते हैं जैसे - कायर, गद्दार, नपुसंक, धर्म-द्रोही आदि। सच्चा धार्मिक या सच्चे अर्थों में धर्म को मानने वाला कभी साम्प्रदायिक नहीं हो सकता और साम्प्रदायिक व्यक्ति कभी धार्मिक हो ही नहीं सकता यदि कोई धर्म में, ईश्वर में या खुदा में विश्वास करता है और मानता है कि यह सृष्टि ईश्वर/खुदा की रचना है तो उसे सबको मान्यता देनी चाहिए। यदि उसकी ईश्वर/खुदा की सत्ता में जरा भी आस्था है तो वह सभी लोगों को उसकी संतान समझेगा औरसमान समझेगा इसके विपरीत जिसकी धर्म में और धार्मिक विश्वासों में आस्था के विपरीत स्वार्थों में घिरा है तो वह सबको समान नहीं समझेगा और वह अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए साम्प्रदायिकता के विचार को ग्रहण करेगा, सबको समान नहीं समझेगा। साम्प्रदायिक व्यक्ति किसी दूसरे सम्प्रदाय क्या अपने सम्प्रदाय में भी समानता-बराबरी-भाईचारे के विपरीत होगा और अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए असमानता की विचारधारा को अपनाएगा। इस बात को एक उदाहरण के माध्यम से समझा जा सकता है।
स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान एक तरफ महात्मा गांधी जो स्वयं को सनातनी हिन्दू कहते थे, जनेऊ धारण करते थे। प्रार्थना सभाएं करते थे, 'रघुपति राघव राजा राम' की आरती गाते थे। हिन्दू रिवाजों-मान्यताओं mein विश्वास जताते थे, ईश्वर में विश्वास करते थे, हिन्दू-ग्रन्थों का आदर करते थे। लेकिन महात्मा गांधी साम्प्रदायिक नहीं थे, सभी धर्मों और उनके मानने वालों का आदर करते थे। उन्होंनें धर्म के आधार पर राष्ट्र बनाने का विरोध किया। इस आदर्श के लिए उन्होंने अपनी जान भी दे दी। धर्म-निरपेक्ष राज्य के पक्के समर्थक थे, धर्म को व्यक्ति का निजी मामला मानते थे। दूसरी तरफ इसके विपरीत वीर सावरकर थे जिनकी हिन्दू धर्म में, इसके रीति-रिवाजों, विश्वासों-मान्यताओं में आस्था नहीं थी बल्कि उनका ईश्वर में भी विश्वास नहीं था, लेकिन उनको धर्म के आधार पर 'हिन्दु-राष्ट्र' चाहिए था। धर्म के आधार पर 'हिन्दु महासभा' का गठन किया उनको धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र स्वीकार नहीं था जबकि धर्म से उनका कोई सरोकार नहीं था। इसी तरह मुसलमानों में देखा जा सकता है। एक तरफ मौलाना अबुल कलाम आजाद थे जो इस्लाम की मान्यताओं में विश्वास रखते थे, कुरान पर चार-भागों में टीका लिखी, जो पांचों समय नमाज पढ़ते थे और नियमित रूप से मस्जिद जाते थे लेकिन वे धर्म को निजी मामला समझते थे। धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र में विश्वास करते थे। धर्म के आधार पर 'पाकिस्तान' की मांग करने वालों का मुखर विरोध किया।
अबुल कलाम मौलाना आजाद ने कहा कि ''मैं मुसलमान हूँ, और गर्व के साथ अनुभव करता हूँ कि मुसलमान हूं। इस्लाम की तेरह सौ बरस की शानदार रिवायतें मेरी पैतृक संपति हैं। मैं तैयार नहीं हूँ कि इसका कोई छोटे-से-छोटे हिस्से को भी होने दूँ। इस्लाम की तालीम, इस्लाम का इतिहास, इस्लाम का इल्म और फन, और इस्लाम की तहजीब मेरी पूंजी है और मेरा फर्ज है कि उसकी रक्षा करूं। मुसलमान होने की हैसियत से मैं अपने मजहबी और कलचरल दायरे में अपना एक खास अस्तित्व रखता हू और मैं बरदास्त नहीं कर सकता कि इसमें कोई हस्तक्षेप करे। किंतु इन तमाम भावनाओं के अलावा मेरे अंदर एक और भावना भी है, जिसे मेरी जिंदगी की 'रिएलिटीज़' यानि हकीकतों ने पैदा किया है। इस्लाम की आत्मा मुझे उससे नहीं रोकती, बल्कि मेरा मार्ग-प्रदर्शन करती हैं। मैं अभिमान के साथ अनुभव करता हूँ कि मैं हिंदुस्तानी हूँ मैं हिंदुस्तान की अविभिन्न संयुक्त-राष्ट्रीयता नाकाबिले तक्सीम मुत्ताहिदा कौमियत का एक अंश हूँ। मैं इस संयुक्त-राष्ट्रीयता का एक ऐसा महत्त्वपूर्ण अंश हूँ । उसका एक ऐसा टुकड़ा हूँ, जिसके बिना उसका महत्त्व अधूरा रह जाता है। मैं इसकी बनावट का एक जरूरी हिस्सा हूँ। मैं अपने इस दावे से कभी दस्तबरदार नहीं हो सकता।"
दूसरी ओर इसके विपरीत मुहम्मद अली जिन्ना थे, जिनका नमाज और मस्जिद से कोई लेना-देना नहीं था। जिनका इस्लाम में, इस्लाम की मान्यताओं में कोई विश्वास नहीं था। मसलन शराब और सुअर का मांस इस्लाम में हराम माने गए हैं जबकि जिन्ना का नाश्ता सुअर के मांस और रात का भोजन शराब (स्कॉच) के बिना नही होता था। आचार-विचार से, वेश-भूषा से, विश्वास-व्यवहार से कहीं से भी जिन्ना इस्लाम धर्म के निकट नहीं थे, लेकिन धर्म के आधार पर अलग राष्ट्र की मांग की और फलस्वरूप पाकिस्तान का निर्माण हुआ। महात्मा गांधी व अबुल कलाम मौलाना आजाद सच्चे अर्थों में धार्मिक थे लेकिन इसके विपरीत जिन्ना व सावरकर का धर्म से व धार्मिकता से कोई वास्ता नहीं था। जिन्ना की मुस्लिम लीग और अबुल कलाम मौलाना आजाद में हमेशा छतीस का आंकड़ा रहा और महात्मा गांधी तो वीर सावरकर के राजनीतिक शिष्य की ही गोली का शिकार हुए। इसके विपरीत जिन्ना और सावरकर में गहरी समानताएं हैं जैसे दोस्तों में होती हैं। दोनों की विचारधारा, धर्म के मामले में एक जैसी थी, दोनों धर्म के आधार पर राष्ट्र का निर्माण करना चाहते थे। दोनों 'द्वि-राष्ट्र के सिद्धांत के समर्थक थे।
यद्यपि यह बात सही है कि साम्प्रदायिकता का मूल कारण धर्म नहीं है लेकिन साथ ही यह बात भी सच है कि धर्म का प्रयोग करके ही साम्प्रदायिक शक्तियां फलती-फूलती हैं। धर्म के प्रतीकों का, धर्म के विश्वासों के सहारे ही यह विष-बेल फैलती है। स्वतंत्रता पूर्व समय में सन 1938 तक मुस्लिम लीग का आधार नहीं बढ़ा। जमींदारों और कुछ उच्च-मध्यवर्ग तक ही साम्प्रदायिक चेतना का प्रसार-प्रभाव था, लेकिन जब सन 1938 के बाद जिन्ना ने धार्मिक प्रतीकों का सहारा लिया, मुल्ला-मौलवियों का तथा धार्मिक स्थलों का सहारा लिया तो उसका आधार बढ़ा और अपने आक्रामक प्रचार से लोगों की चेतना में यह बात डाल दी कि पाकिस्तान या मुसलमानों के लिए अलग देश बने बिना न तो इस्लाम सुरक्षित है और न ही इस्लाम को मानने वाले।
इसी तरह आजादी के कुछ समय तक साम्प्रदायिकता हाशिये पर ही रही। जनसंघ को 'बनियों' की पार्टी के तौर पर ही जाना गया और इसकी ताकत कम ही रही लेकिन ज्यों ही धार्मिक भावनाओं से जुड़े मुद्दे उठाए, धार्मिक प्रतीकों को उठाया तो इसका आकार तेजी से बढ़ता गया और एक राजनीतिक ताकत बनकर उभरी। गौ-रक्षा के बाद, राम-जन्म भूमि के विवाद को उठाया, अखाड़ों के महंतों, मंदिरों के पुजारियों, पौराणिक कथावाचकों का, धार्मिक स्थलों का सहारा लिया और इनको अपने प्रचार में जोड़ लिया तो एक बड़ी राजनीतिक शक्ति बन गई। धर्म से जुड़े प्रतीक और विश्वास साम्प्रदायिकता को आधार प्रदान करते हैं। साम्प्रदायिक शक्तियां बड़ी चालाकी से धर्म में संकीर्णता, अंध्विश्वास, भाग्यवाद और अतार्किकता का लाभ उठाती हैं लेकिन ध्यान देने योग्य बात है कि साम्प्रदायिक लोग स्वयं धार्मिक रूढिय़ों को नहीं मानते, ठीक उसी तरह जिस तरह वे धर्म से जुड़े मानवीय मूल्यों और शिक्षाओं को नहीं मानते। साम्प्रदायिक शक्तियां अत्याधुनिक तरीकों व तकनीक का प्रयोग करती हैं। धार्मिक ग्रन्थों व शास्त्रों की दुहाई भी देते हैं और अपने उपदेशों, सभाओं, भाषणों में उनके पालन का आग्रह भी करते हैं। मसलन साम्प्रदायिक हिन्दू मनु द्वारा दी गई वर्णाश्रम व्यवस्था को आदर्श व्यवस्था मानता है। आश्रम-व्यवस्था के अनुसार न तो कोई सन्यास लेता है और न ही ब्रह्मचारी रहता है। इसी तरह साम्प्रदायिक मुसलमान का व्यवहार शरीअत के अनुसार नहीं होता। हां शास्त्रों की-ग्रन्थों की, रूढिय़ों-पुरातन विश्वासों को आम लोगों पर बदले की कार्रवाई की तरह प्रयोग किया जाता है। सभी धर्म की सेवा करने वाले उग्रपंथी चाहे सिक्ख हों, हिन्दू या मुसलमान सबसे पहले स्त्रियों की आजादी छीनते हैं, उनकी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद को समाप्त करते हैं, उन पर आचार-संहिता थोंपते हैं। साम्प्रदायिकता शक्तियां स्वयं चाहें रूढि़वादी न हों लेकिन समाज को रूढिय़ों से जकडऩे की कोशिश करते हैं। इसका एक काफी दिलचस्प उदाहरण है 'शिव सेना' (राजनीतिक पार्टी) स्वयं को हिन्दुओं के हितों की रक्षक घोषित करती है लेकिन इसकी कलई तभी खुल जाती जब कोई भी मुद्दा आता है जैसे कि रेलवे में भर्ती के लिए उन्होंने कहा कि यह सिर्फ महाराष्ट्र के लिए है और दूसरे प्रान्त के लोगों को शिव सेना के गुण्डों ने पीट-पीट कर भगा दिया यदि 'शिव सेना' से पूछा जाए कि क्या महाराष्ट्र के बाहर के हिन्दुओं के प्रति उनका व्यवहार धार्मिक है। इसी तरह 'शिव सेना' 'वेलेन्टाइन डे' पर लड़के-लड़कियों के जोड़ों के मुंह पर कालिख पोत देती है, स्त्रियों के लिए 'ड्रेस कोड़' का आहवान करती है, लेकिन दूसरी तरफ माइकल जैक्शन को बुलाकर 'सांस्कृतिक' कार्यक्रम भी करवाती है। साम्प्रदायिक शक्तियों की जीत असल में इसी में होती है कि लोग वैसा ही मानते जाएं जैसा वे कहते जाएं। आजादी, उन्मुक्तता व बराबरी का रिश्ता-रिवाज उनकी सारी विचारधारा को खतरा नजर आता है।
आधुनिक भारत के चिन्तक व समाज सुधारक राजाराम मोहन राय ने धर्म के नाम पर किए जाने वाले कुकृत्यों को उचित ठहराने के बारे में सही ही कहा है कि ''इन धार्मिक नेताओं ने अधिकतर लोगों को अपने आकर्षण में इस तरह जकड़ लिया है कि ये असहाय लोग वस्तुत: बाध्यता और दासता के बंधन में हैं यह अपनी दृष्टि और अपना हृदय पूर्णरूपेण खो चुके हैं। इसीलिए इन नेताओं के आदेश का पालन करते समय वे अपने वास्तविक मंगल और पाप में भेद करना तक अपराध समझते हैं। यद्यपि मनुष्य होने के नाते वे मूलत: एक ही वृक्ष की भिन्न-भिन्न शाखाएं हैं तथापि केवल अपने मतवाद को स्थापित करने के लिए और साम्प्रदायिक भावना से प्रेरित होकर वे एक-दूसरे की हत्या करना अथवा अत्याचार करना एक विशेष पुण्य का कार्य मानते हैं। मिथ्याचार, चोरी, डकैती, व्यभिचार आदि निकृष्टतम दुष्कार्य जो कि आत्मा के लिए अमंगलकारी एवं साधारण मानव के लिए भी अहितकारी हैं, ऐसे पापकर्मों से वे केवल इसलिए नहीं हिचकते कि उन्हें विश्वास है कि उनके धार्मिक नेता उन्हें पाप से मुक्ति दिला देंगे मनुष्य अपना अमूल्य समय ऐसी पुराण कथाओं के पाठ में व्यतीत करता है, जिन पर विश्वास करना असंभव लगता है। परंतु इन्हीं कथाओं से प्राचीन और नए धार्मिक नेताओं पर उनका विश्वास मानो और अधिक दृढ़ होता है।"
साम्प्रदायिकता न तो धार्मिक कारणों से पैदा होती है और न वह धार्मिक समस्याओं को उठाती है इसलिए साम्प्रदायिकता का समाधान धार्मिक आधार पर नहीं हो सकता। हिन्दू साम्प्रदायिकता और मुस्लिम साम्प्रदायिकता की लड़ाई हिन्दू-धर्म और इस्लाम-धर्म की लड़ाई नहीं है बल्कि यह कुछ वर्गों के राजनीतिक हितों की टकराहट है, इसलिए इसका समाधन भी राजनीतिक पहलकदमी में है। धर्म की आड़ में छुपी राजनीति और राजनीतिक हितों की कलई खोलकर ही इससे मुकाबला किया जा सकता है। स्वतन्त्रता से पहले मुस्लिम लीग साम्प्रदायिकता की राजनीति करती थी लेकिन उसकी एक भी मांग धार्मिक नहीं थी। मुस्लिम लीग के 14 सूत्री मांग-पत्र का इस्लाम से कोई लेना देना नहीं था। सारी मांगें राजनीतिक थी। इसी तरह स्वतन्त्रता के बाद आर.एस.एस. साम्प्रदायिकता का चैंपियन है। सारी राजनीति धर्म की आड़ लेकर की जाती है अपने संगठन का राजनीतिक चरित्र भी छिपाया जाता है। लोगों में स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए सांस्कृतिक संगठन की छवि बनाई जाती है जबकि होती है शुद्ध सता हथियाने की राजनीति। कोई संगठन अपने को सांस्कृतिक संगठन कैसे कह सकता है यदि उसका पहला मकसद ही राजनीतिक हों यानि हिन्दू राष्ट्र बनाना। यदि किसी राष्ट्र का चरित्र निर्धारण करने के काम को भी अराजनीतिक श्रेणी में रखा जाएगा तो राजनीतिक कार्य किसको कहा जाएगा। 'विश्व हिन्दू परिषद' ने कभी भी मन्दिरों में सुधारों के लिए कोई अभियान नहीं चलाया इसके नेता विष्णुहरि डालमिया, अशोक सिंघल, प्रवीण तोगडिय़ा न तो संत हैं और न ही उनकी कोई धार्मिक आस्था है बल्कि वे राजनीतिक व्यक्ति हैं जो विशेष वर्गों के राजनीतिक हितों को साध रहे हैं
शहीदे भगतसिंह ने 'धर्म और हमारा स्वतन्त्रता-संग्राम लेख में धर्म और साम्प्रदायिकता पर विचार प्रकट करते हुए दोनों में स्पष्ट अन्तर किया है उन्होंने लिखा कि ''रूसी महात्मा टालस्टॉय ने अपनी पुस्तक में धर्म पर बहस करते हुए उसके तीन हिस्से किये हैं-
1 इसेन्स ऑफ़ दी रिलिजन - यानी धर्म की जरूरी बातें - अर्थात सच बोलना, चोरी न करना, गरीबों की सहायता करना, प्यार से रहना वगैरह।
२ फिलोसोफी ऑफ़ दी रिलिजन - यानी जन्म-मृत्यु, पुनर्जन्म, संसार-रचना आदि का दर्शन। इसमें आदमी अपनी मर्जी के अनुसार सोचने और समझने का यत्न करता है।
३ रिचुअल ऑफ़ दी रिलिजन - यानी रस्मो-रिवाज वगैरह।
सो यदि धर्म पीछे लिखी तीसरी और दूसरी बात के साथ अन्धविश्वास को मिलाने का नाम है, तो धर्म की कोई जरूरत नहीं। इसे आज ही उड़ा देना चाहिए यदि पहली और दूसरी बात में स्वतन्त्र विचार मिलाकर धर्म बनता हो, धर्म मुबारक है।"
इस तरह कहा जा सकता है कि साम्प्रदायिकता की उत्पति का कारण धर्म नहीं है और न ही अनेक धर्मों के लोगों का साथ रहना बल्कि इसका कारण वर्ग विशेष के निहित स्वार्थ है यदि धर्म और धार्मिक आस्थाएं इसका कारण होती तो साम्प्रदायिकता की उत्पति आधुनिक युग में न होती बल्कि इसकी उत्पति काफी पहले हो गई होती क्योंकि आधुनिक युग के मुकाबले पहले लोगों की धार्मिक आस्थाएं अधिक पुख्ता थी, जबकि आधुनिक काल में धार्मिक आस्थाओं पर प्रश्न चिह्न लगा है। दिलचस्प बात यह है कि साम्प्रदायिकता की शुरूआत भी आधुनिक काल में हुई और इसको आगे बढ़ाने वाले मंदिरों-मस्जिदों-गुरूद्वारों-गिरिजाघरों में बैठे पुजारी-महंत नहीं थे, बल्कि राजनीति के क्षेत्र में काम करने वाले लोग थे। स्वतंत्रता पूर्व के काल में राजनीतिक लोगों ने साम्प्रदायिकता को धर्म की आड़ लेकर आगे बढ़ाया और स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद विशेषकर सन 1980 के बाद राजनीतिक लोगों ने धार्मिक आड़म्बर का चोला धरण करके राजनीतिक लाभ उठाया। इस तरह स्पष्ट है कि साम्प्रदायिकता एक राजनीतिक विचारधारा है जो सत्ताधरी वर्ग के हितों की रक्षा के लिए काम करती है, लेकिन यह धर्म का आवरण ओढ़कर या धर्म की आड़ लेकर ऐसा करती है और लोगों की धार्मिक भावनाओं से इसमें ईंधन का काम लिया जाता है।