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July 27, 2011

रविन्द्रनाथ टैगोरः विराट भारतीय आत्मा


रविन्द्रनाथ टैगोरः विराट भारतीय आत्मा

रवीन्द्र नाथ मूलतः बंगला के कवि हैं, लेकिन वे भारत के और विश्व के कवि हैं। रविन्द्रनाथ टैगोर का जन्म हुआ। कलकत्ता में 7 मई,1861 में हुआ। रविन्द्रनाथ को एक समृद्ध विरासत मिली थी। रविन्द्रनाथ टैगोर के दादा द्वारकानाथ ने जहां उत्पादन को बढ़ावा देने में अपनी ऊर्जा लगाई, वहीं इनके पिता देवेन्द्रनाथ टैगोर ने राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित ब्रह्म समाज में सक्रियता से कार्य किया।
रविन्द्रनाथ का संबंध जमींदार घराने से था, उनके दादा द्वारकानाथ ठाकुर राजा कहलाते थे, लेकिन रविन्द्रनाथ का बचपन साधारण तरीके से ही बीता। उन्होंने लिखा कि “हमारे बचपन में भोग-विलास का सरंजाम नहीं था, इतना कहना काफी होगा। ...हम लोग नौकरों के शासन में थे। अपने काम को आसान करने के लिए उन लोगों ने हमारा हिलना-डुलना एक तरह से बन्द कर दिया था। ...हमारे खान-पान में शौकीनी की गंध भी न थी। कपड़े-लत्ते इतने साधारण थे कि आज के लड़कों के सामने उनकी फेहरिस्त रखने से इज्जत जाने का डर है। दस साल की उम्र होने से पहले कभी किसी दिन किसी कारण से मौजा मैने नहीं पहना। जाड़े के दिनों में एक सादे कपड़े के ऊपर और भी एक सादा कपड़ा ही काफी था। इसके लिए मैने किसी दिन भाग्य को बुरा-भला नहीं कहा। हां, हमारे घर का दर्जी नियामत खलीफा उपेक्षा के भाव से जब हमारे कुर्ते में जेब लगाना आवश्यक समझता तो इसका हमें दु:ख होता - क्योंकि ऐसा कोई लड़का तो किसी भिखारी के घर भी पैदा नहीं होता जिसके पास अपनी जेब में रखने के लिए कुछ-न-कुछ चल-अचल संपति न हो। ... छोटी से छोटी चीजें भी हमारे लिए दुर्लभ थीं, बड़े होने पर कभी मिलेंगी इसी आशा में उन सबको दूर भविष्यत् के हाथों में समर्पित करके हम बैठे हुए थे। उसका फल यह हुआ था कि उन दिनों जो कुछ भी हमें मिल जाता उसका रस पूरा-पूरा गार लेते थे, छिलके से लेकर गुठली तक कुछ भी फेंका न जाता।”
वे अपने पिता की तेहरवीं संतान थे। रविन्द्रनाथ के भाई और उम्र में बड़े भानजे को स्कूल में जाते देख स्कूल जाने की जिद्द की तो निरुत्साहित करने के लिए “हम लोगों के जो शिक्षक थे उन्होंने मेरा मोह भंग करने के लिए एक जोरदार तमाचे की तरह यह सारगर्भ बात कही थी, तुम अभी स्कूल जाने के लिए जिस तरह रो रहे हो, न जाने के लिए इससे कहीं ज्यादा तुम्हें रोना पड़ेगा।” असल में शिक्षा प्रणाली का यह सच ही था। 8 मार्च, 1874 को लगभग 12-13 साल की उम्र में उनकी मां का देहांत हो गया। रविन्द्रनाथ कवि तथा नाटक के अभिनेता के तौर पर प्रसिद्धि प्राप्त कर रहे थे, सत्रह साल की उम्र में अंग्रेज़ी की पढ़ाई के लिए 1878 में इंगलैंड भेजे वे अपनी शिक्षा पूरी करने से पहले ही बुला लिये गए। 9 दिसम्बर 1883 को बाईस साल की उम्र में मृणालिनी देवी के साथ उनका विवाह कर दिया गया। उनके पांच संतानें हुईं। इनकी शिक्षा की व्यवस्था घर पर ही की। इनकी पत्नी के देहांत के बाद बच्चों को पिता के साथ-साथ मां का प्यार भी दिया। बाल मनोविज्ञान को जानने का अवसर मिला और बेहतरीन बाल साहित्य की रचना की। इनकी बेटी तथा एक बेटे की मृत्यु ने गहरा आघात पहुंचा। उन्होंने 1901 में विश्वभारती स्कूल की स्थापना की। जिसमें अंग्रेजी शिक्षा के विकल्प के तौर पर शुरु की थी। आज यह शान्तिनिकेतन विश्वविद्यालय के तौर पर फल-फूल रहा है।
1911 में भारत का राष्ट्रगान ‘ष्जन गण मण’ लिखा और उसी साल उन्होंने ब्रह्मसमाज की पत्रिका ‘तत्वबोध प्रकाशिका‘ में इसे ‘भारत विधाता‘ शीर्षक से प्रकाशित किया था। इस पत्रिका का सम्पादन गुरुदेव ही करते थे।1911 में ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में 27 दिसंबर को इसे गाया गया।शुरु में इस पर आरोप लगाया जाता रहा कि यह जार्ज पंचम की अभ्यर्थना में लिखा गया है। कहा तो यहां तक गया कि गीत में जार्ज पंचम को ही भारत भाग्य विधाता कहा गया है।यह संयोग ही था कि जिस अधिवेशन में यह गाया गया उसी अधिवेशन में जार्ज पंचम का अभिनंदन करने का निर्णय लिया गया था। अभिनंदन करने का कारण था कि उन्होंने बंगभंग के फैसले को रद्द करने का ऐलान किया था।
गुरुदेव ने इन विवादों का ज़ोरदार विरोध किया और कहा कि ‘भारत भाग्य विधाता‘ और ‘जय हे‘ का भारत के जनगण के लिए ही व्यवहार किया गया है। यह गीत देश के जनगण के लिए समर्पित है। गुरुदेव ने स्वयं 1905 में बंगभंग के ख़िलाफ़ कलकत्ता में निकले ऐतिहासिक जुलूस का नेतृत्व किया था। उसी दौरान उन्होंने ‘बंगलार माटि बंगलार जल‘ शीर्षक गीत लिखा था। रविन्द्रनाथ टैगोर शिक्षा शास्त्री, दार्शनिक, कवि, चित्रकार के तौर पर प्रसिद्ध हुए। 15 साल की उम्र में उन्होंने कविता पाठ किया। उनकी कविताएं उनके मित्र की मासिक पत्रिका में प्रकाशित होती थी और उनके नाटकों में मुख्य भूमिका निभाने के कारण कलकत्ता के आस पास के क्षेत्र में जाने जाने लगे थे। 51 साल तक उनका दायरा सीमित ही रहा। 1912 में उनकी प्रसिद्धि हुई। उन्होंने अपनी कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद किया। अपनी डायरी को भूल गए और वह चित्रकार रोथेन्स्टाइन के हाथ लग गई। इस चित्रकार ने अपने दोस्त प्रख्यात कवि डब्ल्यू. बी. यीट्स को दिखाया। उन्हें ये कविताएं बेहद पसन्द आईं और उसकी भूमिका लिख दी जो 1912 में लंदन गीतांजलि नाम से प्रकाशित हुई। और एक साल के भीतर नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया। और रविन्द्रनाथ पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हो गए। इस पुरस्कार को प्राप्त करने वाले पहले गैर पश्चिमी व्यक्ति थे। रविन्द्रनाथ टैगोर मूलत: बंगला भाषा के कवि हैं, लेकिन गीतांजलि की सफलता के बाद उन्होंने अपनी रचनाओं को अंग्रेजी में अनुवाद किया।1913 में गीतांजलि की कविताओं पर नोबेल पुरस्कार मिला और इससे एक लाख बीस हजार रुपए मिले जो शान्तिनिकेतन आश्रम के कामों में लगा दिए। 1915 में अंग्रेजी सरकार ने सर की उपाधि दी। 1919 में जलियांवाला बाग के बर्बर नरसंहार से दुखी होकर रोष स्वरूप इसे वापिस लौटा दिया। और बहुत ही तीखा पत्र लिखा जिसे साहसी कार्रवाई माना गया।
रविन्द्रनाथ ने 11 बार विदेश की यात्राएं कीं। पूरा यूरोप, रूस, अमेरिका के दोनों महाद्वीप, चीन, जापान, मलाया, जावा, ईरान आदि देशों की यात्रा की। कई विद्वानों से परिचय हुआ। विलियम रोथेन्स्टाइन, कवि यीट्स, एच जी वेल्स, आईंस्टाइन से मुलाकात हुई। प्रसिद्ध वैज्ञानिक बोस से उनकी गहरी मित्रता थी। अपने जमाने के हर क्षेत्र के यशस्वी लोगों से टैगोर के संबंध थे। 7 अगस्त 1941 को रविन्द्रनाथ की मृत्यु हो गई।
उन्होंने एक हजार से अधिक कविताएं, आठ कहानी संग्रह, दो दर्जन नाटक, आठ उपन्यासों के अलावा धर्म, दर्शन, संस्कृति,शिक्षा आदि विषयों पर सैंकड़ों निबन्धों उनके विचार हैं। साहित्य लेखन के अलावा वे संगीतकार थे। उन्होंने लगभग दो हजार गीतों को संगीत दिया। 1929 में उन्होंने चित्रकारी शुरु की।
भारत के भविष्य का स्पष्ट नक्शा उनके जेहन में था, जो उनके साहित्यिक-रचनाओं में परिलक्षित होता है।’प्रार्थना’ और ’त्राण’ कविता में जो संकल्प है, वह रवीन्द्रनाथ के जीवन और साहित्य के लक्ष्यों व प्रतिबद्धताओं के साथ भारतीय समाज में व्याप्त समस्याओं की ओर भी संकेत करती है।
चित्त जहाँ शून्य, शीश जहाँ उच्च है
ज्ञान जहाँ मुक्त है, जहाँ गृह-प्राचीरों ने
वसुधा को आठों पहर अपने आँगन में
छोटे-छोटे टुकड़े बनाकर बन्दी नहीं किया है
जहाँ वाक्य उच्छ्वसित होकर हृदय के झरने से फूटता
जहाँ अबाध स्रोत अजस्र सहस्रविधि चरितार्थता में
देश-देश और दिशा-दिशा में प्रवाहित होता है
जहाँ तुच्छ आचार का फैला हुआ मरुस्थल
विचार के स्रोत पथ को सोखकर
पौरुष को विकीर्ण नहीं करता
सर्व कर्म चिन्ता और आनन्दों के नेता
जहाँ तुम विराज रहे हो
हे पिता, अपने हाथ से निर्दय आघात करके
भारत को उसी स्वर्ग में जागृत करो!


रवीन्द्र नाथ टैगोर ’त्राण’ कविता में व्यक्त चरित्र के नैतिक-उत्थान, आत्मिक-विकास की बात करते हैं, वही बार-बार उनकी रचनाओं का विषय बना है।
हे मंगलमय, इस अभागे देश से
सर्व तुच्छ भय दूर कर दो।
लोक-भय, राज-भय और मृत्यु भय
प्राण से दीन और बल से हीन का यह असभ्य भार
यह नित्य पिसते रहने की यन्त्रणा
नित्य धूलि-तल में पतन
पल-पल पर आत्मा का अपमान
भीतर-बाहर दासत्व के बन्धन
हजारों के पैरों के नीचे बार-बार त्रस्त और नतशिर होकर
मनुष्य की मर्यादा गौरव का अपहरण परिहरण
मंगलमय अपने चरण के आघात से
इस विपुल लज्जा-राशि को
चूर्ण करके दूर कर दो
अनन्त आकाश उदार आलोक
उन्मुक्त वातास से भरे हुए मंगल प्रभात में
सिर ऊँचा करने दो।
रवीन्द्र नाथ की कविता में काम करते हुए साधारण जन आते हैं।आम साधारण लोगों की मेहनत को रेखांकित करते हैं। उनके प्रति रवीन्द्र नाथ के मन में बड़ा आदर है।आम किसानों-मजदूरों को वे वास्तविक देवता के मानते हैं।साहित्य में आमजन को इससे पहले ऐसी प्रतिष्ठा शायद ही मिली हो। रवीन्द्र नाथ के साहित्य में आम जन के विश्वसनीय चित्रों के पीछे उनका लगाव है। रवीन्द्र नाथ को उनके बीच रहने का मौका मिला, उन्होंने उस जीवन को समझा। आमजन से सच्ची सहानुभूति के बिना ऐसा लेखन संभव नहीं है।

''धुलि-मंदिर'' कविता में
देवता तो वहाँ गए हैं,
जहाँ माटी गोड़कर खेतिहर खेती करते हैं -
पत्थर काटकर राह बना रहे हैं,
बारहों महीने खट रहे हैं।
क्या धूप, क्या वर्षा, हर हालत में सबके साथ हैं
उनके दोनों हाथों में धूल लगी हुई है
अरे, तू भी उन्हीं के समान स्वच्छ कपड़े बदलकर धूल पर जा।

रवीन्द्र नाथ की कविताओं में ब्राह्मणवाद के शिकार दलितों की पीड़ा को समझा और कविताओं में अभिव्यक्त किया।
''ब्राह्मण'' कविता में ''अपमानित'' कविता में
ऐ मेरे देश, तुमने जिनका अपमान किया है
अपमान में तुम्हें उन सबके समान होना होगा।
जिन्हें तुमने मनुष्य के अधिकार से वंचित किया है
सामने खड़ा रखा और तो भी गोद में जगह न दी
अपमान में तुम्हें उन सबके समान होना होगा।

देख नहीं पाते, मृत्यु-दूत द्वार पर खड़ा है
उसने तुम्हारी जाति के अंहकार पर अभिशाप आँक दिया है
अब भी अगर सबको नहीं बुलाते, दूर खड़े रहते हो
चारों ओर अभिमान से अपने को बाँधे रखते हो
तो फिर मौत से चिता की भस्म में सबके समान होगे।

प्रेम रवीन्द्रनाथ की कविताओं का प्रमुख विषय है, जो प्रकृति, मानव से होता हुआ समस्त पृथ्वी तक जाता है। बांगला साहित्य का इतिहासकार सुकुमार सेन ने सही लिखा है कि ''जीवन के प्रति रवीन्द्र नाथ का दृष्टिकोण स्वीकृति, प्रशंसा और कृतज्ञता का था, क्षोभ और शिकायत का नहीं।'' रवीन्द्रनाथ टैगोर हिन्दी के निराला व बांगला के नजरूल इस्लाम की तरह विद्रोही नहीं थे, लेकिन मुक्ति की चाह उनकी रचनाओं के केन्द्र में है। बार-बार विभिन्न विधाओं में इसे व्यक्त करते हैं। ''दो पंछी'' कविता में पिंजरे में बंद पंछी और जंगल के पंछी के बीच संवादों के जरिये ऐश्वर्य़पूर्ण गुलामी के प्रति हेय तथा कष्टपूर्ण आजादी के प्रति मोह रवीन्द्रनाथ के मंतव्य को उद्घाटित करने के लिए काफी है।

वन के पंछी ने कहा, 'भई पिंजरे के पंछी हम मिलकर वन में चलें।'
पिंजरे का पंछी बोला, 'भाई वनपाखी, आओ
हम आराम से पिंजरे में रहें।'
वन के पंछी ने कहा, 'नहीं
मैं अपने-आपको बांधने नहीं दूँगा।'
पिंजरे के पंछी ने पूछा,
'मगर मैं बाहर कैसे निकलूँ? '

वन का पंछी कहता है,
'भाई पिंजरे के पंछी, तनिक वन का गान तो गाओ।'
पिंजरे का पंछी कहता है,
'तुम पिंजरे का संगीत सीख लो।'
वन का पंछी कहता है,
'ना, मैं सिखाए-पढ़ाए गीत नहीं गाना चाहता।'
पिंजरे का पंछी कहता है,
'भला मैं जंगली गीत कैसे गा सकता हूँ? '
वन का पंछी कहता है,
'आकाश गहरा नीला है,
उसमें कहीं कोई बाधा नहीं है।'
पिंजरे का पंछी कहता है,
'पिंजरे की परिपाटी
कैसी घिरी हुई है चारों तरफ से!'
वन का पंछी कहता है,
'अपने-आपको
बादलों के हवाले कर दो।'
पिंजरे का पंछी कहता है,
'सीमित करो, अपने को सुख से भरे हुए एकान्त में।'
वन का पंछी कहता है,
'नहीं, मैं वहाँ उडूंगा कैसे? '
पिंजरे का पंछी कहता है,
'हाय, बादलों में बैठने का ठौर कहाँ हैं? '

रवीन्द्रनाथ के जीवन-अनुभवों और अन्तर्दृष्टि ने पहचान लिया था कि आजादी प्राप्त करने के संघर्ष में सबसे पहले खुद से संघर्ष करना पड़ता है। आजादी कभी खैरात में नहीं मिलती, उसके लिए कीमत चुकानी पड़ती है। ऐश्वर्य और सुविधापरस्त समाज की आजादी की चाह आत्मछलना है।
रविन्द्रनाथ के महात्मा गांधी जैसे राजनीतिक लोगों के साथ घनिष्ठ संबंध थे, लेकिन वे राजनीति में कभी सक्रिय नहीं हुए। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने रविन्द्रनाथ के राष्ट्रगान नामक निबंध में लिखा कि “यह युग भारतवर्ष में राजनैतिक जागरण का युग है। रवीन्द्रनाथ ने किसी जमाने में राजनैतिक आंदोलनों में सक्रिय भाग लिया था, परंतु बहुत शीघ्र ही उन्होंने देखा कि जिन लोगों के साथ उन्हें काम करना पड़ रहा है, उनकी प्रकृति के साथ उनका मेल नहीं है। रवीन्द्रनाथ अंतर्मुख-साधक थे। हल्ला-गुल्ला करके, ढोल पीट के, गला फाड़ के, लेक्चरबाजी करके जो आंदोलन किया जाता है, वह उचित नहीं जंचता था। देश में करोड़ों की संख्या में दलित, अपमानित, निरन्न, निर्वस्त्र लोग हैं, उनकी सेवा करने का रास्ता ठीक वही रास्ता नहीं है जिस पर वाग्वीर लोग शासक-वर्ग को धमकाकर चला करते हैं। शौकिया ग्रामोद्धार करने वालों के साथ उनकी प्रकृति का एकदम मेल नहीं था। जो लोग सेवा करना चाहते हैं उन्हें चुपचाप सेवा में लग जाना चाहिए। सेवा का विज्ञापन करना सेवा भावना का विरोधी है।”

रविन्द्रनाथ का समय भारतीय इतिहास में क्रांतिकारियों तथा राष्ट्रवादियों के उत्थान का समय है। समाज को हिला देनेवाली घटनाएं उस दौरान हुईं। लेकिन रविन्द्रनाथ का इनके प्रति उदासीनता व तटस्थ भाव एक नई उलझन पैदा करता है। यद्यपि 1857 के मंतव्यों और शहीदों के अप्रतिम साहस को सही परिप्रेक्ष्य देकर अपने समय के साहित्यकारों से अलग रुख अपनाया था। प्रथम स्वाधीनता संग्राम के प्रति साहित्यकारों के इस रुख को पहचानकर ही रविन्द्र नाथ टैगोर ने बड़े दुखी मन से लिखा कि ‘‘उस दिन मैने 1857 के महान विप्लव के क्रान्तिकारी दृश्यों के बीच झांक कर देखा और ऐसे अनेक बहादुर लोगों की कल्पना की जो पूरे जोश के साथ भारत के विभिन्न हिस्सों में व्याप्त अराजकता के बीच प्रयास करते हुए संघर्ष की कार्रवाई में उतरे थे। यह माना गया कि इस सिपाही-युद्ध के दौरान कई नायकों ने अपनी ऊर्जा का उपयोग एक गैर जरूरी बहादुरी के बिन्दु तक किया। यदि इस तर्क को मान भी लिया जाए तो भी यह जरूर स्वीकार किया जाना चाहिए कि ये सिपाही वास्तव में बहादुर थे। उनका नामोल्लेख विश्व के महानतम वीरों में किया जाना चाहिए। इस देश का कैसा दुर्भाग्य है कि ऐसे वीरों के जीवन-वृतांत हमें विदेशियों द्वारा लिखे गए पक्षपाती इतिहास के पन्नों से जुटाने पड़ते हैं। इस सिपाही विद्रोह काल में हम ऐसे अनेक वीर योद्धाओं को चिह्नित कर सकते हैं जो यदि यूरोप में पैदा हुए होते तो उन्हें इतिहास के पन्नों में ही नहीं, कवियों के गीतों, मार्बल की प्रतिमाओं और ऊँचे स्मारकों में अमर बनाने के प्रयास अवश्य होते।’’
रविन्द्रनाथ टैगोर ने अपने जीवन को ही अपनी पाठशाला बनाया। अपने जीवन के प्रयोगों से ही उनके सिद्धांत निकले। शिक्षा के क्षेत्र में जो वो मौलिक व वैकल्पिक प्रणाली दे पाए, वह उनके अनुभव की उपज थी। वे स्कूल में गए, लेकिन जल्दी ही छूट गया और अपने घर पर रहकर ही शिक्षा प्राप्त की। बेरिस्टर की उपाधि के लिए लंदन में गए, लेकिन बीच में ही छोड़ कर आ गए। शांतिनिकेतन विश्वविद्यालय बनाने तथा उसकी शिक्षण-पद्धति के निर्मित होने में शिक्षण संस्थाओं में उनके अनुभवों का सर्वाधिक योगदान है। अपनी कविता-कहानियों-नाटकों तथा शिक्षा-संबंधी लेखों में इस संबंध में विचार प्रस्तुत किए हैं।
उन्होंने शिक्षा-व्यवस्था-प्रणाली-पद्धति तथा उसके मंतव्यों पर गंभीरता से विचार किया है। स्कूली-शिक्षा पर विशेष तौर से। उनके सामने एक स्पष्ट लक्ष्य था, बेहतर समाज के निर्माण का। शिक्षा को वे मनुष्यता के विकास-उत्थान का साधन मानते थे। शिक्षा को विशेषाधिकार नहीं, बल्कि अधिकार के रूप में चाहते थे। शिक्षा के ढांचे की जकड़ विद्यार्थी को भींचकर ही मार देती है। उन्होंने शिक्षा-ज्ञान के चरित्र के विभिन्न पहलुओं पर विचार किया।उन्होंने लिखा कि “शिक्षा का सबसे बड़ा अंग समझा देना नहीं है, मन पर चोट लगाना है। इस आघात के भीतर से जो चीज बज उठती है उसकी व्याख्या करने के लिए अगर किसी लड़के को कहा जाए तो वह बिल्कुल बच्चों -जैसी कोई बात होगी। लेकिन वह मुंह से जो कुछ कह पा रहा है उससे कहीं अधिक उसके मन में बज रहा है जो लोग विद्यालय से शिक्षार्जन करके केवल परीक्षा के द्वारा फल का निर्णय करना चाहते हैं कि उन्हें इस चीज की कोई खबर नहीं होती। मुझे याद आता है, बचपन में मैं बहुत सी चीजें नहीं समझता था, लेकिन उनसे मेरे मन में बड़ी हलचल सी पैदा हो जाती थी। ”
आज उनके विचारों का महत्तव अधिक हो गया है। वैश्वीकरण व उदारीकरण की नीतियों के कारण शिक्षा का अर्थ पूर्णरूपेण बदल गया है। शासन-सत्ताओं, नीति-निर्माताओं तथा शिक्षकों व विद्यार्थियों शिक्षा के समस्त घटकों में शिक्षा के अर्थ बदल गए हैं। शिक्षा व्यापार की वस्तु के रूप में बदल दी गई है। रवीन्द्र नाथ की तोते की कहानी वर्तमान की शिक्षा-प्रणाली का गहन विश्लेषण करती है। उसके समस्त पक्षों को छूते हुए शिक्षा की वैकल्पिक प्रणाली के सूत्र इसमें निहित हैं। तोते की शिक्षा का जिम्मा अपने भांजे को देता है, जिसका शिक्षा से कोई लेन-देन नहीं है। वह भव्य इमारतें, अत्यधिक पुस्तकें व शिक्षकों की व्यवस्था तो करता है और खूब अमीर हो जाता है। लेकिन तोते की शिक्षा देने के लिए उसकी कोई समझ नहीं है, वह उसे कागज़ खिलाता है। तोते की शिक्षा की व्यवस्था में जुटे लोग तो मालामाल होते जाते हैं और तोता धीरे-धीरे मरने की ओर अग्रसर होता जाता है, अन्ततः वह मर जाता है। आज शिक्षा में सबसे उपेक्षित विद्यार्थी है। उसका घोर शोषण हो रहा है। रवीन्द्र नाथ टैगोर ने शिक्षा पर गहन जोर दिया।
भविष्य के प्रति जो चिंतित है, वह बच्चों पर जोर देता है। रवीन्द्र नाथ ने बच्चों के लिए जितनी गंभीरता से और जितनी मात्रा में साहित्य की रचना की है, उसके आधार पर कहा जा सकता है कि वे बच्चों के पालन-पोषण से लेकर उनके मानसिक विकास के लिए कार्यरत थे।
भारतीय नवजागरण के सवालों में स्त्री-मुक्ति का सवाल प्रमुख सवाल था, जिसके इर्द-गिर्द परिवार नामक संस्था का जनतांत्रिकरण, स्त्री-पुरुष समानता, स्त्री के स्वतंत्र व्यक्तित्व, स्त्री-शिक्षा, बाल-विवाह आदि समस्याओं को संबोधित करता था। यद्यपि इसमें उत्तराधिकार व संपति के अधिकार शामिल नहीं थे, लेकिन तत्कालीन संदर्भ में यह काफी क्रांतिकारी था। इसका स्वरूप बेशक संरक्षणवादी था, लेकिन इससे जो चिंगारी निकली, उसी से स्त्री-मुक्ति के स्वतंत्र स्वर मुखरित हुए।
रविन्द्र नाथ ने भारतीय समाज व परिवार में स्त्री की स्थिति का वर्णन करते हुए उसकी मुक्ति के लिए आवाज उठाई। भारतीय रूढ़िवादी समाज में स्त्री की दशा दयनीय थी। रवीन्द्र नाथ ने घर में ही ऐसा देखा और उसे अपने साहित्य में स्थान दिया। पत्नी का पत्र आदि कहानियों तथा घर बाहर, ठकुरानी बहु आदि उपन्यासों में विशेष तौर पर इसे विषयवस्तु बनाया।
रविन्द्र नाथ पश्चिम के आधुनिक ज्ञान और भारत की परम्पराओं के सांमजस्य बिठाने वाले वे व्यक्ति थे। उनको पश्चिम के साहित्य और विज्ञान की गहरी समझ थी तथा भारतीय इतिहास और संस्कृति की नस नस से वे पूर्णत: वाकिफ थे। रविन्द्रनाथ ने अपनी परम्परा का मूल्यांकन तार्किक ढंग से किया। संस्कृत-साहित्य की समृद्ध परम्परा को आत्मसात किया। महाभारत, रामायण के अलावा कालिदास को समझा। बुद्ध, जैन, लोकायतों के चिन्तन-दर्शन को समझा। भक्तिकाव्य की संत व सूफी काव्य का गहराई से अध्ययन किया। भारतीय इतिहास की विभिन्न सांस्कृतिक धाराओं को समझा। इस सबके तार्किक दृष्टि अपनाने से उदार मानवीय दृष्टि विकसित हुई, जिससे वे भारतीय साहित्य व इतिहास का अद्भुत विश्लेषण कर पाए। गांधारी, कर्ण, जैसे चरित्रों पर कलम चलाकर उन्हें युगानुरूप व्याख्यायित किया। कबीर से वे अत्यधिक प्रभावित थे, कबीर को उन्होंने जिस तरह से समझा, पूरे विमर्श को ही बदल दिया। उनका यह प्रभाव हिन्दी में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के माध्यम से पड़ा।
भारत की बहु-संस्कृति, बहुधर्मी की शक्ति को रविन्द्रनाथ ने पहचाना। विभिन्न क्षेत्रों से आए विभिन्न संस्कृतियों के लोगों के परस्पर आदान-प्रदान से जिस सांझी संस्कृति का निर्माण हुआ, उसे रविन्द्र नाथ ने रेखांकित किया। वे भारत को संस्कृतियों का महा-समुद्र कहते थे। भारत-तीर्थ कविता में इस विचार को अभिव्यक्ति दी। कई लेख इस संबंध में लिखे। उनके इन विचारों का प्रभाव जवाहर लाल नेहरु पर, रामधारी सिंह दिनकर आदि पर दिखाई देता है, जिन्होंने इस विषय पर विस्तृत शोध किया।
कोई नहीं जानता, किसके आह्वान पर
कितने लोगों की दुर्वार धारा कहाँ से आई, और
इस सागर में खो गई।
आर्य, अनार्य, द्रविड़, चीनी, शक, हूण, पठान, मुगल
सब यहाँ एक देह में लीन हो गए।
आज पश्चिम ने द्वार खोला है, वहाँ से सब भेंट ला रहे हैं
ये देंगे और लेंगे, मिलाएँगे और मिलेंगे, लौटकर नहीं जाएँगे -

लड़ाई के स्रोत में विजय के उन्मत गीत गाते हुए
मरुभूमि और पहाड़-पर्वतों को पार करके जो लोग आए थे
वे सब-के-सब मुझमें विराज रहे हैं, कोई भी दूर नहीं है
मेरे लहू में उनका विचित्र सुर ध्वनित है
आर्य रुद्रवीणा, बजो, बजो, बजो
घृणा से आज भी दूर खड़े हैं जो
बन्धन तोड़ेंगे - वे भी आएँगे, घेरकर खड़े होंगे
इस भारत के महामानव के सागर के सागर-तट पर।

किसी दिन यहाँ महा ओंकार की अविराम ध्वनि
हृदय के तार में ऐक्य के मन्त्र से झंकृत हुई थी।
तप के बल से 'एक' के अनल में 'बहु' की आहुति दे
भेद-भाव भुलाकर एक विराट् हृदय को जगाया था।
उसी साधना, उस आराधना की
यज्ञशाला का द्वार आज खुला है
सबको यहाँ सिर झुकाकर मिलना होगा-
इस भारत के महामानव के सागर-तट पर।

न तो उन्होंने परम्परा का अंधानुकरण किया और न ही आधुनिकता का। परम्परा के मामले में मालविकाग्निमित्रम् में कालिदास का कथन ही उनका आदर्श था।
पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्।
सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः।।
परम्परा के प्रति ऐसे विवेकपूर्ण रवैये के कारण ही वे संकीर्ण राष्ट्रवाद की सीमाओं व खतरों को समझते थे। लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के परस्पर संबंध को वे समझते थे। परम्परा के भार से दबे हुए नहीं थे। निर्भीक आलोचना उनके चिन्तन को विश्वसनीयता प्रदान करता है। वर्तमान जीवन से परम्परा को तथा परम्परा से वर्तमान जीवन को समझने की अद्भुत टेक्नीक विकसित की। भारतीय दर्शन की अद्भुत कृति गीता पर टिप्पणी इसे समझा जा सकता है।
1932 में रवीन्द्रनाथ टैगोर ईरान के शाही निमन्त्रण पर वायुमार्ग से ईरान गए थे। इस हवाई यात्रा का वर्णन उन्होंने अपनी फारस में नामक छोटी सी पुस्तिका में किया है। उन्होंने लिखा कि वह पृथ्वी जिसे मैं उसकी विविधता और निश्चयात्मकता वाली वस्तुओं का संज्ञान कराने वाली के रूप में जानता हूँ, अस्पष्ट सी होने लगी और इसका त्रिआयामी स्वरूप सिमटकर द्विआयामी यानी चित्र की तरह प्रतीत होने लगा। ...मुझे ऐसा लगने लगता है कि उस स्थिति में जब मनुष्य इतनी ऊंचाई से सैंकड़ों विनाशकारी शस्त्रों को बरसाता है वह कितना नृशंस हो सकता है। वह इस अपराध की भयानकता से किंचित भी विचलित नहीं होता जो उसके उठे हुए हाथ को संकोच से कंपा सकती और रोक सकती थी, अगर वह मारे जाने वालों की वास्तविक संख्या को जान सकता लेकिन वे तो उसके सामने आ ही नहीं पाते। लेकिन जब वह यथार्थ जिससे मनुष्य का घनिष्ठ संबंध रहता है, धुंधला हो जाता है तो उस घनिष्ठता का आधान भी तिरोहित हो जाता है। गीता में प्रस्तुत उपदेश और दर्शन इसी तरह का एक ऐरोप्लेन है - अर्जुन की चेतना को जो कि करुणा से पूर्ण थी उसे ऐसी ही ऊंचाई पर ले जाया गया, जहां कोई यह नहीं पहचान सकता था कि कौन वधिक है और कौन वध्य। कौन सगा संबंधी है और कौन अजनबी। मनुष्य के आयुधागार में ऐसे कितने ही ऐरोप्लेन भरे पड़े हैं जो दर्शनों से निर्मित हैं जो सामाजिक धार्मिक सिद्धांतों के रूप में उस यथार्थ को ढँक लेते हैं जो साम्राज्यवाद या विस्तारवाद की नीतियों से पैदा होता है। इसमें उसके लिए केवल यही संतोष बचा रहता है, जब भी उस पर विनाश फट पड़ेगा - न हन्यते हन्यमाने शरीरे। ।।

राजनीतिक वैचारिक तौर पर वे सैन्यवाद और राष्ट्रवाद के खिलाफ थे। वे बहु-संस्कृति, विविधता और सहनशीलता के पक्षधर और विश्वबंधुत्व के समर्थक थे। संकीर्ण राष्ट्रवाद की उनके चिन्तन में कोई जगह नहीं थी। साम्राज्यवाद का सबसे क्रूर और स्पष्ट चेहरा युद्ध में नजर आता है। रवीन्द्र नाथ ने दो-दो विश्वयुद्धों से उत्पन्न त्रासदी को महसूस किया। युद्ध का दौर उनके लिए सर्वाधिक पीड़ादायी था। वे युद्ध के खिलाफ किसी राजनीतिक नफे-नुक्सान की गणना करके नहीं थे, बल्कि युद्ध को वे मानव-संस्कृति के विनाशक के तौर पर देखते थे। ‘जे युद्धे भाई के मारे भाई’ कविता जिसका मूल बांग्ला से हिन्दी अनुवाद मोहनदास करमचंद गांधी ने किया महत्तवपूर्ण है।
वह लड़ाई ईश्वर के खिलाफ लड़ाई है ,
जिसमें भाई भाई को मारता है ।

जो धर्म के नाम पर दुश्मनी पालता है ,
वह भगवान को अर्घ्य से वंचित करता है ।
जिस अंधेरे में भाई-भाई को नहीं देख सकता ,
उस अंधेरे का अंधा तो
स्वयं अपने को नहीं देखता ।
जिस उजाले में भाई भाई को देख सकता है ,
उसमें ही ईश्वर का हँसता हुआ
चेहरा दिखाई पड़ सकता है ।
जब भाई के प्रेम में दिल भीग जाता है ,
तब अपने आप ईश्वर को
प्रणाम करने के लिए हाथ जुड़ जाते हैं।

रवीन्द्रनाथ की मृत्यु पर गांधी जी ने कहा था कि “गुरुदेव की देह खाक में मिल चुकी है, लेकिन उनके अंदर जो जोत थी, जो उजाला था, वह तो सूरज की तरह था, जो तब तक बना रहेगा, जब तक धरती पर जानदार रहेंगे। गुरुदेव ने जो रोशनी फैलाई वह आत्मा के लिए थी। सूरज की रोशनी जैसे हमारे शरीर को फायदा पँहुचाती है, वैसे गुरुदेव की दी हुई रोशनी ने हमारी आत्मा को ऊपर उठाया है।... वे तो बस गुरुदेव ही नहीं थे, वे तो ऋषि थे।”
आज हमारा समाज साम्प्रदायिकता, धार्मिक पाखण्ड, जातिगत कट्टरता, साम्राज्यवादी शोषण, मानवीय मूल्यों के पतन, चारित्रिक पतन के संकटों से जूझ रहा है। इन समस्याओं से निजात पाने के लिए रवीन्द्रनाथ के साहित्य में मौजूद चेतना को जन जीवन का हिस्सा बनाने की आवश्यकता

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