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July 7, 2011

तिरस्कृत

दलित आत्मकथा 'तिरस्कृत'
डा. सुभाष चन्द्र, एसोशिएट प्रोफेसर
हिन्दी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र
सूरजपाल चौहान की आत्मकथा ’तिरस्कृत’ दलित जीवन की सच्चाइयों को उद्घाटित करती है। समाज में व्याप्त जाति -आधारित ऊंच-नीच, भेदभाव, शोषण व तिरस्कार को उघाड़ती है। ब्राह्मणवाद ने किस तरह से दलितों का शोषण किया है उन प्रक्रियाओं को उद्घाटित करते हुए दलित जीवन का प्रामाणिक चित्र प्रस्तुत किया है। व्यवस्था की अमानवीयता को उजागर किया है। दलितों के प्रति भेदभावपूर्ण दृष्टि से सिकुड़ती मानवता को उभारा है।
शिक्षा व ज्ञान किसी समाज व समुदाय के विकास में मुख्य कारक हैं। ज्ञान पर एकाधिकार करके व शूद्रों को ज्ञान से वंचित रखकर ही ब्राह्मणवाद अपना वर्चस्व स्थापित करने में कामयाब हुआ था। ब्राह्मणवादी वर्चस्व को समाप्त करने के लिए ज्ञान व शिक्षा प्राप्त करना निहायत जरूरी है, इसलिए दलित चिंतकों चाहे जोतिबा फूले हों या फिर डा.भीमराव आम्बेडकर ने शूद्रों को ज्ञान व शिक्षा प्राप्त करने के लिए विशेष रूप से प्रेरित किया और शासन-सत्ता को इसकी व्यवस्था करने पर जोर दिया। वर्चस्वी वर्ग भी शिक्षा, ज्ञान व इससे पनपने वाली चेतना की शक्ति को भली-भांति समझता है, उसे यह अच्छी तरह से मालूम है कि दलितों को सेवक’ बनाए रखने के लिए उसका अशिक्षित एवं अज्ञानी होना पहली शर्त है, इसलिए वह दलितों को शिक्षा नहीं देना चाहता। सरकारी स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों की दलितों के प्रति पूर्वाग्रह-ग्रसित मानसिकता व व्यवहार से यह प्रकट होता है। दलित वर्ग से सम्बन्ध रखने वाले विद्यार्थियों को बेवजह प्रताड़ित करना व उनको शिक्षा प्राप्त करने के लिए हतोत्साहित करने की घटनाएं समाज में घट रही हैं और सूरजपाल चौहान के अनुभव भी इसे पुष्ट करते हैं। जातिगत संकीर्णता व पूर्वाग्रह से ग्रसित शिक्षकों के दिल में अपने विद्यार्थियों से समान रूप से व्यवहार करने की भावना ही पैदा नही होती, बल्कि उनके प्रति शत्रुवत व्यवहार किया जाता है।
जाति का पुछल्ला ब्रह्मराक्षस की तरह सदैव मेरे पीछे लगा रहा। संस्कृत विषय पढ़ाने वाले अध्यापक वेदपाल शर्मा मुझे समय-समय पर जाति का ओछापन याद दिलाते रहे। मैं तड़प उठता था उस द्रोणाचार्य की बातें सुनकर। एक दिन अपने साथी अध्यापकों से मेरी ओर संकेत कर उसने कहा था यदि देश के सारे चूहड़े-चमार पढ़-लिख गए तो गली-मौहल्लों की सफाई और जूते बनाने का कार्य कौन करेगा ? (पृ॰-16)
शहर के स्कूल का अध्यापक दलितों को ’सफाई व जूते बनाने’ के लिए अनपढ़ रखना चाहता है तो गांव का अध्यापक दलितों को खेतों में ’सीरी-साझी’ लगाने के लिए। अध्यापक की इस टिप्पणी से दलितों के प्रति ऐसा अमानवीय व्यवहार करने व उनको शिक्षा से वंचित रखने के कारणों को समझा जा सकता है। दलित जातियों के विद्यार्थियों के प्रति सवर्ण मानसिकता के रोगी अध्यापकों द्वारा कई रूपों में प्रताड़ना की जाती है, उनको अन्य विद्यार्थियों से दूर बैठा दिया जाता है जो उनमें हीन-भावना तो पैदा करता ही है साथ ही यह धारणा भी पैदा करता है कि शिक्षा उनके लिए नहीं है क्योंकि उन पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता और व पढ़ाई में पिछड़ जाते हैं तो तपाक से सिद्ध कर दिया जाता है कि असल में ज्ञान प्राप्त करना उनके बस की बात ही नहीं, जो दिमाग ’विद्या’ को प्राप्त करने के लिए चाहिए वे इनके पास है ही नहीं। इस तरह एक अघोषित साजिश की तरह दलितों की प्रतिभा व क्षमता की संभावनाओं को दबा दिया जाता है।
हम तीनों भंगी मौहल्ले के बालकों को गांव की पाठशाला में पढ़ रहे सभी बच्चों से दूर पीपल के नीचे बैठने को कहा जाता। वहीं पास में एक गंदी नाली थी, जिसमें गांव के सवर्ण लोगों के मौहल्ले की गंदगी बहती रहती। मैं, श्रीपाल और रामखिलाड़ी सारा-सारा दिन हाथों में तख्तियां लिए बैठे रहते। कभी किसी मास्टर का ध्यान आ जाता तो हमारी घोटा लगी तख्तियों पर पैंसिल से हरफ खींच जाता और हम उन हरपफों पर खड़िया पोत लिया करते थे। कई माह तक हम तीनों के परिवार के सदस्य इसे ही स्कूल जाना और पढ़ना समझते रहे।’(पृ॰-29)
तथाकथित उच्च जाति से संबंध रखने वाले सूरजपाल चौहान के सहपाठी तभी तक दोस्ती रखते हैं जब तक कि उनकी जाति का भान नहीं होता। जब यह मालूम हो जाता है कि वह दलित जाति से है तो उनके उनके दिमाग में घर किए पूर्वाग्रह को प्रैक्टिकल करके दिखा देते हैं और दोस्ती जैसा पवित्र रिश्ता जिसकी बुनियाद विश्वास व वैचारिक एकता पर आधारित है वह भी जातिगत संकीर्णता व पूर्वाग्रह का शिकार हो जाता है। पूर्वाग्रहों से ग्रसित इन तथाकथित उच्च जाति के लोगों को इसका अनुमान ही नहीं होता कि वह कितना घटिया व मानव-विरोधीी कार्य कर रहे हैं। इनके इस व्यवहार से स्कूलों-कालेजों में दी जा रही शिक्षा व ज्ञान पर प्रश्नचिह्न है कि उसमें कितनी वैज्ञानिकता, तार्किकता, आधुनिकता व मानवीय सार है तथा कितना पिछड़ापन, रूढ़िग्रस्तता व अमानवीयता है। अनुपम जैन इस आत्मकथा के लेखक का कालेज का सहपाठी व घनिष्ठ मित्र है, जिसके घर लेखक का खूब आना-जाना व पारिवारिक संबंध हैं। यह परिवार चौहान को राजपूत चौहान या उच्च जाति से संबंधित समझता है इसलिए दलितों के बारे में अपने पूर्वाग्रह भी मौके-बेमौके जाहिर करते रहते हैं, लेकिन ज्यों ही लेखक के दलित होने का पता चलता है तो दोस्ती व पारिवारिक संबंध टूटने में एक क्षण भी नहीं लगता और दलितों के प्रति नफरत व हिंसा उसके चेहरे पर, उसके शब्दों में तथा उसके व्यवहार में साफ-साफ उभर आती है।
सरकार से मिलने वाले वजीफे के लिए कालेज के सूचना-पट्ट पर दलित छात्रों की सूची लगी हुई थी। उसमें मेरा नाम भी था। मेरे नाम पर नजर पड़ते ही अनुपम जैन तुरन्त बोला- अरे चौहान, क्या तुम राजपूत नहीं हो--शड्यूल्ड कास्ट हो क्या? अनुपम के ये शब्द सुनकर मैं बुरी तरह झेंप गया था। मेरे मुंह से बोल नहीं निकले। मैं अचकचा कर रह गया था उस समय।
अबे, देखो चूहड़े भी ’ठाकुर’ व ’राजपूत’ बनने लगे।’
अनुपम मुंह बिचकाकर और बड़बड़ाता क्लास-रूम की ओर बढ़ गया।’ (पृ॰-17)
जब शिक्षा देने वाले अध्यापकों के मन में तथा साथ शिक्षा ग्रहण कर रहे सहपाठियों के दिल में दलित शिष्यों व सहपाठियों के प्रति इतनी घृणा है तो वे इस अपमानजनक वातावरण में कितनी शिक्षा ग्रहण करेंगे और व्यक्तित्व का कितना विकास होगा इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। दलित परिवारों के बच्चे स्कूल में दाखिला लेते हैं लेकिन जल्दी ही स्कूल छोड़ देते हैं इसके अन्य कारणों के साथ शिक्षा संस्थानों का ऐसा माहौल भी जिम्मेदार है।
जाति-प्रथा, व अछूत, सवर्ण-अवर्ण, किसी भगवान या दैवीय शक्ति ने नहीं बनाए, बल्कि समाज के स्वार्थी व शोषणकारी वर्गों के लोगों ने अपने शोषण को वैधतादेने व औचित्य ठहराने के लिए बनाया है। शासक-सत्ता सिर्फ ताकत के बल पर शासन नहीं कर सकती वह अपनी सत्ता की स्वीकार्यता के लिए तरह-तरह के प्रपंच प्रचार व ढोंग-पाखण्ड करती है। जाति-प्रथा ने सत्ता को टिकाए रखने व एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग के शोषण को वैध् ठहराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है इसलिए जाति-प्रथा की वैधता के लिए कभी कर्मफल का सिद्धांत गढ़ा गया तो कभी अन्य कारण से इस व्यवस्था द्वारा किए जा रहे जुल्म व अत्याचार को उचित ठहराया गया। यदि कोई शासन-सत्ता सिर्फ डण्डे के जोर पर कायम रहना चाहे तो उसे हरेक व्यक्ति के पीछे एक सिपाही की जरूरत पड़ेगी और यह भी सर्वविदित है कि सेना व पुलिस में भी विद्रोह हो जाता है। सत्ता चाहे कितनी भी अत्याचारी वह जन-विरोधी हो, लेकिन वह समाज हितैषी होने का मुखौटा पहनती है और अपनी स्वीकार्यता का वैचारिक आधार तैयार करती है। दलितों पर शासन करने व उनका शोषण करने के लिए ब्राह्मणवादी उनके दिमाग में तरह-तरह से यह बात घुसेड़ देना चाहते हैं कि सेवा’ करना दलितों का धर्म व कर्तव्य है, क्योंकि सवर्ण वर्ग अच्छी तरह जानता है कि समाज में उसका वर्चस्व या चौधर तभी तक कायम है जब तक कि दलित वर्ग इसको मानता रहे। यदि दलित-वर्ग ने उनकी सामाजिक सर्वोच्चता को मानना बंद कर दिया और बराबरी के व्यवहार की अपेक्षा करने लगे तो उनकी यह व्यवस्था एक पल भी नहीं चलने वाली, इसलिए इस व्यवस्था को तोड़ने वाले को दण्ड दिया जाता है, अप्राकृतिक व अमानवीय प्रथाओं को लागू करने व स्वीकार्यता लेने के लिए हिंसा व पशु बल का सहारा लिया जाता है। कहावत है कि भंगी पैदा नहीं होता, बल्कि पीट-पीटकर बनाया जाता है’ तथाकथित निम्न जाति का व्यक्ति खुद को नीच समझे और कथित उच्च जाति का व्यक्ति स्वयं को श्रेष्ठ समझे इसके लिए बचपन से ही सिखाया जाता है। बच्चों पर चूंकि सामाजिक कायदों-बंधनों का उतना गहरा प्रभाव नहीं होता अतः उनका व्यवहार स्वाभाविक ही होता है वे स्वभावतः संकीर्ण व पक्षपाती नहीं होते, लेकिन संकीर्ण व पक्षपाती व्यवस्था को कायम रखने के लिए उनका ऐसा करना जरूरी है इसलिए उनको पीट-पीटकर ये कायदे सिखाए जाते हैं। गांव के हम-उम्र बच्चों के साथ खेलने पर लेखक की पिटाई का प्रसंग इस ओर संकेत करता है। मैं एक दिन अपने हम-उम्र बालकों के साथ कंचे खेल रहा था।
लोधों का बनवरिया, काछी का श्यामू और ठाकुर का बीरू। सबके सब खेलने में मग्न थे। ठाकुर प्रताप बड़ा परेशान था कि उसका बीरू भरी दुपहरी में कहाँ चला गया। वह उसे खोजता हुआ वहाँ आ धमका, जहां हम चारों कंचे खेल रहे थे।
ठाकुर प्रातप ने नीम के पेड़ से एक संटी तोड़कर चार-पांच अपने लड़के को जमा दी। बीरू को पिटते देख बनवरिया और श्यामू भाग खड़े हुए। उन दोनों को देख मैं जैसे ही वहां से भागने लगा कि तुरन्त ठाकुर ने मुझे आगे से आकर धर दबोचा। सटाक-सटाक संटियों की बरसात कर दी थी उसने मेरे ऊपर। मेरा कान ऐंठते हुए ठाकुर ने कहा - साले भंगिया के मेरे छोरा के संग खेलतु है ... ठौर मार दूंगा।’
ठाकुर अपने बेटे बीरू को घसीटते हुए कुएं की ओर ले गया। मैं दीवार के सहारे टिका डबडबाई आँखों से सब देख रहा था। ठाकुर ने कुएं से एक बाल्टी पानी खींचा और नीम की टहनी पानी में डुबोकर बीरू को छींट देने लगा। बीरू रोते-रोते कह रहा था- मो पै पानी क्यों डारि रहे हो?’
अरे! चुप नालायक, भंगिया के संग खेलकर अपने आप कू अपवित्र कर लीनों और फिर पूछत है कि पानी के छींटे क्यों डारि रहे हो?’ ठाकुर प्रताप ने बीरू के मुंह पर एक थप्पड़ लगाते हुए कहा था।’ (पृ॰-29)
बीरू को पिटने का समझ नहीं आ रहा, अपवित्र होने की भाषा समझ नहीं आ रही, लेकिन ठाकुर की पिटाई लेखक को और बीरू को दोनों को ही समझाने की कोशिश कर रही है कि उनमें समानता नहीं है। एक में श्रेष्ठता का तो दूसरे में हीनता का भाव पैदा करने की प्रयोगशाला की तरह है।
लाला गेंदालाल का सूरजपाल चौहान के प्रति किया गया व्यवहार भी यही व्यक्त करता है कि बचपन से दलितों को अहसास करवाया जाता है कि वे निम्न हैं और उनको किसी भी समय यह नहीं भूलना चाहिए, यदि किसी रौ में वे भूल भी जाते हैं तो सवर्णों की संटी’ उनको याद करवाने के लिए तैयार है। अचरज की बात है कि खेतों में तथा कारखानों में सारा काम दलित करते हैं। ढेर सारा अनाज उगाते हैं सारा उनके हाथों से होकर गुजरता है, लेकिन ज्यों ही वह खेत से घर में आ जाता है तो दलित के हाथ लगाने भर से अपवित्र हो जाता है। जमींदारों-सेठों के लिए दूध-घी व अन्य सामग्री का इन्तजाम दलित करते हैं लेकिन एक बार वह वस्तु सेठ की दुकान में या जमींदार के घर में दाखिल हो जाए तो फिर दलित उसको छू नहीं सकता। यहां तक कि सूरजपाल चौहान लाला गेंदालाल की दुकान के चबूतरे पर भी पैर नहीं रख सकते। एक धातु के बने बर्तन गेंदालाल का परिया’ व चौहान की कटोरी’ भी सवर्ण अवर्ण में विभाजित हो जाती है। चौहान द्वारा दी गई दुअन्नी को सीधे न लेकर पानी में धोकर और चिमटी से उठाना सवर्ण जाति का दंभ और अवर्णों के प्रति हिंसा व घृणा की कहानी स्वयं कह देता है। सूरजपाल चौहान का यह अनुभव आँखें खोल देने वाला है कि समाज की कितनी बड़ी आबादी किस तरह की अमानवीय स्थितियों में जीवन-यापन करती है। इस पूरे प्रसंग को उद्धृत करने का लोभ संवरण नहीं हो पा रहा है।
मैं एक हाथ में कटोरी और दूसरे हाथ में दुअन्नी दबाए बनिये की दुकान की ओर उछलता-कूदता अपनी धुन में बढ़ा जा रहा था। मैं गेंदा लाला की दुकान की चौंतरिया (देहरी के पास बना ऊँचा चबूतरा) पर जाकर खड़ा हुआ कि तभी लाला ने पास रखी अरहर की लौंद (संटी) मेरे पैरों पर जड़ दी। मैं तिलमिला कर रह गया था। मैं भौंचक्का-हैरान, थोड़ी देर तक मेरी समझ में कुछ नहीं आया। मेरी समझ में कुछ आए, इससे पहले ही गेंदा लाला ने लाल-लाल आँखें दिखाते और भद्दी गाली देते हुए मुझसे कहा- बहन के टीटना, आँखें बंद किए हुए ऊपर चढ़ौ आ रहौ है।’
अब मैं समझ चुका था कि लाला ने मुझे संटी क्यों मारी? दो साल दिल्ली में रहकर मैं तो भूल ही गया था कि मैं नीच जाति का हूँ। मनु के विधान अनुसार मुझे तो लाला की दुकान की चौंतरिया के ऊपर तक नहीं चढ़ना चाहिए था और मैं था कि दुकान की चौखट तक पहुंच गया। अपने को संभालते हुए और आँखों से आँसू पोंछते हुए मैंने बनिए से कहा- मोय दो-आना कौ कडुओ तेल दे देयो।’
गेंदा लाला गली के भूरा कुत्ते की तरह गुर्राता हुआ बोला- भैंचो-भंगिया के, सीधे अररावत चलौ आ रहौ है ..., कटोरी धती पै धर।’
मैंने कटौरी जमीन पर रख दी थी। लाला दुकान के अन्दर से परिया भरकर सरसों का तेल लाया और उसने जमीन पर रखी कटोरी से ऊँचाई से तेल डालते हुए फिर कहा- भंगिया के ध्यान रखियो दुकान पै आवै से पहले चौंतरिया से नीचे ही खड़ौ रहै कै चीज के तांई आवाज लगाइयो।’
मैं लाला के हाथ में लगी तेल की परिया और जमीन पर रखी कटोरी को टुकुर-टुकुर देख रहा था। लाला कितनी दूरी से जमीन पर रखी कटोरी में तेल डाल रहा था -कहीं तेल से भरी परिया कटोरी से छू न जाए। ....
गेंदा लाला को मैंने तेल के बदले पैसे देने को हाथ बढ़ाया,तभी लाला ने पानी से भरे तसले की ओर संकेत करते हुए मुझसे कहा-देख, सामने पानी से भरो तसला रखो है, वा पे पैसा डारि दे।’ मैंने सहमते हुए दुअन्नी पानी से भरे तसले में डाल दी। लाला दुकान के अन्दर गया और चिमटी उठाकर लाया। उसने चिमटी से दुअन्नी पानी से भरे तसले से निकालकर अपनी गुल्लक में डाली और मैं तेल की कटोरी उठाकर चुपचाप घर की ओर चल दिया था।’(पृ. 33)
उच्च जाति का होने की ग्रंथि कथित सवर्ण समाज की मानवीयता को अन्दर ही अन्दर खोखला कर रही है इसका अहसास ही नहीं होता। सवर्ण समाज ने दलित समाज को तमाम नागरिक अधिकारों से वंचित किया ही है साथ ही प्राकृतिक अधिकारों से भी वंचित करने की कोशिश की है। प्यासे व्यक्ति को पानी पिलाकर कोई भी आदमी पुण्य का काम समझता है,लेकिन दलितों के लिए यह भी स्वीकार नहीं है। कुओं-तालाबों में पशु-पक्षी पानी पी सकते हैं लेकिन दलित के छूने भर से कुएं-तालाबों का पानी भ्रष्ट होने का सवर्ण को अंदेशा रहता है। सूरजपाल चौहान अपने गांव में जा रहे थे तो बच्चे व पत्नी विमला को प्यास लगी। जमींदार से पानी पिलाने को कहा तो उसने कुएं से पानी खींचकर पीने को कहा लेकिन जब उसे सूरजपाल से मालूम हुआ कि वह निम्न जाति से ताल्लुक रखता है तो
बाल्टी छीन ली,खुद पानी पिलाने लगा। विमला ओक बनाकर जैसे ही पानी पीने को झुकी और एक कदम आगे रखा तो वह बूढ़ा जमींदार दाँत पीसता हुआ बोला-अरे भंगनिया,नेक पीछे कू हट के पानी पी, यह शहर ना है गाँव है, मारे लठिया के कमर तोड़ दई जाएगी....
भैंचो-भंगिया और चमट्टा के सहर (शहर) में जाकै नए-नए लत्ता (कपड़े) पहर (पहन) के गांव में आ जात हैं, कछु (कुछ) पतौ न चलतु कि जे भंगिया के है कि नाय (नाही)’ (पृ॰-31)
जाति-प्रथा व छूआछूत का जहर भारतीय समाज के खून में रम गया है। उपरोक्त प्रसंग एक मशीनी प्रतिक्रिया के तहत स्वतः ही घटित हो रहा है। बूढ़ा जमींदार कोई बहुत सोच-समझकर ऐसा व्यवहार नहीं कर रहा, बल्कि यह उसके संस्कार का हिस्सा बन गई है। उसे अपने व्यवहार में कुछ भी अजीब, अटपटा व अमानवीय नहीं लगता। सदियों से अछूतों के साथ ऐसा व्यवहार करते यह शारीरिक क्रिया की तरह बन गई है। किसी दलित के प्रति उसकी यही प्रतिक्रिया होगी, ठीक उसी तरह एक दलित की इस बूढ़े के व्यवहार के प्रति वही प्रतिक्रिया होगी जो सूरजपाल चौहान की है। चौहान को जमींदार के व्यवहार में कुछ भी अटपटा नहीं लगता इसलिए वह बिना किसी विरोध के चुपचाप उसकी बात सुन लेता है और सहमा-सहमा सा उनके पीछे चल’ पड़ता है। इसके विपरीत विमला को बूढ़े जमींदार का व्यवहार अपमानजनक लगता है और वह अपना आक्रोश व्यक्त करती है और चीखते हुए बोलती है
चलो, ये पानी नहीं जहर है, अपने घर जाकर पिएंगे ..., नहीं चाहिए इतना मीठा पानी।’ (पृ॰-31)
विमला का यह व्यवहार बूढ़े जमींदार व सूरजपाल दोनों के लिए सामान्य नहीं है। यदि यह संस्कार गहरे में घर नहीं कर गया होता तो सूरजपाल चौहान को पानी पीने के लिए बूढ़े जमींदार से पूछने की जरूरत नहीं थी। उसकी जगह यदि कोई सवर्ण जाति का व्यक्ति का होता तो वह सीध बाल्टी उठाता, पानी खींचकर पीता व चलता बनता। पानी की बूढ़े जमींदार से मांग ही उसके शक का कारण बनती है क्योंकि दलित व सवर्ण के बीच व्यवहार की भाषा भी विशेष ही है जिसमें दलित की ओर से हमेशा याचना ही रहती है और सवर्ण की ओर से गाली।
जाति-प्रथा व छुआछूत शोषण का जरिया रहा है और शोषण को वैध ठहराने व इसके विरूद्ध रोष को समाप्त करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जहां तक जातिगत भेदभाव शोषण करने का काम करती है वहां तक इसका प्रयोग किया जाता है और अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए जाति की व छूतछात की सीमा को भी लांघ जाते हैं जिन अछूतों के छूने भर से सवर्णों के बर्तन अपवित्र हो जाते हैं, घर-दुकान की दहलीज भ्रष्ट हो जाती है, व्यक्ति का शरीर अशुद्ध हो जाता है अपनी काम वासना व हवस मिटाने के लिए अछूत कही जाने वाली जातियों की औरतों के शरीर के लिए लालायित रहते हैं, इस दौरान उनकी छुआछूत का भाव पता नहीं कहां छूमंतर हो जाता है। जिस तरह सवर्ण जाति के मर्द दलित स्त्रियों से खिलवाड़ करते हैं उसी तरह सवर्ण जाति की औरतें भी अपनी काम-वासना की पूर्ति के लिए मर्दों से सहवास करने में कोई हिचकिचाहट नहीं करती। ऐसे एक प्रसंग का जिक्र करते हुए सूरजपाल चौहान ने लिखा
ठकुराइन भगवंती नवयौवना थी। उसका शरीर भी सुड़ौल और सुन्दर था। तीखे नैन-नक्श वाली थी वह। मेरे चाचा गुलफान से उसकी आंखें चार हो गई थीं। अवसर पाते ही ये दोनों एकांत में मिला करते थे। ठकुराइन भग्गो मुझसे और मेरी मां से बहुत छूत रखती थी। लेकिन चाचा से एकांत में खूब अठखेलियां करती। चाचा भी मौका पाकर उसे छेड़ बैठता था। मैं अपनी बाल-बुद्धि पर जोर डालता और सोचता - यह ठकुराइन मुझसे इतना छूत करती है, जरा-सा छू जाने पर अपने ऊपर पानी के छींटे डालती है ...। चाचा में ऐसा क्या है कि टीका की मड़ैया के पीछे अरहर के खेत में उसके साथ उलझी पड़ी रहती है’ (पृ॰-35)
भगवंती उसी ठाकुर प्रताप के परिवार से है जो अपने बेटे व सूरजपाल दोनों को साथ-साथ खेलने पर पीटता है और दलित के साथ खेलने पर अपने बेटे को अपवित्र होना मानकर उसकी शुद्धि करता है। इसी तरह लाला गेंदालाल जो सूरजपाल चौहान को अपनी दुकान के चबूतरे पर चढ़ने पर भी पीटता है, उसके हाथ से दुअन्नी भी पानी में धेकर चिमटी से उठाता है,उसका छोटा भाई भंगी मौहल्ले में पड़ा रहता है और वहीं रोटियां तोड़ता है, लेकिन इससे गेंदालाल अपने भाई की जायदाद हड़पने के लिए उसे पागल तक घोषित कर देता है। इस तरह कहा जा सकता है कि छुआछूत व जाति-प्रथा निम्न कही जाने वाली जातियों के शोषण में मदद पहुंचाती हैं। इसलिए सत्ताधरी शोषक इसे बनाए रखने के लिए लगातार कार्य करते रहते हैं।
जाति-प्रथा,छुआछूत और ऊंच-नीच का यह जहर केवल सवर्णों नहीं है, बल्कि दलितों में भी ब्राह्मणवाद की विष-बेल खूब पनपी हुई है। जातियों में बंटे हुए समाज की विशेषता है कि जातियां एक के ऊपर एक खड़ी हैं और हरेक जाति किसी दूसरी से अपने को श्रेष्ठ समझती हैं तथा अपने से नीची समझे जाने वाली जाति के प्रति नफरत व हिंसा का प्रदर्शन करती है। दलित समाज भी ब्राह्मणवाद की इस बुराई से अछूता नहीं है, इसी कारण दलितों में एकता स्थापित नहीं हो पाती। राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए कभी-कभी दलित समाज की विभिन्न जातियां एक मंच के नीचे एकत्रित हो जाती हैं, लेकिन सामाजिक स्तर पर वही भेदभाव बना रहता है। यानी वोट बैंक की एकता छिन्न-भिन्न हो जाती है। जब तक दलितों में सामाजिक एकता स्थापित नहीं होती व वर्ग के तौर पर चेतना नहीं पनपती तब तक दलित आन्दोलन का अपने मकसद में कामयाब होना असंभव ही है लेकिन विडम्बना ही है कि दलित आन्दोलन के झण्डाबरदार मौका मिलते ही जाति विशेष के उद्धारक’ व नेता’ बन जाते हैं और दलितों की अन्य जातियों के प्रति शत्रुवत व्यवहार करने लगते हैं। इस तरह के व्यवहार प्रकट होता है जब अधिक योग्य होते हुए भी भंगी जाति के व्यक्ति को ड्राईवर की नौकरी इसलिए नहीं मिलती क्योंकि चयन करने वाला दूसरी दलित जाति से है और उसका यह कहना कि
...तुम पागल हो क्या? भंगी जाति का आदमी कहीं भी झाडू लगाकर अपना पेट भर लेगा ..., यदि चमार को नौकरी नहीं मिली तो वह बेचारा कहाँ जायेगा...., नहीं रखना भंगी को ड्राईवर की नौकरी पर।’ (पृ॰-116)
बिल्कुल इसी तरह की प्रतिक्रिया है जिस तरह कोई सवर्ण जाति का व्यक्ति दलित के बारे में कहता है कि वह जूते गांठकर, फेरी लगाकर, झाडू लगाकर गुजारा कर लेगा यदि सवर्ण को नौकरी नहीं मिली तो वह क्या करेगा?
जातिगत चेतना से ऊपर उठकर वर्ग चेतना को अपनाए बिना दलितों में एकता कायम नहीं हो सकती। अपनी जाति की सहुलियतों के लिए लड़ने मात्र से विशेष उपलब्धि नहीं होगी बल्कि जाति उत्थान की यह झूठी होड़ दलित समाज में दरार पैदा करती है और ब्राह्मणवाद के आधार को मजबूत करती है। जाति के आधार पर भेदभाव एवं पक्षपात करके छोटे-छोटे स्वार्थों को पूरा करने की प्रवृति विशेषकर सरकारी नौकरी व सुविधाएं पाने के लिए पूरे दलित समाज को एक दृष्टि से न देखकर जातिगत आधार पर बन्दरबांट करना इसमें बाधक है।
जिस तरह सवर्ण-जातियों में अनेक उपजातियां हैं जिनमें ऊंच-नीच का भेद है उसी तरह दलित जातियों में भी ऊंच-नीच समझने वाली मानसिकता का गलबा है। जाति पर शोध करने वाले विद्वानों ने अमर-बेल की तरह फैली जाति की शाखाओं-प्रशाखाओं को गिनाया है। ब्राह्मणों में ही सैंकड़ों किस्म के ब्राह्मण हैं जिनका आपस में रोटी-बेटी का रिश्ता नहीं है। ब्राह्मणवाद के इस रोग को दलितों ने भी ग्रहण कर लिया है इस विषाणु की ओर संकेत करने वाले दो अनुभव बहुत ही रोचक हैं
जब मैंने उन्हें (ओ.पी.पंवार) अपने पड़ौस में रह रहे सोनकर जी के विषय में बताया और कहा कि वह भी आपके खटीक समुदाय के हैं, तो पंवार ने नाराज़गी व्यक्त करते हुए कहा था अरे, आप, भी अजीब बात करते हो- सोनकर और हमारी जाति में जमीन-आसमान का अन्तर ...., वह सुअर खटीक है और हम बकर खटीक।’ दलित होते हुए अपने को श्रेष्ठ समझना एक दंभ व भ्रम में जीना है जो ब्राह्मणवाद का समर्थन है और दलित दृष्टि का विरोध। छुआछूत का भूत दलित समाज में कितने गहरे तक व्याप्त है।
मेरे पड़ौस के एक जाटव मित्र की पत्नी खाली समय में मेरी श्रीमती के पास आकर बैठ जाया करती थी। वह घण्टों बातें बनाती। हमारे सवर्ण पड़ोसियों ने एक बार उस मित्र की पत्नी से पूछा- क्या आप भी शैड्यूल्ड कास्ट है?’
जाटव मित्र की पत्नी ने सीधे-सीधे उत्तर न देकर उस सवर्ण महिला से कहा था- बहन जी, हम शैड्यूल्ड कास्ट तो हैं पर ऊँची जाति वाले शैडयूल्ड कास्ट हैं।’ (पृ॰-105) जाटव जाति की महिला का जवाब दलितों में मौजूद ऊंच-नीच की कहानी स्वयं कह देता है।
सूरजपाल चौहान को शैडयूल्ड कास्ट एसोसिएशन’ नोएडा के कार्यकर्ताओं ने विचार-विमर्श के बाद अपनी संस्था का सदस्य बनाना चाहा जिसके लिए वह तैयार हो गए। संस्था का सदस्य बनने के लिए दिए फार्म में नाम, पिता का नाम, निवास स्थान के कालम के साथ-साथ उसमें एक कालम उपजाति’ का भी था’ लेखक ने जब उपजाति’ का कालम खाली छोड़ दिया तो यह कहकर कि मैट्रिमोनियल’ के कार्य में सुविधा होगी’ का तर्क देकर उपजाति’ लिखने के लिए कहा तो लेखक ने ज्यों ही अपनी उपजाति वाल्मीकि’ लिखी तो वहां मौजूद सभी पढ़े-लिखे दलित एक-दूसरे के चेहरों की ओर कुछ क्षणों तक अपलक देखते रहे। कोई कुछ बोल नहीं रहा था - सन्नाटा, एकदम से-पिन-ड्राप सायलैंस’। यह सन्नाटा और सायलैंस दलित समाज में व्याप्त ब्राह्मणवादी मानसिकता व विचार को ही व्यक्त करता है जैसे कोई सवर्ण किसी दलित को अपने से उच्च या बराबर की स्थिति में सहन नहीं कर सकता वैसे ही दलितों में अपने को श्रेष्ठ समझने वाली जाति अपने से नीची माने जाने वाली जाति के व्यक्ति को सहन नहीं करती और यह सन्नाटा और चुप्पी टूटती है तो घोर ब्राह्मणवादी रुझान के साथ
तभी, संस्था के महासचिव डाक्टर रवीन्द्र ने मेरे कंधे पर हाथ रखते व हैरानी व्यक्त करते हुए कहा कि -अरे वाल्मीकि हो और प्रबन्ध्क के पद पर भी कार्य करते हो.....।’ लेखक इससे पहले कि कुछ कहता सामने वाली पंक्ति में बैठे वर्मा जी ने कहा-अरे, हम किसी भी तरह की छुआछूत नहीं मानते ..., हम अपने घर के आंगन में भंगिन तक को बैठा कर चाय व नाश्ता करवा देते हैं ..., तुम वाल्मीकि हो तो क्या हुआ (पृ॰.16)
यह उसी तरह की प्रतिक्रिया है जैसे किसी घोर ब्राह्मणवादी की होगी जो यह स्वीकार करता है कि नीची समझी जाने वाली जातियों में कोई व्यक्ति इतना योग्य नहीं हो सकता कि वह प्रबन्ध्क या अन्य किसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी को निभाने लायक है और उसके साथ बात करने खाने-पीने को उसके ऊपर एहसान की तरह करता है न कि बराबरी के रिश्ते की तरह।
इसी तरह लेखक ने एक ओर घटना का जिक्र किया है, जब लेखक अपने परिवार के साथ तांगे में बैठकर अपने गांव में जा रहा था तो भूदेवा नामक व्यक्ति जो स्वयं दलित है, अपनी पत्नी के साथ पैदल जा रहा था। कड़ी दोपहरी को देखते हुए लेखक ने उन्हें तांगे में बैठा लिया, लेकिन ज्यों ही भूदेवा को लेखक की जाति का पता चलता है तो वह तांगे से कूद जाता है और उसकी पत्नी भी बुरा सा मुंह बनाती पीछे से उतर जाती है।’ (पु॰-65) भूदेवा को कड़ी दोपहरी में पैदल चलना मंजूर है, लेकिन कथित निम्न जाति के साथ तांगे में बैठकर जाना नहीं।
शोषक शक्तियां भली भांति इस बात को जानती-पहचानती हैं कि शोषण तभी तक किया जा सकता है जब तक कि दलितों में फूट है व एकता कायम नहीं है, इसलिए वे दलितों को आपस में लड़वाने का कोई भी मौका नहीं चूकते। दलितों में से ही किसी को फुसलाकर दलितों को नियंत्रित करने का खेल खेलते हैं और अपना वर्चस्व कायम रखते हैं। सूरजपाल चौहान दलितों की एकता को उनकी मुक्ति के लिए आवश्यक मानते हैं वे दलितों की एकता तोड़ने वाली सवर्णों की साजिश का पर्दाफाश भी करते हैं और दलितों की एकता को रेखांकित भी करते हैं। ठाकुर लटूरी के खेत में बेगार करने के लिए समरू इसलिए नहीं जा पाता कि उसे अपनी बीमार पत्नी को दवाई दिलाने शहर जाना पड़ता है। तो ठाकुर पंचायत बुलाकर उसका अपमान करता है और खचेरा नामक दलित से उसको पंचायत में पिटवाता है। इस प्रसंग से न केवल दलितों को दलितों से दबाने की नीति उजागर होती है बल्कि कथित पंचायतों का सामन्ती चरित्र व न्याय के नाम पर निर्दोर्षों को सजा देने व दबाना भी रंखांकित होता है।
पंचायतों के इस तरह के अमानवीय फैसले आज कल अखबार की सुर्खियों में जगह पा रहे हैं। कहीं दलित महिला को नंगा करके घुमाया जाता है तो कहीं सामूहिक बलात्कार करने के फरमान सुना दिए जाते हैं। समरू का अपमान करने से उसकी जाति के लोग खचेरा को पीट देते हैं और मामला पुलिस तक जाता है तो ठाकुर लटूरी खचेरा के खिलाफ ही बयान देता है क्योंकि उसका काम हो चुका था और ठाकुर लटूरी जैसे शोषकों का सिद्धान्त है कि इस्तेमाल करो और फेंक दो।’ ठाकुर लटूरी के घर दूध का बेला’ पीकर व उसकी मीठी-मीठी बातों को सुनकर खचेरा समझ बैठा था कि वह ठाकुर के विश्वसनीय लोगों में है और उसके शोषण-अन्याय का औजार बन गया, लेकिन सूरजपाल ने संकेत किया खचेरा जैसे दलित सवर्णों के तभी तक काम के हैं जब तक कि उनका उल्लू सीधा हो, इस मामले में किसी को गलतफहमी न रहे। सवर्णों के शोषण-अन्याय से दलितों में उपजे रोष-आक्रोश को दबाने के लिए खचेरा जैसे लोगों को झूठी पदवियां’ भी दी जाती हैं, जिससे कि ऐसे लोग सवर्णों के कुत्सित अभियान का शिकार हो जाते हैं।
गांव के बसीठों ने (सवर्णों ने) ताऊ खचेरा को ऐसे ही घृणित व अपमानजनक कार्य कराने के लिए तैयार कर रखा था। तथाकथित सवर्ण ताऊ खचेरा से बिना किसी अपराध के दलितों को भरी पंचायत में मूँछ के बाल उखाड़ना, काला मुंह करना, मुंह पर थूकना व जूते लगवाने जैसे कार्य करवाते थे। ऐसे कार्य करने के बदले ही बलार’ होने की पदवी दे रखी थी गांव के बसीठों ने। मेरी ननिहाल नौगंवा में मेरे नाना गोकुल को भी लोग इसी नाम से पुकारते थे- गोकुला बलार या बलार भंगी।’ (पृ॰-38)
सूरजपाल चौहान ने इस बात को भी रंखांकित किया है कि दलितों में एकता की चेतना आ रही है और अब वे ठाकुर लटूरी जैसों की कुचालों को समझने लगे हैं। जब लेखक (सूरजपाल) अपने पिता के आग्रह पर गांव में पक्का मकान बनवाना शुरू करता है तो ठाकुरों की वही प्रतिक्रिया होती है जो दलितों की समृद्धि का कोई चिन्ह देखकर होती है। पक्का मकान बनने से रोकने के लिए दूसरे दलितों को भड़काकर लड़वा देना चाहता है।
उसी दिन सांय काल लटूरी ने जाटवों के मौहल्ले से प्रभु, कल्लन, लोटन, परसादी व सुमरू को अपने यहां बुलाया। ये सभी ठाकुर लटूरी के कहे अनुसार वहां पहुँच गए। ठाकुर प्रताप, गांव का लोध-राधे, लाला गेंदा, रोशन पहलवान व पंडित चन्द्रभान वहां पहले से ही मौजूद थे। ठाकुर प्रताप ने जाटवों को फटकारते हुए कहा था- तुम्हें शर्म आनी चाहिए, एक भंगिया कौ तुम्हारे सामने सीना ठोंक के पक्को मकान बनवा रहौ है और तुम..... जनखों की तरह हाथ पे हाथ धरे बैठे हो, तुम पे कुछु करौ जातु नाय।’
ठाकुर हम का करें? प्रभु ने सहजता से पूछा।
का करोगे, अरे भूल गए वा खचेरा भंगिया कूँ, जो बात-बात में तुम पे जूता चलावतौ ...। वाके ही भैया रोहना का मकान बन रहो है और तुम चुपचाप तमासौ देख रहे हो ..., अरे बिच्चैदो-कुछ करो, पीछे से हम तुम्हारी सपोट करेंगे।’ लटूरी ने उनको भड़काते हुए कहा।’ (पृ॰-42)
दलितों में फूट डालने व एक-दूसरे के विरूद्धलड़वाने के षड़यन्त्रों को तो दर्शाया ही है साथ ही दलितों में एकता का आधार व चेतना को भी रेखांकित किया है।
प्रभु, कल्लन, समरू, परसादी, लोटन और इतवारी सभी के सभी जाटव लट्ठ लेकर हमारे बनते घर के सामने खड़े थे उन्होंने एक स्वर में मेरे पिता का नाम लेकर आवाज लगाई। पिता साथ में बनी कच्ची कुठरिया से निकल आए। मैं चन्दू डोकर के नीम के तने का सहारा लिए खड़ा था। लटूरी गांव के बसीठों के साथ-साथ अपने घेर के पास रूक गया था जो हमारे घर से थोड़ी ही दूरी पर था। रोहन भैया, तु बना मकान, हम देखते हैं तुझे कौन ससुरा रोकता है मकान बनाने के लिए।’ प्रभु ने पिता के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा- ठाकुर तुमने हमें क्या खचेरा समझ रखा है तुम खचेरा को ही तरह-तरह के लालच देकर बहका सकते थे, बहुत लड़ाया तुमने हमें आपस में। हम अपनी जिन्दगी जीना सीख गए हैं, अब हम तुम्हारी बातों में आने वाले नहीं ...., अपना भला चाहते हो तो चले जाओ यहां से, वरना ठीक न होगा।’ दलितों में बनी एकता को देखकर सवर्ण हतप्रभ रह गए और एक-एक कर वहां से खिसक गए।
दलितों को लड़वाकर ही सवर्णो का वर्चस्व कायम रह सकता है यदि वे न लड़ने की ठान लें, सवर्णों की साजिशों का शिकार न हों तो उनके मुक्ति के द्वार खुलने का रास्ता यहीं से होकर गुजरता है।
दलितों की एकजुटता पर ही उनके शोषण व अन्याय से छूटकारा निर्भर करता है, जातियों में बंटे समाज में दलितों की मुक्ति व उत्थान किसी तरह संभव नहीं है। इसलिए जातिविहीन समाज के निर्माण के लिए उठाया गया कदम ही दलित-मुक्ति की दिशा को तय करता है, लेकिन दलित समाज का काफी बड़ा हिस्सा इस दिशा में कुछ न करके अपनी जाति को छुपाकर समाज से स्वीकृति व प्रतिष्ठा पाना चाहता है। ऐसे दलित असल में जाति को लेकर हीन-ग्रंथि का शिकार हैं इस ग्रंथि से उबरने के लिए वे जाति छुपा लेते हैं और सवर्ण होने का आडम्बर करने लगते हैं। जबकि जाति को लेकर हीन ग्रंथि का शिकार होना किसी भी तरह उचित नहीं है क्योंकि ना तो जातियां उन्होंने बनाई हैं और ना ही वे कथित निम्न जातियों में जान-बूझकर पैदा हुए हैं और न ही उससे उनकी मानवीय-गरिमा में कोई कमी आती है बल्कि शर्म तो उन्हें आनी चाहिए जो एक इन्सान में और दूसरे इन्सान में भेदभाव करने के लिए जाति का प्रयोग करते हैं। उच्च जाति होने का भ्रम पैदा करके प्रतिष्ठा पाना ब्राह्मणवाद की विचारधारा को ही स्थापित करना है। फिर इससे पूर समाज का तो कोई भला होता ही नहीं और मुक्ति या आजादी कभी एक व्यक्ति की नहीं होती बल्कि पूरे समाज की आजादी व मुक्ति में ही व्यक्ति की मुक्ति समाहित होती है। अपनी मानवीय पहचान का आग्रह ही दलित की प्रतिष्ठा की दिशा में उठाया जाने वाला ठोस कदम होगा। जाति को छिपाने से कुछ समय के लिए प्रतिष्ठा-सम्मान व स्वीकृति मिलने का आभास हो सकता है, लेकिन सच्चाई प्रकट होने पर अपमानित होना पड़ता है। सूरजपाल चौहान को जब तक अनुपम जैन व उसका परिवार सवर्ण समझता रहा, लेकिन ज्यों ही उसकी जाति का पता चला तो उसने लेखक का अपमान किया। जाति छुपाकर सवर्ण समाज मे अपनी जगह नहीं बनाई जा सकती बल्कि जाति-प्रथा के विरूद्व विचारधारात्मक लड़ाई लड़कर ही, जाति प्रथा के कारण सवर्णो में हो रहे मानवता के क्षरण का अहसास कराके ही ऐसा किया जा सकता है। ’जय’ भी अपने घर से भीमराव आम्बेडकर का चित्र हटाने को इसलिए कहता है ताकि एकदम पता न चले कि वे दलित हैं। जाति छुपाकर न तो सवर्णों की ब्राह्मणवादी मानसिकता पर कोई सवालिया निशान लगता है और न ही दलितों के सामाजिक सम्मान मे कोई गुणात्मक अन्तर आता है बल्कि वे अपने लिए एक दोहरी जिन्दगी जीने तथा अपने लिए अनावश्यक झंझट ही खडे करते है।
नोएडा (उ॰प्र॰) में ग्यारह वर्ष के निवास के दौरान ऐसे कई अच्छे पढ़े-लिखे कोठी-बंगले वाले दलित परिवारों से सम्पर्क हुआ जो अपने पड़ोस में अपनी जाति को छुपाकर रह रहे है। कोई राजस्थानी राजपूत तो कोई गौड़-ब्राह्मण। राजस्थानी बने राजपूत ने तो इस डर से कि कहीं उसके दलित होने की पोल न खुल जाये, अपनी बेटी की शादी नोएड़ा से दूर दिल्ली में गोल-डाकखाने के परिसर में जाकर की थी। ऐसा नहीं था कि नोएड़ा में रह रहे पड़ौसी उसकी जाति के विषय में जानते न हों। सभी जानते थे, लेकिन कोई अपने मुख से कुछ कहता न था। ऐसे पढ़े-लिखे लोगों में आत्म-सम्मान की कमी है।’ (पृ॰-105)
विचार करने की बात है कि जाति न छुपाने से इस राजस्थानी राजपूत’ का क्या बिगड़ जाता यदि उसकी जाति उजागर होने से किसी को परेशानी हो सकती थी तो उन्हीं को हो सकती थी जिनसे वह अपनी जाति छुपा रहा है और अपने लिए कठिनाइयां पैदा कर रहा है।
जाति छुपाने की बजाए जाति-विहीन समाज के निर्माण के लिए संघर्ष करने से दलितों को सम्मान मिल सकता है। भेदभाव व असमानता को पोषित करने वाली व्यवस्था को समाप्त करके ही ऐसा किया जा सकता है, लेकिन चिन्ताजनक बात यह है कि शिक्षित दलित वर्ग का बहुत बड़ा हिस्सा इसी व्यवस्था का शिकार हो गया है। जय, मदन व किशनपाल आदि चरित्रों से इसे समझा जा सकता ह। असिस्टेंट सेनेट्री इंसपेक्टर के पद पर काम करने वाला किशनपाल अपना परिचय ए.एस.आई. के रूप में इसलिए करवाता है ताकि सामने वाला व्यक्ति उसे दिल्ली पुलिस का ए.एस.आई समझे। सत्ता व रौब-दाब वाली स्थिति का दिखावा करना एक खास किस्म की विकृति ही है और यह विकृति उसके व्यवहार में तथा उसके द्वारा जीए जा रही मूल्य व्यवस्था में भी समा गई है। अपनी पहली पत्नी तीन साल की बच्ची के साथ छोड़ दी। कारण, वह बेचारी गांव की और रंग में काली थी’ (पृ॰-89) भ्रष्टाचार की दलदल में वह धंस गया है और व्यवस्था-जन्य बुराइयां उसमें घर करती जा रही हैं, इसका परिणाम यह होता है कि जिनको इस अमानवीय व्यवस्था को बदलने का प्रयास करना चाहिए वे इसके संरक्षक बन जाते हैं। किशनपाल ने एम.सी.डी. में साधारण से पद, सहायक सेनेट्री निरीक्षक के पद पर मात्र तीन-चार वर्ष की नौकरी में ही उसने एक चेतक स्कूटर, फियट कार और जमुना पार दिल्ली में पांडव नगर में साढ़े चार लाख रूपए में मकान भी खरीद लिया है।’
जयप्रकाश या जय को ऊंची जाति वाले व कोठी-बंगले वाले लोगों में अपनी पहचान-सम्मान-प्रतिष्ठा के लिए एस.सी.कहलवाने में लज्जा आने लगी’ और पिता के सफाई कर्मचारी होने और मां रंग में काली व अनपढ़’ होना भी लज्जा की बात बन गई। कभी वह अंग्रेजी न समझने वालों से भी फर्राटेदार अंग्रेजी में बोलता है, अपनी पत्नी को अंग्रेजी बोलनी न आने पर अपने दोस्त-मित्रों के घर तो लेकर ही नहीं जाता बल्कि उसका तिरस्कार व अपमान’ भी करता है। जय बहुत ही लम्पट किस्म का चरित्र है जो अपने मां-बाप को भी नाम लेकर बुलाता है और उनके नाम बिगाड़कर सुनहरी’ से सुन्नू’ व फूलवती’ से फूल्लो’ कर देता है और लड़कियों से हाथ मिलाने के आधुनिक चलन की ओट लेकर उनका हाथ सहलाता है और अपनी कुंठाओं को निकालता है। वह आम्बेडकर के चित्र को भी घर से हटवाना चाहता है, जिसका कारण मात्र यह नहीं है कि वह जाति छुपाना चाहता है बल्कि यह भी है कि आम्बेडकर ने दलित मुक्ति के लिए जो संघर्ष की राह बताई थी और जो आदर्श स्थापित किए थे उससे मुंह मोड़ना भी है। मदन भी इसी तरह का शिक्षित दलित है जिसकी दलितों में तो एक पढ़े-लिखे बड़े आदमी की छवि है जिसका उसके परिवार व रिश्तेदारों में प्रभाव भी है, लेकिन वह नैतिकता से गिरा हुआ आदमी है जिसे कि अपने भाई के मरने पर उसके कफन के पैसों की शराब पीने में कोई शर्म नहीं आती और सूरजपाल चौहान जैसे प्रगतिशील विचारों वाले को वह सहन नहीं कर सकता, वह दलित समाज को उन्हीं पुरानी रूढ़ियों में जकड़े रखना चाहता है। इस तरह के उभरता हुआ शिक्षित वर्ग दलित-आन्दोलन के लिए चुनौती है क्योंकि ऐसे तत्त्वों को कोई भी राजनीतिक शक्ति बरगला व खरीद सकती है। यह पीढ़ी शोषणकारी व्यवस्था में समाकर इसका हथियार बन रही है। जयप्रकाश अपनी पत्नी को उसी तरह प्रताड़ित करता है, जिस तरह सवर्ण समाज दलित को प्रताड़ित करता है। इस अमानवीय विचार को ग्रहण करके अपने वर्ग व समाज से विश्वासघात कर रहा है, लेकिन सूरजपाल चौहान का जय को मानसिक रोगी’ मानकर उसे मनोरोग चिकित्सक’ को दिखाकर समस्या का समाधान निकालना अति सरलीकरण है। असल में वह मनोरोगी नहीं है, बल्कि व्यवस्थाजन्य विकृति है जो उसने ग्रहण कर ली है। इसका समाधान दलित-मुक्ति के लिए किए जाने वाले विचारात्मक संघर्ष में है, ब्राह्मणवाद की बुराइयों पितृसत्ता व वर्णव्यवस्था के अमानवीय पक्षों को उद्घाटित करने में है, न कि मनोरोग चिकित्सक के पास।
सवर्ण मानसिकता से ग्रस्त साहित्यकारों-आलोचकों में दलित-साहित्य को लेकर कई तरह की शंकाओं को उठाया जाता है। दलित-साहित्य के स्वतन्त्र अस्तित्व को लेकर, उसकी पाठकीयता को लेकर कई तरह के प्रश्नचिन्ह लगाए जाते हैं, सूरजपाल चौहान ने अपने अनुभवों के माध्यम से दलित-साहित्य से जुड़े विभिन्न पहलुओं की ओर संकेत किया है। दलित-साहित्य के स्वतंत्र अस्तित्व, स्वतंत्र धारा की पहचान को लेकर सबसे पहले सवाल उठाया जाता है। दलित साहित्य में अभिव्यक्त यथार्थ को सहन करने व स्वीकार करने के लिए बहुत बड़े कलेजे की जरूरत है, इस यथार्थ को देखकर इसके जिम्मेवार लोग व विचारधारा को भी जानना समझना होगा, जो किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है इसलिए इस अमानवीय यथार्थ व उसकी जिम्मेवार विचारधारा मनुवाद को सुरक्षित रखने व पर्दा डालने के लिए सबसे सरल व चालाकी पूर्ण ढंग यही है कि दलित साहित्य के स्वतन्त्र अस्तित्व को नकार दिया जाए। बार-बार कहा जाए कि दलित साहित्य जैसा कोई साहित्य नहीं होता। दलित साहित्य को मान्यता न देना इसके अस्वीकर का लोकप्रिय ढंग है जबकि इसकी स्वतन्त्र पहचान स्थापित करना इसकी स्वीकार्यता को बढ़ाना है। सूरजपाल चौहान ने इसे पहचानते हुए इसकी ओर संकेत किया है। एक कविता गोष्ठी में जब संचालक ने तिरस्कृत’ के लेखक का दलित रचनाकार के रूप में परिचय करवाते हुए कविता-पाठ करने के लिए आमंत्रित किया तो
वर्चस्वी वर्ग की विचारधारा को प्रसारित करने वाली नोएड़ा (उ॰प्र) साहित्यिक संस्था सूर्या-संस्था’ की संचालिका आशारानी ब्होरा ने तुरन्त ही तुनक कर कहा था- अरे, साहित्य भी कभी दलित होता है ..., साहित्य तो साहित्य है। मैं नहीं मानती कोई दलित साहित्य-वाहित्य ...।’ लेकिन जब लेखक ने कहा क्यों जब ललित साहित्य, संत साहित्य या ब्राह्मण साहित्य हो सकता है, तो दलित साहित्य क्यों नहीं हो सकता?’ और इस बात से चिढ़कर आशारानी व्होरा कविता सुने बिना ही कार्यक्रम के बीच से उठकर चली गई।
दलित साहित्य में व्यक्त सामाजिक यथार्थ से बचने के लिए तथा इसकी धार को कुंद करने के लिए इस पर संकीर्णता का आरोप लगाया जाता है, जो दलित साहित्य के विरोध का ही एक पैंतरा है। समाज को वर्गों के आधार पर न देखकर समस्त मानवों को एक मानना-देखना अन्ततः वर्गो के बीच संघर्ष व टकराहट को न पहचानना है। सर्वजन हिताय’ का संदेश देने वाली रचनाएं अन्ततः परिवर्तन को नकारती हैं और यथास्थिति को स्वीकारती हैं जो दलितों के शोषण को जारी रखने की स्वीकारोक्ति है। तिरस्कृत’ के लेखक व किशोर के बीच हुई बातचीत में इस ओर संकेत किया है।
किशोर-दबे स्वर में मुझसे दलित रचनाएं न लिखने का अनुरोध हमेशा करते थे। एक दिन आफिस से आते समय दिल्ली के बाराखम्बा रोड़ स्थित स्टेट्समेन बस स्टेंड’ पर कौशल’ ने मुझसे कहा था- सूरज जी, मैं तुम्हारा हितैषी हूँ, तुमने दलितों के विषय में बहुत कविताएं व कहानियां लिखी है। ... अब मैं चाहता हूँ कि आप अपनी संकुचित विचारधारा को त्यागकर साहित्य की मुख्यधारा में आ जाओ। मैं भगवान से प्रार्थना करता हूँ कि वह आपको सदबुद्धि दें।’ (पृ॰-82)
संकीर्णता’ को यानी दलित समाज की हितैषी विचारधारा व दलित समाज की वास्तविकताओं को छोड़कर मुख्यधारा’ को अपनाने का एक ही अर्थ है सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि से वर्चस्वी वर्ग की विचारधारा को अपनाना, अपने वर्ग के हितों के विरूद्धऔर शोषक वर्ग के हितों को पोषित करने वाली रचनाएं करना। साहित्य की मुख्य धरा का अर्थ है समाज की मुख्यधरा। यानि वर्चस्वी वर्ग का यशोगान करना, अपनी रचनाओं में उनकी उदारता, दयाध्र्मिता, मानवता का गुणगान करके ठकुरसुहाती करना और बदले में पुरस्कार’, सम्मान चिह्न,’ भव्य पदवियां’ व उपाध्यिां’ं हासिल करना और समाज की मुख्यधरा से बाहर यानि हाशिये पर ध्केल दिए गए दबे-कुचले, वंचित-पीड़ित-दलित लोगों की ओर से मुंह मोड़ लेना। दलित साहित्यकारों की स्वीकृति तभी तक है जब तक कि वह तथाकथित मुख्यधरा’ की विचारधारा को पोषित करने वाली रचनाएं प्रस्तुत करता है ज्यों ही उसने दलित समाज की सच्चाइयों को और उनके पीछे निहित कारणों व शक्तियों पर उंगली उठानी शुरू की तो उसकी रचनाएं स्वीकार्य नहीं होंगी और उसको अपमानित किया जाएगा, लेकिन दलित साहित्यकार के लिए दलित जीवन की जटिलताओं से किनारा करना साहित्यकार के रूप में उसकी मृत्यु का लक्षण होगा। सूरजपाल चौहान इसकी ओर संकेत करते हैं उनके अनुभवों से दलित-साहित्य व रचनाकारों के प्रति श्रेष्ठता-ग्रंथि के शिकार रचनाकारों का रवैया समझा जा सकता है।
सवर्ण साहित्यकारों के बीच में मेरे प्रति आदर और सत्कार तभी तक कायम रहा जब तक मैं उनके राग अलापता रहा। मेरी गैर दलित रचनाओं और भजनों, जिनमें शिव-स्तुति’ प्रमुख थी, सुन-सुनकर वे झूम उठते थे और खूब तालियां बजाते। धीरे-धीरे जब मेरा स्वर बदलने लगा तो इनके बीच में मुझे शक की नजरों से देखा जाने लगा। एक बार दिल्ली के मावलंकर हाल’ में एक कवि सम्मेलन के दौरान एटा-मैनपुरी से आये एक कवि ने मंच पर ही मेरी जाति मुझसे पूछ डाली। मैंने खीजते हुए उससे कहा-
मैं भंगी हूँ, क्या परेशानी है तुझे?’
मेरी बात सुनकर वह बड़ी बेशर्मी से मुंह बिचकाता हुआ बोला था-
लो, अब भंगी भी कविताएं लिखने लगे।’ (पृ॰-123)
दलित साहित्य पर और दलित साहित्यकारों पर संकीर्णता’ का आरोप लगाने वालों को अपने अन्दर झांककर देखने की जरूरत है। संकीर्णता उनमें है जो दलित साहित्य पर संकीर्णता का आरोप लगाते हैं क्योंकि कोई रचनाकार अपने इर्द-गिर्द की व अपने समाज की सच्चाईयों-टकराहटों, अन्तर्विरोधों व विसंगतियों को ही अपनी रचनाओं में व्यक्त करता है और सही ढंग से उसी को कर भी सकता है। दलित साहित्यकारों से यह अपेक्षा करना कि वे अपने समाज की सच्चाईयों को व्यक्त न करके ऐसी दुनिया का निर्माण करें जिसका कि उनको अनुभव नहीं है किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। दलित रचनाकार अपने समाज की वास्तविकताओं को व्यक्त करें तो उन पर संकीर्णता का आरोप लगाकर उनका बहिष्कार करना, उनकी रचनाओं को न पढ़ना उनकी पुस्तकों को पुस्तकालयों में न रखना और दलित-पत्रिकाओं को न पढ़ना संकीर्णता के लक्षण व प्रमाण हैं। दलित साहित्यकार स्वतन्त्र विचारों के साथ स्वीकार्य नहीं हैं बल्कि उसकी स्वीकार्यता तब तक है जब तक कि वह उनके (सवर्णों) खांचे में फिट होने की गुंजाइश रखता है। हिन्दी-साहित्य’ के नाम पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व घोर ब्राह्मणवादियों के शिंकजे में कार्यरत सूर्या-संस्था, नोएड़ा (उ॰प्र) के अनुभव से सूरजपाल जी ने इस ओर संकेत किया है कि जब तक इनके मंचों पर इनके पसंद की या विचार की कविताएं सुनाते रहो याकि इनका प्रचार करते रहो तब तक इस सड़क छाप कवियों’ की मण्डली में आप का स्थान है यदि आपने यथार्थ की रचनाएं प्रस्तुत करनी शुरू दी तो यहां आपके लिए दरवाजे बंद हैं।
जब इनके मंचों से अपनी भावपूर्ण दलित रचनाएं पढ़नी शुरू कर दीं। मेरी रचनाओं को सुन-सुनकर ये सभी हैरान रहने लगे। इनमें से कई मुझे बहुत दिनों तक ऐसा सब मंचों से न पढ़ने के लिए मनाते रहे। काव्य-गोष्ठियों में मेरी रचनाएं सुनकर अब ये नाक-भौंह सिकोड़ने लगे। जब इन्होंने देखा कि मैं बदलने वाला नहीं, तो मुझे बुलाना ही बंद कर दिया, जिसकी मुझे पहले से ही सम्भावना थी।’ (पृ॰-108)
दलित रचनाकारों पर संकीर्णता का आरोप लगाने वाले असल में खुद संकीर्णता का शिकार हैं अपनी पसंद की रचनाएं न पाकर किसी साहित्यकार को संकीर्ण कहना उचित नहीं है उसकी रचनाओं में व्यक्त यथार्थ का विश्लेषण करके पूरे समाज के संदर्भ में उसको देखने पर ही किसी निर्णय पर पहुंचा जा सकता है लेकिन दलित साहित्य व साहित्यकार के प्रति सवर्ण मानसिकता से ग्रस्त रचनाकार व पाठक इतने संकीर्ण व पूर्वाग्रही हैं कि बिना पढ़े ही इनके बारे में फतवे’ घोषित कर देते हैं। आशारानी व्होरा नाम की लेखिका दलित-पत्रिका शम्बूक’ के दो अंकों को तिरस्कृत’ के लेखक के पास भिजवा देती है न तो अपनी पुस्तकों में स्थान देती और न ही इनको पढ़ने की जहमत उठाती है। इसी तरह ब्राह्मणवादी सोच को धारण किए व्यक्ति पुस्तकालयों में दलित-साहित्य को नहीं आने देते। जब सूरजपाल चौहान ने अपने कार्यालय के पुस्तकालय के लिए दलित साहित्य की महत्वपूर्ण कृतियां खरीदवा दीं तो उनको कोपभाजन तो बनना ही पड़ा। हिन्दी अधिकारी की टिप्पणी दलित साहित्य के प्रति नजरिये को स्पष्ट कर देती हैं।
पुस्तकें देखकर हिन्दी अधिकारी ने कहा यह - ये कूड़ा-कचरा क्यों खरीद लिया ..... कौन पढ़ेगा इन्हें।’ हिन्दी अधिकारी के पूर्वाग्रह प्रकट होने लगे थे।
मैंने कहा- आपने इनमें से कुछ पढ़ा है।’
वह तपाक से बोले- ऐसी वाहियात चीजें मैं नहीं पढ़ता’ (पृ॰-84)
बिना पढ़े ही दलित साहित्य को वाहियात’ मानना व रद्द कर देना सवर्ण-संकीर्णता व दलितों के प्रति घृणा को दर्शाता है। दलित साहित्य के प्रति पाठकीय संवेदना का घोर अभाव है जो पाठकीय तैयारी, संवेदना, व आलोचनात्मक विवेक दलित साहित्य को ग्रहण करने के लिए चाहिए वह लगभग सिरे से गायब है। ऐसी स्थिति में दलित साहित्य में उठाए गए गम्भीर सवालों पर चर्चा करने की बजाए, शोषण-उत्पीड़न की स्थितियों व कारणों को समझने की बजाए व मानवता के हो रहे क्षरण को समझने की बजाए दलित साहित्य को खारिज करने का ही भरसक प्रयास रहता है कभी जानकारियों के अभाव का, कभी सही तथ्यों का, कभी विश्वसनीयता, कभी सौन्दर्यबोध का, कभी संकीर्णता का तो कभी अश्लीलता का आरोप चस्पां कर दिया जाता है। दलित साहित्य में व्यक्त सच्चाईयों से मुंह मोड़ने व उसकी जिम्मेदार विचारधारा को बचाने का यही सबसे आसान व कारगर ढंग है और अक्सर ऐसा ही होता है। यदि कोई दलित रचनाकार को पढ़ता है या उसकी किसी रूप में मदद करता है तो इस तरह कि जैसे उस पर अहसान किया हो
वह (कौशल) लगभग चीखते हुए बोले- आपको पता है कि आपके बाल-कविता पाठ की रिकार्डिंग मेरे छोटे-भाई और मेरी पत्नी ने मिलकर की है, यह जानते हुए भी कि आप वाल्मीकि जाति के हैं।’ (पृ॰-83)
दलित साहित्य के प्रति अभी आलोचना-दृष्टि विकसित नहीं हुई दलित रचनाओं में मीन-मेख निकालना ही इनकी आलोचना पद्धति के तौर विकसित हुई है। प्रख्यात दलित साहित्यकार ओमप्रकाश वाल्मीकि की जूठन’ पर बातचीत करते हुए कौशल छटांक, सेर, किलो’ का बहाना लेकर वही ऊट-पटांग सवाल करता है जिसका कि रचना के सौन्दर्य, रूप, कथ्य, आदि से कोई संबंध नहीं रखती।
दलित साहित्य की रचनाओं को और उनमें उठाए गए सवालों को नकारने का एक ओर पैंतरा लिया जाता है। दलित साहित्यकारों पर उसी तरह का आरोप लगाया जाता है जिस तरह दलित राजनेताओं पर। दलित साहित्यकारों पर समाज की शांति को भंग करने जैसा अनर्गल व बेहूदा आरोप लगाया जाता है, जाति को बढ़ावा देने वाला कहा जाता है या फिर इनके काम से समाज का कोई भला नहीं हो सकता ऐसा कहकर दलित साहित्य की महत्ता को ही नकारने का प्रयास किया जाता है। सूरजपाल चौहान के आफिस के सहयोगी, जो कविता भी लिखते हैं, किशोर कुमार कौशल’ के साथ हुई बातचीत से अनुमान लगाया जा सकता है कि दलित साहित्य के बारे क्या धारणा रखते हैं।
.... तुम या तुम्हारे दलित साहित्यकार अपने आपको साहित्यकार होने का ढिंढोरा पीट रहे हैं ... तुम्हारे लिखने से दलितों का क्या भला हो रहा है? तुम लोग तो दलितों और सवर्णों के बीच की खाई को चौड़ा करने में लगे हो ..., तुम्हारे लिखने से क्या समाज बदल जाएगा ...। तुम या तुम्हारे दलित साहित्यकार मुंशी प्रेमचन्द, निराला या नागार्जुन से बड़े नहीं हो गए हो।’ (पृ॰-83)
दलित साहित्यकार किसे माना जाए, दलित जातियों में पैदा हुए साहित्यकार को या फिर दलितों के हितों को बढ़ावा देने वाले को - यह सवाल बहुत ही विवादास्पद रहा है। सूरजपाल चौहान व ओमप्रकाश वाल्मीकि की बातचीत से इस पर कोई राय बनाई जा सकती है। कृष्ण कुमार कौशल नाम का रचनाकार दलित हैं, लेकिन वह आर्यसमाजी विचारधारा का समर्थक है जो मूलतः वर्ण-व्यवस्था को आदर्श व्यवस्था मानती है और मनु स्मृति को वेदों की तरह का जरूरी ग्रंथ। ओमप्रकाश वाल्मीकि तिरस्कृत’ के लेखक को कहते हैं कि उच्च वर्ण की विचारधारा ब्राह्मणवाद का समर्थक व्यक्ति दलित हितैषी व दलित साहित्यकार नहीं हो सकता चाहे उसने स्वयं दलित समुदाय में ही जन्म क्यों न लिया हो। बात बिल्कुल सही है कि व्यक्ति का व्यवहार उसके विचारों से परिचालित होता है और विचार से ही समाज बदलता है। दलित-दृष्टि व दलित-हित को अभिव्यक्त करने वाली रचनाओं को दलित-रचना व इनके लेखकों को दलित-रचनाकार कहा जा सकता है चाहे वह किसी भी जाति से संबंध रखता हो।
समाज में साम्प्रदायिकता की विचारधारा को प्रसारित करने के लिए साहित्य का सहारा लेने को तथा दलितों को इस कुत्सित अभियान में शामिल करने के आर.एस.एस., विश्व हिन्दू परिषद व बजरंग दल की योजना को भी उद्घाटित किया है। साहित्यकार होने की पहली शर्त है कि बिना किसी पूर्वाग्रह के मानवीय दृष्टि से समाज की सच्चाई को, अन्तर्विरोधों को व विसंगतियों को देखना और उनको मानवीय नजर से अपनी साहित्य-रचनाओं में अभिव्यक्त करना, जिसको अपनाए बिना कोई भी साहित्यकार नहीं हो सकता, हां प्रचारक अवश्य हो सकता है। सूरजपाल चौहान के अनुभवों से प्रचारकों को पहचानने की समझ विकसित होती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए मनुस्मृति एक आदर्श ग्रन्थ है जिसकी व्यवस्था को लागू करने के लिए वह हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहती है। हिन्दू राष्ट्र में दलितों का स्थान वही होगा जो मनु ने निर्धारित किया है। अपनी इस विचारधारा को प्रचारित करने में साहित्यकारों को जोड़ने के लिए बड़े-बड़े भव्य आयोजन करके, प्रशस्ति प्रमाण पत्र बांटकर, पुरस्कारों का लालच देकर व फूल मालाएं पहनाई जा रही हैं और इसमें कुछ हद तक सफल भी हुए हैं। अच्छी बात यह है कि हिन्दी का रचनाकार अभी तक कट्टरपंथी व नफरत फैलाने वाली विनाशकारी शक्तियों की गिरफ्त से बाहर है। मंचीय कवियों की बहुत बड़ी संख्या ही इस विचारधारा को महिमामंडित करती है चाहे स्त्री के संबंध में पितृसत्ता व पुरूष प्रधानता हो या उन्मादी राष्ट्रवाद हो या फिर युद्ध के संबंध में हो। वह अपनी चुटकुलेनुमा रचनाओं में इन प्रतिक्रियावादी शक्तियों की विचारधारा व तर्क ग्रहण करता है, लेकिन समाज में और साहित्य जगत में ऐसे भाण्डों को अभी तक मात्र हंसाने-गुदगुदाने वाला या मनोरंजन करने वाला ही माना जाता है। गम्भीर साहित्यकार के रूप में अभी तक न तो इनकी पहचान है और न मान। न तो इनको गम्भीरता से लिया जाता है न ही इन्हें समाज को दिशा देने वाला रचनाकार माना जाता है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, बजरंग दल व विश्व हिन्दू परिषद द्वारा आयोजित अ.भा. हिन्दी साहित्य सम्मेलन का वर्णन करते हुए सूरजपाल ने लिखाः
उद्घाटन सत्र में हरेक वक्ता ने भारत के मुस्लिम समाज को जी भरकर अपशब्द कहे। वातावरण इस प्रकार लगा कि मानो हम किसी राजनीतिक पार्टी या धर्म-सम्मेलन में आए हुए हों। उद्घाटन सत्र के दौरान हर हर महादेव’ के नारे गूंजते रहे। वहां पधारे हरेक व्यक्ति के सीने पर जय श्रीराम’ के बिल्ले लगाए जा रहे थे। मैंने जब इसका विरोध किया तो भाजपा व बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने गाली-गलौज से मेरा स्वागत किया। मैं अन्त तक अपने निश्चय पर डटा रहा। मैंने कहा कि मैं यहां हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आया हूँ, किसी धार्मिक सम्मेलन में नहीं । भला मैं क्यों लगाऊँ, जय श्रीराम का बिल्ला। बहुत समझाने-बुझाने पर किसी तरह बात टली। लेकिन मैं पूरे कार्यक्रम में कार्यकर्ताओं की आँखों में खटकता रहा। सभी मुझे घूर-घूर कर देख रहे थे।’ (पृ॰-66)
सूरजपाल चौहान ने ऐसे संकीर्ण मानसिकता के लोगों की असली मंशा को उजागर किया है, जिनका साहित्य से या साहित्यिक सरोकारों से कुछ भी लेना-देना नहीं है। यदि कोई साहित्यकार साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए गम्भीर बातचीत करता है, रचनात्मक सुझाव देता है या साहित्य में संकीर्णता न अपनाने की बात करता है, जाति-प्रथा जैसे घृणित विचार को ध्वस्त करता है तो उसको तालियां बजाकर या फिर शोर मचाकर मंच से उतार दिया जाता है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व उसके आनुषंगिक संगठनों के लिए जाति-प्रथा जैसी अमानवीय-प्रथा को समाप्त करना कोई मकसद नहीं है, बल्कि यह तो उसको पोषित करने वाली संस्था है। लोकतांत्रिक शासन-प्रणाली में जन समर्थन हासिल करके ही शासन हथियाया जा सकता है, इसलिए अपने राजनीतिक हित साधने के लिए अपने पीछे लगाने की रणनीति अपनाते हैं। दलितों के प्रति सदियों से अपनाई जा रही नफरत व हिंसा को समाप्त करने की बजाए दलितों में इस उत्पीड़न का अहसास न हो इसके लिए छोटे-मोटे उत्सवों के बहाने दलितों के साथ मेलजोल करने व बराबर समझने का ढोंग किया जाता है। सवर्ण व पुरूषवादी विचारधारा को पोषित करने वाला संघ व उसके आनुषंगिक संगठनों को राजनीतिक हित साधने के लिए दलितों को अपने पीछे/साथ लगाना जरूरी है तो उन पर अपना वर्चस्व बनाए रखने व सामाजिक सत्ता बनाए रखने के लिए उनको निम्न/नीचा बनाए रखना भी जरूरी समझता है। राजनीतिक दृष्टि से हिन्दू समाज एक इकाई के रूप में तथा सामाजिक स्तर पर जातियों-उपजातियों में बंटा समाज व एक के ऊपर एक टिकी सामाजिक व्यवस्था जिसमें सवर्ण सबसे ऊपर है। ऐसी अन्तर्विरोधी समाज-व्यवस्था को बनाने के लिए नित नई-नई योजनाएं बनाना व लोगों और विशेषकर दलितों में ऐसा भ्रम पैदा करना कि वह समाज में एकता व बराबरी चाहता है संघ की कार्यप्रणाली का हिस्सा है। अपनी इस राजनीतिक व्यूह-रचना में संघ काफी हद तक कामयाब हुआ है। इसके तो स्पष्ट ही उदाहरण हैं कि वर्ण-व्यवस्था व मनुवाद को पोषित करने वाली संघ के राजनीतिक घटक व वर्ण-व्यवस्था व मनुवाद के विरूद्ध आग उगलने वाली, सबसे मुखर व दलित-हितैषी’ राजनीतिक दल ने कई बार इकट्ठे मिलकर सत्ता का स्वाद चखा है। यह रहस्य तो नहीं है कि परस्पर विरोधी सामाजिक दृष्टि रखने वाले राजनीतिक दलों में एकता कैसे हो जाती है क्योंकि राजनीतिक एकता का अर्थ है राजनीतिक स्वार्थों की एकता। सूरजपाल चौहान ने अपनी आत्मकथा में इस की ओर संकेत किया है व दलितों के आन्दोलन को भ्रमित करने व कुन्द करने की साजिश को उद्घाटित किया है।
संघ द्वारा आयोजित साहित्य सम्मेलन के समापन पर लेखक ने भाजपा व संघ के कार्यकर्ता से पूछा - आप दलितों को अपनी ओर करने हेतु क्या कर रहे हैं और भविष्य में क्या योजना है, जिससे कि इस देश की सत्ता हम सवर्णों के ही हाथों में रहे।’
इस पर संघ के उस कार्यकर्ता ने बताया कि अब पूरा ध्यान देश के दलितों को अपनी ओर करने में लगाया जा रहा है। उसने योजनाओं पर चर्चा करते हुए कहा- रक्षाबंधन जैसे त्यौहारों के अवसर पर हम अपने कार्यकर्ताओं के साथ चूहड़े-चमारों के घर जाते हैं और मिठाई तथा छोटे-मोटे उपहारों के साथ उनकी बहन-बेटियों से राखी बंधवाते हैं ऐसा करने से इन चूहड़े-चमारों पर हमारा अच्छा प्रभाव पड़ता है। ये छोटी जाति के लोग बड़े खुश होते हैं, जब हम इसके घर जाते हैं। भविष्य में ऐसी कई योजनाएं हैं।’(पृ॰-68)
सूरजपाल चौहान ने संघ द्वारा आयोजित किए जाने अन्तर्जातीय उत्सवों-कार्यक्रमों के पीछे की साजिश का पर्दाफाश तो किया ही है साथ ही दलितों व दलित नेताओं, दलित राजनीतिक दलों को इस राजनीति को समझने का आग्रह किया है।
कहा जा सकता है कि सूरजपाल चौहान ने अपनी आत्मकथा तिरस्कृत’ में अपने अनुभवों को आलोचनात्मक विश्लेषण के साथ प्रस्तुत करके इन अनुभवों को समस्त दलित-पीड़ित लोगों के साथ इस तरह-जोड़ दिया है कि यह आत्मकथा अधिकांश दलित-पीड़ित आबादी की कथा बन जाती है। दलितों के प्रति हिंसा, घृणा, पूर्वाग्रहों को स्पष्ट रूप में रखते हुए उनकी स्वीकृति, सम्मान, पहचान व मानवीय गरिमा को महत्त्व दिया है। दलितों के बीच पनपे ब्राह्मणवाद को बहुत तीखे रूप में उठाया है जो दलितों की एकता व संगठित होने में मुख्य अवरोध है और दलित मुक्ति में सबसे बड़ी रूकावट हैं। दलित साहित्य की स्वतन्त्रा सत्ता, सौन्दर्य-बोध, पाठकीय चेतना-संवेदना आदि से जुड़े सवालों को भी महत्वपूर्ण ढंग से उठाया है जिससे कि दलित साहित्य के बारे में धारणा बनाने में मदद मिलती है। इस तरह तिरस्कृत’ बहुत जरूरी सवालों को उठाने वाली दलित मुक्ति के दस्तावेज की रचना है।

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