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July 6, 2011

अक्करमाशीः समाजशास्त्रीय अध्ययन





अक्करमाशीः समाजशास्त्रीय अध्ययन






डा. सुभाष चन्द्र, एसोशिएट प्रोफेसर
हिन्दी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र

शरणकुमार लिम्बाले रचित आत्मकथा अक्करमाशी’ दलित साहित्य की अनुपम कृति है, जो समाज की ऐसी सच्चाई को हमारे सामने रखती है कि समाज में व्याप्त भेदभाव व असमानता को कानूनी मान्यता देने वाली व्यवस्था की परत दर परत उघाड़ती जाती है।
मनुष्य के जीवन में शिक्षा को अनिवार्य मानते हुए कहा है कि शिक्षा से ही मनुष्य का विकास होता है, उसी के माध्यम से वह संस्कृति व सभ्यता की उपलब्धियों को प्राप्त करता है। लेकिन भारतीय समाज का एक दुखद व शर्मनाक अध्याय यह भी रहा है कि समाज के बहुत बड़े वर्ग को धर्म का वास्ता देकर इससे वंचित कर दिया। वर्ण-धर्म के पालन को मनुष्य के लिए मोक्ष प्राप्त करने का और समाज को सुचारु रूप से चलाने का आधार माना। और इस व्यवस्था का पालन करवाने के लिए शासकों से आग्रह किया गया। वर्ण-धर्म का अर्थ था जो चार वर्ण बनाए गए हैं वे श्रेष्ठता के क्रम में हैं और शूद्र वर्ण को तो ज्ञान प्राप्त करने से वंचित रखा गया, उसका धार्मिक कर्तव्य हो गया ज्ञान प्राप्त न करना। यदि किसी शूद्र ने ज्ञान प्राप्त करने की कोशिश की तो उसको सजा दी गई। इस कथित आदर्श व्यवस्था ने अधिकांश आबादी को समाज की उपलब्धियों से दूर कर दिया। इस वर्ग को न केवल ज्ञान से वंचित किया, बल्कि गुजारा करने व जीने के सारे साधन भी इनसे छीन लिए और ये पूर्णरुपेण सवर्णों पर निर्भर हो गए।
घर की खस्ता हालात होने के कारण बच्चों को घर के कामों में मदद करनी पड़ती है। वे अपनी पढ़ाई को ठीक ढंग से नहीं कर पाते। यह समस्या केवल दलित या अछूत मानी जाने वाली जातियों की ही नहीं है, बल्कि तमाम मेहनतकश जनता की है। इस वर्ग की आर्थिक स्थिति में बच्चों का महत्वपूर्ण स्थान है, वे बड़ों की सहायता करते हैं या स्वतंत्र रूप से कुछ कमाते हैं जो इन परिवारों के अस्तित्व के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। लेखक का दोस्त संगू वन-भोजन के लिए स्कूल के बच्चों के साथ जाना चाहता है, लेकिन उसकी मां उसे जाने नहीं देती।
चटनी-रोटी बांधकर हम भी उन बच्चों में शामिल हुए जो शिक्षक के निर्देशानुसार कतार में खड़े थे। उसी समय जनामाय हाथ में छड़ी लेकर वहां आई। संगू को कतार से बाहर निकालते हुये पीटने लगी। संगू रोने लगा। वह हमारे साथ वन-भोजन के लिए जाना चाह रहा था। पर जनामाय उसे कतार से बाहर खींचने लगी। जनामाय किसी की सुन नहीं रही थी। उसे पीटते हुए कह रही थी, संग्या, चुपचाप मेरे साथ चल, नहीं तो लातों का परसाद दूंगी! तेरा बाप भूखा ही मजदूरी करने गया है। उसे रोटी पहुंचानी है। तू अगर नहीं जायेगा तो वह दिन भर भूखा रहेगा और जानता है, आगे क्या होगा? रात में वापसी पर वह सारा गुस्सा तुझपर निकालेगा, तेरी बोटियां काटेगा, इसलिए कह रही हूं चुपचाप चल।’(पृ.-35)
केवल दलितों से ही नहीं, बल्कि समाज के तो अन्य वर्गों के गरीब लोग भी हैं वे भी इसी तरह की स्थितियों में जी रहे हैं। परिवार का गुजारा चलाने के लिए बच्चे भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। मेहनतकश जनता के बच्चों को बचपन जैसा कुछ मिलता ही नहीं, वे शोषण की चक्की में होश संभालते ही जोत दिए जाते हैं और मरने के साथ ही उनका इससे पीछा छूटता है। सिद्धांत के तौर पर सब इस बात को मानते हैं कि अपने बच्चों को पढाना चाहिए, इससे उनका जीवन सुधरेगा’ बनेगा’, लेकिन सामाजिक व आर्थिक स्थितियां इस तरह की है कि चाहते हुए भी मां-बाप अपने बच्चों को पढ़ा नहीं पाते। वे बच्चों का भविष्य बनेगा, उज्ज्वल होगा, नरक की स्थितियों से मुक्ति मिलेगी , ऐसा सोचकर वे अपने बच्चों को स्कूल में दाखिल तो करवाते हैं, लेकिन जल्दी ही उनका यह सपना चकनाचूर हो जाता है। परिवार की आर्थिक हालात उसकी पढ़ाई के रास्ते में दीवार बनकर खड़ी होती है। परिवार के सामने दो रास्ते हैं एक तो बच्चे को पढ़ाई करवाके भविष्य संवारने का और दूसरा घर के काम में हाथ बंटाकर वर्तमान को बचाने का। स्वाभाविक है कि इन स्थितियों में व्यक्ति वर्तमान को ही चुनता है। परिणाम के तौर पर वह बच्चे को स्कूल से उठा लेता है। सरकारी आंकड़े भी इस बात को रेखांकित करते हैं कि जितने बच्चे स्कूल में दाखिला लेते हैं उसके आधे ही प्राईमरी पास कर पाते हैं। इस बात पर तो काफी जोर दिया गया कि सभी बच्चे स्कूल में न जांए, लेकिन अभी यह प्रश्न अनछुए जैसा ही है कि जो बच्चे स्कूल में आ गए हैं उनको स्कूल छोड़ने से कैसे रोका जाए? असल में तो हर व्यवस्था का चरित्र होता है उसी के आधार पर वह काम करती है। श्रमिकों का शोषण पूंजीवादी-सामन्ती व्यवस्था के चरित्र की प्रमुख विशेषता है। इसके लिए जरूरी है कि श्रमिक काफी मात्रा में उपलब्ध रहें और वे यदि जागरूक न हों तो इस व्यवस्था के लिए वरदान ही है। शिक्षा नीति भी व्यवस्थाजन्य है। जिस वर्ग के पास शासन सत्ता होती है वह अपने अत्यधिक लाभ के लिए ही शिक्षा का प्रयोग करता है। पूंजीवादी-सामन्ती व्यवस्था में पूंजीवाद व सामन्तवाद के मूल्यों को बढ़ावा देने वाली शिक्षा का ही प्रसार होगा। समाज में जितने स्तर हैं शिक्षा के भी उतने ही स्तर हैं। जिस स्तर में व्यक्ति है उसे उसी स्तर तक ही शिक्षा देने की इच्छा व्यवस्था की रहती है। ये उसकी पारिवारिक स्थितियों पर निर्भर करता है कि वह कहां तक शिक्षा प्राप्त करेगा। चूंकि दलितों के पास जीवन जीने के कोई साधन नहीं हैं वे पूरी तरह से सर्वहारा हैं, जिनका इस व्यवस्था ने सर्वस्व शोषण कर लिया है इसलिए उसका शिकार वह सबसे पहले होता है। पूंजीवाद में शोषण तो सबका ही होता है, लेकिन यह भी उसके स्तर पर निर्भर करता है। जो सबसे नीचे की श्रेणी में है उसका सबसे अधिक शोषण होता है। शोषण का तीखा अहसास भी उसी को होता है। इसलिए दलितों में भी जिनके पास ’कुछ’ है वही पूंजीवादी ढांचे में विकास के ’कुछ’ अवसर पा सकता है, शेष तो मौल्या की तरह स्कूल से निकाल लिए जाते हैं। जो जितना गरीब है वह उतना ही जल्दी इस व्यवस्था की कड़क्की में आता है। मौल्या के परिवार का जो वर्णन लेखक ने किया है, उस हालत में इसके अतिरिक्त क्या निर्णय लिया जा सकता है।
मौल्या मेरी ही तरह रोज स्कूल आता था, परंतु उसके पिता ने उसे स्कूल से निकाल लिया तथा पशुओं की देखभाल पर लगा दिया। अर्थात नौकरी पर लगा दिया। इतनी छोटी उम्र में ही मौल्या नौकरी कर रहा था। रोज दो बार भोजन तथा प्रतिवर्ष सौ रूपए - उसका वेतन था। उस वर्ष मौल्या की मां के पास पहनने के लिए धोती भी नहीं थी, घर में हमेशा भूखा सोना पड़ता था। उसकी इस नौकरी से उसके पेट का बोझ घरवालों पर से हट गया था। एक पेट की चिंता मिट गई थी। और फिर सालाना सौ रूपए मिलने वाले थे। उन पैसों से परिवारवालों के लिए कपड़े खरीदे जाने वाले थे। इस तरह मौल्या परिवार का आधार बन गया था।’ (पृ.-36)
अक्सर कहा जाता है कि दलितों के लिए स्कूलों में इतनी सुविधा है, उनके लिए सरकार ने छात्रवृति के प्रबन्ध कर रखे हैं इसके बावजूद भी यदि वे नहीं पढते तो उनमें पढ़ने की ललक-इच्छा और प्रतिभा ही नहीं है, लेकिन वास्तविकता इससे अलग है। बच्चे मां-बाप पर बोझ नहीं, बल्कि उनके परिवार के लिए उनकी मेहनत की जरूरत है। शोषण आधारित समाज में उनका शोषण इतना अधिक है कि वे सिर्फ अपनी मेहनत से गुजारा नहीं कर सकते। दूसरी ओर शोषकों को इस स्थिति का दोगुना लाभ होता है उसे सस्ते दर पर श्रमिक मिल जाता है वह भी ऐसा कि किसी भी तरह के जुल्म-शोषण का विरोध करने की हालत में नहीं होता।
स्कूल कभी विठोवा अथवा कभी महादेव के मंदिर में लगा करता था। स्कूल के भीतर, मतलब मंदिर में ब्राह्मणों तथा वैश्यों के लड़के बैठते थे। पहली कतार में एक ओर लड़के, दूसरी ओर लड़कियां। उनके पीछे चमारों के लड़के और सबसे पीछे महार लोगों के, दरवाजे के निकट। मातंग जाति का अर्जु हमारे साथ नहीं बैठता था। हम महार जमात के थे, इसलिए प्रति शनिवार पूरे स्कूल की जमीन को गोबर से लीपने का काम हमें दिया जाता था। गोबर इकट्ठा करके पूरा स्कूल लीपने के बाद शिक्षक मेरी सराहना करते। घर पर मैं किसी भी प्रकार का काम नहीं करता था। पर स्कूल का यह काम मुझे चुपचाप करना पड़ता था।’ (पृ.-39)
असल में तो पूंजीवादी व्यवस्था के शोषण की मार दलितों से विकास के तमाम अवसर छीन लेती है और रही-सही कसर निकाल देती है सामाजिक स्थिति। दलित चूंकि समाज के सबसे निचले पायदान पर है इस कारण तमाम सामाजिक निर्मितियां भी उसके खिलाफ हैं और उसके शोषण की जमीन तैयार करती हैं। गांवों में स्कूलों के लिए कोई व्यवस्था तो थी नहीं। सुविधा के हिसाब से स्कूल की जगह बदल जाती है वह या तो मंदिर है, चौपाल या फिर किसी सवर्ण सरपंच का या अन्य किसी दबदबे वाले और अमीर का घर-कोठी। इन सबमें परम्परागत तौर पर दलितों का जाना मना है। इसलिए इसका खामियाजा भी दलित को ही चुकाना पड़ता है। वरन् तो तेली के लड़के महाद्या की क्या हिम्मत थी कि वह लिम्बाले को देखते ही पीटने लगे और उसके पढ़ाई का सामान (स्लेट-पुस्तकें) फेंक दे और शिक्षक भी द्रोणाचार्य की परम्परा निभाते हुए अपना वर्ण-धर्म निभाते हुए न्याय सुना देते हैं। इस दृष्टि से किए गए न्याय में लिम्बाले को ’सबसे दूर दरवाजे के पास’ ही बैठना पड़ेगा, क्योंकि समाजार्थिक दृष्टि से उसकी समाज में उसकी हैसियत के अनुसार शिक्षकों को इसमें कुछ भी अटपटा नहीं लगता।
सावन के माह के कारण स्कूल तेली की कोठी में लगता था। मैं पहली बार उस कोठी में गया था। लड़कों में जाकर बैठ गया। उस कोठी के मालिक के लड़के महाद्या ने मुझे देख लिया। वह भागता हुआ आया। मेरी स्लेट तथा पुस्तकें छीन लीं और पूरी शक्ति से वह मुझे पीटने लगा। आंखों के सामने तारे चमकने लगे। सारे बच्चे मेरी ओर देख रहे थे। शिक्षक आए। उन्होंने उन सबसे दूर दरवाजे के पास बैठने के लिए मुझसे कहा। मैं उस स्थान पर अकेला बैठ गया। भीतर-ही-भीतर घुटते हुए, ध्रुव की तरह स्थिर।’(पृ.- 40)
जाति-प्रथा जन्य अस्पृश्यता ने दलित समाज को अलगाव की स्थिति में डाल दिया है। अस्पृश्यता का सहारा लेकर दलित समाज को नियंत्रित भी किया जाता है, अपमानित भी किया जाता है और वंचित व उत्पीड़ित भी किया जाता रहा है। वह ब्राह्मणवादी संस्कार की अन्यायपूर्ण दृष्टि का ही परिणाम है कि आधुनिक समाज की संरचनाओं स्कूल आदि में भी दलितों को पीछे रखा जाता है। समाज के उर्धोन्मुखी विकास क्रम में और समस्तर (होरीजंटल) में भी वह सबसे निचली सतह पर आता है। शोषक व्यवस्था के लिए यह स्तर निहायत जरूरी है और यह तभी कायम रह सकता है जबकि यह वर्ग भी अपनी इस स्थिति को दिल-दिमाग से स्वीकार कर ले। बराबरी की आकांक्षा ही उसमें जन्म न ले इसलिए उसको ऐसे शाक-ट्रीटमेंट देना शोषक वर्ग अपने अस्तित्व के लिए जरूरी समझता है। स्कूल में शिक्षकों व सवर्ण छात्रों द्वारा किया गया अमानवीय व क्रूर व्यवहार इसी मानसिकता का परिचायक है और इसी योजना का उद्घाटन है। गैर बराबरी को स्वीकार करने का संस्कार इतने गहरे तक बैठा दिया गया है कि दलित बालक सवर्णों की चप्पल तक छूने से भी घबराता है।
जब स्कूल मारवाड़ी की कोठी में लगता तो मैं बैठक के नीचे बैठता। लड़के-लड़कियां ऊपर बैठते। शिक्षक और ऊंची जगह पर बैठकर सवर्णों के लड़कों को गणित समझाते। हम नीचे जूतों की तरफ बैठे रहते। सभी ओर चप्पल और जूते। रत्ना नामक लड़की की चप्पल बड़ी खूबसूरत लगती। शिक्षक की चप्पलों को मैं छूता तक नहीं था। सोचता, चप्पलों को छूत लग जाएगी। गुरुजी की चप्पल मुझे राम की पादुकाओं की तरह लगती।’ (पृ.-40)
समाज में जाति के आधार पर जो स्पष्ट विभाजन है, वह स्कूल में भी साफ नजर आता है। दलित विद्यार्थियों के लिए बैठने का अलग स्थान तो सवर्ण के लिए अलग स्थान। समाज में दर्जा निम्न तो स्कूल में भी बैठने का स्थान निम्न। खेल भी अलग-अलग। स्कूल एक तरह की सामाजिक ईकाई, जो बृहतर समाज का प्रतिरूप। वही छुआछात का भेद-व्यवहार, वही ऊंच-नीच।
बनियों और ब्राह्मणों के लड़के कबड्डी खेल रहे थे। हम अछूत बच्चे उनसे अलग-थलग ही बैठे थे। माल्या, मारत्या, उंब-या, परश्या, चंदया आदि छूना-पानी खेल शुरू कर चुके थे। दलितों का खेल अलग, सवर्णों का खेल अलग। दो-दो खेल दो-दो आंधियों की तरह । थोड़ी देर बाद खाना शुरू हुआ।’(पृ.-36)
देश के चिन्तकों ने सोचा था कि ज्यों-ज्यों शिक्षा का प्रसार होगा, उससे वैज्ञानिक चेतना पनपेगी वह अपने आप ही जाति के, अस्पृश्यता के भेद को मिटा देगी। यही सोचकर उन्होंने जाति-प्रथा जैसी अमानवीय प्रथाओं के खिलाफ कोई विशेष अभियान नहीं चलाया और केवल राजनीतिक आजादी व लोकतंत्र अपनाने को ही पर्याप्त मान लिया। जिन शिक्षण-संस्थाओं ने इस सामाजिक विषमता को समाप्त करना था और बराबरी का अहसास पैदा करना था वहीं पर इस गैर-बराबरी और विषमता को फलने-फूलने का मौका मिला। वहां भी समाज का ढांचा यूं-का-यूं ही मौजूद रहा। दलितों की दुनिया अलग ही बनी रही। कोई ऐसा अवसर ही नहीं बन पाया कि दलित और सवर्ण मिलकर कोई ऐसा कार्य करते जिससे कि बराबरी का एहसास ही होता। जाति की पहचान ही मुख्य बनी रही।
बनिए, ब्राह्मण, मारवाड़ी-मुसलमान, सुनार, ठाकुर, जाट आदि जमात के सौ लड़के, शिक्षक और लड़कियां बरगद के विशाल पेड़ के नीचे खाने के लिए बैठ गए - गोलाकार में। और हम अछूत बच्चे एक अलग पेड़ के नीचे। श्लोक के साथ उन्होंने खाना शुरू किया। हम उस श्लोक का अर्थ भी नहीं जानते थे।
मारुति के पास रोटी बांध्ने के लिए कपड़ा नहीं था, इस कारण मेरे ही कपड़े में उसकी रोटी बंधी थी। उंब-या सूखी मछली ले आया था। मल्ल्या की रोटी पर केवल चटनी थी। हम सबने रोटियां निकालीं। लड़के-लड़कियां शिक्षकों को सब्जी-रोटी दे रहे थे। उनके पास तली हुई अच्छी चीजें थीं।’ (पृ.-36)
समाज का दो वर्गों में स्पष्ट विभाजन है। एक के पास खाने के लिए रूखा-सूखा एवं अपर्याप्त है तो दूसरे के पास अच्छे पकवान हैं। एक के पास अपना पेट भरने के लिए रोटी बांधने के लिए कोई कपड़े का टुकड़ा भी नहीं है। अभावग्रस्त समाज और दूसरी तरफ विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग। एक को परम्परागत रूप से समस्त अधिकार प्राप्त तो दूसरे को परम्परागत रूप से मानव की पहचान भी नहीं। वंचित वर्ग को सब कुछ बचा-खुचा मिलता। वह हमेशा बचे-खुचे पर गुजारा करता। चाहे फिर पेड़ की छाया ही क्यों न हो। दलित वर्ग को वह भी उसकी सामाजिक हैसियत के अनुसार ही मिलती।
हमारा पेड़ भी छितराया हुआ था, हमारी ही तरह। हवा का झोंका आता कि धूप लगती। गरम हवा का अहसास होता। छितराई छांव में हम बैठे थे। उंब-या ने मुझे सूखी मछली की सब्जी दी। मैंने अपनी सब्जी उसे दी। इच्छा हुई कि अपनी सब्जी-रोटी शिक्षकों को दे आऊं। पर क्या मेरी रोटी शिक्षक खायेंगें? गांव के अन्य बच्चों की रोटियां ताजा थीं। मसालेदार सब्जियां थीं फिर तली हुई अन्य चीजें भी थीं। उनकी माताओं ने बड़े प्यार से उन्हें चीजें बनाकर दी थीं। दलितों के पास अलबत्ता बासी रोटियों के टुकड़े थे। वे भी इतने कि हमारे लिए ही पर्याप्त न हों।
पेट तो शमशान-भूमि की तरह है, कितने भी मुरदे जलाते रहो, उसे और मुरदे चाहिए। मां चिढ़कर कहती थीं, तेरा पेट है कि कुंआ! टोकरी क्यों नहीं बांध लेता मुंह पर?’
अधपेट ही उठ जाता था मैं यह सब सुनते सुनते। खानेवाला मैं अकेला थोड़े ही था! अकेला मैं पेट-भर खा लेता तो बाकी क्या खाएंगें? पर आज तो घर पर जो भी था, मैं बांध ले लाया था। गांव की लड़कियों ने हमें भी सब्जी-रोटी दी, पर ऊपर से। यह सोचकर कि हमारी रोटियों तथा मिर्च को उन्होंने देखा होगा, मुझे अपनी स्थिति पर शर्म भी आई। मैं चुपचाप खाने लगा। गांव के बच्चे तथा शिक्षक खा रहे थे। उनके निकट ही लड़कियां बैठी हुई थीं। उनमें गपशप चल रही थी। हम अछूत एकदम खामोश थे। सामने मरी मछली के टुकड़े थे। बहुत सहज और मुक्त होकर रहनेवाली उन लड़कियों के होंठ मैं मन ही मन चबा रहा था।’ (पृ.-37)
अभावग्रस्त जीवन एक हीनग्रंथि पैदा करती है, जो कभी संकोची तो कभी अन्तर्मुखी बना देती है। यह स्थिति बराबरी का अहसास ही पैदा नहीं होने देती। सारे संबंध एक तरफा बन जाते हैं। एक तरफ एक वर्ग हमेशा देने की मुद्रा में रहता है। वह हमेशा दया की भीख बांटता है तो एक हमेशा याचक की मुद्रा में रहता है। याचक की यह मुद्रा उसके विकास के सारे अवसर छीनकर आत्मकेद्रिंत कर देती है। वह सिर्फ मूक दर्शक बनकर रह जाता है, न कि सारी स्थितियों का भागीदार। वे किसी भी सामूहिक आयोजन से बाहर कर दिए जाते हैं और यह बात किसी को भी अजीब नहीं लगती। स्कूल के बच्चों का वन भोजन में भी वे अकेले ही रह जाते हैं। उनका अन्य बच्चों से संपर्क है तो केवल उस समय जब वे अपनी दया दर्शाते हुए उनको खाने के लिए कुछ देते हैं तो फिर जूठन को निबटाने वाले के रूप में। पेट भरने के लिए दलित वर्ग पूरी तरह सवर्णों पर निर्भर है। पेट की भूख मिटाने के लिए वे सवर्णों की जूठन खाने पर मजबूर हैं। भूख ने उनके मान-सम्मान की परिभाषा से जूठन खाने को निकाल ही दिया है। वे जूठन को इस तरह चटखारे लेकर लेकर खाते हैं कि जैसे उनको मोहन भोग मिल गया हो। जिस तरह दलित बच्चे इस जूठन पर टूटते हैं। वह स्थिति की सारी व्याख्या स्वयं कर देती है और जब लेखक की मां इस बात को सुनकर उस जूठन से कुछ घर के लिए बचा कर लाने की कहते हैं तो स्थिति की भयावहता और विडम्बना सामने आ जाती है।
खाना खत्म हुआ। सवर्णों की रोटियां और सब्जियां बच गई थीं। शिक्षकों ने बची हुई सारी जूठन इकट्ठी करके हमें देने के लिए कहा। मैं, मारुति, उंब-या व परेश्या बचे-खुचे अन्न की उस जूठन को लेकर अपने स्थान पर आने लगे। लड़के-लड़कियां मजा लेते हुए आगे निकल गए। पर हम सबके प्राण तो उस जूठन में अटक गए थे। मारुति उस जूठन को लेकर आगे बढ़ने लगा और हम चीलों की तरह उसके पीछे पीछे चलने लगे।
हम सब निंगप्पा के खेत में रुक गए। जूठन बंधे कागज खोलकर हमने उत्सुकता से देखा। उसमें गेहूं की नमकीन रोटियों, पराठों, लड्डूओं, गुझियों, चपातियों आदि के छोटे-बड़े टुकड़े थे। बेहतरीन गंध आ रही थी। हम सब गोलाकार में बैठ गए और जूठन पर टूट पड़े। कई दिनों बाद ऐसी चीजें मिली थीं। सभी भूखे थे। भिखारी की झोली की तरह हमारे पेट की स्थिति हो गई थी।
घर आने के बाद मैने मां से यह सब कहा। मां भूख-पीड़ितों की तरह कहने लगी, घर के लोगों के लिए उसमें से थोड़ा ले आता तो क्या बिगड़ता? बचा हुआ अन्न अमृत होता है।’ (पृ.-37-38)
बचे हुए अन्न को अमृत कहना भूखे आदमी की मजबूरी है। यहीं से दो वर्गों की संस्कृति के अन्तर समझ आने लगते हैं। जिस समाज के पास अभाव हैं वह उसी के अनुसार गुजारा करने की संस्कृति विकसित कर लेता है। और चाहे कुछ भी हो इस में शासक वर्ग की विचारधारा का प्रभुत्व शामिल होता है और उसके हित व स्वार्थ सुरक्षित होते हैं। शासक वर्ग उसी मूल्य को स्वीकृति देता है जिससे उसके हितों को कोई नुक्सान न पहुंचे। अब जूठन को अमृत मानने में शोषक वर्ग को क्या नुक्सान हो सकता है? उसको तकलीफ तो तब होती यदि वह अपना हिस्सा मांगता। जूठन देने में उसको कोई ऐतराज नहीं हैं। इससे तो उसके वर्चस्व को ही स्वीकृति मिलती है और भूखे को खिलाने का पुण्य भी वह प्राप्त करता है। शायद इसीलिए साधन संपन्न लोग अवश्य ही अपनी थाली में कुछ न कुछ जूठन छोड़ देते होंगें।
दलितों को सब कुछ जूठन के तौर पर ही मिलता है। तमाम प्राकृतिक व मानवीय उपलब्धियों पर शोषक वर्ग का ही प्रथम अधिकार है। पहला हक उसी का है। यह समाज में स्तर भेद बनाए रखती है और इससे शोषण की व्यवस्था को जारी रखना सरल हो जाता है। गांव की दिशा, नदी का घाट तक इस व्यवस्था को बनाए रखने के लिए बांट लिए गए। यह केवल अलग-अलग घाट बनाने का व पवित्रता-अपवित्रता का ही मामला नहीं है, बल्कि यह सर्वोच्चता का भी मामला है। आखिर सभी वस्तुओं के पहले भोक्ता सवर्ण ही क्यों हैं? इसलिए कि इससे उनकी सर्वोच्चता की दावेदारी कायम रहती है।
स्कूल छूटने पर हम लोग नदी के किनारे खाना खाने जाते। रेत में बैठकर खाते। नदी में तैरते। नदी के निचले घाट पर सवर्ण पानी भरते। उनकी औरतें कपड़े धोतीं। नदी के निचले घाट पर धनगर व कुनबी पानी भरते, नहाते, कपड़े धोते, अपने जानवरों को नहलाते। उसके और निचले घाट से हम लोगों को पानी लेना पड़ता, नहाना तथा कपड़े धोने पड़ते। ऊपर के दोनों का गंदा पानी हमारे हिस्से में आता। हम उनके घाट पर जा नहीं सकते थे।
एक दिन मैं नदी के बीच, पानी में खड़े होकर पानी पी रहा था। किसी मां ने अपने छोटे बच्चे का मैले से भरा कपड़ा शायद धोया था। उसी मैले का सैलाब मेरे नजदीक आ रहा था। उबकियां आईं, पर कहूं किससे? और फिर जल से अधिक पवित्र कौन-सी वस्तु है? सवर्णों के घाट से आए गंदे पानी को हम लोग पचा रहे थे।’(पृ.-42)
दलितों की मेहनत से ही सवर्णों का अधिकांश कारोबार चलता है। उनके खेतों में अनाज उपजाते हैं। उनके लिए अन्य सुविधाएं व भोग का सामान तैयार करते हैं, तब उनसे कोई घृणा व अपवित्रता नहीं होती। लेकिन जब कोई सामान तैयार हो जाता है तो वह दलितों के प्रयोग करने से अपवित्र होने लगता है। सारे मंदिरों में मूर्तियां बनाने का काम अधिकांश दलित ही करते है, लेकिन एक बार वह मंदिर में स्थापित हो जाने के बाद दलितों के छूने भर से ही अपवित्र होने लगती है। नारायण पटेल का कुंआ दलित खोदतें हैं वहां वे ही पानी निकालते हैं, लेकिन एक बार कुंआ बनकर तैयार हो जाता है तो फिर दलितों के छूने से उसका पानी अपवित्र हो जाता है।
नारायण पटेल का कुंआ। पिछले वर्ष दलितों ने इसे बनाया है। घोडुप्पा, दत्तू, देवप्या, सिद्धया, त्रिमुक, कवष्णु, मसा, मनू, मल्या, शिवलिंग, नामदेव आदि ने इस कुंए का काम ठेके पर लिया था। यहां दलितों ने पसीना बहाया था। यहीं पर उन्होंने बारूद बिछाई थी। इस धरती को फोड़कर उन्होंने पानी निकाला। पर आज यह कुंआ दलितों के लिए खुला नहीं है। उसका पानी वे नहीं पी सकते।’ .... मैं माणक्या, तुलश्या कुंए के किनारे खड़े थे। पानी में हमारी छाया तैर रही थी। हम बेर खाने आए थे। प्यास लगी। मैं ऊपर खड़ा रहा। माणक्या व तुलश्या भीतर जाकर पहरा दे रहे थे कि कोई हमें देख तो नहीं रहा है। भयभीत होकर या चोरी से ही हमें अपनी प्यास बुझानी पड़ती थी। इस पानी पर भी बिरादरी का हक था। मेरी अंजुली के स्पर्श से पानी में अनेक लहरें उठीं। धरती के पेट में शायद खलबली मच गई। इस कुंए से अपनी प्यास बुझाते हुए हमें किसी ने देखा नहीं, यह हमारा भाग्य। अगर देख लेते तो बेतहाशा पीटे जाते। ऐसा क्या है हमारे स्पर्श में? हमारे स्पर्श से पानी अपवित्र हो जाता है, अन्न अपवित्र हो जाता है, कपड़े अपवित्र हो जाते हैं, पनघट अपवित्र हो जाता है, श्मशान भूमि अपवित्र हो जाती है, होटल-ढाबा अपवित्र हो जाता है। ईश्वर, धर्म और मनुष्य भी अपवित्र हो जाता है।’ (पृ.-131)
’पवित्रता’ की यह व्यवस्था ब्राह्मणवादी व्यवस्था की जीवन-रेखा है और ऐसे क्रम में है कि हर स्तर पर अपनी उपस्थिति का अहसास करवाती है। न केवल यह सवर्णों और दलितों के बीच विभाजक रेखा खींचती है, बल्कि यह दलितों के बीच भी विभिन्न स्तर बनाकर रखती है। ब्राह्मणवादी व्यवस्था में जाति के ऊपर जाति खड़ी है। ऊपरवाली जाति अपने से नीचे की जाति से अपने से कमतर समझती है, घृणा करती है। इसी व्यवस्था के कारण तो समाज में दलित जातियों की एक वर्ग के रूप में पहचान नहीं बन पाती और ब्राह्मणवाद का शोषण जारी रहता है। समाज के सभी स्तरों पर इस विचारधारा को स्वीकृति मिल जाती है। स्वाभाविक है कि इसमें सबसे ज्यादा वही वर्ग पिसता है, जो कि समाज के सबसे निचले स्तर पर आता है। इस आत्मकथा के लेखक लिम्बाले व उनका दोस्त भीमू , जो कि एक अन्य दलित जाति से संबंधित है, जिसको कि लेखक की जाति अपने से निम्न मानती है, साथ-साथ खेलते हैं, पानी पीते हैं, एक घाट पर जाते हैं। तो उनके दोनों के परिवारों द्वारा इसका ऐतराज किया जाता है। न केवल मौखिक आपत्ति की जाती है, बल्कि जाति की दीवार को बनाए रखने वाले नियमों को तोड़ने पर दण्ड दिया जाता है।
गरमी के दिन थे। मैं तथा मातंग समाज का भीमू - हम दोनों इन दिनों रोज खेलते। उसकी मां हम दोनों पर स्नेह जतलातीं। खेलते हुए एक बार प्यास लगी। इस कारण हम दोनों घर आए। मैं पहले पानी पी गया। भीमू को पानी दे रहा था कि संतामाय चिल्ला उठीं, अरे मातंग को साथ लिये क्यों घूम रहा है? उसके साथ क्यों खेल रहा है? गांव जल गया क्या कि इसके साथ खेलने लगा? उसे लोटा मत दे। अपवित्र हो जाएगा।’ और भीमू को डांटते हुए कहने लगीं, चल ,यहां से निकल।’ (पृ.- 58)
भीमू को पानी पीने से मना करने के कारण मुझे काफी बुरा लगा। बिरादरी दोस्ती से भी बड़ी होती है क्या? प्यास से भी बिरादरी बड़ी होती है क्या? भीमू आदमी नहीं है क्या? फिर उसके स्पर्श से पानी अपवित्र कैसे हो जाएगा?
भीमू और मैं नदी पर चले गए। पैर जल रहे थे। नदी पर भी महारों का अलग घाट था और मातंगों का अलग। अब हम किस घाट का पानी पिएं? यहां पानी ही पानी का वैरी बन चुका है। हमारा मन अब दो घाटों में बंट चुका था।
मैं और भीमू मातंगों के घाट पर जाकर पानी पीने लगे। घर जाने के बाद संतामाय ने मुझे इसलिए पीटा कि मैंने मातंगों के घाट पा का पानी पिया था। उन्होंने मुझसे कहा, आगे कभी मातंग लड़के के साथ खेलेगा तो याद रख, रोटी बंद कर दूंगी। फिर जा मातंगों की बस्ती में। मातंगों की संगत क्यों पकड़ रहे हो? आजकल क्या बुरे दिन आए हैं तुझे? राजा का बेटा है तू, राजा की शान से जी। पटेल का है रे तू!
संतामाय अनाप-शनाप बक रही थीं। और उधर अनसा मां ने भी भीमू को पीटा था। मुझे साथ में लेकर उसने मातंगों का घाट अपवित्र किया था इसलिए।’ (पृ.-59)
शरण कुमार लिम्बाले ने ठीक ही पहचाना है कि दलितों का शोषण उनकी साधनहीनता के कारण है। वे अपने अस्तित्व के लिए पूरी तरह सवर्णों पर निर्भर हैं। ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने उनको सम्पति के अधिकार से वंचित करके सिर्फ ’सेवा’ का अधिकार दिया। यदि साफ-साफ शब्दों में कहा जाए तो यह था अपने शोषण को वैध्, उचित, धार्मिक व ईश्वरीय मानने को राजी होना। अन्य सभी प्रकार के रोजगार से उसको वंचित कर दिया गया। यही उसके दयनीय जीवन का रहस्य है। अपने पेट की भूख मिटाने के लिए उसको तरह तरह के शोषण-उत्पीड़न सहन करना पड़ा है। औरतों की इज्जत के साथ खिलवाड़ हुआ है तो भूख मिटाने के लिए और उसको सहन किया गया है तो पेट की भूख मिटाने के लिए। यदि उत्पादन के साधनों में उसकी हिस्सेदारी होती तो शायद उसकी इतनी दुर्गति न होती। परनिर्भरता ही उसके सारे दुखों की जड़ है।
जिनके पास वर्णश्रेष्ठत्व से प्राप्त सत्ता तथा वंश-परम्परा से प्राप्त संपति रही है उन्होंने यहां की दलित स्त्रियों को सतत भोगा है। देहात-देहात के जमींदारों, पटेलों ने खेतों में काम करनेवाली दलित स्त्रियों के साथ ऐसा ही व्यवहार किया है। रंडियों की तरह उन्होंने इनका उपभोग किया है। दलितों की लड़कियां इनकी वासना का शिकार होती हैं। इनके द्वारा किए गए स्वैराचार से संतति जन्म लेती रहती है। जमींदार के इशारे पर जीनेवाला घर हर गांव में होता है। पूरा गांव इस घर को पटेल की रंडी का घर’ कहता रहता है। इस स्त्री की संतति की पहचान पटेल की रंडी के बच्चों के रूप में ही बनती है। पटेल की दया पर, खुश होकर ही जीने में उनके जीवन की सार्थकता होती है। यों बदले में उन्हें मिलता ही क्या है?’ (पृ.-80)
भूख मिटाने के लिए दलितों को समस्त शोषण सहन करना पड़ता है। ऐसी अमानवीय स्थितियों से गुजरना पड़ता है कि सुनने वाले के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। शरण कुमार लिम्बाले ने भूख के इर्द-गिर्द ही दलित समस्या को देखा है। कई अनुभव ऐसे बताते है कि दलित जीवन की त्रासदी उद्घाटित होती है। एक बार किसी का आटा रास्ते में गिर गया । ऊपर से तो वह उठाकर ले गए लेकिन जो नीचे बच गया, जिसमें मिट्टी भी मिल गई थी। उसे लिम्बाले घर लेकर गए तो इस काम के लिए उसकी सराहना की गई। यदि खाने के लिए उनके पास पर्याप्त मात्र में अनाज हो तो वे किसी भी कीमत पर इस काम के लिए उसकी सराहना न करते। अपनी भूख मिटाने के लिए शरण की बहन जब केले के छिलके खाती है तो वह उसे पीटता है। वह छिलके खाने को बुरा समझता है, विडम्बना देखो कि वह स्वयं कुछ समय बाद छिलके धोकर खाने लगता है। पेट भरने के लिए छिलके खाना दलित जीवन की त्रासदी है। और पेट की भूख मिटाने के लिए ही वे मरे हुए जानवरों का मांस खाते हैं। मरे जानवरों का मांस खाना दलितों की मजबूरी है न कि उनका शौक। और ब्राह्मणवादी विचारधारा इसी कारण उनसे घृणा करती है। इसी को आधार बनाकर उनको ’गंदा’, ’अपवित्र’ साबित करती है।
पेट की आग बुझाने के लिए हम लोग नदी-नालों के किनारे घूमते। केकड़े पकड़ते। मधुमक्खियों के छते निकालते। बगुलों को पकड़ते। खरगोशों का शिकार करते। गोह निकालते। गिलोल से चीलों को गिराते। गिलहरियां भूनकर खाते। बीरदेव के बाग में जाकर खेलते। मूंगफलियों की चोरी करते। चोरी की हुई मूंगफलियां बेचते। बालाण्या के कुंए में तैरते। मशा, मैं, परश्या इन कामों लग जाते। मजा आता। जंगली खजूर का जवान पेड़ काटते, पेट के लिए। किसानों से डरते भी थे। ... पुजारी के खेत के निकट जामुन का पेड़ है। उसके नीचे आकर हम पेड़ को चीरते। उसके भीतर का हिस्सा नारियल की तरह सपेफद होता है। खाने के लिए बेहतरीन। खूब खाते। इसी जामून के पेड़ के नीचे सूअरों को भी भूनकर खाते।’ (पृ.-112)
पेट की भूख मिटाने के लिए पेड़ों की छाल खाना उनके स्वाद के कारण नहीं है, बल्कि इस शोषणकारी व्यवस्था ने उनके लिए ऐसे हालात पैदा कर दिए हैं कि अपनी पूरी मेहनत के बाद वे अपना पेट भी भर नहीं पाते उनकी सारी मेहनत की कमाई को शोषक वर्ग शोषित कर लेता है। इससे खराब बात क्या होगी कि सारा दिन काम करने के बाद भी व्यक्ति को अपना पेट भरने के लिए जानवरों के गोबर से दाने निकाल कर खाने पड़ें। यह छुपा हुआ नहीं है कि उत्तरप्रदेश में दलितों को उनकी मेहनत के लिए ’गोबरहा’ दिया जाता रहा है। गोबरहा का अर्थ है कि अनाज निकालते हुए जानवर कुछ ज्यादा खा जाते थे। जिसकारण उनको पूरा तो पचता नहीं था, इसलिए कुछ दाने साबुत दाने उनके गोबर में निकल आते थे। गोबर को धोकर निकाले गए दानों को ही गोबरहा कहा जाता था। लिम्बाले की नानी संतामाय गोबर इकट्ठा करके उसके उपले बनाकर बेचती है उससे अपना गुजारा करती है, लेकिन वह उस गोबर को अलग रख लेती, जिसमें कि दाने नजर आते। उसको धोकर व सुखाकर वह पीस लेती और भूख मिटाने के लिए उसकी रोटी बनाकर खाती। उस रोटी का स्वाद कैसा था? इस बारे में लिम्बाले ने अपना अनुभव बताया है कि
जब उसने संतामाय की अलग किस्म की रोटी देखी तो उसे खाने की जिद्द की। उसकी जिद्द उसे रोटी का एक टुकड़ा दे देती है। अरे, यह क्या? रोटी में तो गोबर की दुर्गंध थी! इतनी कि मानो मैं गोबर की ही रोटी चबा रहा था। मैं उसे सहजता से भीतर धकेल नहीं सका। बड़ी मुश्किल से उसे भीतर धकेल पाया और बचे टुकड़े को मैने लौटा दिया। ... आश्चर्य कि संतामाय उस रोटी को सहजता से खा रही थीं। मुझे आश्चर्य होता कि संतामाय को उबकाई क्यों नहीं आती? गोबर की दुर्गंध उन्हें क्यों नहीं महसूस होती? हाथ का निवाला मुंह में जाता, पेट में उतरता और लुप्त हो जाता।’ (पृ.-48)
लिम्बाले मूलभूत प्रश्न उठाते हैं कि जाति-बिरादरी जैसी संस्थाएं असल में दलितों का शोषण करने के लिए ही बनाई गई हैं। तमाम मानवीय और प्राकृतिक उपलब्धियों को कुछ लोग भोग सकें इसकी व्यवस्था करने के लिए ही ऐसे विचारों का ईजाद किया गया। जीने के सारे उपादान छीनकर दलितों को असहाय बना दिया और जब उसने अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए कुछ इन्तजाम किया तो उसे चोरी कहा गया उसके लिए दण्ड निर्धारित किए गए और उनको प्रताड़ित किया गया। मनुष्य जन्म से ही जाति-बिरादरी लेकर कैसे आता है? जन्म से वह शूद्र कैसे हो जाता है? जन्म से वह गुनहगार कैसे हो सकता है? कहते हैं कि ब्रह्मा ने अपने पैरों के भीतर से एक विराट् शूद्र समाज को जन्म दिया है। उस समाज ने शूद्रों का जीवन जीया है। भूख मिटाने के लिए किसी ने चोरी की, किसी ने जोगवा मांगा तो किसी ने मृत जानवरों को खींचा। हजारों वर्षों से जिनकी रोटी छीन ली गई है, वे अगर रोटी के लिए चोरी करते हों तो वह अपराध् कैसे हो सकता है? अगर वे तृप्त होते तो क्यों करते चोरियां? क्यों सहते क्रूर पुलिस के अत्याचार।’ (पृ.-134)
उस दिन से आदमी इस पेट की तृप्ति में लगा है। अब उसे इस पेट को भी भरना मुश्किल हो गया है। वह अब अधपेट रहने लगा है। भूख के कारण खुद को बेचने लगा है। भूख के कारण ही औरत वेश्या बनने लगी और पुरुष चोरी करने लगा है। भूख आदमी से सभी प्रकार के काम करवा लेती है। वह मैला निकालने और ढोने लगा है। अब उसे महसूस होने लगा कि ईश्वर ने पेट देकर गलती की है। मुझे भी हमेशा ऐसा ही लगता।’ (पृ.-44)
शिक्षा के प्रसार से तथा चेतना के विस्तार से दलितों में स्वाभिमान व आत्मसम्मान का भाव जग रहा है। वह एक तरफ तो अपने समाज में व्याप्त बुराइयों को छोड़ने के लिए संघर्ष कर रहा है, दूसरी ओर बराबरी के व्यवहार का दावा पेश कर रहा है।
धीरे-धीरे मुझे मृत जानवर से घृणा होने लगी। मृत जानवर का मांस खानेवालों पर भी गुस्सा आने लगा। मेरी आयु के सभी सहयोगियों में गुस्सा छूत के रोग की तरह फैलने लगा। चमड़ा उतारे हुए जानवर के मांस पर हम पेशाब करते। गोबर या मिट्टी फेंकते। पर गंगा मां ऐसे मांस को भी ले जातीं। धोतीं, पकातीं। हम साथियों को उन पर गुस्सा भी आता और बुरा भी लगता। मृत जानवर का मांस कोई खाए ही नहीं - ऐसा लगता।’ (पृ.-57)
लिम्बाले और उसका दोस्त चायवाले से बराबरी के व्यवहार के लिए उसकी पुलिस थाने में रिपोर्ट करते हैं, यद्यपि इस बारे में वे अधिक स्पष्ट नहीं थे। उनके अन्दर उठी यह इच्छा ही महत्वपूर्ण है। परन्तु पुरानी पीढी के लोग किसी प्रकार का विवाद नहीं करना चाहते। इस मामले में भी बस्ती के लोग और सवर्णों के एक जैसे विचार थे तो एक अन्य घटना में भी ऐसे ही प्रतिक्रिया करते हैं, लेकिन यह कहना तो कतई उचित नहीं होगा कि पिछली पीढी के लोग बराबरी का व्यवहार नहीं चाहते थे। वे बिल्कुल बराबरी का व्यवहार चाहते थे, लेकिन वे इसके लिए इतनी हिम्मत नहीं कर पाते थे। उनको स्थितियां भी इतनी इजाजत नहीं देती थी, जितनी कि नई पीढी को। जब चंदया का पिता उसको मंदिर में जाने पर पीटता है जो उसका यह अर्थ नहीं है कि उसकी मंदिर में जाने के अधिकार को प्राप्त नहीं करना चाहता। उसकी पीड़ा इस बात में झलकती है जब वह कहता है कि उसे गांव में रहना है। उसको डर है कि यदि उसने गांव की मर्यादा यानी कि सवर्णों के प्रभुत्व को चुनौती दी तो उसका गांव में जीना दूभर हो जाएगा।
श्रावण के महीने में ही विट्ठल तथा महादेव के मंदिर में रोज पोथी पढ़ी जाती थी। सारा गांव पोथी सुनने इकट्ठा होता। मेरे मन में क्या आएगा, पता नहीं चलता था। उस दिन मैं, मलक्या तथा चंदया नीचे विटठल मंदिर में घुस गए। हमने भगवान के पैर छुए। घर आए। चंदया का पिता मंदिर की सीढी के पास पोथी सुनता रहा था। उसे हमारा मंदिर-प्रवेश भाया नहीं। चंदया को उसने पीटा। हमारी ओर इशारा करके कहने लगा, इनके साथ खेल मत। मुझे इस गांव में रहना है। तुझे यह क्या सूझी है? मेरा मुंह काला करेगा क्या? आज तक मुझे किसी ने कुछ नहीं कहा है। पैर काटूंगा तेरे,’ चंदया का बाप चिल्ला रहा था। मतलब हमारा मंदिर-प्रवेश अपराध् था। हमें अपनी मरजाद से जीना चाहिए। यहां अछूतों का मंदिर में प्रवेश वर्जित है।
ईश्वर मनुष्य-मनुष्य में भेद करता है। एक को अमीर, दूसरे को गरीब। एक सवर्ण, दूसरे को अछूत। मनुष्य-मनुष्य में द्वेष फैलानेवाला यह कैसा ईश्वर है? सभी ईश्वर के पुत्र हैं ना? फिर हम अस्पृश्य कैसे ? हमें गांव के बाहर खदेड़नेवाला ईश्वर, धर्म या देश हमें मान्य नहीं है।
क्यों रखा गया हमें गांव के बाहर? क्यों रखा गया हमें मनुष्यों से दूर? क्यों रखा गया हमें हमारे ही लोगों से बाहर? मनुष्य मनुष्य में अन्तर क्यों? सभी का खून लाल है ना!’ (पृ.- 107-108)
लिम्बाले का यह प्रश्न उचित ही है कि जब सब इन्सान एक ही ईश्वर की संतान हैं और सबका खून एक जैसा है तो फिर यह भेदभाव क्यों है? वे ऐसे किसी विचार व सत्ता को नहीं मानने वाले जो उनकी मानवीय गरिमा को, उनके सामाजिक सम्मान को और उनके साथ भेदभाव को मान्यता देता हो। अस्पृश्यता ने दलितों के प्रति भेदभाव व अपमान की स्थितियां पैदा की हैं। वह किसी भी समय अपने को इन्सान के रूप में नहीं देख पाता। वह हमेशा अछूत ही बना रहता है। यदि उसे किसी से सहायता की जरूरत हो तो उसे वह सहायता नहीं मिलेगी और यदि वह किसी की सहायता कर दे तो उसको इस बात की सजा मिलेगी। उसका सार्वजनिक जीवन से स्थायी तौर पर बहिष्कार है। उसे किसी कार्य में शामिल ही नहीं किया जाता। इस लेखक अनुभव इस बात को स्पष्ट करता है। अपने दोस्तों के साथ लेखक गांव जाता है तो वह अपने दोस्तों से नाराज होकर अलग हो जाता है और तभी की एक घटना दलितों के प्रति घोर अपमान को प्रदर्शित करने वाली अस्पृश्यता के व्यवहार से होता है।
शिवाप्पा खेत में काम कर रहा था। उसकी पत्नी रोटी लेकर आई थी। उसके सिर पर रोटी की टोकरी थी, बगल में बच्चा था। सिर पर रखी टोकरी उतारने में सहायता के लिए उसने मेरी ओर देखा। दूसरों की सहायता करना मेरा फर्ज था। मैने सहायता की। यह देखकर वह कोसने लगा। शिवप्पा की पत्नी मेरा पक्ष लेने लगी। मैने उसकी सहायता की थी। शिवप्पा और चिढ़ गया, अछूत है यह, अछूत। अछूत संता का पोता!’
शिवप्पा की पत्नी को इसका पता नहीं था। सुनकर उसका चेहरा फीका पड़ गया। वह रुआंसी-सी हो गई। आंखों में पानी आ गया। मेरे स्पर्श से रोटियां अपवित्र हो गई थीं, वह अपवित्र हो गई थी, उसका बच्चा भी अपवित्र हो गया था। मुझे गालियां देने लगी। शिवप्पा और अधिक बिगड़ गया। पैर का जूता निकालकर उसने मेरी ओर फेंका। मैं गांव की दिशा में भाग निकला।’ (पृ.-132)
सिर्फ गांव का जमींदार ही दलितों के प्रति अवमानना का व्यवहार नहीं करते, बल्कि इसके अलावा जो अन्य सहायक पेशा करने वाली जातियां हैं जैसे लोहार, बढई व नाई आदि भी उससे इसी तरह पेश आते हैं। वे भी दलितों के प्रति उसी तरह का रवैया रखते हैं, जिस तरह का जमींदार रखते हैं। लेखक जब स्कूल-कालेज में जाने लगता है तो उसकी इच्छा भी सवर्णों की तरह अच्छे ढंग के बाल कटवाने की होती है। लेकिन नाई उसके बाल काटने से इन्कार कर देता है।
नाई ने मुझे देखा। मेरे सिर की ओर देखा, तू यहां क्यों खड़ा है? मैं तेरे बाल नहीं काटूगां।’
मैं हिम्मत से बोला, मेरे पास पैसे हैं।’
उस समय दूसरे गांव का एक आदमी अपने बाल कटवा रहा था।
उसे मुझ पर दया आई। उसने कहा, बैठो’, तो वह नाई भड़क गया। कहने लगा, अरे, यह तो महार है, इसे जाने दो।’
गांव के भैसों के भी बाल साफ करने वाले उस नाई के लिए पता नहीं मैं क्यों अपवित्र था?’ (पृ.-62)
सवाल उठता है कि जब दलित पैसे देने के लिए तैयार है तब भी नाई उसके बाल क्यों नहीं काटता? क्या इसके पीछे मात्र पवित्रता-अपवित्रता की धारणा ही काम करती है? ऐसी बात नहीं है कि नाई सिर्फ अपवित्र होने से बचने के लिए ही उसके बाल नहीं काटता? सिर्फ अपवित्रता के कारण तो कोई सवर्ण भी अपना आर्थिक अहित नहीं करता। जमींदार को सहायता करने वाले तो फिर ऐसा क्यों करने लगे। इस व्यवहार का रहस्य है कि गांव की व्यवस्था जमींदार-सवर्ण द्वारा चालित है वहां वही कायदे चलते हैं जिनको कि वह मान्यता प्रदान करता है। सवर्ण को अपनी सेवाएं देने वाला नाई या लुहार यदि दलित को भी सेवाएं प्रदान करेगा तो इससे उसकी सर्वोच्चता को ठेस लगती है और इसे वह किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता। इसलिए वह इस बात को सहन नहीं कर सकता कि सहायक कारीगर किसी ऐसे कार्य को करें जिससे कि उनकी शान में फर्क पड़ता हो। वह पूरी तरह से सवर्ण पर निर्भर है। यदि वह उसकी इस बात को नजरंदाज करता है तो वह भी रोजगार व अन्य जरूरी चीजों से वंचित हो जाएगा। अपने वजूद को सुरक्षित रखने के लिए वह दलित के प्रति उसी तरह की उपेक्षा करता है, जिस तरह की सवर्ण करता है। एक तो इसमें जाति-प्रथा की प्रकृति है जिसमें ऊंची माने जाने वाली जाति अपने से नीचे मानी जाने वाली जाति के प्रति वैसा ही व्यवहार करती हैं जैसा कि ऊंची जाति उसके प्रति करती है। वह इस बात को अच्छी तरह पहचानता है कि व्यवस्था का संचालन उसके पास नहीं है। उसे तो सामाजिक नियमों का पालन करना है और इन नियमों को बनाता है सवर्ण वर्चस्वी वर्ग। जब चायवाला लिम्बाले व उसको दोस्त को दूसरे कपों में चाय देता है और उसके प्रति भेदभाव करने की रिपोर्ट लिखवाने के लिए वे थाने में जाते हैं तो जो चायवाला उनको ढाबे में अलग बर्तनों में चाय देता है वह उनको अपने घर आने पर अपने बर्तनों में चाय पिलाने की बात कहता है। उसका यह कहना मात्र डर के कारण नहीं कि उस पर कानूनी कार्रवाही हो सकती है, बल्कि इसके पीछे उसके धंधे की मजबूरी भी है, उसे पता है कि यदि वह दलितों को उसी बर्तन में परोसेगा, जिसमें कि सवर्णों को परोसता है तो उसकी दुकान से कोई सवर्ण चाय नहीं पियेगा। इसलिए वह यदि स्वयं छुआछात को, ऊंच-नीच को न भी मानता हो भी उसे ऐसा व्यवहार करना ही पड़ता है।
ऊपरी तौर पर देखने में ऐसा लग सकता है, सवर्ण उच्च जातियों की अपेक्षा पिछड़ी कही जाने वाली या जमींदारों की सहायक जातियां दलितों से अधिक क्रूरता से पेश आती हैं, लेकिन वास्तविकता कुछ और ही है। पिछड़ी कही जाने वाली जातियां भी असल में साधन-सम्पन्न सवर्णों पर ही निर्भर हैं। उनकी कृपापात्र और विश्वासपात्र बने रहने के लिए वे ऐसा व्यवहार करते हैं जिससे कि वे उनके सबसे बड़े भक्त नजर आयें। उनकी इच्छा का ख्याल रखने वाले और उनके आदेशों को मानने वाले दिखाई दें। इसी कारण वे सवर्णों के वफादार दिखने के लिए सवर्णों से भी अधिक ब्राह्मणवादी नजर आते हैं। लेकिन यह सच है कि दोनों ब्राह्मणवादी व्यवस्था के शोषित हैं और शिकार हैं। असल में यह उसी तरह का मामला है जैसा कि रामायण में शम्बूक की हत्या का। राजा राम के पास ब्राह्मण शिकायत लेकर जाते है कि एक शूद्र भक्ति-तपस्या कर रहा है और इस कारण एक ब्राह्मण बालक की मृत्यु हो गई है। अब राजा का कर्तव्य है कि वह व्यवस्था बनाए और शम्बूक को इसका दण्ड दे। इस बात को मानते हुए राजा राम शम्बूक की हत्या कर देते हैं। अब इसमें सबसे बड़ा दोषी किसे माना जाए - क्षत्रिय राम को या ब्राह्मण ऋषि को?
दलित औरतों का यौन-शोषण करना कोई भी जमींदार अपना अधिकार ही समझता है। इसकी जड़ में भी उसकी साधनहीनता ही मुख्य है। चूंकि जमीन ही समस्त जीवन का आधार रही है। अपना तथा अपने जानवरों के गुजारे के लिए खेत में जाना निहायत जरूरी था और खेत दलितों के पास थे नहीं। इसलिए वे खेत मालिक के शोषण का शिकार होती ही थी। लेखक संतामाय की बातें सुनकर भीतर ही भीतर कसमसाता।
अत्याचारों के कारणों का पता ही नहीं चलता।संतामाय की बातें बेचैन करतीं। लगता, यह एक ऐसी मार है, जिसके खिलाफ बोलना भी मना है। किसान हमें खेत की सीमा पर भी नहीं घुसने देते। बकरियां चराने हेतु जवान दलित औरतें जंगल में गईं कि किसान चिढ़ते। कहते, हमारे खेतों की ओर न जाओ। हमारे जानवरों को घास की जरूरत होती है। तुम चोर हो। तुम खेत पर मत आओ। तुम्हारी बकरियां हमारी फसलें नष्ट करती हैं।’ और किसान दलित स्त्रियों का अपमान करते। गंदी गालियां बकते। पीटते। कभी कभार किसी का आंचल खिसका देते और कभी किसी को खड़ी फसल में खींच ले जाते।’(पृ.-129)
लेखक स्वयं इस शोषण का उदाहरण है। जमींदार अपनी काम वासना पूरी करने के लिए उन पर आश्रित लोगों की विवशता का लाभ उठाते हैं। वे इस हद तक चले जाते हैं कि उनका जीवन ही बरबाद कर देते हैं। विट्ठल कांबले के दाम्पत्य जीवन को उजाड़कर खेत मालिक उसकी पत्नी को अपनी रखैल बना लेता है। और यह कोई अकेली घटना नहीं है, बल्कि इस आत्मकथा में ही इसके संकेत हैं कि प्रत्येक गांवों में ऐसी घटनाएं हैं। इन अवैध संबंधों के चलते यदि कोई बच्चा पैदा हो जाए तो ये जमींदार उसको अपनाने के लिए तैयार नहीं होते। इसकी बदनामी और बोझ ढोना पड़ता है गरीब और मजबूर औरत को।
विट्ठल कांबले एक खेत के मालिक के यहां साल-भर की शर्त पर मजदूर था। वार्षिक सात-आठ सौ का वेतन। रात-दिन मालिक के घर या खेत पर काम करता। खेत के अनेक जानवरों में एक और जानवर। अपने दुःखों और हड्डियों के ढांचे को देखते रहना, यही उसकी नियति थी। पेट और पीठ एक हो जातें जानवरों के गोठ की तरह उसकी भी जिंदगी थी। आंसुओं को कितना कुछ रोक सकता था? भूख की कितनी जुगाली वह कर सकता था? कोल्हू के बैल की तरह वह अपने जीवन से जोता गया था। नहर से बहनेवाला कल-कल पानी पेट में क्षुब्ध पसीने की बूंद बनकर बहता था।
विट्ठल कांबले किसी हणमंता लिंबाले नामक पटेल के खेत में मजदूर था। बुरे समय में पटेल सहायता भी करता। इस सहायता से एक पूरा परिवार असहाय होता जा रहा था। पटेल के हाथ किसी भरे-पूरे संसार को ध्वस्त कर रहे थे।’ .... हणमंता लिंबाले इसी टोह में था। उसने मसाई से संपर्क किया और उसे अक्कलकोट में किराए के एक कमरे में रख दिया। मां ने भी मजबूरन हणमंता का हाथ पकड़ लिया। जिस व्यक्ति को लेकर उसे बदनाम किया गया था, जिंदगी से उठा दिया गया था, उसी के साथ रहना उसने तय किया। हणमंता ने मसाई के दाम्पत्य जीवन को तोड़ दिया और अपने नियंत्रण में रख लिया। जैसे कोई शौक से कबूतर पालता हो। दोनों मजे में रहने लगे। मसाई गर्भवती हुई। लड़का हुआ। लड़के का बाप कौन? हणमंता को मसाई चाहिए थी। उसका शरीर चाहिए था। पर संतति? मसाई के उस लड़के के नाम के साथ अगर हणमंता का नाम लग जाता तो उसकी बदनामी होती। लड़का बड़ा होकर खेती में हिस्सा मांगे तो? मसाई कोर्ट में गई तो? हणमंता यह सब नहीं चाहता था। पर प्राप्त संतति को कैसे टाला जा सकता था?’(पृ.-76)
लिम्बाले ने ब्राह्मणवाद की अनिवार्य विशेषता पितृसत्ता का उद्घाटन किया है। पितृसत्ता के कारण भी दलित स्त्रियों को शोषण का शिकार होना पड़ा है। पितृसत्ता औरत को स्वतंत्र नहीं समझती वह उसको हमेशा पुरुष के अधीन रखना चाहती है। उसका अपने शरीर पर भी कोई अधिकार नहीं है। वह अपनी इच्छा से संतान भी उत्पन्न नहीं कर सकती। यदि वह ऐसा कर लेती है तो समाज में उसको किसी प्रकार की मान्यता नहीं मिलती। बिना विवाह के संतान पैदा करना स्त्री के लिए एक कंलक बन जाता है। इसलिए उस पर तरह-तरह के जुल्म व यौन-शोषण होता है। शरणकुमार लिम्बाले अपने अनुभव के माध्यम से इसे दर्शातें हैं। वे स्वयं इस व्यवस्था के प्रताड़ित हैं। बार-बार उनसे उनके पिता के बारे में पूछा जाता है। जब स्कूल में जाते हैं तब भी और अन्य अवसरों पर भी। बिना बाप की संतान को कमतर माना जाता है उसे अक्करमाशी यानि ग्यारहमाशी कहा जाता है बारहमाशी नहीं। बिना विवाह के हुआ बालक पूरा मनुष्य नहीं, इसी मान्यता के कारण बार बार अपमानित होना पड़ता है। पहचान के एक बाप का होना जरूरी है। यह व्यक्ति को वंश से, खानदान से, जाति से पहचानने को बढ़ावा देती है, जिससे मनुष्य के रूप में व्यक्ति की पहचान धूमिल पड़ती है।
मैं मनुष्य था। सिवा मनुष्य शरीर के मेरे पास था ही क्या? यहां इस देश में मनुष्य जाति-बिरादरी और धर्म से पहचाना जाता है। बाप से पहचाना जाता है। मेरे पास बाप का नाम नहीं, धर्म और जाति नहीं है, न मैं किसी बाप का उत्तराधिकारी हूं।’ (पृ.-105)
पितृसत्ता की विचारधारा के कारण स्त्री का और विशेषकर दलित स्त्री का अत्यधिक शोषण हुआ है।पितृसत्ता की विचारधारा को स्त्रियों के अन्दर इस तरह घुसा दिया गया है कि वे बिना पुरुष के अपने जीवन की कल्पना ही नहीं कर सकती। चाहे उनके पति उनको कितना ही सताएं, कितना ही प्रताड़ित करें वे उसकी पूजा ही करती हैं। उनके पति उनको छोड़ भी दें, उनके प्रति कोई कर्तव्य न निभाएं तो भी वे उनके प्रति वफादार ही बनी रहती हैं। संतामाय वर्षों से अपने पति से अलग रहती है वह उसको त्याग देता है वह बहुत कष्टपूर्ण जीवन बिताती है, लेकिन जब उसको अपने पति के मरने की खबर मिलती है तो उसकी आंखों में आंसू आ जाते हैं।
संतामाय का पति जब गुजर गया तब मैं खाना खा रहा था। किसी ने खबर दी। संतामाय जोर-जोर से रोने लगीं। संतति नहीं हो रही थी,इसलिए पति ने उन्हें छोड़ दिया था और दूसरा विवाह कर लिया था। बच्चे हुए। संतामाय झोंपड़ी में रहने लगीं। आज पति की मृत्यु की खबर सुनकर वह रोने लगीं। इस बीच मसा मां भी आईं। दोनों रोने लगीं। नागी, निरमी भी रोने लगीं।’ (पृ.-102)
पितृसत्ता की शिकार स्त्रियों के दुखों से अक्करमाशी भरी पड़ी है, लेकिन देवकी व धनव्वा का दुख विशेष है। देवकी स्वयं पितृसत्ता का शिकार है और वह स्त्रियों के गर्भ गिराने का काम करती है। पितृसत्ता के कारण उस औरत का कोई सम्मान नहीं है जिसके बिना पति के बच्चा पैदा होता है। अपनी इज्जत बचाने के लिए वह देवकी की तरह क्रूर हो जाने पर मजबूर है जो अपने ही बच्चे की बेदर्दी से हत्या करने लगती है। धनव्वा का यौन शोषण उसका बाप ही करता है। स्त्रियों को अपने शरीर पर, अपनी इच्छाओं पर और अपने बारे में निर्णय लेने का अधिकार नहीं है।
देवकी अकेली थी। रामाप्पा के बाग में काम करती थी। शादी नहीं हुई थी। दरिद्र अवस्था। अन्य स्त्रियों के वह गर्भ गिराती। संकटग्रस्त औरतें देवकी के यहां आतीं। गर्भ निकाल फेंकती। इज्जत जिंदगी से बड़ी होती है। गर्भवती स्त्री को वह पेट के बल सुलाती। उसकी कमर पर खड़ी होकर धीरे-धीरे रौंदती। कुछ विशेष वनस्पतियां खाने के लिए देती।
एक बार स्थिति यह हुई कि देवकी को ही गर्भ रह गया। तड़के में बच्चा हुआ। सवेरा होने के पूर्व ही उसने उस बच्चे को घूरे में गाड़ दिया। अपने ही पिल्ले को खानेवाली सूअरी और देवकी में अंतर ही क्या था? देवकी के पास गांव की धनव्वा अकसर आती। धनव्वा देवाप्पा की जवान लड़की। धनव्वा का पति पिछले वर्ष बिजली गिरने से गुजर गया। धनव्वा पिता के घर ही रहती। पिता बहुत विचित्र व्यक्ति था। धनव्वा को गर्भ रह गया। और वह देवकी के यहां चक्कर काटने लगी।
धनव्वा देवाप्पा की बड़ी लड़की। अब उसका पुनर्विवाह होना मुश्किल ही था। उसे पिता से ही गर्भ रह गया। धनव्वा देवकी के हाथ-पैर जोड़ती। दिन अधिक बीत गए थे। देवाप्पा बेशर्मी से कह रहा था कि पेड़ लगाया, फल क्यों न खांऊं ?’ (पृ.-114)
पितृसत्ता की बनावट इतनी महीन है कि उसके संस्कार उस व्यक्ति के दिमाग का भी हिस्सा बन जाते हैं जो स्वयं उसका शिकार है। शोषण की व्यवस्था के सूत्र तो पकड़ में आ जाते है लेकिन पितृसत्ता को पहचानना उतना आसान नहीं है। शरणकुमार लिम्बाले इस बात को अच्छी तरह व्याख्यायित करते हैं कि दलितों के सम्मान और श्रम दोनों का शोषण किया गया है। इसकी वजह भी स्पष्ट है कि वे पूरी तरह से सवर्णों पर निर्भर थे, क्योंकि उत्पादन के सारे साधन उनके हाथों में सिमटे थे। दलितों के पास उत्पादन के साधन नहीं थे। उनकी भूख मिटाने के लिए यानी कि जिन्दा रहने के लिए सवर्णों पर निर्भर थे इसीलिए उनकी शर्तों पर ही जीवन जीने पर मजबूर हुए। लिम्बाले को लगता है कि शोषण का सबसे घिनौना रूप है - स्त्री को रखैल बनाना। वह अपनी बहनों के प्रति चिन्ता करते हैं कि समाज उनको स्वीकार नहीं करेगा , लेकिन वे साथ ही इस की संभावना भी व्यक्त करते है कि वह तो पुरुष होने के कारण किसी रखैल के साथ जी’ लेगें। विचार करने की बात है कि जब पुरुष को रखैल चाहिए तो वह कोई न कोई औरत ही होगी। यदि स्त्री के लिए अलग और पुरुष के लिए अलग नैतिकता के मानदण्ड होंगें तो पितृसत्ता की सार्थकता बनी रहती है।
रोटी भी सवर्णों के हाथों में थी और बस्ती की इज्जत भी। एक हाथ से उन्होंने इस बस्ती की भूख को मिटाया तो दूसरे हाथ से इनको भोगा। सवर्णों के दो हाथों के बीच कसमसाती मसा मां को मैं देख नहीं पाता। सीता को अशोक वन से छुडाया गया, पर मेरी मां का छुटकारा कौन करेगा? पटेल की रखैल कहलाते कहलाते वह पटेल के खेत में क्षण-क्षण रीतते हुए मर जाएगी। पर हम बच्चों का क्या होगा? नागी, निरमी, वनी, सुनी, पमी - इनके साथ शादी कौन करेगा? मैं तो पुरुष हूं, किसी रखैल के साथ जी लूंगा, पर इन बहनों का क्या होगा? क्या इनके विवाह होंगें? मनुष्यों की बस्ती में क्या हमें स्वीकार किया जाएगा? हमारी मौत पर क्या दलित बस्ती इकट्ठी होगी? क्या बहनें ऐसी ही सड़ जाएंगी?’ (पृ.-111)
व्यक्ति में अन्याय के प्रति लड़ने के लिए जो संवेदना चाहिए वह किसी न किसी रूप में उसे अपने समाज से, अपने जीवन से मिलती है। जब वह समाज की पीड़ा के साथ अपनी पीड़ा को मिलाकर देखता है और सबकी पीड़ा को समाप्त करना चाहता है तभी वह समाज परिवर्तन की बात सोच सकता है। न कभी अकेले-अकेले आदमी के दुख दूर होते हैं और यदि केवल अपने दुख के लिए व्यक्ति लड़ता है तो वह सिर्फ बदले की भावना की कार्रवाही बनकर रह जाती है।
जीजाबाई ने जैसे शिवाजी को वीरकथाएं सुनाई होंगी वैसे ही संतामाय मुझे अन्याय की कहानियां सुनातीं। उनकी आंखों से टपकने वाले आंसू मुझे महाकाव्य की तरह लगते। उनकी एक एक कहानी मुझे महायुद्ध की चिनगारी का एहसास दिलाती। जिस भूतकाल को हम जी चुके हैं, वह कितना भयावह है, इसका अहसास मुझे होने लगा। मेरी व्यथा मुझ तक सीमित नहीं है। वह व्यथा आज की नहीं है। इस अन्याय की जड़ें हजारों वर्षों के इतिहास में फंसी हुई है। मेरा दुख बुद्ध द्वारा देखा गया दुख है। मैं आज उसी दुख को झेल रहा हूं। इसके बावजूद मेरे भीतर का बुद्ध जाग क्यों नहीं रहा है।’ (पृ.-129)
ये बात सही है कि दलितों पर सवर्णों ने अत्याचार किया है और घोर अपमान किया है। औरतों का यौन शोषण किया है। इस शोषण की स्थिति को दलितों ने अपनी नियति मानकर स्वीकार किया होगा। यह कोई यांत्रिक ढंग से दास बनाये गए सेवक नहीं, बल्कि विचारधारात्मक आधार पर उन पर काम किया गया। ब्राह्मणवाद ने अपने वर्ण-धर्म और पुनर्जन्म आदि के माध्यम से इस घनी आबादी के मन में यह बात बिठाई कि इस शोषण को सहन करने में ही उसकी भलाई व मुक्ति है। इसीलिए शायद वे हिम्मत नहीं कर सके कि वे अपने ’मालिक’ द्वारा दिए गए काम के विपरीत कुछ कदम उठाते।
मेरे नाना, दादा, पड़दादा इस कोठी की रक्षा करते रहे हैं। पटेल जब तहसील जाते तो इस कोठी की रक्षा वे रात-भर करते रहते। पर उन बेवकूफों के मन में एक बार भी यह विचार नहीं आया कि कोठी में खाट पर सोई पटेल की पत्नी का चेहरा भी कभी देख लें। इसके उलट उन्होंने अपनी बहू-बेटियों को रात के अंधेरे में इन कोठियों के अधीन कर दिया। इन कोठियों के निर्माण में अपनी ही बलि दे दी। उनकी जूठन पर जीने में ही अपनी जिंदगी को सार्थक मानते रहे। मेरा यह इतिहास! मैं बाल शिवाजी की तरह बेचैन हो जाता।’ (पृ.-129)
पूंजीवाद-सामन्तवाद की नींव शोषण पर टिकी है। इसका सबसे तीखा अहसास उस समय होता है जब कि कोई बेबस साहूकार-महाजन के पास ऋण लेने जाता है। लिम्बाले अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहते हैं, लेकिन उसके पास इसके लिए पैसे नहीं हैं इसके लिए वे साहूकार के पास जाते हैं तो उस समय का अनुभव बताते हैं
किसी दिन मैं और संतामाय साहूकार के यहां गए, रुपयों के लिए। साहूकार अपनी धुन में था। मैं और संतामाय दूर खड़े थे। संतामाय की चोली फटी हुई थी और उसके स्तन दिखलाई दे रहे थे। साहूकार की नजर वहां थी। पैसों के लिए उसने मजबूरी व्यक्त की। परंतु उसकी आंखें मेरे कलेजे में विष की तरह धंस रही थी। इस सेठ-साहूकार की मां-बहन की साड़ी-चोली ऐसे ही नाजुक स्थानों से फट जानी चाहिए और मैं ताकता रहूं,’ मेरे जलते मन ने कहा। गरीबी से घृणा हुई। ऐसे अपमानों से मैं छटपटाता, चिढता।’ (पृ.-132)
पूंजीवादी-सामन्ती व्यवस्था और पुरुष प्रधान समाज की संरचना में साहुकार का यह व्यवहार कुछ भी आश्चर्य में डालने वाला नहीं है, लेकिन जब लेखक की इच्छा भी वैसा ही करने की होती है तो बहुत चिन्ता की बात है। एक बड़ा सवाल हमारे सामने खड़ा होता है कि क्या दलित-उत्पीड़न का बदला इस तरह से चुकाया जाएगा। जैसे लाला संतामाय की ओर कामुक नजरों से देख रहा था और उसके फटे वस्त्र यानी उसकी गरीबी नाजायज फायदा उठा रहा था तो क्या इसका इलाज यही है कि जिस तरह लाला करता है वैसे ही उसके साथ किया जाए? क्या इतिहास में हुए तमाम उत्पीड़न का बदला उतना ही उत्पीड़न करना होगा? असल में लेखक भी उसी पुरुष-प्रधान सामन्ती मानसिकता का ही शिकार है जो इस समस्या का ऐसा समाधान सोचता है। बदले की भाषा की बजाए, उत्पीड़न के बदले उत्पीड़न में समाधन नहीं है, बल्कि ऐसी व्यवस्था की स्थापना करने में समाधन निहित है, जिसमें किसी का शोषण संभव न हो सके।
पूंजीवादी व्यवस्था में दो वर्ग हैं एक शोषक तथा दूसरा शोषित। शोषक वर्ग केवल भोक्ता है और श्रमिक वर्ग कर्ता। दोनों की स्थिति का अनुमान शेवंता की स्थिति से लगाया जा सकता है। एक तरफ शेवंता है जो काम की अधिकता एवं खुराक की कमी के कारण जवानी में ही बुढ़ा गई है, दूसरी तरफ बंगले की मालकिन है जो पचास साल की उम्र में भी जवान लगती है। पूंजीवादी शोषण ने शेवंता के जीवन से तेज व प्रसन्नता’ छीन ली है।
शेवंता की ससुराल शोलापुर में थी। अभावग्रस्त झोंपड़पट्टियां और फटेहाल लोग। इन झोपड़ियों के पड़ोस में स्थित बंगलों में शेवंता बरतन मांजती। जवान उम्र की यह शेवंता बुढ़िया हो गई थी। उस बंगले की पचास वर्ष की बुढ़िया जवान और प्रसन्न लगती। शेवंता के चेहरे की मुसकराहट, उसका तेज किसने छीना है? इस सूरजमुखी फूल की प्रसन्नता को किसने चुराया है?’ (पृ.-134)
गरीबी एक अभिशाप है और अभिशाप का कारण है शोषणकारी-व्यवस्था। अभाव व गरीबी व्यक्ति के जीवन मे कई तरह के कष्ट और तकलीफें लेकर आती हैं। रोजगार की असुरक्षा व स्थायी अभाव व्यक्ति के व्यक्तित्व के स्वाभाविक विकास को रोकते हैं। गरीबी के कारण उसे विकास के अनुकूल अवसर नहीं मिलते। लेखक ने गरीबी को दुखों की जननी तो माना, लेकिन वह गरीबी को महिमामंड़ित भी करता है। गरीबी को दृढ़ता के साथ जोड़ना एक भाववादी पैंतरा ही है। गरीबी मनुष्य की मनुष्यता को समाप्त करती है। गरीबी के कारण वह ऐसे काम करने के लिए तैयार हो जाता है जो कि वह अन्यथा न करता। गरीबी न तो कोई प्राकृतिक व दैवीय वरदान-अभिशाप है न वह ऐसी कोई सत्ता है कि जिससे बचा नहीं जा सकता। वह व्यवस्था का गुण है और व्यवस्था मनुष्य निर्मित है जो बदली जा सकती है। गरीबी की कोई सार्वभौमिक व वैश्विक परिभाषा नहीं है यह एक सापेक्ष स्थिति है। किसी के मुकाबले में कोई अमीर है, लेकिन किसी दूसरे के मुकाबले में वह गरीब हो जाता है। असमानता को मापने का ही तरीका है गरीबी। यदि समस्त संसाधनों को मानवों की जरूरत के हिसाब से वितरित कर दिया जाए तो यह स्थिति नहीं होगी। जिस समाज में सबके लिए समान अवसर हों उस समाज में चरित्र ज्यादा दृढ़ होंगें।
कालेज की दुनिया में हमारी गरीबी फबती नहीं थी। गरीबी का दुख बड़ा गहरा होता है। यह दुख आदमी को अमर्याद बनाता है। दुख मनुष्य को मनुष्य के रूप में खड़ा कर देता है। जिसके दुख की जड़ें जितनी गहरी होती हैं वह मनुष्य उतने ही दृढ़ चरित्र का होता है। दुख और दरिद्रता को झेलते हुए हम शिक्षा ग्रहण कर रहे थे।
जेब में चाय को भी पैसे नहीं होते। परिस्थिति के कारण हम अंर्तमुख हो जाते। मेरे जैसे अनेक दलित मित्र हैं, यह दुख मेरा अकेले का नहीं है’ यह अहसास बढ़ता।’ (पृ.-134)
गरीबी का यह दुख सिर्फ दलित नहीं झेल रहे, बल्कि बहुत बड़ी आबादी है जो ऐसी स्थितियों में जी रही है। वे सब शोषण के शिकार हैं और इस शोषण से छूटकारा पाने के लिए दलितों के साथ संघर्ष में भी आ सकते हैं। लिम्बाले ने एक बात की ओर ध्यान आकर्षित किया है जो चिन्ताजनक भी है और दलित समाज के सामने चुनौती भी है। पूंजीवादी व्यवस्था में व्यक्ति ज्यों ही कुछ विकास के अवसर पाकर विकास करता है या किसी के विकास करने की संभावना बनती है तो वह अपने वर्ग से कट जाता है। वह स्वयं को इस वर्ग से अलग कर लेता है। जिस का नतीजा होता है कि व्यक्ति उच्चवर्ग की संस्कृति को, सोच-विचार को व मूल्य-मान्यताओं को इस तरह स्वीकार कर लेता है कि उसे अपने वर्ग से ही नहीं, बल्कि अपने रिश्तेदारों व संबंधियों से भी रिश्ता रखने में शर्म महसूस होने लगती है। उसकी जागरूकता का, विकास का व सचेतता का उस वर्ग को कोई लाभ नहीं होता, जिसमें वह पैदा होता है। उनकी हालत तो क्या सुधरनी वह स्वयं दोहरा जीवन जीने लगता है। उसकी पारिवारिक स्थिति व ऐतिहासिक स्थिति उसके लिए एक ग्रंथि बन जाती है। वह इस अतीत के अभिशाप को बदलने की बजाए उससे पीछा छुड़ाने गता है। पीछा छुड़ाने के तरीके क्या हैं कि वह उस पहचान को अपनाता है, जो उसकी है नहीं और उसको छुपाता है जो उसकी पहचान है। यह एक सरल व आसान रास्ता है, लेकिन दलित समाज व आन्दोलन को इसका कोई लाभ नहीं होता। मराठवाड़ा आन्दोलन के दौरान लेखक अपनी जाति छुपाकर रहने लगता है। तो वह अपने को पालने-पोसने वाली संतामाय से इसलिए दूरी बनाने लगता है कि वह काली है और उसके पास बेहतरीन कपड़े नहीं हैं।
संतामाय बुढी स्त्री। हमेशा तंबाकू खानेवाली। साड़ी-चोली हमेशा फटी हुई। संतामाय को हास्टल के कमरे में कैसे ले जाऊं! संतामाय अगर गोरी, बेहतरीन कपड़ों में होतीं तो मैं कमरे पर ले जाता। मुझे संतामाय की लाज आ रही थी। सामने से जब कालेज के दोस्त दिखते जो मैं संतामाय से दूरी रखकर चलता, जैसे कि यह दरिद्र स्त्री मेरी कोई लगती ही न हो। संतामाय मुझसे पूछताछ कर रही थीं, मैं बोल नहीं रहा था। संतामाय थाली होती तो मैं उन्हें अपने भीतर छिपा लेता।’ (पृ.-141)
इस तरह की प्रवृति अन्ततः उसको अपने ही वर्ग के विरूद्ध खड़ा कर देती है। वह जल्दी से अपनों से पीछा छुड़ाना चाहता है। वह स्वयं को अमीर और समृद्ध देखना चाहता है, अपनी पहचान वह उच्चवर्ग से करने की लालसा उसे उसी वर्ग का हिस्सा बना देती है।
बस के यात्री मेरी तथा दादा की ओर देखते रहते। मुझे शर्म आती। हमाल के नाती के रूप में लोग मुझे पहचानते। कंडक्टर जल्दी सीटी दे दे, बस निकले, ऐसा लगता। फटेहाल अवस्था में खड़ी संतामाय, निरमी, वनी बस के हिलने की प्रतीक्षा में होतीं। अवरुद्ध कंठ के कारण आंखें भर आतीं। कंडक्टर सीटी देता। बस निकलती।’ (पृ.-143) किसी व्यक्ति के लिए किसी वर्ग के लिए सुधार के लिए सबसे पहली शर्त है उस वर्ग से गहरा जुड़ाव व सहानुभूति।

1 comment:

  1. मैं तेली जाति का कहा जाता हूँ आपका लेख पढ़ कर स्कूल के दिनों के अपमान याद आया,पढ़कर दुख इस बात का है कि जिस तेली का मुंह देखना हिन्दू धर्म के ठेकेदारों ने अशुभ कहा,अब उसी जाति के लोगों को बेवकूफ मोहरा बनाकर दलितों को अपमानित कर शासन करने का उपाय निकाल लिया

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