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April 24, 2011

अज्ञेय की कविता में विभाजन की त्रासदी

अज्ञेय की कविता में विभाजन की त्रासदी

डा. सुभाष चन्द्र, एसोशिएट प्रोफेसर, हिन्दी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय,कुरुक्षेत्र

हिन्दी साहित्य-जगत की विलक्षण प्रतिभा सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का जीवन और साहित्य विवादास्पद रहा है। अंग्रेजी और संस्कृत साहित्य से प्रतीकों और बिम्बों का प्रयोग, समाज से कटकर व्यक्तिवादिता के खोल में सिमटे कलावादी होने के उन पर कई तरह के आरोप लगते रहे हैं। निस्संदेह इन आरोपों में कुछ सच्चाईयां हैं। इसके बावजूद उनके सोलह कविता-संग्रहों, आठ कहानी संग्रहों, पाँच उपन्यासों, निबन्धों, गीतिनाट्य, यात्रावृत्त आदि विधाओं की अनेक पुस्तकें प्रकाशित हैं। अज्ञेय के विपुल साहित्य-सृजन उसमें बहुत अद्भुत व अनुपम सामग्री है।
आजादी के साथ ही भारतीय उप महाद्वीप को महात्रासदी से गुजरना पड़ा। लाखों लोग उजड़े और हजारों मारे गए। लाखों लोगों को शरणार्थी का जीवन जीने पर मजबूर होना पड़ा। अज्ञेय स्वयं न तो शरणार्थी थे, न कभी वैसी परिस्थिति में पड़े थे। किंतु शरणार्थियों की मनोदशाओं का गहरा अनुभव उन्होंने प्राप्त किया था। विभाजन के बाद त्रासदी का संबंध पंजाब, बंगाल, जम्मू-काश्मीर आदि में सर्वाधिक हुआ, इन क्षेत्रों से अज्ञेय का गहरा संबंध था।

विभाजन की त्रासदी से उपजे मानवीय संकट की गम्भीरता व व्यापकता का अनुमान आसानी से इसी बात से लगाया जा सकता है, कि अज्ञेय जैसे ‘अपने से बाहर न निकलने वाले’ कवि ने इस विषय पर सोलह कवितांए ‘मिरगी पड़ी’, ‘ठांव नहीं’, ‘रूकेंगे तो मरेंगे’, ‘मानव की आंख’, ‘गाड़ी रूक गया’, ‘हमारा रक्त’, ‘श्रीमद्धर्मधुरंधर पंडा’, ‘कहती है पत्रिका’, ‘जीना है बन सीने का सांप’, ‘पक गयी खेती’, ‘समानांतर सांप’ (जिसके सात भागों में ) तथा पांच कहानियां ‘शरणदाता’, ‘लेटर बक्स’, ‘मुस्लिम-मुस्लिम भाई-भाई’, ‘-रमंते तत्र देवता’, ‘बदला’ लिखी हैं। सन्1947 में ही अज्ञेय ने ‘शरणार्थी’ नामक संग्रह में इन कविताओं और कहानियों को प्रकाशित किया था। अज्ञेय ने इसकी भूमिका में यह भी स्पष्ट किया कि इन कहानियों और कविताओं की विषयवस्तु सच्ची घटनाओं पर आधारित हैं। अपने लेखकीय कौशल का प्रयोग करके उन्होंने विभाजन की त्रासदी को बहुत ही रचनात्मक ढंग से अज्ञेय ने प्रस्तुत किया।

एक अनजान व्यक्ति की आंखों में व्याप्त असामान्य अथाह घृणा को अज्ञेय जैसा मानव-हृदय व व्यवहार का पारखी कवि ही पहचान सकता था। यह घृणा ही इन रचनाओं का प्रेरणा स्रोत बनी, इसे बताते हुए उन्होंने लिखा कि ‘‘अक्तूबर 1947 के आरम्भ में दिल्ली जाने के लिए स्टेशन गया, तो पुल पार कर प्लेटफारम पर उतरते हुए सीढ़ियों पर पश्चिमी पंजाब के एक परिवार से मुठभेड़ हो गई। सबसे आगे पुरुष सिर झुकाए चल रहा था, पीछे स्त्री और दो बच्चे। मेरे ठीक सामने वे चढ़ रहे थे, मैं उतर रहा था। मेरे सामने पहुंचकर उस आदमी ने जैसे जान कर चौंक कर मुंह उठाकर मेरी ओर देखा। हमारी आंखें मिलीं तो मैं चौंका, क्योंकि सहसा संचित हो मानेवाली उतनी घनी भय-मिश्रित घृणा मैंने कभी किसी और आंखों की जोड़ी में नहीं देखी। यह भी है ‘मानव की आंख’! उसने शायद मुझे मुसलमान समझा था, क्योंकि मैं पाजामा पहने था और यहां का ‘हिन्दू पहिरावा’ धोती है।(वह स्वयं सलवार पहने था, यह और बात है!) इसी संबंध-सूत्र से खिंचा हुआ मेरा मन पहुँचा उससे सप्ताह भर पहले की घटना की ओर- सितम्बर के अंत में मैं ढाका गया था। वहां शहर घूमने की इच्छा प्रकट करने पर लोगों ने मुझे हिंदू मुहल्लों में घूमने को मना किया क्योंकि मैं पाजामा पहनता हूं और मुसलमान समझा जाऊंगा और मुसलमानों के मुहल्लों में जाने से इसलिए मना किया कि मैं लंबा-चौड़ा-गोरा होने के कारण पंजाबी मुसलमान समझा जाऊंगा और पूर्वी पाकिस्तान के लिए पश्चिमी पाकिस्तानी असह्य हो रहे हैं। यह भी कहा गया कि हिंदू तो घृणा से मुंह फेर कर ही रह जायेंगे, ढाका के मुसलमान छुरा भोंकने में दक्ष हैं और उन्हें बहुमत के कारण कोई भय भी नहीं। मैंने दोनों ही परामर्शों की उपेक्षा की और इस प्रकार दोनों की सच्चाई का अनुभव कर सका। छुरा तो कहीं न भोंका गया पर यह तो कई जगह हुआ कि मेरे गुजरने के बाद लोगों ने दबी किंतु घृणा से छमकती हुई आवाज में कहा, ‘पांजाबी!’
मशः मन और पीछे को चलता गया - सन् 1946 का सीमा प्रांत - अबटाबाद-कोहाट-पेशावर, अखबारों की सुर्खियां, नारे, रेल की यात्राएं, सैनिक अधिकारियों की बातचीत, जनता की उक्तियां, साम्प्रदायिक संस्थाओं की बैठकें - और मन का अनुसरण करते हुए घृणा के देश के नये-नये पथ-पगडंडियां मेरे सामने खुलती गईं।’’ ( शरणार्थी, पृ.-4)

विभाजन की त्रासदी को कथा में तो यशपाल, भीष्म साहनी, राही मासूम रजा, सआदत हसन मंटो आदि लेखकों ने अपनी रचनाओं का विषय बनाया। हैं। लेकिन अज्ञेय को छोड़कर शायद ही किसी कवि ने उस समय इस विषय पर कविता लिखी हो। यद्यपि ज्यों-ज्यों साम्प्रदायिकता की समस्या विकराल और विकट होकर उलझ रही है, त्यों-त्यों हिन्दी के कवि इसकी रचनात्मक अभिव्यक्ति कर रहे हैं। विभाजन पर केन्द्रित अज्ञेय की रचनाएं उनके व्यक्तित्व के अनचिह्नें पहलुओं की ओर संकेत करती हुई उन पर लगे व्यक्तिवादिता के आरोपों का खंडन करती हैं।

‘मानव की आंख’ में ऐसी घृणा सामान्यतः नहीं हो सकती, बल्कि मानव हृदय में प्रेम का भाव मुख्यतः होता है। प्रेम को अपदस्थ करके जब घृणा अपना घर बना लेती है, तो इंसानियत का क्षरण होने लगता है। मनुष्य अपनी मनुष्यता त्यागकर हिंस्र पशु हो जाता है। इसे देखकर अज्ञेय का कवि हृदय हिल गया था।
कोटरों से गिलगिली घृणा यह झांकती है।
मान लेते यह किसी शीत रक्त, जड़-दृष्टि
जल-तलवासी तेंदुए के विष नेत्र हैं

और तमजात सब जंतुओं से
मानव का वैर है
क्योंकि वह सुत है प्रकाश का -
यदि इनमें न होता यह स्थिर तप्त स्पंदन तो?

मानव से मानव की मिलती है आंख, पर
कोटरों से गिलगिली घृणा झांक जाती है! (मानव की आंख)
धर्म और साम्प्रदायिकता का सहारा लेकर चालाक शासक वर्ग आम लोगों के जीवन से खेलता है। साम्प्रदायिक दंगों में सतही तौर पर धार्मिक विवाद दिखाई देते हैं। असल में उसके पीछे शासक वर्गों की क्रूर चालें होती हैं। अज्ञेय ने दूरदृष्टि से सही कहा था कि साम्प्रदायिक घृणा की फसल काटने के लिए अगली सदियां हैं और उसका परिणाम भुगत रहे हैं। आजादी के इतने सालों के बाद भी राजनीति जनता में आपसी विश्वास नहीं पैदा कर पाई, बल्कि साम्प्रदायिकता की आग में शहर दर शहर जल रहे हैं और पिछले दशकों में पूरी राजनीति का चरित्र बन गया है। साम्प्रदायिक राजनीति और नफरत लोकतंत्र को समाप्त कर रही है। उन्होंने सही पहचाना था कि साम्प्रदायिकता धार्मिक कारणों से नहीं, बल्कि राजनीतिक कारणों से उपजी है।
वैर की परनालियों से हंस-हंस के
हमने सींची जो राजनीति की रेती
उसमें आज बह रही खूं की नदियां हैं।

कल ही जिसमें ‘खाक-मिट्टी’ कह के हमने थूका था
घृणा की आज उसमें पक गई खेती
फस्ल काटने को अगली सदियां हैं। (पक गई खेती)

विभाजन की त्रासदी ने लोगों के जीवन को अस्थिर कर दिया था। कहीं पर भी ठहराव नहीं था। अपनी जान बचाने के लिए लोग दर दर भटक रहे थे। मानव जीवन के समक्ष जब अस्तित्व का ही संकट पैदा हो जाए, तो मानव गरिमा के सवाल पीछे छूट जाते हैं। अज्ञेय ने इस स्थिति को बहुत समग्रता से समेटा है। लोगों की आंकाक्षा और मनःस्थिति के बहुत ही मार्मिक चित्र उन्होंने खींचा है। अज्ञेय के काव्य बोध को यहीं समझा जा सकता है कि वे एक स्थिति के हर पक्ष को छूते हैं उनकी नजर से कुछ भी ओझल नहीं होता। स्थूल स्थिति और मनःस्थिति को जिस तरह से वे एकमएक कर देते हैं वह उनकी अद्भुत कला है, जो अन्य किसी कवि में शायद ही देखने को मिले। शहरों और गांवों की स्थिति में अन्तर को पहचानना और हृदय और पांव की प्रतिक्रियाओं को देखना आदि महत्वपूर्ण है।

शहरों में कहर पड़ा है और ठांव नहीं गांव में
अंतर में खतरे के शंख बजे, दुराशा के पंख लगे पांव में
त्राहि! त्राहि! शरण! शरण!
रुकते नहीं युगल चरण
थमती नहीं भीतर कहीं गूँज रही एकसुर रटना
कैसे बचें कैसे बचें कैसे बचें कैसे बचें

आन! मान! वह तो उफान है गुरूर का -
पहली ज़रूरत है जान से चिपटना! (ठांव नहीं)


मनुष्य की ‘पहली जरुरत जान से चिपटना’ होकर रह जाए और ‘रुकेंगे तो मरेंगे’ की स्थिति हो जाए तो मानवीय संकट है। मनुष्य के सांस्कृतिक विकास व रुपान्तरण में स्थायित्व की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। अपनी जड़ों से उखाड़े व खदेड़ दिए लोगों के समक्ष अस्तित्व का सवाल खड़ा हो जाता है। भागना उनकी नियति बन जाती है।
भागो, भागो, चाहे जिस ओर भागो
अपना नहीं है कोई, गति ही सहारा यहां -
रुकेंगे तो मरेंगे! (रुकेंगे तो मरेंगे)
विभाजन के बाद देश में जिस तरह का उन्माद दिखाई दिया उसकी तुलना अज्ञेय ने मिरगी के रोगी के साथ की है। मिरगी के रोगी की चेतना गायब हो जाती है और उसके हाथ-पैर अकड़ जाते हैं अपने कृत्यों पर उसका कोई नियन्त्रण नहीं होता। मिरगी का दौरा है।
चेतना स्तिमित है।
किंतु कहीं भी तो नहीं दीखती शिथिलता-
तनी नसें, कसीं मुट्ठी, भिंचे दांत, ऐंठी मांस-पेशियां-
वासना स्थगित होगी किंतु झाग झर रहा है मुंह से!

आज जाने किस हिंस्र डर ने
देश को बेखबरी में डस लिया!
संस्कृति की चेतना मुरझ गया!
मिरगी का दौरा पड़ा, इच्छा शक्ति बुझ गयी!
जीवन हुआ है रुद्ध, मूर्छना की कारा में -
गति है तो ऐंठन है, शोथ है,
मुक्ति-लब्ध राष्ट्र की जो देह होती है - लोथ है -
ओठ खिंचे, भिंचे दांतों में से पूय झाग लगे झरने!
सारा राष्ट्र मिरगी ने ग्रस लिया है! (मिरगी पड़ी)

विभाजन के बाद आबादी के स्थानान्तरण के सवाल के साथ ही दलितों अछूतों के स्थानान्तरण का सवाल चर्चा में आया था। अज्ञेय ने ‘कहती है कविता’ में इसे व्यक्त किया, जो केवल ऐतिहासिकता को ही नहीं समेटे है, बल्कि मानवीयता की त्रासदी को भी उभारता है।
कहती है पत्रिका
चलेगा कैसे उनका देश?
मेहतर तो सब रहे हमारे
हुए हमारे फिर शरणागत-
देखें अब कैसे उनका मैला ढुलता है!

‘मेहतर तो सब रहे हमारे
हुए हमारे फिर शरणागत।’

अगर वहीं के वे हो जाते
पंगु देश के सही, मगर होते आजाद नागरिक।

होते द्रोही!
यह क्या कम है यहां लौट कर
जनम-जनम तक जुगों-जुगों तक
मिले उन्हें अधिकार, एक स्वाधीन राष्ट्र का
मैला ढोवें? (कहती है पत्रिका)

ब्राह्मणवादी व्यवस्था के अभिशाप को सामने रखते हुए अज्ञेय ने सपाट तरीके से समस्या को प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि उसकी तमाम जटिलताओं के साथ रखा है। गौर करने की बात यह है कि अज्ञेय की सहानुभूति अछूतों के प्रति है जो उनके लेखकीय सरोकारों को उद्घाटित करती है।

मानव समाज में भाईचारे का सवाल हमेशा ही विचारणीय रहा है। प्राचीन समाजों में जाति, धर्म, भाषायी, नस्लीय, और क्षेत्र के आधार पर भाईचारे की सरणियां बनती रही हैं। लेकिन आधुनिक समाज में सब संकीर्णताओं को त्यागकर समतामूलक मानवीय मूल्यों के आधार पर ही सच्चे भाईचारे की निर्मिति संभव है। साम्प्रदायिकता मनुष्य के भाईचारे के आधार के तौर पर धर्म को प्राथमिकता देती है। जबकि अनुभवों से बार बार यह बात असत्य सिद्ध हो रही है। ‘मुस्लिम-मुस्लिम भाई-भाई’ कहानी तथा ‘कहती है पत्रिका’ कविता में इस सवाल के विभिन्न पहलुओं को अभिव्यक्त किया है। धर्म के आधार पर भाईचारा कितना खोखला है अज्ञेय ने धर्म के आधार पर भाईचारा नहीं होता, बल्कि उसका आधार वर्गीय है।

हमने भी सोचा था कि अच्छी चीज है स्वराज
हमने भी सोचा था कि हमारा सिर
ऊँचा होगा ऐक्य में। जानते हैं पर आज
अपने ही बल के
अपने ही छल के
अपने ही कौशल के
अपनी समस्त सभ्यता के सारे
संचित प्रपंच के सहारे

जीना है हमें तो, बन सीने का सांप उस अपने समाज के
जो हमारा एक मात्र अक्षंतव्य शत्रु है
क्योंकि हम आज ही के मोहताज
उसके भिखारी शरणार्थी हैं। (जीना है बन सीने का सांप)


यह इधर बहा
मेरे भाई का रक्त
वह उधर रहा
उतना ही लाल
तुम्हारी बहन का
रक्त!
बह गया, मिलीं दोनों धरा
जाकर मिट्टी में हुई एक। (हमारा रक्त)

अज्ञेय बार बार आगाह करते हैं साम्प्रदायिकता के सांप से बचने की। वे जनता से आह्वान करते हैं, बार बार चेताते हैं कि जिसे हम अपना कहते हैं वह ही हमें डस लेगा। साम्प्रदायिकता चाहे हिन्दू हो या फिर मुस्लिम दोनों का चरित्र एक ही होता है और दोनों परस्पर दुश्मन नहीं बल्कि पूरक होती हैं और एक-दूसरे को फूलने फलने के लिए खुराक उपलब्ध करवाती हैं। साम्प्रदायिकता मनुष्य की इंसानियत को ढंक लेती है। अज्ञेय बार बार मनुष्य की इंसानियत को जगाने की बात करते हैं। मनुष्य की इंसानियत को जगाकर ही साम्प्रदायिकता के सांप को समाप्त किया जा सकता है।
किंतु भीतर कहीं
भेड़-बकरी, बाघ-गीदड़, सांप के बहुरूप के अंदर
कहीं पर रौंदा हुआ अब भी पड़पता है
सनातन मानव -
खरा इनसान -
क्षण भर रुको तो उसको जगा लें! (समानान्तर सांप-7)


धर्म, मर्यादा, परम्परा आदि की सब बातें उनका छल है, जिसकी आड़ में अपने नापाक इरादों को वे छुपाने की कोशिश करते हैं। प्रेमचन्द ने ‘साम्प्रदायिकता और संस्कृति’ लेख में कहा था कि ‘साम्प्रदायिकता हमेशा संस्कृति का लबादा ओढ़कर आती है, क्योंकि उसे अपने नग्न रूप में आते हुए लज्जा आती है।‘ अज्ञेय ने ‘समानान्तर सांप-7’ कविता में साम्प्रदायिकता की आड़ में छिपी दरिदंगी, रुढ़िवादिता, स्वार्थों को उद्घाटित किया है।
नहीं है यह धर्म, ये तो पैंतरे हैं उन दरिदों के
रूढ़ि के नाखून पर मरजाद की मखमल चढ़ा कर
जो बिचारों पर झपट्टा मारतें हैं -
बडे़ स्वार्थों की कुटिल चालें!
साथ आओ -
गिलगिले ये सांप वैरी हैं हमारे
इन्हें आज पछाड़ दो
यह मकर की तनी झिल्ली फाड़ दो
केंचुलें हैं केंचुलें हैं झाड़ दो! (समानान्तर सांप-7)

अज्ञेय ने अपनी कविताओं में साम्प्रदायिक शक्तियों की क्रूरता, बर्बरता, हिंस्रता, उन्माद और घृणा की सघनता को दर्शाने के लिए उनकी तुलना हिंस्र-पशुओं के साथ की है। उनके विवेकहीन कार्यों के लिए ‘मिरगी के रोगी’ रुपक रचा है।
साम्प्रदायिकता स्वतः स्फूर्त परिघटना नहीं है कि मानवता के क्षरण से पनपी हो, बल्कि इसके कारण सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने और ऐतिहासिक परिस्थितियों में हैं, वर्ग-स्वार्थों की टकराहट में हैं, संकीर्ण व सस्ती राजनीति में हैं। विभाजन से उपजी त्रासदी, शरणार्थियों की दयनीय हालत, धार्मिक उन्माद में पनपती घोर घृणा के वर्णन से मन्द पड़ती मानवता और शरणार्थियों के प्रति सहानुभूति पैदा करने में अज्ञेय की कविताएं कामयाब होती हैं।

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