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December 29, 2010

आम्बेडकर : मानवाधिकार कार्यकर्ता

आम्बेडकर : मानवाधिकार कार्यकर्ता
सुभाष चन्द्र, एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र

विश्व के उत्पीडि़त वर्गों के संघर्षों के प्रतिफल के रूप में मानवाधिकारों की घोषणा बेशक 1948 में हुई और 1993 में भारत में भी राष्ट्रीय मानवाधिकार का आयोग गठित किया गया। राज्य द्वारा मानवाधिकारों की स्वीकृति से निश्चित तौर पर उत्पीडि़त वर्गों के आन्दोलनों को बल मिला है, लेकिन उत्पीडि़त वर्गों के संघर्ष तभी से शुरू हो गए थे, जब से उन पर अत्याचार शुरू हुए थे। पश्चिम में 1215 में मैग्राकार्टा, 1628 में अधिकारों के लिए आवेदन, 1689 में बिल आफ राइटस, 1776 में अधिकारों का वर्जीनिया घोषणापत्र, 1791 में आम लोगों के अधिकारों की फ्रांस उदघोषणा आदि दस्तावेज आम लोगों संघर्षों के संघर्षों का ही नतीजा थे। यह बात सही है कि आधुनिक काल में इस प्रक्रिया ने तेजी पकड़ी और साम्राज्यवादी शक्तियों ने जहां पूंजी को वैश्विक रूप दिया वहीं श्रमिक वर्गों को भी वैश्विक स्तर पर एकजुट होने के अवसर अधिक मिले। विश्व की उत्पीडि़त शक्तियों की तरह भारत में मानवाधिकारों के लिए संघर्ष का इतिहास उतना ही पुराना है जितना कि उत्पीडऩ। मनुस्मृति के कठोर दण्डविधानों में छुपे उनको नियंत्रित करने में उनके आन्दोलन व भावना को समझा जा सकता है।
कथित भारतीय आम चेतना, नैतिक चेतना, सहज विवेक कमोबेश ब्राह्मणवादी विचारधारा से नियंत्रित व निर्देशित है और ब्राह्मणवादी विचारधारा की जेळी के दो सिंगड़ हैं - वर्ण-व्यवस्था और पितृसत्ता। इन्हीं दो सिंगड़ों से ब्राह्मणवाद ने भारतीय लगभग अस्सी प्रतिशत आबादी के मानवाधिकारों कोंचा है। भारत में वर्चस्वशाली व शासक वर्गों ने मानवाधिकारों के हनन की विचारधारा यानी ब्राह्मणवाद को अपनाकर ही अपनी क्रूरताओं व शोषण को वैध ठहराया है। शासन चाहे धुर हिन्दूवादी हो, तुर्कों का हो, मुगलों का हो अथवा अंग्रेजों का हो वे इसी विचारधारा में अपनी सुरक्षा पाते रहे हैं। इसीलिए भारत में जितने भी सामाजिक आन्दोलन हुए हैं उन्होंने ब्राह्मणवादी मूल्यों और संरचनाओं को नकारा है। चाहे चावार्क का आन्दोलन हो, महात्मा बुद्ध का आन्दोलन हो या कबीर-नानक-रविदास का आन्दोलन हो, या फिर जोतीबा फूले, ताराबाई शिन्दे और आम्बेडकर के आन्दोलन हों। भारतीय इतिहास में एक समानान्तर परम्परा व धारा है जो कभी प्रखर रूप में तो कभी मंद गति से चलती रही है। भारत में मानवाधिकारों का आन्दोलन असल में ब्राह्मणवाद के वर्चस्व के नकार का ही आन्दोलन है। इसीलिए जिस भी महापुरुष मानवाधिकारों के लिए संघर्ष किया है उसने अपनी परम्परा इसी में पहचानी है। डा. भीमराव आम्बेडकर ने इसीलिए अपनी परम्परा को पहचानते हुए महात्मा बुद्ध, कबीर और महात्मा जोतीबा फूले को अपना गुरू घोषित किया था। स्वाभाविक ही है कि इनमें से उस समय कोई भी जिन्दा नहीं था, उनको गुरू बनाने का अर्थ उनके परम्परा और विचार को ही अपनाना था।
1938 में रेलवे कामगारों को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा था कि ''दो शत्रु हैं जिनसे इस देश के मजदूरों को निपटना ही होगा। वे दो शत्रु हैं - ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद। ब्राह्मणवाद से मेरा आशय एक जाति समुदाय के रूप में ब्राह्मणों की शक्ति, उनके अधिकारों और हितों से नहीं है। ब्राह्मणवाद से मेरा मतलब है - स्वतंत्रता, समानता और बन्धुत्व की भावना का निषेध। उस अर्थ में यह सभी वर्गों में व्याप्त है और सिर्फ ब्राह्मणों तक ही सीमित नहीं है, हालांकि यह बात अपनी जगह बिल्कुल सही है कि वे ब्राह्मण ही थे, जो इस निषेधात्मक भावना के आदि प्रणेता और प्रर्वतक रहे। .... ब्राह्मणवाद का प्रभाव महज अन्तरजातीय खान-पान और अन्तरजातीय विवाह सम्बंधों तक ही सीमित नहीं है। इसका दायरा तो उन नागरिक अधिकारों के क्षेत्र तक फैला हुआ है। सार्वजनिक स्कूलों, सार्वजनिक कुंओं और सार्वजनिक परिवहन के साधनों और सार्वजनिक भोजनालयों का उपयोग नागरिक अधिकारों के विषय हैं। हर वह चीज जो सार्वजनिक उपभोग और आम लोगों के इस्तेमाल के लिए उद्दिष्ट हो या फिर सार्वजनिक कोष के द्वारा कायम की गई हो, प्रत्येक नागरिक के इस्तेमाल के लिए खुली तो होना ही चाहिए। लेकिन ऐसे लोगों की संख्या करोड़ों में है जिनके लिए ये अधिकार निषिद्ध हैं। ब्राह्मणवाद का ही परिणाम है जो इस देश को हजारों सालों से जकड़े हुए है और आज भी विद्युत-प्रवाह युक्त बिजली के नंगे तार की भांति क्रियाशील है। ब्राह्मणवाद इतना सर्वव्यापी है कि यह आर्थिक अवसरों के क्षेत्र को भी प्रभावित करता है।"
डा. आम्बेडकर के मन में मानवाधिकारों के लिए संघर्षकत्र्ताओं के लिए बहुत सम्मान था, उन्होंने कहा कि ''वे धन्य हैं जो अनुभव करते हैं कि जिन लोगों में हमारा जन्म हुआ है, उनका उद्धार करना हमारा कर्तव्य है। धन्य हैं वे, जो गुलामी का खात्मा करने के लिए सब कुछ न्योछावर करते हैं, और धन्य हैं वे, जो सुख और दुख, मान और सम्मान, कष्ट और कठिनाइयों, आंधी और तूफान की परवाह किए बिना तब तक संघर्ष करते रहेंगे जब तक कि अस्पृश्यों को उनके मानवीय जन्मसिद्ध अधिकार न मिल जाएं।" आम्बेडकर के आन्दोलन मानवाधिकारों को स्थापित करने वाले थे। 1927 के महाड़ आन्दोलन में चवदार तालाब से पानी पीने के अधिकार के दौरान उन्होंने कहा भी था कि ''हम तालाब पर इसलिए जाना चाहते हैं कि हम भी औरों की तरह मनुष्य हैं और मनुष्य की तरह जीना चाहते हैं।" मनुष्यता प्राप्त करने के आन्दोलन में मनुस्मृति को सरेआम जलाने के पीछे भी शूद्रों और स्त्रियों के अधिकारों को जन्मना वंचित करती थी। कालाराम मन्दिर में प्रवेश का आन्दोलन भी आध्यात्मिक भूख शान्त करने अथवा मोक्ष व पुण्य की प्राप्ति के लिए नहीं था, बल्कि उसके मूल में भी मानवीय अधिकार पाने की भावना थी। 10 फरवरी 1933 को मंदिर-प्रवेश के संबंध में जारी प्रेस के लिए वक्तव्य में स्पष्ट किया कि ''हिन्दू धर्म को सामाजिक समता वाला धर्म बनाना है तो उसकी संहिता में मंदिर-प्रवेश संबंधी संशोधन करना पर्याप्त नहीं होगा। होना यह चाहिए कि उसमें से चातुर्वण्र्य के सिद्धांत को निकाल दिया जाए। वही जाति-प्रथा और अस्पृश्यता की जननी है। चातुर्वर्ण्य और जातिप्रथा दलित वर्गों के आत्मसम्मान के प्रतिकूल है। वे (दलित) अपने आप को तभी हिन्दू कह सकते हैं, जब चातुर्वर्ण्य और जातिप्रथा के सिद्धांत को तिलांजलि दे दी जाए और शास्त्रों से उसका बहिष्कार कर दिया जाए। इससे कम में दलित वर्ग संतुष्ट नहीं होंगे और मंदिरों में प्रवेश भी नहीं करेगे। मंदिर-प्रवेश को स्वीकार करना और उससे संतुष्ट हो जाना बुराई से समझौता कर लेना है और अपने मानवीय व्यक्तित्व की गरिमा को बेच डालना है" खोती व्यवस्था के खिलाफ आन्दोलन, श्रमिकों के लिए हड़ताल के अधिकार की वकालत के पीछे भी यही भावना थी, इसीलिए उन्होंने कहा था कि हड़ताल का अधिकार छीनना दास बनाना है।
हिन्दू धर्म को त्यागकर बौद्ध धर्म ग्रहण करने का आन्दोलन भी धार्मिक भावना, आध्यात्मिक शान्ति, व पूजा के लिए नहीं था, वह भी जन्म के आधार पर ज्ञान, संपति व सत्ता से वंचित करने की मान्यता के नकार से प्रेरित था। मानवाधिकारों में निजता व आस्था-विश्वास के अधिकार को सम्मिलित किया गया। अपनी मान्यता के आधार पर धर्म का चुनाव डा. आम्बेडकर ने मानवाधिकार का प्रयोग किया था।
सामाजिक अपमान को वे सबसे बड़ा अभिशाप मानते थे। आर्थिक प्रगति सामाजिक हैसियत पाने का औजार थी, इसीलिए वे आरक्षण चाहते थे, लेकिन वे आरक्षण के लिए अछूत बने रहने के हामी नहीं थे। राजकीय समाजवाद की कल्पना भी उनकी इसी सोच से उपजी थी कि राज्य ही वंचितों के अधिकारों व सुरक्षा को स्थापित कर सकता है। जिस दौर में विभिन्न देशों में समाजवादी व्यवस्थाएं व्यक्तिगत सम्पति को समाप्त करके सम्पति पर राज्य के अधिकार को स्थापित कर रही थी, उसी दौर में मानवाधिकारों में व्यक्तिगत सम्पति की रक्षा का भार राज्य को दिया। जिस पूंजीवादी व्यवस्था के पैरोकारों से बाबा साहब घिरे हुए थे वे उसमें व्यक्तिगत सम्पति के अधिकार को अनदेखा नहीं कर सकते थे, लेकिन आम्बेडकर की राजकीय समाजवाद की पुरजोर वकालत के पीछे उनकी इस संबंध में मंशा-भावना को समझा जा सकता है। परम्परागत तौर पर वर्ण-धर्म की कठोर-व्यवस्था के तहत दलितों को संपति विहीन कर दिया गया था, जिसकारण संपति के नाम पर दलितों के पास ठन-ठन गोपाल ही था।
यहां भी डा. आम्बेडकर और गांधी में मूलभूत अन्तर है गांधी संपतिशाहों के संरक्षण में श्रमिकों को रहने की सलाह देते थे तो आम्बेडकर राज्य द्वारा संपति का अधिग्रहण। यूं तो प्राचीन भारत के राजनीतिज्ञ कौटिल्य ने भी प्रजा के जीवन, संपति और सुरक्षा को राजा का कत्र्तव्य माना है, लेकिन यहां प्रजा का मतलब वर्ण-धर्म में विभाजित प्रजा है, जिसमें शूद्रों-स्त्रियों के पास तो संपति थी ही नहीं। निश्चित तौर पर यह संपतिशाली वर्गों के हितों की रक्षा की ही बात है। डा. आम्बेडकर शोषणकारी को समस्त मानवाधिकारों को लीलने वाली कहा है, उन्होंने लिखा कि ''कार्य करने की स्वतन्त्रता केवल वहीं पर होती है, जहां शोषण का समूल नाश कर दिया गया है, जहां एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग पर अत्याचार नहीं किया जाता, जहां बेरोजगारी नहीं है, जहां गरीबी नहीं है, जहां किसी व्यक्ति को अपने धंधे के हाथ से निकल जाने का भय नही है, अपने कार्यों के परिणामस्वरूप जहां व्यक्ति अपने धंधे की हानि तथा रोजी-रोटी की हानि के भय से मुक्त है।"
धर्म, जाति, नस्ल, भाषा, रंग, शिक्षा व संपति के आधार पर भेदभाव बिना कानून के समक्ष सभी मनुष्यों की बराबरी के सिद्धांत को मानवाधिकारों में जगह दी गई, जिससे परम्परागत तौर पर वंचितों-उत्पीडि़तों के संघर्षों के लिए नई आशा का संचार हुआ। डा. आम्बेडकर के चिंतन व आन्दोलनों की यह मूल भावना थी। दूसरी गोलमेज कांफ्रेस में 'फेडरल स्ट्रक्चर कमेटी' के सदस्य के तौर पर भारत के संविधान के प्रारूप पर विमर्श के दौरान उन्होंने व्यस्क मताधिकार का सवाल उठाते हुए कहा कि ''मत के अधिकार का अर्थ है अपनी जिन्दगी, सम्पति और आजादी की रक्षा करने का अधिकार। युवावस्था में कदम रखने वाले नागरिक को संपति, शिक्षा या अन्य किसी भी कारण से मत के अधिकार से वंचित करना उचित नहीं है। अनपढ़ होते हुए भी व्यक्ति बु।िमान होता है वह अपनी भलाई को अच्छी तरहसमझता है। गरीबी के कारण किसी को राज्य-प्रतिनिधि के रूप में चुनने से वंचित रह जाना अन्याय है। लोग अपने अनुभव से सीखते हैं। इसी आधार पर ही स्वतंत्र व जनता की पक्षधर सरकार का निर्णय होता है। उन्होंने कहा कि 'कुछ चुनिंदा लोगों को मत का अधिकार देना बहुसंख्यकों का भविष्य अल्पसंख्यकों के हाथ में सौंपना है' ।"
बाबा साहब का आन्दोलन सरकारी और साम्राज्यवादी पूंजी पर पलने वाले आज के अधिकांश एन.जी.ओ. की तरह बहस-चर्चाएं करना नहीं था, बल्कि मानवाधिकारों को प्राप्त करने के लिए लोगों को संगठित करना तथा उनके लिए संघर्ष करने तक जाता था। बाबा साहब उत्पीडि़तों की राजनीतिक लामबंदी के जरिये शासकीय भेदभाव व क्रूरताओं को ही नहीं, बल्कि सामाजिक भेदभाव की संरचनाओं को भी उखाड़ फेंकना चाहते थे। इसी मायने में उनका मुक्तिकामी आन्दोलन महात्मा गांधी के आन्दोलन संरक्षणवादी आन्दोलन से मूलत: भिन्न था, महात्मा गांधी की दीन व विनम्र मुद्रा में उत्पीड़क व वर्चस्वी वर्गों से करुणा व दया की अपील तो है, लेकिन उनकी दलित वर्गो में बराबरी हासिल करने वाली परिवर्तनकारी चेतना नहीं।
बाबा साहब आम्बेडकर का आक्रोश और तिक्तता का मूल किसी व्यक्तिगत रंजिश अथवा बदले की भावना में नहीं था, बल्कि उत्पीडऩकारी बौद्धिक व सामाजिक संरचनाओं के आमूल-चूल परिवर्तन के संकल्प में था। आम्बेडकर चिन्तन-दर्शन व आन्दोलन की सम्पूर्ण चेतना में स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के आदर्श व मूल्य थे। धर्म, जाति, नस्ल, भाषा, रंग के आधार पर संकीर्ण पहचान व विभाजन के नकार को मानवाधिकारों ने आधिकारिक मान्यता दी।

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