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December 28, 2010

दलित : अवधारणा

दलित : अवधारणा
सुभाष चन्द्र, एसोसिएट प्रोफसर, हिंदी विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र

दलित शब्द की दो प्रमुख परिभाषाएं हैं। एक परिभाषा के अनुसार दलित माने जो पहले अछूत या अनुसूचित जाति कहे जाते थे। इस मायने में यह अपवर्जित दृष्टिकोण है। दूसरे परिभाषा अन्तरभाव दृष्टिकोण की है। जिसके अनुसार दलित माने सभी शोषित और पीडि़त वर्ग। इस परिभाषा में दलित, आदिवासी, अति पिछड़ी एवं अल्पसंख्यकों को भी शामिल करने का दृष्टिकोण है।1 दलित शब्द का प्रयोग महान क्रांतिकारी चिन्तक जोतिबा फूले ने किया तथा बाद में डा. भीमराव आम्बेडकर ने इस शब्द का बहुत प्रयोग किया। डा. आम्बेडकर ने अस्पृश्य, आदिवासी और जरायम पेशा जातियों को शामिल किया। अस्पृश्य जातियों को हीन माना जाता था, इनके भौतिक संपर्क से बचा जाता था। गांव के सार्वजनिक तालाब-कुओं का पानी तथा मंदिर आदि में प्रवेश निषिद्ध था। दक्षिण भारत में कुछ जातियों के दर्शन को भी अपशगुन माना जाता था, कुछ जातियों की छाया का संपर्क भी निषिद्ध था। ऐसी परिस्थिति में इन जातियों के लोग दिन में जंगलों में जाकर छुप जाते थे, और मानवीय जीवन तो सोच भी नहीं सकते थे। सन् 1872 के अपराधी आदिवासी अधिनियम के अनुसार बिल्कुल निम्र वर्ग की जातियों के सदस्यों पर अंग्रेजी सरकार अपराधी होने का शक करती थी, वे जरायम पेशा श्रेणी में थी। घोर अन्याय ही है कि इन जातियों में पैदा होने वाले को जन्म से ही अपराधी मान लिया जाता था। इन जातियों के लोगों को पुलिस में अपना पंजीकरण करवाना होता था, थाने में हाजिरी देनी होती थी ओर गांव की सीमा से बाहर जाने क लिए पारपत्र लेना पड़ता था, जो इस प्रक्रिया का पालन नहीं करता था, उसे जेल में डाल दिया जाता था। इस व्यवस्था के चलते न तो ये कोई आर्थिक कारोबार कर सकते थे और न ही अपने जीवन स्तर को सुधारने के लिए कोई अवसर इनके पास था। इस अवस्था में ये पराश्रित होकर शोषित होने को विवश थे। जातियों को दलित वर्ग की संज्ञा दी। दलित जातियों की आबादी जैविक दृष्टि से दूसरी जातियों से अलग नहीं हैं। जाति-व्यवस्था सामाजिक निर्मित है। "कोई भी सामाजिक संस्था बिना किसी कारण या बिना सामाजिक-व्यवस्था के अस्तित्व में नहीं आती। जाति-व्यवस्था के अस्तित्व के लिए भी विशेष सामाजिक गतिविधियां जिम्मेवार हैं। जाति का उदय ही सामाजिक उद्दश्यों को पूरा करने के लिए हुआ था। सामाजिक उच्चावच्च क्रम को सुसंगत बनाए रखना ही इसका उद्देश्य था।" "शरद पाटिल ने जाति-व्यवस्था के उदय को सामाजिक विकास के उस चरण से जोड़ा है, जहां मातृ-सत्तात्मक व्यवस्था का परिवर्तन पितृसत्तात्मक व्यवस्था में हो रहा था। इस मत को पशु चारण अद्र्ध घुमंतू समाज के पितृ-सत्तात्मक समाज में तब्दीली के पक्ष में समझा जा सकता है, जिसमें मातृसत्तात्मक समाज कृषि-व्यवस्था में तब्दील हुआ।"3
दलितों को मानवीय, संवैधानिक व प्राकृतिक अधिकारों से वंचित करके अपने पर आश्रित करके उनकी मेहनत का शोषण किया गया। समाज में सबसे मुश्किल, कष्टदायक तथा गन्दी स्थितिओं के समस्त कार्य इन्हीं के जिम्मे लगाए, सेवा के समस्त कार्य बेगार में करने का भार भी इन्हीं पर था और बदले में मिली घृणा, अपमान व अलगाव।
जाति-व्यवस्था की तीन विशिष्टताएं हैं- क - हर जाति स्वयं को कुछ जातियों से शुद्ध मानने और कुछ जातियों के अपने से भी ज्यादा शुद्ध होने की धारणा रखती है। ख-हर जाति या उप जाति अपने सामाजिक रस्मों रिवाजी जीवन के संबंध में अपनी विशिष्ट पद्धतियां, शैलियां, रूप व परम्पराएं अपनाती हैं। वैवाहिक संबंधों से लेकर दाह-संस्कारों तक हर जाति कुछ परम्पराओं का पालन करती है। ग-जाति-उत्पीडऩ व असमानता के प्रति असंतुष्टि की भावनाएं स्वयं से उच्च जाति के प्रति तो होती है, लेकिन स्वयं से नीची समझी जाने वाली जाति के प्रति जातिवादी रुख ही बना रहता है।4
जाति-व्यवस्था का समाज के विभिन्न वर्गों पर अलग-अलग व कई मामलों परस्पर विपरीत प्रभाव पड़े हैं, किसी के लिए यह विशेषाधिकार प्राप्त करने का जरिया रही है, तो किसी के लिए तमाम प्राकृतिक, मानवीय व वैधानिक अधिकार छिने जाने की व्यवस्था। इस व्यवस्था की विचारधारा व ढांचे पर समाज में लगातार विचार-विमर्श होता रहा है। जिन वर्गों को जाति-व्यवस्था समाज में विशेषाधिकार प्रदान करती थी, वे इसे बनाए रखने के लिए इसके समर्थन में तर्क गढ़ते रहे हैं, तो जिनके लिए यह अमानवीय स्थितियां निर्मित करती थी, वे इसके खोखले तर्कों पर चोट करते रहे हें।
जाति व्यवस्था के समर्थकों ने श्रम-विभाजन का वैज्ञानिक आधार बताकर इसे उचित ठहराने की कोशिश की, लेकिन यह श्रम का विभाजन नहीं, बल्कि श्रमिकों का विभाजन करती है। जाति-व्यवस्था ने जो श्रम-विभाजन किया है, उसका आधार वैज्ञानिक इसलिए नहीं है कि जाति-व्यवसाय में व्यवसाय चुनने का आधार योग्यता, वरीयता या वैयक्तिक भावना नहीं है, बल्कि पूर्व नियति है। इसमें किसी व्यक्ति को व्यवसाय चुनने और छोडऩे की आजादी नहीं है। श्रम में बराबरी नहीं, बल्कि श्रम की उच्च व निम्र श्रेणियां बनाती हैं। जाति-प्रथा के समर्थकों ने प्रजाति और रक्त की शुद्धता बनाए रखने की व्यवस्था कहकर भी इसे तर्कसंगत ठहराने की कोशिश की, लेकिन विश्लेषण करने पर इस तर्क आधार पर खोखला नजर आया, क्योंकि जाति-व्यवस्था प्रजाति के आधार पर मानव समाज का विभाजन नहीं, बल्कि एक ही प्रजाति के लोगों का विभाजन करती है। अछूतों व सवर्णों में कोई प्रजातिगत भेद नहीं है। एक ही प्रजाति के लोगों में विवाह व खन-पान का बंधन लगाकर जाति-व्यवस्था उनमें अलगाव पैदा करती है। खान-पान से तो प्रजाति की शुद्धता पर कोई आंच नहीं आती, लेकिन जाति-व्यवस्था में खान-पान बंधन लगाया गया।
जाति-व्यवस्था के समर्थक वर्ण और जाति-व्यवस्था को अलग-अलग कहकर तथा दबी जुबान में जाति को गलत तथा वर्ण को उचित ठहराते हैं, जो परोक्ष ढंग से जाति-व्यवस्था की विचारधारा को वैधता देना ही है। जाति-व्यवस्था व वर्ण-व्यवस्था का केन्द्रीय विचार असमानता का है, जो श्रम में असमानता को मान्यता प्रदान करती है। वर्ण-व्यवस्था के चारों वर्णों में समानता नहीं है, बल्कि क्रमिक सोपान है। इस क्रमिक सोपान में एक वर्ण को दूसरे से अधिक अधिकार प्राप्त हैं। वर्ण-व्यवस्था प्रदत्त अधिकार इतने भेदभावपूर्ण व अवैज्ञानिक हैं कि चौथे वर्ण को ज्ञान, संपत्ति, सत्ता के अधिकारों से वंचित किया गया और समाज का अधिकांश काम इसके जिम्मे ही आया। असल में वर्ण-व्यवस्था की सुसंगत दिखाई देने वाली विचारधारा ही जाति व्यवस्था की जननी है।
शासक वर्गों के लिए जनता को नियंत्रित करने का अमोघ अस्त्र साबित हुई, इसीलिए न तो मुस्लिम शासकों ने जाति-व्यवस्था के साथ छेड़छाड़ की और न ही अंग्रेज शासकों ने। जाति-व्यवस्था और वर्ण-धर्म की अनुपालना शासकीय लूट व शोषण को वैधता प्रदान करने के लिए रामबाण साबित हुई।
जाति-व्यवस्था की अमानवीय, बर्बर व भेदभावपूर्ण विचारधारा के खिलाफ समाज में आन्दोलन भी होते रहे हैं। ब्राह्मणवाद और बुद्ध के महासंग्राम के समय से ही जाति का सवाल भारतीय सभ्यता और समाज के इतिहास का बड़ा अनसुलझा सवाल रहा है और अदम्य सवाल भी। हजारों सालों के संघर्षों के बावजूद इस सवाल का हल न होना ब्राह्मणवादी व्यवस्था की और उसे जुड़ी शक्ति और संपत्ति की व्यवस्थाओं की मजबूती का प्रमाण है। लेकिन अगर यह सवाल हजारों साल तक अदम्य रहा और बराबर बाहरी सामाजिक संकटों को जन्म देता रहा तो इससे यह बात भी साबित होती है कि प्रभुत्व की व्यवस्था क ी वहशी ताकत अपनी जगह, उस व्यवस्था की व्यापक जन-स्वीकृति में बराबर दरारें भी पड़ती रहती हैं।
उत्पीडि़त वर्ग बराबर खड़े होकर उत्पीडि़त होते रहने से इंकार करता है और हमारे समाज के बेहतरीन और सबसे ज्यादा प्रगतिशील तत्वों ने इस सवाल को जिन्दा रखा है। मेरा अपना विचार यह है कि जाति-विरोधी सामाजिक समतावादी विचारधारा से लैस भक्ति-सूफी परंपरा ने, जो भारत के लगभग हर क्षेत्र और भाषा में व्याप्त रही है, प्रभुत्वशाली समाज के विश्वासों और उसके द्वारा गढ़े गए औचित्य के सामने संकट पैदा करने और उसे गहराने में भारी योगदान दिया है। महात्मा बुद्ध, महावीर जैन, नाथों-सिद्धों, भक्तिकालीन संतों कबीर, नानक, रैदास, दादू आदि के सशक्त आन्दोलन भी जाति-व्यवस्था को मिटाने के लिए हुए, जिन्होंने समाज को आन्दोलित-उद्धेलित किया। महात्मा जोतिबा फूले, डा. भीमराव आम्बेडकर ने इसके खिलाफ जबरदस्त आन्दोलन किए, जिसने जाति-व्यवस्था को प्रभावित किया, लेकिन उनका हश्र भी यही हुआ, और जाति-व्यवस्था समाज में बनी ही रही।
जाति-व्यवस्था के समाप्त न होने का कारण इसका सोपानिक क्रम है। जाति-व्यवस्था के दो पक्ष हैं। पहले के अनुसार मनुष्यों को अलग-अलग समुदायों में विभाजित किया जाता है। जाति-व्यवस्था के दूसरे पक्ष के अनुसार सामाजिक दर्जे में इन समुदायों का सोपानिक क्रम निर्धारित किया जाता है। प्रत्येक जाति को गर्व है और इस बात से संतुष्टि है कि वह जाति-क्रम में किसी अन्य जाति से ऊंची है। इस श्रेणीकरण के बाह्य लक्षण के रूप में सामाजिक और धार्मिक अधिकारों का भी एक श्रेणीकरण है, जिन्हें शास्त्रीय रूप से अष्टाधिकार और संस्कार कहा जाता है। किसी जाति का दर्जा जितना ऊंचा होगा, उतने ही अधिक उसके अधिकार होंगे। समुदायों के इस श्रेणीकरण तथा जातियों के इस सोपान ने जाति-व्यवस्था के विरुद्ध एक सामूहिक मोर्चा खोलना असम्भव बना दिया है। जाति-भेद न केवल लोगों को टुकड़े-टुकड़े में बांट देता है, बल्कि साथ ही यह सबके मन में ऊंच-नीच का भाव पैदा करता है। ब्राह्मण समझता है कि हम बड़े हैं, राजपूत छोटे हैं। राजपूत समझता है कि हम बड़े हैं, कहार छोटे हैं। कहार समझता है हम बड़े हैं चमार छोटे हैं। चमार समझता है हम बड़े हैं, मेहतर छोटे हैं। और मेहतर भी अपने मन को समझाने के लिए किसी को छोटा कह ही लेता है। हिन्दुस्तान में हजारों जातियां हैं और सबमें यह भाव है।
कभी यह आर्थिक इकाई के तौर पर तो कभी सामाजिक इकाई के तौर पर तो कभी राजनीतिक इकाई के तौर पर अपना रूप बदलती रही और धार्मिक वैधता ने इसे समाप्त नहीं होने दिया। जाति-व्यवस्था अपने लचीलेपन के कारण भी समाज में स्वीकार्य बनी रही। वर्ण या जाति-व्यवस्था के बारे में मनुस्मृति में दिए गए नियम-निर्देश कभी भी कठोरता से लागू नहीं हुए। आर्थिक या राजनैतिक हैसियत बदलते ही जाति का दर्जा भी बदलता रहा है। निम्र मानी जाने वाली जातियां उच्च मानी जाने वाली जातियों के तौर तरीके अपना कर उनकी श्रेणी में अपना स्थान सुरक्षित करती रही हैं। प्रख्यात समाजशास्त्री व संस्कृतिविद् एम.एन. श्रीनिवासन ने इसे संस्कृतिकरण की प्रक्रिया कहा है, इसकी परिभाषा के अनुरूप एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें निम्र जाति के हिन्दू या आदिवासी या अन्य समूह अपने रीति-रिवाज, कर्मकाण्ड, विचारधारा और जीवन-दर्शन में उच्च जातियेां का अनुकरण करती हैं और जिससे क्रमिक रूप से जाति का पुनर्जन्म होता है। निम्र जाति में सामाजिक सर्वोच्चता की यह भ्रांति भ्रमित चेतना का परिणाम है।
जाति-व्यवस्था के वैचारिक आधार पर करारी चोट करने व जनता में व्यापक समर्थन के बावजूद ये आन्दोलन इसीलिए असफल हुए कि ये जाति-व्यवस्था के सामाजिक-आर्थिक आधार को पहचान कर उसे बदल पाने में कामयाब नहीं हुए। इन आन्दोलनों की कमजोरी को रेखांकित करते हुए वामपंथी विचारक बी.टी. रणदिवे ने लिखा कि हमारे देश के समाज-सुधारकों ने भारत में कृषि-क्रांति और जातिगत व समुदायगत असमानताओं, पूर्वाग्रहों तथा इनसे चालित दृष्टिकोणों के कायम बने रहने के बीच के इस महत्वपूर्ण रिश्ते को नहीं पहचाना है। उनके लिए नजर में ये कुप्रथाएं सिर्फ पूर्वाग्रह हैं जिनकी निन्दा करके, इनमें विश्वास रखने वालों को इन्हें छोड़ देने पर राजी कर लेने भर से, इनसे मुक्त हुआ जा सकता है, इससे ज्यादा और कुछ भी करने की जरूरत नहीं है। इनके खिलाफ संघर्ष को वर्तमान सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष से व इस व्यवस्था के पूर्व-पूंजीवादी तथा पूंजीवादी आधार के विरुद्ध संघर्ष से और वर्गीय शोषण के इसके आधार के विरुद्ध संघर्ष से जोडऩे की कोई जरूरत नहीं है। उनके तईं यह संघर्ष आम जनवादी आंदोलन का यानी वर्ग-संघर्ष का हिस्सा नहीं होना चाहिए।
जाति-व्यवस्था भूमि-संबंधों की उत्पति है। भूमि पर वास्तविक श्रम करने वाले को उसके श्रम से अलग करने के शोषणकारी विचार को वैधता प्रदान करती है। स्वाभाविक है कि संपत्ति-संबंधों को बदले बिना जाति-प्रथा की समाप्ति नहीं हो सकती। इस बात की पुष्टि के लिए गौर करना होगा कि अधिकांश भूमिहीन भू-श्रमिक दलित जातियों से हैं। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान भूमि-सुधार जमीन जोतने वाला ही जमीन का मालिक हो का सवाल मुख्य सवाल बना था, लेकिन स्वतंत्रता के बाद शासक वर्गों ने इसे ठण्डे बस्ते में डाल दिया। भूमि सुधारों को लागू किया जाता तो संपत्ति-संबंधों के बदलने से जाति-व्यवस्था के आधार पर चोट होती। स्वतंत्रता-आंदोलन के दौरान नेताओं ने सामाजिक न्याय व सामाजिक परिवर्तन के मुद्दों को स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद के लिए स्थगित कर दिया था, लेकिन स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद कोई सामाजिक आन्दोलन नहीं छेड़ पाए। हरित क्रांति के बाद भी संपत्ति के संबंध नहीं बदले, जाति की विभेदकारी प्रथा भी समाप्त नहीं हुई।
बदलती तकनीक, आर्थिक विकास व आधुनिकता के कारण खान-पान और सामाजिक व्यवहार में दलित-सवर्ण की श्रेणियों के अलगाव को कम करके जाति-व्यवस्था की जकड़ को शिथिल किया है। आधुनिक विकास ने समाज के विभिन्न समाज के तौर-तरीकों से वैयक्तिकता व स्वतंत्र निर्णय की भावना का विकास हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप अन्तर्जातीय विवाह की ओर रूझान बढ़ा है। अन्तर्जातीय विवाह करने वाले युवक-युवतियों पर अत्याचार किए जाते हैं, यहां तक कि उनकी हत्या तक कर दी जाती है, लेकिन इसके बावजूद अन्तर्जातीय विवाह की प्रवृति बढ़ रही है, जो जाति-व्यवस्था के टूटने की पूर्व सूचना दे रही है।
सदियों से वंचित-पीडि़त दलित वर्ग के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए सरकारी नौकरियों व सत्ता में भागीदारी के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई, जिसके सकारात्मक परिणाम भी निकले, लेकिन इससे सामाजिक अन्याय व उत्पीडऩ समाप्त नहीं हुआ, बल्कि वर्चस्वी वर्गों के कुछ हिस्सों में इसकी नकारात्मक प्रतिक्रियाएं भी हुई।
जाति-व्यवस्था को शासक वर्गों ने बढ़ावा दिया है। जाति-व्यवस्था उच्च वर्गों का हथियार रही है। इसलिए यह जनता की वर्गीय एकता को तोड़कर शासक वर्गों के काम आती रही है। साम्राज्यवादी शक्तियों ने भी इसका प्रयोग किया। औपनिवेशिक शोषण में विभेदीकरण की प्रक्रिया अंतर्निहित थी, जिसमें कुछ भारतीय समुदायों को अन्य समुदायों की कीमत पर फायदा दिया जाता था। 1901 की जनगणना के बाद से ब्रितानियों ने देशी लोगों के मतानुसार सामाजिक अग्रता के आधार पर प्रत्येक दस वर्ष बाद होने वाली जनगणना द्वारा सीधे हस्तक्षेप किया। एक ऐसा प्रयास, जिसमें लगातार जाति-नेता होने के दावों-प्रतिवादों में वृद्धि उत्पन्न की, श्रेष्ठता के दावों को बढ़ावा दिया, जाति-संगठनों को बढ़ावा दिया और जाति के मिथकीय इतिहास की खोज में बढ़ोतरी की। बेहतर सामाजिक स्तर प्राप्त करने की आकांक्षा के चलते उप जातियों के लोग अब अपना सामुदायिक समर्थन जातीय भ्रातृत्व के नाम पर अपने जाति-नेता को देने लगे। यह नेता मछली-रोटी मलाई पाकर शासकों का समर्थन करते थे। उपजातियों के निम्रतम तबकों में जाति-भ्रातृत्व के नाम पर छद्म चेतना विकसित हुई और यह चेतना धूर्ततापूर्ण परिस्थितियों से अपनी आंखें मूंदे रही। सामान्य लोग इन सारे फायदों के हिस्सेदार नहीं थे। उनके समाज के विशिष्ट लोग ही सारे बड़े फायदों को प्राप्त कर लेते थे। वह इस सारे मामले को बिल्कुल ठीक-ठाक सामने रखने पर पाते हैं कि अधिकतर मामलों मेंजाति की छद्म चेतना ने वर्ग-चेतना को ढंक लिया या विरूपित किया और वर्गीय समझदारी विभाजनों और संकीर्णता से धुंधली हुई।
जाति-व्यवस्था उच्च वर्ग की उत्पति है, जो निम्र वर्ग में फूट डालकर उसकी एकता को छिन्न-भिन्न करती है। जाति-व्यवस्था के नियमों या आचार-संहिता का तोड़ता है तो उस पर कोई दण्डात्मक कार्रवाई नहीं की जाती। कथित खाप या जाति-पंचायतों के सामाजिक बहिष्कार से लेकर हत्या तक की कार्रवाई का शिकार समाज के गरीब व कमजोर लोग हुई हैं, किसी प्रभावी-वर्चस्वी व्यक्ति को प्रताडि़त करने की हिम्मत किसी गोत्र या जाति पंचायत ने नहीं की। हरियाणा के उच्च अधिकारियों व मंत्रियों के बेटे-बेटियों ने अन्तर्जातीय विवाह किए हुए हैं, लेकिन किसी जातिवादी, मर्यादावादी पंचायती ने उनके खिलाफ कभी चूं तक नहीं की, बल्कि उसका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उसके इर्द-गिर्द मंडराते हैं। इसमें कुछ हैरान करने वाला इसलिए नहीं है कि उच्च वर्गों ने जाति-व्यवस्था के बंधन या आचार-संहिता अपने लिए नहीं बनाई, बल्कि समाज के निचले वर्गों में फूट डालने व वैमनस्य पैदा करने के लिए बनाई है। शोषित-निम्र वर्ग की एकता को तोडऩे के लिए जाति-व्यवस्था काम आ रही है।
संदर्भ:
1- सं. मणिमाला धर्मान्तरण: जरा सी जिन्दगी के लिए बुक्स फॉर चेन्ज, दिल्ली 2003 पृ.- 20 प्रकाश लुईस का लेख-दलित आदिवासी और धर्मान्तरण: दिशा और दृष्टिकोण
2- जाति प्रथा दो निबंध संवाद प्रकाशन मुम्बई पृ.२० के.वी. रमन्ना जाति और वर्ग ऐतिहासिक रूपरेखा
3- जाति प्रथा दो निबंध संवाद प्रकाशन मुम्बई पृ. के.वी. रमन्ना जाति और वर्ग: ऐतिहासिक रूपरेखा
4- डा. सुभाष चन्द्र जाति क्यों नहीं जाती? उदभावना प्रकाशन, दिल्ली पृ.114 शैलेन्द्र शैली का लेख
5- नया पथ अप्रैल जून, 2008 पृ.15 एजाज अहमद का लेख-हिन्दुस्तान की तामीर
6- डा. सुभाष चन्द्र जाति क्यों नहीं जाती? उदभावना प्रकाशन, दिल्ली पृ.52 डा. आम्बेडकर का लेख जाति प्रथा-उन्मूलन
7- डा. सुभाष चन्द्र जाति क्येां नहीं जाती? उदभावना प्रकाशन, दिल्ली पृ.राहुल सांकृत्यायन तुम्हारी जात-पांत की क्षय
8- डा. सुभाष चन्द्र जाति क्यों नहीं जाती? उदभावना प्रकाशन, दिल्ली, पृ.86 बी.टी. रणदिवे का लेख, जाति, वर्ग और संपत्ति के संबंध
9- श्यामाचरण दुबे भारतीय समाज नेशनल बुक ट्रस्ट, इण्डिया, दिल्ली, चौथा सं. पृ.52
10- जाति प्रथा दो निबंध संवाद प्रकाशन मुम्बई पृ.67

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